शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

धन्यवाद मित्र

बाल कहानी  
                     
                                   धन्यवाद मित्र
                                                                
                                                                   पवित्रा अग्रवाल

      राकेश ने कालेज से लौट कर कपड़े बदले और बैट उठा कर क्रिकेट खेलने के लिए समीर के घर की तरफ चल दिया ,समीर दरवाजे पर ही मिल गया...
 "समीर  कुछ परेशान से दिख रहे हो ,कहीं जा रहे हो क्या ?'
 "हाँ राकेश  अभी अभी खबर मिली है कि ताऊ जी की मौत हो गई है,मम्मी पापा तो उनके पास ही थे।'
 "बीमार थे क्या ?'
 "हाँ कुछ दिन से बीमार चल रहे थे पर ऐसी उम्मीद नहीं थी कि ठीक नहीं होंगे ।'
 "चलो मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ ,मेरा यह बैट अपने घर में रख दो।'
           मौत की खबर सुन कर राकेश के मन मैं कुछ चल रहा था। उसका मन हुआ कि अपने मन की बात समीर को बता दे पर कुछ संकोच भी हो रहा था। कुछ सोचते हुए उसने समीर से पूछा ."तुम्हारे ताऊ जी ने कभी मरने के बाद अपनी आँखें दान करने की बात कही  थी ?'
 "नहीं राकेश मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं है यदि ऐसा कुछ होगा तो ताई जी को पता होगा ।...पर  आजकल पढ़ने में आ रहा है कि बहुत से लोग मरने से पहले अपनी आँखें दान करने की बात घर वालों से कह कर जाते हैं।आज सुबह के अखबार में पढ़ा था कि क्रिकेट खिलाड़ी नवाब पटौदी भी अपनी आखें दान कर गए थे .
 " और तुम्हें मालुम है समीर उनके तो एक ही आँख थी... एक  किसी दुर्घटना में खराब हो गई थी वह एक आँख से भी काफी क्रिकेट खेले और उसे भी दान कर गए।'
    'हाँ यह तो मैं ने भी पढ़ा था राकेश। जागरूक लोग फार्म भरके अपने जीवन काल मे ही नेत्रदान करने की इच्छा सब को बता देते हैं।...पर जो ऐसा नहीं कर पाए हैं क्या उनके घर वाले भी मृत व्यक्ति की आँखे दान कर सकते हैं ?'
   "हाँ इस पुण्य के काम में कोई बाधा नहीं है। मेरी मौसी की कुछ दिन पहले ही मौत हुई थी , उनकी  आँखें भी दान कर दी गई थीं ...जब कि उन्होंने ऐसी कोई इच्छा मरने से पहले व्यक्त नहीं की थी।'
   " राकेश मैं तुम्हारी बात समझ रहा हूँ क्यों न अपने घरवालों को समझा कर मैं ताऊ जी की आँखे भी दान  करने बात करूँ ।...किसी नेत्रहीन  की  जिन्दगी बदल जाएगी। वह इस दुनिया को अपनी आँखों से देख पाएगा।'
 "समीर उन आँखों से एक नहीं दो व्यक्ति देख सकेंगे।'
 - "अच्छा ! दोनो आँखें एक को नहीं बल्कि दो लोगों को एक एक लगाई जाती हैं ?'
 "हाँ।.. यदि नेत्र दान करने हैं तो समीर इसके लिए सब से बढ़िया जगह  अस्पताल ही रहेगी ।डाक्टर्स को अपनी इच्छा बताने पर वह लोग सब प्रबन्ध कर देंगे...पर हमें जल्दी से अस्पताल पहुँचना चाहिए।'
समीर ने पूछा -"क्या नेत्र दान के लिए शव को अस्पताल ले जाना पड़ता है ?'
  "नहीं समीर मौत यदि घर में हुई है तो शव को अस्पताल ले जाने की जरूरत नहीं होती । नेत्र बैंक वालों या इस से संबधित संस्था को समय से सूचित करना पड़ता है आगे फिर वह  सब कर लेते हैं।'
 "क्या इसके लिए डाक्टर्स को कुछ फीस देनी पड़ती है ?'
 "नहीं समीर कुछ नहीं देना पड़ता'
 'आँखे मरने के कितनी देर बाद तक उपयोगी रहती हैं,तुम्हें कुछ पता है ?'
 'हाँ  समीर, मैं ने कहीं पढ़ा था कि 4-5 घन्टे के अन्दर उनको निकाल लेना चाहिए ।'
 "राकेश क्या आँख पूरी निकाल लेते हैं ?'
 'अरे नहीं, आँख नही खाली कोर्नियां ( आँख का काला भाग ) लिया जाता है।'
 " राकेश ,तुम्हें इस विषय में इतनी जानकारी कैसे है ?'
        "मुझे मैगजीन्स और न्यूज पेपर पढ़ने का बहुत शौक है...उस से बहुत ज्ञान बढ़ता है।'
 अस्पताल के बाहर ही समीर के पिता मिल गए थे।
    राकेश व समीर ने उन से नेत्र दान कराने की बात की । उन्होंने ताई जी, उनके बच्चों व कुछ डाक्टर्स से सलाह मशवरा किया ।
     डाक्टर साहब ने कहा --"देखिए आपके पति या बच्चों के  पिता तो जा चुके हैं। अब आप इस शरीर का  क्या करेंगे ?...यहाँ से ले जा कर अग्नि के सुपुर्द कर देंगे । उनके नेत्र भी जल कर खाक हो जाएंगे।पर  आपके नेत्र दान करने से इनकी आँखें किन्हीं दो लोगो के शरीर में जीवित रहेंगी।..दो नेत्र हीन व्यक्ति  जिन्हें रोशनी मिलेगी  वे और उनका परिवार आपको जीवन भर दुआएं देंगे।...निर्णय अब आपको करना है।'
 आखिर सब की सहमति से नेत्र दान कर दिए गए।
    राकेश ने समीर के पापा से कहा-- "अंकल क्या आप ताऊ जी का शोक संदेश, फोटो के साथ समाचार पत्र में छपवाएंगे ?'
 "हाँ बेटा छपवाना है।'
 "तो उसके नीचे यह जरूर लिख दीजिएगा कि नेत्र दान कराया गया ।'
 समीर ने कहा - "इस से क्या होगा राकेश ?'
 "समीर, इस से समाज में जागृति आती है,  कुछ अन्य लोगों को प्रेरणा मिलती है कि वह भी नेत्र दान  कराने के विषय में सोचें ।'
   "तू बहुत दूर की सोचता है...इस नेत्र दान की प्रेरणा भी तू ही है,धन्यवाद दोस्त ।'


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-पवित्रा अग्रवाल