रविवार, 16 अक्तूबर 2016

यादगार दीपावली

 बाल कहानी
                                 यादगार दीपावली
     
                                                             पवित्रा अग्रवाल


        मेरे दोस्त नन्दू के पिता पटाखों का व्यापार करते हैं। उनका थोक का काम है। एक बार मुझ से नन्दू ने कहा था -"जब पटाखे लेने हों तो मेरे साथ चलना, मैं पापा से कह कर सस्ते दिलवा दूँगा।बाजार में यही पटाखे दुगनी कीमत पर मिलेंगे।'
     मैं ने पटाखों के लिए दो सौ रुपये मम्मी से लिए और दो सौ रुपये मैं ने अपने जेब खर्च में से बचाए थे।वह भी जेब में रख कर नन्दू के घर की तरफ चल दिया।
     नन्दू के घर एक औरत ( जो मुझे उनकी काम वाली लग रही थी ) बैठ कर रो रही थी और नन्दू की बहन से तीन सौ रुपये उधार मॉग रही थी। नन्दू की बहन ने कहा--"बाई बच्चे को सरकारी दवाखाने में ले जाना चाहिए था।वहाँ डॉक्टर की फीस भी नहीं देनी पड़ती और इलाज भी मुफ़्त में हो जाता।जब इलाज के लिए रुपये नहीं थे तो प्राइवेट अस्पताल में बच्चे को क्यों भरती करवा दिया ?'
          "बिटिया ,पहले मैं सरकारी अस्पताल में ही गई थी। वहाँ डॉक्टर साहब नहीं थे, उनका इंतजार करती तो मेरा बेटा मर जाता....उसकी हालत बहुत खराब है। उसे सुबह से उल्टी और दस्त हो रहे हैं। मैं काम पर गई हुई थी। घर जा कर जब उसकी हालत देखी तो घबरा गई और जल्दी से अस्पताल ले कर भागी...मजबूरी में मुझे प्राइवेट अस्पताल ले जाना पड़ा।डॉक्टर साहब ने पर्चा लिख कर दवाएँ जल्दी लाने को कहा है ,उसे ग्लूकोस चढ़ाना है..बिटिया मुझे जल्दी से तीन सौ रुपये दे दो,बहुत मेहरबानी होगी ।'
     "देखो बाई मैं तुम से पहले भी कह चुकी हूँ कि इस समय मम्मी घर पर नहीं हैं।हमारे यहाँ काम करते अभी तुम्हें दस दिन हुए हैं।उन से बिना पूछे तुम्हें तीन सौ रुपये कैसे दे दूँ ? तुम इंतजार कर लो,मम्मी थोड़ी देर में आती होंगी।'
    "पर मैं इंतजार नहीं कर सकती।तब तक तो मेरा बेटा मर जाएगा..मैं जाती हूँ,कही दूसरी जगह कोशिश कर के देखूँगी।' वह आँसू पोंछती हुई घर से बाहर चली गई।
      मैं ने उसे रोक कर डॉक्टर का पर्चा दिखाने को कहा।उस ने मुझे वह पर्चा दिखाया ।पर्चा देख कर मुझे विश्वास हो गया कि वह झूठ नहीं बोल रही है, मैं ने कहा--"तुम मेरे साथ चलो,मैं दवाए अभी दिलवा देता हूँ फिर तुम्हारे साथ डॉक्टर साहब के पास भी चलूँगा।...तुम्हारे पति कहाँ हैं ?'
      वह लंबी आह भर कर बोली--"वह मज़दूरी करता है पर रोज काम नहीं मिलता।कभी मिलता भी है तो उसे शराब पीने में उड़ा देता है।सुबह का गया रात को नशे में धुत्त हो कर लौटता है...नाम का पति है।उस की रोटी का जुगाड़ भी मुझे ही करना पड़ता है।'
     दवाएँ ले कर हम अस्पताल पहुँचे तो कम्पाउडर बोला --"तुमने बहुत देर कर दी..'
     "तो क्या मेरा बेटा....'
  "परेशान मत हो,तुम्हारा बेटा ठीक है।डॉक्टर साहब ने अपने पास से इंजक्शन लगा दिया है और ग्लूकोस भी चढाया जा रहा है।'
     "क्या करती साहब ,घर में एक पैसा नहीं था। कहीं से इंतजाम भी नहीं कर पाई।देवदूत की तरह यह बच्चा मुझे मिल गया।मेरा दुखड़ा सुन कर इसी ने मुझे सब दवाएँ खरीद कर दी हैं।मैं तो इसे जानती भी नहीं हूँ और न ये मुझे जानता है। ये दीपावली के लिए पटाखे खरीदने बाजार जा रहा था ,उन रुपयो से इस बच्चे ने मुझे दवाएँ दिलवा दीं।...देखो न मैं भी कितनी स्वार्थी हूँ... अभी तक इस बच्चे का नाम भी नहीं पूँछा -- "बेटा तुम्हारा नाम क्या है ?'
    "मेरा नाम अभिषेक है, प्यार से सब मुझे अभि कह कर पुकारते हैं।'
  कम्पाउडर ने कहा -- "शाबाश अभिषेक, तुम बहुत अच्छे हो।....क्या तुम्हारे घर में अब डाँट नहीं पड़ेगी ?'
      "कम्पाउडर साहब,ये रुपये तो कल तक पटाखे - बम के रूप में जल कर धुआँ बन जाते। मम्मी कहती हैं कि आतिशबाजी धन की बरबादी तो है ही ,इस से प्रदूषण भी फैलता है।जलने व आग लगने का खतरा भी बना रहता है। उनसे नुकसान ही नुकसान है,फायदा एक भी नहीं।मेरे इन रूपयो का उपयोग देख कर मम्मी बहुत खुश होंगी।'
    बचे हुए रुपये मैं ने बाई को देते हुए कहा-"ये रुपये तुम रख लो,अभी तुम्हें इन की जरूरत पड़ सकती है।तुम्हारा बेटा अब ठीक है,मैं जा रहा हूँ।'
      "बेटा तुम्हारे ये रुपये मुझ पर उधार हैं।मैं थोड़े-थोड़े कर के तुम्हें लौटा दूँगी । तुम नन्दू के दोस्त हो न ? मैं उन के घर काम करती हूँ।'
  "ठीक है।'
   घर में प्रवेश करते ही माँ ने पूँछा--"तू तो पटाखे लेने गया था,खाली हाथ क्यों लौट आया ?'
  "माँ आप कहती हैं न कि पटाखे छुड़ाना रुपयों का धुआँ उड़ाने के समान है। मैं ने आज उन रुपयों से एक गरीब बीमार बच्चे को दवा दिला दी है।सच माँ वह रुपये एक गरीब माँ के आँसू पोंछने के काम आए हैं। यह दीपावली बिना पटाखों के मनाने का मुझे जरा भी मलाल नहीं होगा बल्कि यह दीपावली मुझे हमेशा याद रहेगी।'
  पूरी बात सुन कर मेरी माँ की ऑखों में भी स्नेह के दीप जल उठे।


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      ईमेल – agarwalpavitra78@gmail.com

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3 टिप्‍पणियां:

  1. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (18-10-2016) के चर्चा मंच "बदलता मौसम" {चर्चा अंक- 2499} पर भी होगी!
    शरदपूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत ही उम्दा ..... बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ... Thanks for sharing this!! :) :)

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  3. बहुत ही उम्दा .... बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति .... Thanks for sharing this!! :) :)

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