रविवार, 13 मार्च 2016

रंग भरा गुब्बारा

 
 
 
 
 
होली के अवसर पर
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बाल कहानी

                    रंग भरा गुब्बारा   

                                             पवित्रा अग्रवाल

       होली के दूसरे दिन सुबह यश जल्दी उठ गया। उसे अखबार का इंतजार था। रोज अखबार सुबह छह बजे तक आ जाता था। सात बजे तक नहीं आया तो उसे ध्यान आया कि आज तो समाचार पत्र नहीं आते।...वह बेचैन हो उठा।...पता नहीं कल जो आदमी स्कूटर से गिरा था, उसका क्या हाल है। यदि मामूली चोट लगी होगी तो अखबार में उसका जिक्र नहीं होगा। यदि हालत गंभीर होगी या मौत हो चुकी होगी तो समाचार पत्र में न्यूज अवश्य आएगी।
     यश पूरे दिन परेशान रहा। दूसरे दिन उठते ही सबसे पहले उसने समाचार पत्र लेकर वह पृष्ठ खोला, जिसमें दुर्घटना आदि के समाचार छपते हैं। तभी उसकी नजर एक समाचार पर रुक गई। उसमें लिखा था "एक शरारती बच्चे द्वारा रंग भरा गुब्बारा फेंकने से चालीस वर्षीय सुमेर स्कूटर पर संतुलन खो बैठने से गिर पड़े। उनके सिर में गंभीर चोट आई है। हालत नाजुक है।'
      समाचार पढ़ कर यश रो पड़ा। यद्यपि वह घायल आदमी न उसका रिश्तेदार था और न कोई परिचित।
    उसने अंदाजा लगाया कि वह पापा की उम्र का ही होगा। मेरी उम्र के उसके भी बेटे-बेटी होंगे, पत्नी होगी। हो सकता है बूढ़े माँ-बाप भी हों। हो सकता है वह घर में कमाने वाला अकेला  व्यक्ति     हो....यदि उसे कुछ हो गया तो उसके परिवार का क्या होगा।...होली पर की गई मेरी ये छोटी सी शरारत किसी के लिए जान लेवा साबित हो सकती है ऐसा तो मैंने सोचा भी नहीं था।
     परसों होली वाले दिन छोटे गुब्बारों में रंगीन पानी भरते देख कर मम्मी ने टोका था,  -"यश, सीधे-साधे रंगों से होली खेलना। राह चलते लोगों पर ये गुब्बारे मत फेंकना। इससे किसी को चोट लग सकती है, कोई दुर्घटना भी हो सकती है।'
      "कुछ नहीं होता मम्मी आप तो वैसे ही डरती हैं।'
     उसकी बात सुने बिना ही मम्मी दूसरे कमरे में चली गई थीं। यश रंगों की पुड़िया, पिचकारी व गुब्बारे लेकर अपने दोस्तों के घर की तरफ चल दिया था। बहुत जल्दी उसके रंग समाप्त हो गए थे और रंग लेने के लिए वह अपने घर की तरफ लौट रहा था। उसके हाथ में एक गुब्बारा बचा था। स्कूटर पर जाते हुए एक आदमी पर उसकी नजर पड़ी। उसे ताज्जुब हुआ कि उसके ऊपर किसी ने भी रंग क्यों नहीं डाला। बस हाथ का गुब्बारा उसने स्कूटर वाले पर उछाल दिया था।...उस आदमी को स्कूटर के साथ गिरते देख कर वह डर गया और भाग कर अपने घर आ गया। उसे किसी ने शायद गुब्बारा फेंकते नहीं देखा था।
     मम्मी ने उसे टोका भी था कि 'अरे आज तो तू बड़ी जल्दी होली खेल कर घर आ गया।'
 "हाँ मम्मी सिर में थोड़ा दर्द है।'
    मम्मी ने माथे पर हाथ लगा कर देखा फिर कहा, "बुखार तो नहीं है।...पानी गर्म कर देती हूँ, जल्दी से नहा-धो ले। अभी तो रंग छुड़ाने में ही आधा घंटा लगेगा...फिर खाना खाकर थोड़ी देर सो जाना।'
    उसे कई दोस्त बुलाने आए। 'उसके सिर में दर्द है' कह कर मम्मी ने उन्हें बाहर से ही लौटा दिया।
    कल भी पूरे दिन वह परेशान रहा। मम्मी ने कारण पूछा तो वह बोला "कुछ नहीं मम्मी, परीक्षा आरही हैं न उसी की वजह से थोड़ा तनाव हो रहा है।'
    आज अखबार में स्कूटर वाले की गंभीर हालत का समाचार पढ़ कर तो वह बहुत दुखी हो गया। जल्दी से तैयार हुआ। टिफिन बॉक्स बैग में रखा। मम्मी आवाज ही देती रह गई। वह बिना नाश्ता किए घर के बाहर बने मंदिर में गया। भगवान से स्कूटर वाले का जीवन बचाने की प्रार्थना की और स्कूल चला गया।
      क्लास में लेट आने पर टीचर ने राहुल को बाहर खड़े रहने को कहा तो वह बोला,
       -" मैडम मेरे लेट होने की वजह सुन लें। फिर भी आप सजा देंगी तो मुझे मंजूर होगी।...मेरे ताऊजी का होली वाले दिन एक एक्सीडेंट हो गया था। दो दिन से वह बेहोश थे।मैं पापा और ताई जी को हास्पिटल में चाय-नाश्ता दे कर आ रहा हूँ इसीलिए कुछ लेट हो गया।'
   "ठीक है अंदर आओ।...कैसे हो गया था एक्सीडेंट ? अब वे कैसे हैं ?'--टीचर ने पूछा
 "होली वाले दिन स्कूटर चलाते हुए एक रंग भरा गुब्बारा उनके मुँह पर आकर लगा। संतुलन बिगड़ जाने से वह गिर पड़े थे।...आज वे होश में आए हैं।...अब खतरे से बाहर है।'
 अनायास ही यश के हाथ जुड़ गए और उसके मुँह से निकला "थैंक गॉड।'
 बराबर में बैठे छात्र ने चौंक कर पूछा "तुझे क्या हुआ ?'
     "कुछ नहीं उसके ताऊजी खतरे से बाहर हैं यह जान कर अच्छा लगा।'
 टीचर ने पढ़ाना शुरू कर दिया था किंतु यश का ध्यान पढ़ने में नहीं था।...वह बहुत खुश था उसकी वजह से जो व्यक्ति दुर्घटना का शिकार हो गया था, उस व्यक्ति का जीवन अब बच गया है वर्ना वह कभी अपने को माफ नहीं कर पाता। उसने मन ही मन कसम खाई कि इस तरह की होली अब वह कभी नहीं खेलेगा और दोस्तों को भी नहीं खेलने देगा।


पवित्रा अग्रवाल

ईमेल --  agarwalpavitra78@gmail.com

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