शुक्रवार, 3 मार्च 2017

रंगों की धारा

बाल कहानी 

                         रंगों की धारा
                                                  पवित्रा अग्रवाल
    
        नेहा और तुषार को जब से पता चला था कि होली पर दीदी के साथ जीजा जी भी आ रहे हैं तब से दोनों बहुत खुश थे और बेसब्री से होली और जीजा जी का इंतजार कर रहे थे।
      उन्होंने अपने पड़ोस के घरों में अपने दोस्तों को भाभी और जीजा जी के साथ बड़ी उमंग से होली खेलते देखा था। अपने कई दोस्तों  से उन्होंने होली के कई मजेदार किस्से भी सुने थे कि कैसे उन्होंने अपनी भाभी को रंग लगाया और जीजा जी को होली पर कैसे छकाया।
      तब नेहा व तुषार के न तो भाभी थीं और न जीजा अत: इस तरह के मजेदार अनुभव भी उनके पास नहीं थे। अभी तीन महीने पूर्व ही उनकी दीदी की शादी हुई थी, इस तरह एक जीजा तो उन्हें भी मिल गए थे। नेहा और तुषार की तीव्र इच्छा थी कि होली पर दीदी के साथ जीजा जी भी उनके घर आए तो खूब मजा आएगा।
     दीदी का पत्र आया था कि होली से एक दिन पूर्व वह जीजा जी के साथ होली मनाने आ रही हैं। यह समाचार सुनते ही दोनों खुशी से उछल पड़े थे और दोनों भाई-बहन मिलकर जीजा जी से होली खेलने के नए-नए तरीके सोच रहे थे। सोचते-सोचते ही दिन बीत गए और दीदी-जीजा जी आ गए और फिर होली भी आ गई।
       होली की सुबह दीदी जल्दी जाग गई थीं और मम्मी के साथ बातों में व्यस्त हो गई थी। जीजा जी अपने कमरे में गहरी नींद में सोए थे। बस नेहा और तुषार को मौका मिल गया। तुषार दरवाजे पर पहरेदारी करने लगा इतनी देर में नेहा ने हरे-लाल रंग की सूखे रंगों की पुड़िया उठाई और जीजा जी के बालों में डाल आई। किसी को पता भी नहीं चला और वह दोनों पुन: अपने बिस्तर में जाकर सो गए।
     सुबह उठते ही उनके जीजा जी को बाल काढ़ने की आदत थी। दीदी ने जब उन्हें चाय पीने के लिए जगाया तो बाल काढ़ कर उन्होंने मुँह धोने के लिए जैसे ही चेहरे पर पानी डाला तो मुँह पर गिरे हुए सूखे रंग ने अपना कमाल दिखा दिया। अपने चेहरे व हाथों में लगा रंग देखकर वे आश्चर्य में पड़ गए और दीदी को पुकार कर कहा -- "हेमा तुम तो बहुत होशियार निकलीं। सुबह-सुबह रंग लगा दिया और हमें पता भी नहीं चला।'
    "रंग ? ... कैसा रंग ? ... फिर जीजा जी का रंग से पुता चेहरा देख कर दीदी की हँसी छूट गई। किसने लगाया ये रंग ?...मैंने तो अभी तक रंग छुआ भी नहीं है और ना ही मेरे पास रंग है।'
    "तुमने नहीं नहीं लगाया ?...तब तो जरूर नेहा व तुषार की शरारत है।'
   "लेकिन वे दोनों तो अभी तक सो रहे हैं...खैर किसी ने भी लगाया हो...लेकिन इस रूप में तुम बहुत अच्छे लग रहे हो।' दीदी ने जीजा जी को छेड़ा था।
     जीजा जी ने अपने हाथों में लगा रंग जीजी के मुँह पर मलते हुए कहा, "अब तुम भी अच्छी लग रही हो।'
       नेहा व तुषार बराबर वाले कमरे में नींद का नाटक करते हुए दीदी-जीजा जी की बातों का आनंद ले रहे थे। तभी जीजा जी बोले, "हेमा यदि तुषार और नेहा सो रहे हैं तो फिर घर में बचा कौन। जरूर ये काम मम्मी-पापा का होगा फिर तो मैं भी उन्हें रंग लगा सकता हूँ।    उन्होंने बाथरूम में जाकर हाथ गीले किए और मम्मी-पापा के मुँह पर मलते हुए बोले- "आपके होली खेलने का अंदाज हमें बहुत अच्छा लगा। आपको भी होली मुबारक।'
     जब तक मम्मी-पापा दमाद की बात समझ पाते तब तक तुषार ने एक जग पानी जीजा जी के सिर पर डाल दिया था। हरे-लाल रंगों की धाराएँ उनके बालों से बहने लगी थीं।
    तुषार व नेहा ताली बजा-बजा कर हँस रहे थे 'जीजा जी ससुराल की पहली होली मुबारक हो। होली खेलने का हमारा अंदाज पसंद आया आपको ?'
     जीजी जी उन्हें पकड़ने के लिए  भागे तब तक वह दरवाजे से बाहर निकल चुके थे।
   (मेरे दूसरे बाल कहानी संग्रह 'चिड़िया मैं बन जाऊं 'में से एक कहानी )

 ईमेल -- agarwalpavitra78@gmail.com


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4 टिप्‍पणियां:

  1. हमेशा की तरह एक और बेहतरीन लेख ..... ऐसे ही लिखते रहिये और मार्गदर्शन करते रहिये ..... शेयर करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। :) :)

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  3. प्रभावशाली प्रस्तुति...
    मेरे ब्लॉग की नई प्रस्तुति पर आपके विचारों का स्वागत।

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