मंगलवार, 3 अक्तूबर 2017

विकलांगता का दुःख

बाल कहानी
         विकलांगता का दुःख
                                                              
                                                    पवित्रा अग्रवाल
 
        मदन ने जब आँखें खोलीं तो सामने पिता, माँ व दादी खड़े थे। उसने इधर-उधर नजर दौड़ाई तो जगह  अनजानी लगी।
  "माँ मैं कहाँ हूँ ?'
  "बेटे, तुम अस्पताल में हो। कल स्कूल जाते समय तुम्हारी कार का एक्सीडेंट हो गया था।'
  "मेरी आँख पर यह पट्टी क्यों है ? हाथ पर भी प्लास्टर है। क्या हाथ की हड्डी टूट गई है ?'
  "हाँ बेटे, तुम्हारे हाथ की हड्डी टूट गई है। एक आँख में भी चोट लगी है।'
    आँख में चोट लगने की बात सुन कर मदन घबरा गया, "आँख में चोट ? माँ कहीं ऐसा तो नहीं कि इस एक आँख से अब मैं देख ही न पाऊँ ?'
  "ऐसा कुछ नहीं होगा। तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगे ।'
 मदन आँखें बंद करके लेट गया। उसे बहुत सी बातें याद आ रही थीं। पिछले वर्ष कक्षा में सोनू के  प्रथम आने पर उसने अपने मित्र अमित से कहा था, "यार, इस बार तो लँगड़े सोनू ने बाजी मार ली।'
    अमित को उसकी बात पसंद नहीं आई थी। उसने कहा था, "मदन, क्या तू खाली सोनू नहीं कह सकता। नाम से पहले लँगड़ा या ऐसा कोई भी विशेषण लगाना जरूरी है ? शर्म की बात है हमारे लिए कि शारीरिक रूप से स्वस्थ होने के बाद भी पढ़ाई में उससे पीछे हैं।'
         "लँगड़ा है, इसीलिए तो प्रथम आ गया। न तो वह खेल सकता है और न कहीं ज्यादा आ जा सकता है। खाली बैठा क्या करे ... पढ़ता रहता होगा।...ज्यादा पढ़ेगा तो प्रथम तो आएगा ही।'
    अमित ने कहा, "मदन, ये सब फालतू के तर्क हैं। पता नहीं दूसरों की कमियाँ ढूँढ़ने में तुझे क्या मजा आता है। हमें दूसरों की अच्छाई देखनी चाहिए। दिलीप के हाथ में छह उँगली हैं तो तू उसे छंगा कहता है। मोहन को हकला कहता है। सुरेश को मोटा होने की वजह से हाथी कहता है। यह अच्छी बात नहीं है। शारीरिक दोष तो किसी में कभी भी आ सकता है।एक दुर्घटना में सोनू की टाँग कट गई थी तो वह लँगड़ा कर चलता है। तू किसी की शारीरिक कमी का मजाक उड़ाना छोड़ दे।'
        ये बातें याद करके मदन रोने लगा था । उसे लगा कि वह अब एक आँख से देख नहीं पाएगा।
        माँ-पापा यहाँ तक कि डॉक्टर ने भी उसे विश्वास दिलाया था कि वह ठीक हो जाएगा।
 लेकिन कुछ भी ठीक नहीं हुआ था। आँख में कार का शीशा चुभ गया था। डॉक्टर उसकी आँख नहीं बचा पाए। उसे एक कृत्रिम आँख लगा दी गई थी। वह अपने कमरे में बैठा रहता। सोचता रहता था कि नकली आँख देख कर बच्चे उसका मजाक उड़ाएँगे।
           माता-पिता ने उसे बहुत समझाया  लेकिन स्कूल भेजने में सफल नहीं हुए फिर अमित ने ही मदन को समझाया था और कहा था, "यह तुम्हारा भ्रम है। कोई मजाक नहीं उड़ाएगा। नवाब पटौदी की भी एक आँख दुर्घटना में खराब हो गई थी। उनकी भी कृत्रिम आँख लगी है। उसके बाद भी वह विज्ञापनों में काम कर रहे हैं और जहाँ तक मुझे याद पड़ता है बाद में भी वह क्रिकेट खेले हैं। उनकी योग्यता के सामने शारीरिक दोष छिप गया। तुम भी इस दुर्घटना को भूल जाओ और मेरे साथ स्कूल चलो। सब तुम्हें बहुत याद करते हैं।'
       दुर्घटना के बहुत दिन बाद आज वह स्कूल गया था। शिक्षक व कक्षा के सभी छात्रों ने बड़े प्यार से उसका स्वागत किया था। सोनू भी हमेशा की तरह उससे बड़ी गर्मजोशी से मिला था लेकिन मदन सोनू से नजर नहीं मिला पा रहा था। वह स्वयं को शर्मिंदा महसूस कर रहा था। विकलांगता का दुख उसकी समझ में आ गया था। अब उसे दूसरे की तकलीफों का एहसास होने लगा था। बिना कुछ कहे उसने सोनू को गले से लगा लिया। दोनों की आँखों में आँसू थे।.
       

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1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (04-010-2017) को
    "शुभकामनाओं के लिये आभार" (चर्चा अंक 2747)
    पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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