मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

थोड़ी सी सूझबूझ

बाल कहानी 
                    थोड़ी सी सूझबूझ             

                                                  पवित्रा अग्रवाल
 
अंगद को स्कूल आते देख उसके मित्र सोमेश ने पूछा ---
        "अंगद तुम तो बहुत रेगुलर हो पर इतने दिनों से स्कूल क्यों नहीं आ रहे थे ?'
    उदास स्वर में अंगद ने कहा--"सोमेश ,मेरे दादा जी नहीं रहे ।'
 "अरे , क्या वो बीमार थे ?'
 "वैसे उन्हें बी पी हाई रहता था तो उसकी वह दवा खाते थे।पर इस समय तो बिल्कुल ठीक थे।मेरी तीन चार दिन की छुट्टी थीं तो दादा,दादी बोले चलो हरिद्वार चलते हैं। गंगा नहा कर एक दो दिन वहाँ रुकेंगे,मैं भी तैयार हो गया।...मुझे क्या पता था कि ऐसा हो जाएगा।'
 "तो क्या उनकी मौत हरिद्वार जा कर हुई थी ?'
 "नहीं हरिद्वार जाते समय ट्रेन में उनकी तबियत खराब हो गई थी।टाइलेट से लौटे तो पसीने में भीगे हुए थे। मैं ने और दादी ने उन्हें बर्थ पर लिटा कर पानी पिलाया फिर उनकी हवा करने लगे । साथ ही गाड़ी  हरिद्वार पहुंचने का इंतजार करने लगे।'
 "हरिद्वार कितनी दूर रह गया था ?'
 "करीब दो घन्टे का रास्ता बचा था ।'
 "फिर तुमने कोई मेडिकल ऐड देने की कोशिश नहीं की ?'
 "मैं क्या मदद करता... मैं कोई डाक्टर तो था नहीं।' 
 "अरे यार मरीज की मदद करने के लिए डाक्टर होना जरूरी नहीं होता। मेरे पापा एक बार दिल्ली से ट्रेन में अकेले आ रहे थे। उनकी तबियत एक दम से खराब हो गई था। उनके साथ के लोगों ने जैसे ही उनकी हालत बिगड़ते देखी  वह लोग एक दम से एक्टिव हो गए।हर केबिन में जाकर पूछा कि आप में से कोई डाक्टर हैं क्या और उन में से एक डाक्टर निकल आया। दवाएं उनके पास थीं,उनसे पापा को आराम हो गया।'
 "उन्हें क्या हुआ था ?'
 "लूज मोशन्स और वोमेटिंग । ऐसे संकट के समय में टी टी से भी तुरंत सम्पर्क करना चाहिए। वह निकटतम स्टेशन पर डाक्टर की व्यवस्था कर के रख सकता हैं,ट्रेन में भी उनकी नजर में कोई डाक्टर हो तो बुला कर मदद कर सकता है।...कहने का मतलब यह कि कोशिश करने पर मदद की उम्मीद बढ़ जाती है।'
     "हाँ यार तू ठीक कह रहा है। मैं उनकी हालत देख कर इतना घबड़ा गया था कि कुछ सूझा ही नहीं। हो सकता है हमारे भी आस पास की बोगी में कोई डाक्टर रहा हो या मैं टी टी से कहता तो वह भी कुछ मदद कर सकता था। कितना डफर हूँ मैं। काश मेरे दिमाग में भी यह ख्याल आया होता..अटैक के बाद दादा जी हरिद्वार तक जीवित रहे थे,स्टेशन पर उतर कर जब तक डाक्टर साहब आए तब तक उनकी मौत हो चुकी थी ।'
      "बाप रे, अंगद अकेले तूने यह सब कैसे संभाला होगा। फिर तुम उनके शव को यहाँ ले कर आए थे या वहाँ पर ही अंतिम संस्कार कर दिया था ?'
    "अरे यार बड़ा मुश्किल समय था वह। अनजान शहर था । पुलिस ऐसे पूछताछ कर रही थी जैसे हमने उनकी हत्या कर दी हो। मोबाइल पास में था ,निकट के रिश्तेदारों को सूचना दी। तो पता लगा कि हमारे एक रिश्तेदार उस समय गंगा नहाने हरिद्वार आए हुए थे। समाचार मिलते ही वह स्टेशन आ गए। आते ही उन्हों ने सब स्थिति संभाल ली थी।. .. फिर धीरे धीरे परिवार के अन्य लोग आ गए। दूसरे दिन सुबह हरिद्वार में ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया था। कभी कभी मैं गिल्टी महसूस करता हूँ...समय पर मदद मिल जाती तो शायद दादा जी बच जाते।'
    "अंगद, अपने को दोष देने से कोई फायदा नहीं है। तेरी जगह मैं होता तो शायद मैं भी कुछ नहीं कर पाता। वह तो पापा को इस तरह की मदद ट्रेन में मिली थी तो हमें लगा था कि उनके साथ यात्रा कर रहे लोग कितने होशियार और सूझ बूझ वाले थे। हमारे सामने उन्हों ने एक उदाहरण पेश किया था कि अचानक आए संकट से घबड़ाना नहीं चाहिए । थोड़ी सूझबूझ से उसका सामना करना चाहिए।.....चल अब क्लास में चलते हैं।'

मेरे ब्लोग्स ---

1 टिप्पणी:

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