सोमवार, 24 अप्रैल 2017

ठंडा ठंडा टेस्टी टेस्टी

बाल कहानी
                   ठंडा ठंडा टेस्टी टेस्टी
                                                                    पवित्रा अग्रवाल 

       श्लोक स्कूल से लौट कर गले पर हाथ रखते हुए बोला – ‘माँ गले में बहुत दर्द हो रहा है ,कुछ निगलने में भी दर्द है ’
         ‘श्लोक सुबह तक तो तुम बिलकुल ठीक थे...अचानक गले में दर्द कैसे होने लगा ?बाहर कुछ खाया पिया था क्या ?’
    ‘मम्मी खाया तो कुछ नहीं था पर इंटरवल में बाटल का पानी ख़त्म हो गया था तो स्कूल से लौटते समय बंडी पर गन्ने का रस पिया था ...ठंडा ठंडा बहुत स्वादिष्ट था .उसमे बर्फ ,नीबू का रस और मसाला भी पड़ा था .मम्मी सच में इतना टेस्टी था कि मैं एक गिलास की जगह दो गिलास पी गया .’
       अपनी धुन में श्लोक इतना उत्साहित होकर बोले जा रहा था ...वह भूल गया था कि अभी उसने माँ से गले के दर्द की शिकायत की है .जब उसका ध्यान सामने
खड़ी उसे घूरती माँ पर गया तो वह अचकचा कर चुप हो गया .
     ‘हाँ तो अब उस टेस्टी टेस्टी गन्ने के रस पीने का मजा भी लूटो .तुम्हे पता है न जब भी तुम यह रस पीते हो तो बीमार हो जाते हो और फिर एंटीबाइटिक्स से ही ठीक होते हो ’
    ‘सोरी मम्मी मैं भूल गया था ...सर में भी बहुत दर्द है.. .कहीं बुखार तो नहीं है?’
    माँ ने उसे छूकर देखा-- ‘अरे तुझे तो बहुत तेज बुखार है ,परीक्षा निकट है और पापा भी टूर पर गए हुए हैं.पहले बुखार कम करने के लिए क्रोसिन की गोली खाओ फिर डॉक्टर के पास चलते हैं ’
      तभी क्रिकेट खेलने के लिए बुलाने उसके दोस्त आगये – ‘आंटी डॉक्टर के पास कौन जा रहा है ?’
     ‘श्लोक के गले में दर्द है और बुखार भी तेज है ...स्कूल से बाहर वाली बंडी से गन्ने का रस पीकर आया है  ,लगता है इन्फेक्शन हो गया है ’
      पंकज ने कहा –‘ आंटी मैं तो रोज पीता हूँ ,मुझे तो कुछ नहीं होता .’
      सुबीर बोला – ‘मैंने एक बार पिया था तो लूज मोशन हो गए थे तब घर पर बहुत डांट पड़ी थी .उसके बाद फिर कभी नहीं पिया ’
     ‘बेटा हरेक के शरीर की प्रतिरोधक क्षमता अलग अलग होती है.श्लोक को आइसक्रीम ,ठन्डे जूस बिलकुल सूट नहीं करते .इनके सेवन से सबसे पहले इसका गला ख़राब होता है फिर ठीक होने में बहुत दिन लग जाते हैं .इसके पीने से भले ही तुम्हे कुछ नहीं होता पर यह तो तुमको भी मालूम है कि गन्ने का रस कितना अनहाइजिनिक होता है .’
‘वह कैसे आंटी ?’
‘गन्ने सड़क के किनारे एसे ही रखे रहते हैं और बंडी वाले रस निकालने के लिए उन्हें उठा उठा कर मशीन में डालते जाते हैं और मशीन में मोड़ मोड़ कर तब तक डालते रहते हैं जब तक उसका पूरा रस न निकल आये .अब गन्ने में कुछ गन्दा चिपका होगा तो वह रस में ही तो मिलेगा न...मैं ठीक कह रही हूँ हैं न ?’
‘आंटी आप बिलकुल ठीक कह रही हैं पर वह गन्नों को धो कर रखते हैं ’
‘बेटा गन्नों पर पानी डालना या उन्हें पानी में से डुबो कर निकलना धोना तो नहीं होता ?...देखो खाना खाने के बाद प्लेट को पानी में से डुबो कर निकालने से वह साफ तो नहीं होती... खाना लगा रह जाता है .साफ करने के लिए उसे रगड़ कर मांजना फिर धोना पड़ता है .पर गन्ने इस तरह से कहाँ साफ हो पाते हैं... गन्ने के रस पर मखियाँ भी कितनी भिनभिनाती रहती हैं .’
‘हाँ आंटी बात तो आप की सही है .
‘एक बात और बेटा वह जो बर्फ स्तेमाल करते हैं वह भी अशुद्ध पानी की हो सकती है .इनके पास पानी की कमी होती है अतः गिलास भी साफ तरह से धुले नहीं होते .वैसे आज कल यह लोग भी प्लास्टिक के गिलास स्तेमाल करने लगे हैं.’
‘आंटी आपने इस विषय पर अच्छी रिसर्च कर रखी है ...आगे से हम भी सचेत रहेंगे ’
‘माँ सब कुछ जानते बुझते भी कभी कभी मन कर आता है पर आगे से ध्यान रखूंगा... अब आप मुझे जल्दी से क्रोसिन दे दो .’
‘गोली लेकर तुम आराम करो हिम्मत है तो दोस्तों से बात करो .मैं जल्दी से घर के कुछ काम निबटा लेती हूँ फिर डाक्टर के पास चलेंगे .’
‘आंटी इसे आराम करने दीजिये ...हम कल मिलते हैं ...बाय श्लोक .’
पवित्रा अग्रवाल