शुक्रवार, 20 मई 2016

समाधान

बाल कहानी
                                       समाधान

                                                                       पवित्रा अग्रवाल
 

        रत्ना और प्रीति दोनों सहेलियाँ हैं। दोनों एक ही स्कूल में व एक ही कक्षा में पढ़ती हैं। उनके घर भी बहुत दूर नहीं हैं। इन दोनों की मम्मी भी आपस में अच्छी दोस्त बन गई हैं। शाम को रत्ना की मम्मी भी रत्ना के साथ प्रीति के घर चली गई थीं। रत्ना की मम्मी को देखकर प्रीति की मम्मी बहुत खुश हुई।
    चाय पीते हुए दोनों की मम्मी आपस में बातें कर रही थीं । रत्ना की मम्मी ने कहा, "गर्मी की छुट्टियों में तो बच्चे परेशान हो जाते हैं। उनके लिए समय बिताना एक समस्या बन जाती है। घर में दो-तीन भाई-बहन हों तो वे आपस में मन बहला लेते हैं लेकिन रत्ना तो मेरी अकेली संतान है। केबिल कनेक्शन भी मैंने नहीं ले रखा है। इतनी महँगाई में गुजारा मुश्किल होता है। सौ रुपये महीने केबिल वाले को देने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। डिपोजिट अलग से देना होता है। वैसे भी केबिल कनेक्शन हो तो बच्चे टी.वी. के सामने से उठना नहीं चाहते।'
     प्रीति की मम्मी बोली, "हमने केबिल कनेक्शन तो ले रखा था। स्कूल खुलते ही बच्चों को समझा-बुझा कर निकलवा दिया। उन्होंने खुद भी महसूस किया कि केबिल के रहते वह पढ़ाई ठीक से नहीं कर पा रहे और क्लास में पिछड़ रहे हैं। अब गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हुई हैं। दो महीने के लिए कनेक्शन फिर ले लूंगी।'
    "मुझे भी कुछ करना होगा। वर्ना इन छुट्टियों में रत्ना "मैं बोर हो रही हूँ, मन नहीं लग रहा' की रट लगा कर मुझे परेशान कर देगी। कहती हूँ नानी या दादी के पास चली जा तो वह अकेली वहाँ जाने को तैयार नहीं है। मैं छह-सात दिन से ज्यादा नही रुक  सकती वर्ना इसके पापा परेशान हो जाते हैं।'
 प्रीति की मम्मी ने पूछा, "रत्ना को पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ने का शौक नहीं है ?'
 "मैं कोई पत्रिका नहीं लेती, उसे भी पढ़ने का शौक नहीं है।'
 "देखिए बहन शौक तो पैदा करना पड़ता है। शुरू में मेरे बच्चों को भी शौक नहीं था फिर भी मैं उनके लिए पत्रिकाएँ मँगाती थी। वह पन्ने पलटते, तस्वीरें देखते, चुटकुले पढ़ते और रख देते। फिर जब मुझ से कहते मम्मी हम बोर हो रहे हैं तो मैं उन्हें पत्रिका थमा कर कहती, "मैं भी बोर हो रही हूँ  किंतु पढ़ने का मेरे पास समय नहीं है। तुम ये कहानी पढ़ो तो मैं भी सुन लूंगी।' धीरे-धीरे उन्हें पत्रिकाएँ अच्छी लगने लगी। कई बार रात को कहते, "हमें नींद नहीं आ रही है' तब मैं पत्रिका उनके हाथ में दे देती कि इसे पढ़ो, पढ़ते-पढ़ते नींद आ जाएगी। आज हालत ये है कि बिना पढ़े उन्हें नींद नहीं आती। बच्चे पढ़ें या न पढ़ें उनकी उम्र व रुचि के हिसाब से पत्रिकाएँ अवश्य मँगानी चाहिए।'
 "तुम ठीक कह रही हो मैं अब नियमित रूप से उसके लिए बाल पत्रिका मँगाया करूँगी।'
     तभी पास बैठी प्रीति ने कहा, "आंटी दो बाल पत्रिकाएँ तो हमारे यहाँ कई वर्ष से आती हैं। मैंने सभी अंक बहुत सँभाल कर रखे हुए हैं क्योंकि रत्ना ने उन्हें नहीं पढ़ा है तो उसके लिए तो वह नई के समान ही हैं वह मुझ से लेकर पढ़ सकती है।.... आप भी पत्रिका मँगाने को कह रही हैं तो आप वह पत्रिका मँगाना जो मैं नहीं मँगाती, इस तरह हम आपस में बदल कर पढ़ लेंगे।'
 "हाँ प्रीति तुम्हारा सुझाव बहुत अच्छा है। हम ऐसा ही करेंगे।'
 प्रीति ने दो पत्रिकाएँ रत्ना को देते हुए कहा, "इन्हें पढ़ने के बाद मुझे वापस कर देना और फिर दूसरी दो ले जाना।'
 पत्रिका लेकर रत्ना घर चली गई। दूसरे दिन शाम को प्रीति रत्ना का इंतजार करती रही क्योंकि वह रोज खेलने आती थी। रत्ना को न आते देख प्रीति उसके घर चली गई।
"आंटी रत्ना कहाँ है ? आज तो वह खेलने भी नहीं आयी।'
 "अरे बेटा वह तो तुम्हारी दी पत्रिकाओं को पढ़ने में इतनी मस्त है कि उसके पास बोर होने को समय ही नहीं है। बैठी होगी अपने कमरे में...सच बेटा तुमने तो हम दोनों की परेशानी का समाधान कर दिया।'
 रत्ना से पत्रिका छीनते हुए प्रीति बोली -- "अरे मैंने पत्रिका इसलिए तो नहीं दी थी कि तुम मुझे ही भूल जाओ। चलो खेलेंगे, बाद में पढ़ना।'
 पत्रिका वहीं रख कर दोनों खेलने चल दी थीं।
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ईमेल - agarwalpavitra78@gmail.com

मेरे ब्लोग्स --

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (21-05-2016) को "अगर तू है, तो कहाँ है" (चर्चा अंक-2349) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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