बुधवार, 9 अगस्त 2017

पानी के बताशे

बाल कहानी
                        पानी के बताशे
       
                                                   पवित्रा अग्रवाल


      ट्यूशन पढ़ कर लौटते हुए शालिनी की नजर चाट के ठेले पर पड़ी। गोल गप्पे देख कर उस के मुंह में पानी भर आया।उसने अपनी सहेली से कहा -- "रोहिणी देख सामने की बंडी पर पानी के बताशे मिल रहे हैं ।''
  "तुम इन्हें पानी के बताशे बोलती हो, हम इन्हें गोल गप्पे कहते हैं।''
     "हाँ कुछ लोग पानी पुड़ी भी बोलते हैं पर यार है बड़े मजे की चीज।इन्हें देख कर तो मेरे मुंह में पानी   आ रहा है,चल खाते हैं।''
  "नहीं शालिनी मैं बाहर के गोल गप्पे कभी नहीं खाती ।मेरी मम्मी ने कभी खाने ही नहीं दिए। सब से   ज्यादा इंफैक्शन की जड़ हैं ये ।''
     "वो कैसे ?''
  "देख शालिनी आज कल पीने का पानी कितना गंदा आ रहा है।अपने घरों में एक्वागार्ड या इसी तरह की पानी साफ करने की कोई न कोई मशीन लगी है।... पर इनके पानी का कोई भरोसा नहीं है।''
 " हाँ सो तो है।''
 " देख जिन हाथों से ये रुपए पैसे लेते हैं, उन्ही हाथों से यह चाट बना रहे हैं...इन्ही से घड़े में हाथ डुबो कर बताशों में पानी भर भर कर लोगों कों खिलाते भी जा रहे हैं।इस तरह हाथ की सारी गंदगी उस   पानी में घुलती जाती है।''
  "हाँ रोहिणी बात तो तूने बिलकुल सच कही है पर यह रूपए पैसे वाली बात मेरी समझ में नहीं आई।''
 "ये रुपए पैसे सैंकड़ों लोगों के हाथ से गुजरते हैं।जैसे हम खाँसते या छींकते समय मुंह पर हाथ रखते  हैं, हाथ गंदे हो गए न,सफाई कर्मचारी कचरा उठा रहा है किसी ने रूपए दिए तो उन्हीं हाथों से ले कर उसने जेब में रख लिए ... कहने मतलब यह है कि  रूपए पैसे लेते देते समय हाथों की गंदगी रुपयों में लगती रहती है और रुपयों की यात्रा जारी रहती है । ''   
  "ओ हाँ रोहिणी रुपए पैसे तो वाकई गंदे होते हैं। यह गंदगी भी हाथों द्वारा पानी में घुल जाती होगी । छी, अब तो मैं बाहर पानी के बताशे कभी भी नहीं खाऊंगी।...पर ये मुझे बहुत पसंद हैं तुझे अच्छे नहीं  लगते ?'
     "अच्छे क्यों नहीं लगते शालिनी, मुझे भी बहुत पसंद हैं ।मैं खाती भी हूँ पर घर पर ।...आजकल तो बाजार में गोल गप्पों का पैकेट मिलता है,पापा वही ले आते हैं।मम्मी आलू ओर मटरा उबाल लेती हैं और पानी भी घर में ही बना लेती हैं ।इस तरह हम लोग तो अक्सर घर में खाते ही रहते हैं ।''
  "पर बाहर का पानी बहुत मजेदार होता है ,वैसा घर में नहीं बन पाता होगा ।''
  " "घर में भी अच्छा बन जाता है,मम्मी तो धनियां ,पोधीना जाने क्या क्या डाल कर बनाती हैं,सब मसालों  का खेल है। वैसे बाजार में पानी पुड़ी मसाले का पैकेट भी आता है।...पर सब से खास बात शालिनी  यह है कि स्वाद के चक्कर में हम स्वास्थ्य से खिलवाड़ तो नहीं कर सकते न ।''
  "बिलकुल ठीक कहा तूने रोहिणी ,स्वास्थ्य से खिलवाड़ का मतलब है ...डाक्टर्स के चक्कर लगाओ, दवाएं खाओ।... मतलब समय व धन दोनो की बरबादी।''
  "देख शालिनी सामने की दुकान पर गोल गप्पों का पैकेट मिल रहा है।चल लेते हैं साथ ही इसके मसाले का पैकेट भी ले लेंगे ।''
 "पर पानी कौन बनाएगा ?''
 "शालिनी,पहले मेरे घर चल मम्मी से पानी  बनवा लेंगे,तू भी देख लेना कैसे बनता है।..हमारी फ्रिज में हमेशा कुछ उबले आलू जरूर रहते हैं।...अब तू गोल गप्पे खा कर ही जाना और हाँ हमारे घर से अपनी मम्मी को फोन कर देना...वरना वह चिन्ता करेंगी।''
   "अरे मेरे मुंह में तो फिर पानी आने लगा '' दोनो हँसती हैं
      

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