शुक्रवार, 3 जून 2016

बाल कहानी   

                      कपड़े की थैली क्यों
                                                      
                                                           पवित्रा अग्रवाल

 रतन थैला ले कर घर से बाहर निकला ही था कि उसका दोस्त हर्ष मिल गया ।
 "अरे रतन इस समय यह थैला ले कर कहाँ जा रहे हो ?'
 "माँ ने सब्जी लाने को कहा है। पास में जो सब्जी की दुकान है न,वहीं जा रहा हूँ ।'
 "तुझे सब्जी लेनी आती है ?'
 "सब्जी लेने में क्या है ?'
 "अरे उन से मोल भाव करना पड़ता है,जरा सी नजर बचे तो वह खराब सब्जी तोल देते हैं ।'
 "क्या तू घर के लिए कभी सब्जी नहीं लाता ?'
 "कभी कभी लाता हूँ।अधिकतर मम्मी पापा स्कूटर पर जा कर ले आते हैं।  मम्मी ने एक बार धनिया, पोधीना और मेथी लाने को कहा था।मुझे पहचान नहीं थी..कुछ का कुछ ले आया ।'
 रतन ने शरारत से कहा--" आज मेरे साथ चल,तुझे सब्जी लेना सिखा दूंगा ।'
 हर्ष ने हँसते हुए कहा --"ठीक है गुरू जी'
 सब्जी खरीदते समय हर्ष ने देखा कि रतन थैले में से छोटी छोटी प्लास्टिक की थैलियाँ निकाल कर सब्जी उसमें डलवाता जा रहा था और दुकान वाले से आग्रह कर रहा था कि वह अपनी थैलियों मे न डाले ।
 हर्ष ने कहा -"रतन सब्जी वाले थैलियाँ देते तो हैं तू घर से यह सब क्यों ले कर आया है ?'
 "यह आदत मैं ने अपने पापा से सीखी है।वह हमेशा घर से थैला ले कर जाते हैं।पहले तो वह एक थैले में ही सब सब्जियां रखवा लेते थे पर सब्जी खाली करने में  मम्मी परेशान हो जाती थीं।भिंडी ,सैम ,बीन्स,हरी मिर्च सब सब्जी आपस में मिल जाती थीं फिर उन्हें अलग करने में समय लगता था।तब से घर में पड़ी यह छोटी प्लास्टिक की थैलियां साथ ले कर आने लगे ।थैलियां नहीं होती हैं तो कपड़े की छोटी थैलियां मम्मी ने बहुत सी बना रखी हैं उन्हें ले आते हैं।'
 "कुछ राज्यों ने तो प्लास्टिक की थैलियों पर बैन लगा रखा है।अपने राज्य में तो अभी इसे लागू नहीं किया है।'
 "प्लास्टिक की थैलियां जानवरों के लिए तो कई बार जान लेवा साबित होती हैं।जैसे लोग बासी खाना,सब्जी और फलों के छिलके इन थैलियों में डाल कर बाहर कचरे में फैंक देते हैं ।गायें, भैंसें खाने के चक्कर में कई बार इसे भी निगल जाती हैं। कई बार तो उनकी जान पर बन आती है...इन से नालियाँ चोक हो जाती हैं...और भी बहुत से नुकसान हैं।'
 "हाँ यह सब पढ़ता तो मैं भी रहता हूँ पर इन पर कभी गहराई से सोचा नहीं।अब मैं भी मम्मी से कहूँगा कि कुछ कपड़े की थैलियां बना कर घर में रखलें व एक दो स्कूटर की डिक्की में पड़ी रहने दें।'
 "हाँ हमारे स्कूटर में भी एक दो थैली अलग से रखी रहती हैं। '
 "यार रमन आज तेरे साथ आ कर बड़ा अच्छा लगा ।एक तो मुझ में आत्म विश्वास पैदा हुआ कि मैं भी तेरी तरह सब्जी लाकर माँ की मदद कर सकता हूँ। तूने कितनी अच्छी तरह चुन चुन कर सब्जी ली हैं...मैं तो सब्जी वाले से कहता था यह दे दो, वह दे दो ।घर जा कर पता लगता था कि उसने कुछ खराब सब्जियाँ  भी तोल दीं हैं। दूसरी बात प्लास्टिक की थैलियों का उपयोग भी कम से कम  करना चाहिए ।'
 ' हर्ष तेरा साथ पाकर मुझे भी अच्छा लगा . अब चलें ?'


3 टिप्‍पणियां:

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