शनिवार, 24 दिसंबर 2016

छाले अब नहीं

बाल कहानी                
                        
छाले अब नहीं

                                                
                                                             पवित्रा अग्रवाल

              दीपू के मुँह में फिर छाले निकल आए थे। तीन दिन से वह ढंग से खाना भी नहीं खा पा रहा। डॉक्टर के पास जाने से अब उसे डर लगता है।
 पहले जब छाले होते थे तो डॉक्टर खाने की गोलियाँ लिख देते थे। बी-कॉम्पलैक्स     की उन गोलियों से उसके छाले ठीक भी हो जाते थे। गोलियों से जब कोई फायदा नहीं हुआ तो डॉक्टर ने हर बार यही कहा कि "बेटा, आपको साग-सब्जी खूब खानी चाहिए। तुम्हारी मम्मी कह रही थीं कि तुम कोई सब्जी नहीं खाते हो। यही आपके छालों का कारण है... छाले बार-बार होते रहेंगे। सुई कब तक लगवाते रहोगे ? जल्दी-जल्दी छाले होना अच्छी बात नहीं है। इससे मुँह में कैंसर भी हो सकता है।'
    जब डॉक्टर समझाते तो सात-आठ दिन वह खूब सब्ज़ियाँ खाता था। छाले ठीक होते ही फिर वह डॉक्टर की हिदायत भूल जाता था।
      माँ रोज गुस्सा होती हैं -" दोनों टाइम दाल-चावल खाना चाहता है। सब्जी तो खाना ही नहीं चाहता। रोटी-पराठे खाता है तो वह भी अचार के साथ। इस बार मैं तेरे साथ डॉक्टर के पास नहीं जाऊँगी। अकेला जा और सुई लगवा कर आ।'
 डॉक्टर के पास जाने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी। पहले तो वह डाँटेंगे कि सब्ज़ियाँ खानी क्यों छोड़ दीं ? दूसरी बात फिर इंजेक्शन लगाने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। जिससे उसे बहुत डर लगता है। तीन दिन और इसी तरह निकल गए। छाले बढ़ते ही जा रहे थे। मम्मी उसके आग्रह पर हरी सब्जी भी बना रही थीं किंतु छालों की वजह से वह कुछ नहीं खा पा रहा था। मम्मी इस बार बहुत सख्त हो गई थीं। डॉक्टर के पास उसके साथ जाने को तैयार नहीं थीं। उसका मन रोने को करता  किंतु रो भी नहीं पाता था, क्योंकि छोटी बहन उसे चिढ़ाती थी कि "भैया लड़का होकर रोता है।"
   आखिर उसने माँ से प्रार्थना की - "मम्मी, इस बार आप मेरे साथ डॉक्टर के पास चलो। मैं वायदा करता हूँ आप जो भी सब्जी बनाएँगी रोज दोनों टाइम खाया करूँगा। बस आप एक काम करना जब मैं सब्जी नहीं खा रहा होऊँ तो आप मुझे छालों की याद दिला देना।'
      फिर माँ उसे डॉक्टर के पास ले गई। उसने डॉक्टर से भी पक्का वायदा किया कि "अब मैं रोज सब्जी खाया करूंगा ।' डॉक्टर के इलाज से छाले ठीक हो गए।
    अब कई महीनों से उसे छाले नहीं हुए हैं। वह रोज सब्जी खाता है। वह समझ गया है कि दवाएँ खाने व इंजेक्शन लगवाने से अच्छा सब्ज़ियाँ खाना है। कभी वह सब्जी खाने में आनाकानी करता है तो मम्मी याद दिला देती है। मम्मी से पहले नटखट नन्हीं बहन जूही याद दिला देती है, "भैया, सब्जी नहीं खाओगे तो छाले हो जाएँगे। फिर आप सुई लगवाने में रोएँगे।'
     अब सब्जी खाने की उसकी आदत पड़ गई है। बहुत दिनों से वह डॉक्टर के पास  नहीं गया है।

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शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

चिड़िया मैं बन जऊँ

बाल कहानी
                            चिड़िया मैं बन जाऊँ


                                                          -पवित्रा अग्रवाल

              सपना अभी स्कूल से लौटी थी। रोज की तरह उसे बहुत भूख लगी थी। आते ही बोली- "मम्मी बहुत जोर से भूख लग रही है, जल्दी से कुछ खाने को दो न ! '
           मम्मी ने कहा, "तुम हाथ मुँह धोकर कपड़े बदलो। इतनी देर में मैं खाना परोस देती हूँ।'   झटपट सपना ने कपड़े बदले और ड्राइंगरूम में टीवी खोल कर सोफे पर बैठ कर खाना खाने लगी।
     तभी मम्मी आ गई, "सपना यह क्या तरीका है। आते ही जूते कहीं डाले। स्कूल बैग ड्राइंग रूम में पटक रखा है। स्कूल ड्रेस बाथरूम के बाहर पड़ी है। रोज समझाती हूँ कि आते ही अपनी चीजें जगह पर रखो। बेटा मैं भी थक जाती हूँ। तुम मेरी मदद नहीं कर पातीं कोई बात नहीं कम-से-कम मेरे लिए काम तो मत बढ़ाओ। सुबह स्कूल जाते समय फिर शोर मचाती हो कि मोजा नहीं मिल रहा, टाई नहीं मिल रही, कभी जूते नहीं मिल रहे।.... सुबह मैं तुम्हारा टिफिन तैयार करूँ या तुम्हारा सामान ढूँढ़ूँ ?...'
      सपना का लटका मुँह देख कर मम्मी ने पुन: कहा -- "मुझे मालूम है तुम्हें मेरा बोलना अच्छा नहीं लग रहा। आखिर कब तक न बोलूँ ? इतनी बार कहा है खाना ड्राइंग रूम में नहीं, डाइनिंग टेबल पर बैठ कर खाओ। तुम्हें देखकर दूसरे बच्चे भी फिर यहीं खाना चाहते हैं।'
    'मम्मी अभी तो आई हूँ। अभी सब सामान जगह पर रख दूँगी। मेरी पसंद का टीवी प्रोग्राम आ रहा था, इसीलिए खाना यहाँ ले आई।'
 "बेटा ये तो रोज की बात है...।'
    खाना खाते हुए सपना की नजर एक चिड़िया पर पड़ी। वह बरांडे में रखे हुए गेहूँ के दाने चुग रही थी। उसे देखकर सपना सोचने लगी- हमारा भी क्या जीवन है। घड़ी की सुई की तरह बस चलते ही रहो। कितने बंधन हैं... ये करो.. वो मत करो। यहाँ जाओ, वहाँ मत जाओ। खेलने का कितना मन करता है, किंतु होम वर्क पूरा न होने पर स्कूल में सजा मिलती है। स्कूल में टीचर्स के हिसाब से चलना पड़ता है और घर में ये मम्मी-पापा टोका-टाकी करते रहते हैं। हम से अच्छा जीवन तो इन चिड़ियों का है। न माता-पिता की डाँट, न स्कूल, न होम वर्क। अपनी मर्जी की मालिक हैं। इस पेड़ से उस पेड़ पर फुदकती-फिरती हैं। जहाँ दाना देखा उतर कर खा लिया। जहाँ पानी मिला पी लिया। जब मन हुआ तो ऊँचे आकाश में उड़ान भर ली। काश मैं भी चिड़िया होती, कितना मजा आता।
     यही सब सोचते हुए उसने होम वर्क किया। अपना सामान जगह पर रखा। अपना कमरा ठीक किया। रात का खाना खाया और जल्दी ही सोने के लिए बिस्तर पर चली गई। सोते समय भी वह गुनगुना रही थी- 

 चिड़िया मुझे बना दे राम, सुंदर पंख लगा दे राम।                     नील गगन में उड़ जाऊँ, हाथ किसी के न आऊँ।
        उसने देखा वह सचमुच चिड़िया बन गई है। सुंदर-सुंदर दो छोटे से पंख भी निकल आए हैं। पंख देखते ही उसने सोचा क्या वह उड़ पाएगी ? और वह सचमुच उड़ने लगी। ठंडी मंद पवन चल रही थी। नीले आकाश में दूर-दूर तक उड़ान भरते हुए वह बहुत खुश थी। उसे सब कुछ बहुत नया-नया और अच्छा लग रहा था। थोड़ी देर में वह थकान अनुभव करने लगी। भूख भी लग आई थी।
      वह दाने की तलाश में घरों के ऊपर उड़ने लगी। एक छत पर उसने देखा कि दाल सूख रही है। वह दाना चुगने के लिए छत पर उतरने ही वाली थी कि एक महिला दाल उठा कर घर में ले गई .        

     उसने फिर उड़ान भरी उसे कहीं कुछ नहीं मिल रहा था। तभी एक छत पर उसे चावल रखे हुए दिखाई दिए। छत पर उतर कर उसने तीन-चार दाने ही खाए थे कि वहाँ एक बिल्ली आ गई। बिल्ली ने उस पर झपट्टा मारा किंतु किसी तरह वह जान बचा कर उड़ गई।
    अब वह बहुत डर गई थी । उसने सोचा पक्षियों का जीवन भी इतना आसान तो नहीं है, जितना दूर से देखने पर लगता है। उन्हें भी पेट भरने के लिए बड़े खतरे उठाने पड़ते हैं। कभी भूखा प्यासा भी रह जाना पड़ता है। वह थक कर एक पेड़ पर बैठ गई। वहाँ भी उसे एक बिल्ली दिखाई दी। अरे पक्षियों का जीवन तो बहुत असुरक्षित है। ये बिल्ली तो हर जगह पहुँच सकती है।
      तभी उसे ध्यान आया कि उसने कई बार अपने बगीचे में चिड़िया व कबूतर के पंख पड़े देखे हैं। घायल चिड़िया भी देखी है। ये जरूर बिल्ली के शिकार हुए होंगे। यहाँ से भी उड़ना पड़ेगा वर्ना बिल्ली दबोच लेगी। अब कहाँ जाऊँ ? भूख भी लगी है।                    उसे पछतावा हो रहा था कि वह तो अच्छी भली लड़की के रूप में मम्मी-पापा के साथ  रह रही थी। बेकार में ही चिड़िया बन गई।       जब वह बहुत परेशान हो गई तो मम्मी-पापा की याद आई। अरे उसकी सब परेशानियाँ तो मम्मी-पापा चुटकी बजाते ही हल कर देते हैं। उन्हीं के पास जाती हूँ वहीं  खाना खिलाएँगे और बिल्ली से भी बचाएँगे।
      वह उड़कर अपने घर के आँगन में जा बैठी तभी उसका प्यारा टोमी उस की तरफ लपका। वह डर कर किवाड़ पर बैठ गई। उसने देखा मम्मी रो रही थीं। पापा परेशान थे। छोटा भाई उसे सहेलियों के घर ढूँढ़ कर लौटा था। उसने कहना चाहा मम्मी मैं आपकी बेटी सपना हूँ किंतु ये क्या,वह तो चीं चीं करके चिड़िया वाली बोली बोल रही है। मम्मी उसकी बात कैसे समझ सकती हैं। उसने मम्मी के कंधे पर बैठ कर खाना माँगना चाहा किंतु मम्मी ने उसे हाथ से उड़ा दिया।
   अब तो उसे रोना आने लगा था। वह अपनी गलत सोच पर पछता रही थी। मानव जीवन तो सब से श्रेष्ठ है। हे भगवान मुझे फिर से सपना बना दें। मैं चिड़िया बने रहना नहीं चाहती। मेरे मम्मी-पापा बहुत अच्छे हैं। मैं फिर से लड़की बनना चाहती हूँ। उसके रोने की आवाज सुनकर मम्मी दौड़ी-दौड़ी आई- "सपना, तू क्यों रो रही है...? कोई बुरा सपना देखा क्या ?'
 मम्मी की आवाज सुनकर उसने आँखें खोल दीं। अरे वह तो अपने घर में अपने बिस्तर पर सो रही थी। वह सपने में चिड़िया बनी थी ,सचमुच मैं नहीं।
 वह खुश होकर मम्मी से लिपट गई।    


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रविवार, 16 अक्तूबर 2016

यादगार दीपावली

 बाल कहानी
                                 यादगार दीपावली
     
                                                             पवित्रा अग्रवाल


        मेरे दोस्त नन्दू के पिता पटाखों का व्यापार करते हैं। उनका थोक का काम है। एक बार मुझ से नन्दू ने कहा था -"जब पटाखे लेने हों तो मेरे साथ चलना, मैं पापा से कह कर सस्ते दिलवा दूँगा।बाजार में यही पटाखे दुगनी कीमत पर मिलेंगे।'
     मैं ने पटाखों के लिए दो सौ रुपये मम्मी से लिए और दो सौ रुपये मैं ने अपने जेब खर्च में से बचाए थे।वह भी जेब में रख कर नन्दू के घर की तरफ चल दिया।
     नन्दू के घर एक औरत ( जो मुझे उनकी काम वाली लग रही थी ) बैठ कर रो रही थी और नन्दू की बहन से तीन सौ रुपये उधार मॉग रही थी। नन्दू की बहन ने कहा--"बाई बच्चे को सरकारी दवाखाने में ले जाना चाहिए था।वहाँ डॉक्टर की फीस भी नहीं देनी पड़ती और इलाज भी मुफ़्त में हो जाता।जब इलाज के लिए रुपये नहीं थे तो प्राइवेट अस्पताल में बच्चे को क्यों भरती करवा दिया ?'
          "बिटिया ,पहले मैं सरकारी अस्पताल में ही गई थी। वहाँ डॉक्टर साहब नहीं थे, उनका इंतजार करती तो मेरा बेटा मर जाता....उसकी हालत बहुत खराब है। उसे सुबह से उल्टी और दस्त हो रहे हैं। मैं काम पर गई हुई थी। घर जा कर जब उसकी हालत देखी तो घबरा गई और जल्दी से अस्पताल ले कर भागी...मजबूरी में मुझे प्राइवेट अस्पताल ले जाना पड़ा।डॉक्टर साहब ने पर्चा लिख कर दवाएँ जल्दी लाने को कहा है ,उसे ग्लूकोस चढ़ाना है..बिटिया मुझे जल्दी से तीन सौ रुपये दे दो,बहुत मेहरबानी होगी ।'
     "देखो बाई मैं तुम से पहले भी कह चुकी हूँ कि इस समय मम्मी घर पर नहीं हैं।हमारे यहाँ काम करते अभी तुम्हें दस दिन हुए हैं।उन से बिना पूछे तुम्हें तीन सौ रुपये कैसे दे दूँ ? तुम इंतजार कर लो,मम्मी थोड़ी देर में आती होंगी।'
    "पर मैं इंतजार नहीं कर सकती।तब तक तो मेरा बेटा मर जाएगा..मैं जाती हूँ,कही दूसरी जगह कोशिश कर के देखूँगी।' वह आँसू पोंछती हुई घर से बाहर चली गई।
      मैं ने उसे रोक कर डॉक्टर का पर्चा दिखाने को कहा।उस ने मुझे वह पर्चा दिखाया ।पर्चा देख कर मुझे विश्वास हो गया कि वह झूठ नहीं बोल रही है, मैं ने कहा--"तुम मेरे साथ चलो,मैं दवाए अभी दिलवा देता हूँ फिर तुम्हारे साथ डॉक्टर साहब के पास भी चलूँगा।...तुम्हारे पति कहाँ हैं ?'
      वह लंबी आह भर कर बोली--"वह मज़दूरी करता है पर रोज काम नहीं मिलता।कभी मिलता भी है तो उसे शराब पीने में उड़ा देता है।सुबह का गया रात को नशे में धुत्त हो कर लौटता है...नाम का पति है।उस की रोटी का जुगाड़ भी मुझे ही करना पड़ता है।'
     दवाएँ ले कर हम अस्पताल पहुँचे तो कम्पाउडर बोला --"तुमने बहुत देर कर दी..'
     "तो क्या मेरा बेटा....'
  "परेशान मत हो,तुम्हारा बेटा ठीक है।डॉक्टर साहब ने अपने पास से इंजक्शन लगा दिया है और ग्लूकोस भी चढाया जा रहा है।'
     "क्या करती साहब ,घर में एक पैसा नहीं था। कहीं से इंतजाम भी नहीं कर पाई।देवदूत की तरह यह बच्चा मुझे मिल गया।मेरा दुखड़ा सुन कर इसी ने मुझे सब दवाएँ खरीद कर दी हैं।मैं तो इसे जानती भी नहीं हूँ और न ये मुझे जानता है। ये दीपावली के लिए पटाखे खरीदने बाजार जा रहा था ,उन रुपयो से इस बच्चे ने मुझे दवाएँ दिलवा दीं।...देखो न मैं भी कितनी स्वार्थी हूँ... अभी तक इस बच्चे का नाम भी नहीं पूँछा -- "बेटा तुम्हारा नाम क्या है ?'
    "मेरा नाम अभिषेक है, प्यार से सब मुझे अभि कह कर पुकारते हैं।'
  कम्पाउडर ने कहा -- "शाबाश अभिषेक, तुम बहुत अच्छे हो।....क्या तुम्हारे घर में अब डाँट नहीं पड़ेगी ?'
      "कम्पाउडर साहब,ये रुपये तो कल तक पटाखे - बम के रूप में जल कर धुआँ बन जाते। मम्मी कहती हैं कि आतिशबाजी धन की बरबादी तो है ही ,इस से प्रदूषण भी फैलता है।जलने व आग लगने का खतरा भी बना रहता है। उनसे नुकसान ही नुकसान है,फायदा एक भी नहीं।मेरे इन रूपयो का उपयोग देख कर मम्मी बहुत खुश होंगी।'
    बचे हुए रुपये मैं ने बाई को देते हुए कहा-"ये रुपये तुम रख लो,अभी तुम्हें इन की जरूरत पड़ सकती है।तुम्हारा बेटा अब ठीक है,मैं जा रहा हूँ।'
      "बेटा तुम्हारे ये रुपये मुझ पर उधार हैं।मैं थोड़े-थोड़े कर के तुम्हें लौटा दूँगी । तुम नन्दू के दोस्त हो न ? मैं उन के घर काम करती हूँ।'
  "ठीक है।'
   घर में प्रवेश करते ही माँ ने पूँछा--"तू तो पटाखे लेने गया था,खाली हाथ क्यों लौट आया ?'
  "माँ आप कहती हैं न कि पटाखे छुड़ाना रुपयों का धुआँ उड़ाने के समान है। मैं ने आज उन रुपयों से एक गरीब बीमार बच्चे को दवा दिला दी है।सच माँ वह रुपये एक गरीब माँ के आँसू पोंछने के काम आए हैं। यह दीपावली बिना पटाखों के मनाने का मुझे जरा भी मलाल नहीं होगा बल्कि यह दीपावली मुझे हमेशा याद रहेगी।'
  पूरी बात सुन कर मेरी माँ की ऑखों में भी स्नेह के दीप जल उठे।


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गुरुवार, 29 सितंबर 2016

बाल कहानी                    
 

                    जिद्दी टिन्नी

 
                                              पवित्रा अग्रवाल
                                 
                                                                                   
       जब से दादी आई है मानसी के मजे आगये हैं.हर समय   एक ही फरमाइश–‘दादी एक कहानी सुनाओ न .’
‘ ठीक है मानसी पर यह अंतिम कहानी सुना रही हूँ.'

    'ठीक है दादी
'तो सुनो–  एक लड़की थी .उसका नाम टिन्नी था .’
‘दादी टिन्नी उसके घर का नाम था या स्कूल का ?’
‘घर का, घर में सब उसे टिन्नी कह कर बुलाते थे .’
‘और स्कूल में उसका क्या नाम था ?’
‘स्कूल में उसका नाम टीना था . वह मम्मी पापा की अकेली बेटी थी .’
‘मेरी तरह वह भी अकेली थी ?...उसके कोई भाई बहन नहीं था ?’
   ‘हाँ वह अकेली थी .मम्मी पापा उसको बहुत प्यार करते थे इसलिए वह बहुत जिद्दी हो गई थी .वह जो मांगती थी उसे सब एक बार में मिल जाता था .कभी उसका कहा पूरा नहीं होता था तो वह जोर जोर से रोती  थी और कहती थी आप लोग बहुत गंदे हो ,मुझे प्यार नहीं करते .’
   ‘अच्छा टिन्नी ऐसा कहती थी ,मै तो मम्मी पापा से ऐसा कभी नहीं कहती .फिर क्या हुआ दादी ?’
   ‘एक दिन टिन्नी स्कूल से बहुत खुश खुश आई और मम्मी को बताया ‘आज मेरी सहेली तारा का बर्थ डे है .शाम को हमें उनके घर जाना है.’
मम्मी ने कहा -‘टिन्नी आज मेरी तबियत बहुत ख़राब है आज मै नहीं जा पाऊँगी ’
‘आप नहीं जाओगी तो मै कैसे जाउंगी?कुछ भी हो मुझे तो जरुर जाना है कह कर वह जोर जोर से रोने लगी...आप कोई भी मुझे प्यार नहीं करते ...मै जरुर जाउंगी '.
‘फिर वो गई दादी ?’
   ‘हाँ उसकी मम्मी की तबियत बहुत ख़राब थी पर उसे  रोता देख कर उन्हें जाना पड़ा.वहां जाकर मम्मी को  बुखार और तेज हो गया, उनको वोमिटिंग भी होने लगी .मम्मी ने पापा को फोन करके बुलाया .पहले तो पापा गुस्सा हुए की तबियत ख़राब थी तो बर्थ डे में नहीं आना चाहिए था .फिर पापा मम्मी को लेकर हॉस्पिटल गए .वहां डॉक्टर ने मम्मी को भर्ती कर लिया ’                            
'भर्ती  करना क्या होता है दादी ?’
    ‘भर्ती  करना यानि एडमिट कर लिया और कहा दो – तीन दिन उनको हॉस्पिटल में ही रहना पड़ेगा पर बच्चों को हम अन्दर नहीं आने देते .इस लिए आप की बेटी यहाँ नहीं रह सकती .’
    ‘बच्चों को वहां क्यों नहीं रहने देते दादी ?’
‘अस्पताल में बहुत तरह के बीमार रहते हैं.बच्चों को इन्फेक्शन न हो जाये, इसी लिए बच्चों को नहीं आने देते .’
‘उसके पापा को भी तो इन्फेक्शन हो सकता है, उनको क्यों आने दिया ?’
‘मानसी , बच्चों को इन्फेक्शन जल्दी होता है इस लिए नहीं आने देते .’
‘दादी फिर टिन्नी कहाँ रही ?’
‘टिन्नी को उसके पापा उसके चाचा चाची के घर छोड़ आये.’
‘चाचा-चाची किस को कहते हैं दादी ?’
‘पापा के छोटे भाई को चाचा कहते हैं’
‘दादी मेरे चाचा नहीं हैं ?’
‘तुम्हारे पापा के कोई भाई नहीं है, इसलिए तुम्हारे कोई  चाचा नहीं है’
‘मेरी मम्मी बीमार हो गई तो दादी मै कहाँ रहूंगी ?’
‘मानसी मुझे बहुत जोर से निन्नी आ रही है,बीच बीच में तुम इसी तरह सवाल पूछती रही तो कहानी पूरी कैसे होगी ?’
‘ठीक है दादी अब नहीं बोलूंगी ,आप पूरी कहानी सुना दो.’
 ‘मै तो यह भी भूल गई कि मै ने कहानी कहाँ तक सुनाइ थी?’
‘टिन्नी को उसके पापा चाचा-चाची के पास छोड़ कर चले गए .दादी वो साथ जाने को रोई नहीं ?’
‘टिन्नी खूब रोई पर पापा को गुस्सा आगया बोले चलो अपने घर, रात को वहां अकेली रहना,मै सुबह आ जाऊंगा.’ 
‘फिर क्या हुआ दादी ?                                                                                                                                       ‘टिन्नी  ने रोना बंद कर दिया और कहा ठीक है पापा आप जाओ ,सुबह जल्दी आजाना .फिर टिन्नी की  चाची ने उसे खाना खिलाया और प्यार से समझाया की अच्छे बच्चे जिद्द नहीं करते हैं .बताओ जब तुम्हारी मम्मी की तबियत ख़राब थी तो तुमने उन्हें घर में आराम क्यों नहीं करने दिया ?’
  टिन्नी ने कहा --‘मम्मी नहीं जातीं तो मैं भी बर्थ डे में  नहीं जा पाती.’
 चाची ने समझाया - ‘टिन्नी  जब तुम्हें बुखार आता है तो मम्मी तुम्हें स्कूल भेजती हैं ?...नहीं भेजती न ? ...इसी तरह जब मम्मी बीमार थीं तो तुमको कहना चाहिए था कि मम्मी आप आराम करिए, बर्थ डे में नहीं जाऊंगी.कहना चाहिए था न?’
‘हाँ चाची मुझसे गलती हो गई .आगे से जिद्द नहीं करूंगी .’
चाची ने कहा –‘ गुड गर्ल , चलो अब जल्दी से सो जाओ .हो सकता है मम्मी कल सुबह ही आजायें . ‘
‘दादी फिर टिन्नी की मम्मी सुबह आगई थीं ?’
‘हाँ आगई थीं , अब तुम भी जल्दी से सो जाओ मानसी, दादी को भी बहुत जोर से नींद आरही है .’
‘गुड नाइट दादी ,अब आप वापस मत जाना दादी .मम्मी बीमार हुई तो मैं किस के पास रहूंगी ,मेरे तो चाचा –चाची यहाँ कोई भी नहीं रहते हैं.’
‘ ठीक है , अब तुम सो जाओ और दादी को भी सोने दो .बाकी  बात कल  करेंगे ,गुड नाईट मानसी ‘
‘गुड नाईट दादी .’     
                                                                                          

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बुधवार, 17 अगस्त 2016

छोटी सी घटना

बाल कहानी                        छोटी सी घटना         
                                                   
                                                पवित्रा अग्रवाल
 
     शाम हो गई थी। अपना होम वर्क समाप्त करके राहुल घर से बाहर खेलने के लिए निकला ही था कि कोने के घर वाले अंकल उसे मिल गए। उन्होंने पूछा बेटे आपके पापा घर पर हैं ?'
 "हाँ अंकल, आइए पापा घर पर ही हैं' कहकर राहुल ने उन्हें ड्राइंग रूम में बिठाया और पापा को उनके आने की सूचना दी।
  पापा के आते ही नमस्ते-नमस्ते के आदान-प्रदान के बाद अंकल ने पापा से पूछा "पूजा आपकी बेटी है क्या ?'
 "हाँ पूजा मेरी ही बेटी है। क्या किया उसने ? कोई शरारत की है क्या ?' पापा ने पूछा।
 "अजी साहब क्या संस्कार दिए हैं आपने अपनी बेटी को..
 .पापा ने बीच में ही बात काट कर कहा-- "मगर किया क्या उसने ? उससे कोई गलती हो गई ?'
 अंकल बोले-" नहीं साहब गलती कैसी ? बहुत ही अच्छी बेटी है आपकी.... अभी तीन-चार दिन पहले की बात है वह मेरे घर आई और आते ही मुझ से सीधा सवाल किया, "अंकल आप सिगरेट पीते हैं ?'
       मैं तो सकपका गया कि छोटी सी बच्ची मुझसे यह प्रश्न क्यों पूछ रही है। मैंने हाँ में सिर हिलाया। तो उसने दस रुपये का एक नोट मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा "आपके घर के सामने पड़ी यह सिगरेट की खाली डिब्बी मैंने खेलने के लिए उठाई थी। इस डिब्बी के अंदर दस रुपये का यह नोट निकला है, आपका ही होगा।' कहकर उसने वह नोट मेज पर रख दिया। मैंने उसे वह रुपये देने की बहुत कोशिश की और कहा - "इन रुपयों से तुम टॉफ़ी खरीद कर खा लेना...लेकिन उसने नहीं लिए। तब मैंने उससे उसका व पिता का नाम पूछा तो ज्ञात हुआ वह आपकी बेटी है। सात-आठ वर्ष की छोटी सी बच्ची इतने अच्छे संस्कार, सच मैं उससे बहुत प्रभावित हुआ हूँ। उसे मैं अपने क्लब की तरफ से पुरस्कार दिलवाना चाहता हूँ।'
         पापा को यह बात पता नहीं थी, शायद मम्मी को भी नहीं मालूम थी। यहाँ तक कि मुझे भी उस ने नहीं बताया था। पूजा को बुलाकर पूछा तो उसने स्वीकृति में गर्दन हिला दी।
 वो अंकल यह जानकर और भी प्रभावित हुए कि पूजा के लिए ये घटना इतनी साधारण थी कि इसका जिक्र उसने घर में भी नहीं किया। पापा को बहुत बधाई देकर पूजा के सिर पर स्नेह से हाथ फेरते अंकल चले गए।
    राहुल भी अपनी छोटी बहन से बहुत प्रभावित हुआ क्यों कि मम्मी से तो अक्सर वह जिद्द करके कुछ न कुछ खरीदने के लिए पैसे माँगती रहती है। लेकिन जो रुपये उसे सड़क पर पड़े मिले उनको अंदाजा लगा कर उसके मालिक तक पहुँचा आई। उसे जरा भी लालच नहीं आया। वह रख भी लेती तो कोई उसे चोर नहीं कहता । साथ ही राहुल को अपने ऊपर ग्लानि भी हुई कि बाहर की छोड़ो, घर में भी इधर-उधर रखे पैसे उसे मिलते हैं तो वह माँ को बिना बताए उठा लेता है और उन पैसों से टॉफ़ी, बिस्कुट आदि खरीद कर खा लेता है।
 वह सोच रहा था मैं तो पूजा से दो वर्ष बड़ा हूँ और जब-तब अपने बड़े होने का रौब उस पर जमाता रहता हूँ। हम दोनों के माता-पिता एक हैं लेकिन हम दोनों की नीयत में कितना अंतर है ?
 पूजा के साथ घटी इस छोटी सी घटना से राहुल को बहुत प्रेरणा मिली। उसने निश्चय किया कि भविष्य में वह भी इतना ही ईमानदार बनने की कोशिश करेगा। उसे पूजा पर बहुत प्यार आ रहा था। उसने अपनी बहन की बड़े प्यार से पीठ थपथपाई।

        
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शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

धन्यवाद मित्र

बाल कहानी  
                     
                                   धन्यवाद मित्र
                                                                
                                                                   पवित्रा अग्रवाल

      राकेश ने कालेज से लौट कर कपड़े बदले और बैट उठा कर क्रिकेट खेलने के लिए समीर के घर की तरफ चल दिया ,समीर दरवाजे पर ही मिल गया...
 "समीर  कुछ परेशान से दिख रहे हो ,कहीं जा रहे हो क्या ?'
 "हाँ राकेश  अभी अभी खबर मिली है कि ताऊ जी की मौत हो गई है,मम्मी पापा तो उनके पास ही थे।'
 "बीमार थे क्या ?'
 "हाँ कुछ दिन से बीमार चल रहे थे पर ऐसी उम्मीद नहीं थी कि ठीक नहीं होंगे ।'
 "चलो मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ ,मेरा यह बैट अपने घर में रख दो।'
           मौत की खबर सुन कर राकेश के मन मैं कुछ चल रहा था। उसका मन हुआ कि अपने मन की बात समीर को बता दे पर कुछ संकोच भी हो रहा था। कुछ सोचते हुए उसने समीर से पूछा ."तुम्हारे ताऊ जी ने कभी मरने के बाद अपनी आँखें दान करने की बात कही  थी ?'
 "नहीं राकेश मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं है यदि ऐसा कुछ होगा तो ताई जी को पता होगा ।...पर  आजकल पढ़ने में आ रहा है कि बहुत से लोग मरने से पहले अपनी आँखें दान करने की बात घर वालों से कह कर जाते हैं।आज सुबह के अखबार में पढ़ा था कि क्रिकेट खिलाड़ी नवाब पटौदी भी अपनी आखें दान कर गए थे .
 " और तुम्हें मालुम है समीर उनके तो एक ही आँख थी... एक  किसी दुर्घटना में खराब हो गई थी वह एक आँख से भी काफी क्रिकेट खेले और उसे भी दान कर गए।'
    'हाँ यह तो मैं ने भी पढ़ा था राकेश। जागरूक लोग फार्म भरके अपने जीवन काल मे ही नेत्रदान करने की इच्छा सब को बता देते हैं।...पर जो ऐसा नहीं कर पाए हैं क्या उनके घर वाले भी मृत व्यक्ति की आँखे दान कर सकते हैं ?'
   "हाँ इस पुण्य के काम में कोई बाधा नहीं है। मेरी मौसी की कुछ दिन पहले ही मौत हुई थी , उनकी  आँखें भी दान कर दी गई थीं ...जब कि उन्होंने ऐसी कोई इच्छा मरने से पहले व्यक्त नहीं की थी।'
   " राकेश मैं तुम्हारी बात समझ रहा हूँ क्यों न अपने घरवालों को समझा कर मैं ताऊ जी की आँखे भी दान  करने बात करूँ ।...किसी नेत्रहीन  की  जिन्दगी बदल जाएगी। वह इस दुनिया को अपनी आँखों से देख पाएगा।'
 "समीर उन आँखों से एक नहीं दो व्यक्ति देख सकेंगे।'
 - "अच्छा ! दोनो आँखें एक को नहीं बल्कि दो लोगों को एक एक लगाई जाती हैं ?'
 "हाँ।.. यदि नेत्र दान करने हैं तो समीर इसके लिए सब से बढ़िया जगह  अस्पताल ही रहेगी ।डाक्टर्स को अपनी इच्छा बताने पर वह लोग सब प्रबन्ध कर देंगे...पर हमें जल्दी से अस्पताल पहुँचना चाहिए।'
समीर ने पूछा -"क्या नेत्र दान के लिए शव को अस्पताल ले जाना पड़ता है ?'
  "नहीं समीर मौत यदि घर में हुई है तो शव को अस्पताल ले जाने की जरूरत नहीं होती । नेत्र बैंक वालों या इस से संबधित संस्था को समय से सूचित करना पड़ता है आगे फिर वह  सब कर लेते हैं।'
 "क्या इसके लिए डाक्टर्स को कुछ फीस देनी पड़ती है ?'
 "नहीं समीर कुछ नहीं देना पड़ता'
 'आँखे मरने के कितनी देर बाद तक उपयोगी रहती हैं,तुम्हें कुछ पता है ?'
 'हाँ  समीर, मैं ने कहीं पढ़ा था कि 4-5 घन्टे के अन्दर उनको निकाल लेना चाहिए ।'
 "राकेश क्या आँख पूरी निकाल लेते हैं ?'
 'अरे नहीं, आँख नही खाली कोर्नियां ( आँख का काला भाग ) लिया जाता है।'
 " राकेश ,तुम्हें इस विषय में इतनी जानकारी कैसे है ?'
        "मुझे मैगजीन्स और न्यूज पेपर पढ़ने का बहुत शौक है...उस से बहुत ज्ञान बढ़ता है।'
 अस्पताल के बाहर ही समीर के पिता मिल गए थे।
    राकेश व समीर ने उन से नेत्र दान कराने की बात की । उन्होंने ताई जी, उनके बच्चों व कुछ डाक्टर्स से सलाह मशवरा किया ।
     डाक्टर साहब ने कहा --"देखिए आपके पति या बच्चों के  पिता तो जा चुके हैं। अब आप इस शरीर का  क्या करेंगे ?...यहाँ से ले जा कर अग्नि के सुपुर्द कर देंगे । उनके नेत्र भी जल कर खाक हो जाएंगे।पर  आपके नेत्र दान करने से इनकी आँखें किन्हीं दो लोगो के शरीर में जीवित रहेंगी।..दो नेत्र हीन व्यक्ति  जिन्हें रोशनी मिलेगी  वे और उनका परिवार आपको जीवन भर दुआएं देंगे।...निर्णय अब आपको करना है।'
 आखिर सब की सहमति से नेत्र दान कर दिए गए।
    राकेश ने समीर के पापा से कहा-- "अंकल क्या आप ताऊ जी का शोक संदेश, फोटो के साथ समाचार पत्र में छपवाएंगे ?'
 "हाँ बेटा छपवाना है।'
 "तो उसके नीचे यह जरूर लिख दीजिएगा कि नेत्र दान कराया गया ।'
 समीर ने कहा - "इस से क्या होगा राकेश ?'
 "समीर, इस से समाज में जागृति आती है,  कुछ अन्य लोगों को प्रेरणा मिलती है कि वह भी नेत्र दान  कराने के विषय में सोचें ।'
   "तू बहुत दूर की सोचता है...इस नेत्र दान की प्रेरणा भी तू ही है,धन्यवाद दोस्त ।'


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-पवित्रा अग्रवाल
 

शुक्रवार, 3 जून 2016

बाल कहानी   

                      कपड़े की थैली क्यों
                                                      
                                                           पवित्रा अग्रवाल

 रतन थैला ले कर घर से बाहर निकला ही था कि उसका दोस्त हर्ष मिल गया ।
 "अरे रतन इस समय यह थैला ले कर कहाँ जा रहे हो ?'
 "माँ ने सब्जी लाने को कहा है। पास में जो सब्जी की दुकान है न,वहीं जा रहा हूँ ।'
 "तुझे सब्जी लेनी आती है ?'
 "सब्जी लेने में क्या है ?'
 "अरे उन से मोल भाव करना पड़ता है,जरा सी नजर बचे तो वह खराब सब्जी तोल देते हैं ।'
 "क्या तू घर के लिए कभी सब्जी नहीं लाता ?'
 "कभी कभी लाता हूँ।अधिकतर मम्मी पापा स्कूटर पर जा कर ले आते हैं।  मम्मी ने एक बार धनिया, पोधीना और मेथी लाने को कहा था।मुझे पहचान नहीं थी..कुछ का कुछ ले आया ।'
 रतन ने शरारत से कहा--" आज मेरे साथ चल,तुझे सब्जी लेना सिखा दूंगा ।'
 हर्ष ने हँसते हुए कहा --"ठीक है गुरू जी'
 सब्जी खरीदते समय हर्ष ने देखा कि रतन थैले में से छोटी छोटी प्लास्टिक की थैलियाँ निकाल कर सब्जी उसमें डलवाता जा रहा था और दुकान वाले से आग्रह कर रहा था कि वह अपनी थैलियों मे न डाले ।
 हर्ष ने कहा -"रतन सब्जी वाले थैलियाँ देते तो हैं तू घर से यह सब क्यों ले कर आया है ?'
 "यह आदत मैं ने अपने पापा से सीखी है।वह हमेशा घर से थैला ले कर जाते हैं।पहले तो वह एक थैले में ही सब सब्जियां रखवा लेते थे पर सब्जी खाली करने में  मम्मी परेशान हो जाती थीं।भिंडी ,सैम ,बीन्स,हरी मिर्च सब सब्जी आपस में मिल जाती थीं फिर उन्हें अलग करने में समय लगता था।तब से घर में पड़ी यह छोटी प्लास्टिक की थैलियां साथ ले कर आने लगे ।थैलियां नहीं होती हैं तो कपड़े की छोटी थैलियां मम्मी ने बहुत सी बना रखी हैं उन्हें ले आते हैं।'
 "कुछ राज्यों ने तो प्लास्टिक की थैलियों पर बैन लगा रखा है।अपने राज्य में तो अभी इसे लागू नहीं किया है।'
 "प्लास्टिक की थैलियां जानवरों के लिए तो कई बार जान लेवा साबित होती हैं।जैसे लोग बासी खाना,सब्जी और फलों के छिलके इन थैलियों में डाल कर बाहर कचरे में फैंक देते हैं ।गायें, भैंसें खाने के चक्कर में कई बार इसे भी निगल जाती हैं। कई बार तो उनकी जान पर बन आती है...इन से नालियाँ चोक हो जाती हैं...और भी बहुत से नुकसान हैं।'
 "हाँ यह सब पढ़ता तो मैं भी रहता हूँ पर इन पर कभी गहराई से सोचा नहीं।अब मैं भी मम्मी से कहूँगा कि कुछ कपड़े की थैलियां बना कर घर में रखलें व एक दो स्कूटर की डिक्की में पड़ी रहने दें।'
 "हाँ हमारे स्कूटर में भी एक दो थैली अलग से रखी रहती हैं। '
 "यार रमन आज तेरे साथ आ कर बड़ा अच्छा लगा ।एक तो मुझ में आत्म विश्वास पैदा हुआ कि मैं भी तेरी तरह सब्जी लाकर माँ की मदद कर सकता हूँ। तूने कितनी अच्छी तरह चुन चुन कर सब्जी ली हैं...मैं तो सब्जी वाले से कहता था यह दे दो, वह दे दो ।घर जा कर पता लगता था कि उसने कुछ खराब सब्जियाँ  भी तोल दीं हैं। दूसरी बात प्लास्टिक की थैलियों का उपयोग भी कम से कम  करना चाहिए ।'
 ' हर्ष तेरा साथ पाकर मुझे भी अच्छा लगा . अब चलें ?'


शुक्रवार, 20 मई 2016

समाधान

बाल कहानी
                                       समाधान

                                                                       पवित्रा अग्रवाल
 

        रत्ना और प्रीति दोनों सहेलियाँ हैं। दोनों एक ही स्कूल में व एक ही कक्षा में पढ़ती हैं। उनके घर भी बहुत दूर नहीं हैं। इन दोनों की मम्मी भी आपस में अच्छी दोस्त बन गई हैं। शाम को रत्ना की मम्मी भी रत्ना के साथ प्रीति के घर चली गई थीं। रत्ना की मम्मी को देखकर प्रीति की मम्मी बहुत खुश हुई।
    चाय पीते हुए दोनों की मम्मी आपस में बातें कर रही थीं । रत्ना की मम्मी ने कहा, "गर्मी की छुट्टियों में तो बच्चे परेशान हो जाते हैं। उनके लिए समय बिताना एक समस्या बन जाती है। घर में दो-तीन भाई-बहन हों तो वे आपस में मन बहला लेते हैं लेकिन रत्ना तो मेरी अकेली संतान है। केबिल कनेक्शन भी मैंने नहीं ले रखा है। इतनी महँगाई में गुजारा मुश्किल होता है। सौ रुपये महीने केबिल वाले को देने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। डिपोजिट अलग से देना होता है। वैसे भी केबिल कनेक्शन हो तो बच्चे टी.वी. के सामने से उठना नहीं चाहते।'
     प्रीति की मम्मी बोली, "हमने केबिल कनेक्शन तो ले रखा था। स्कूल खुलते ही बच्चों को समझा-बुझा कर निकलवा दिया। उन्होंने खुद भी महसूस किया कि केबिल के रहते वह पढ़ाई ठीक से नहीं कर पा रहे और क्लास में पिछड़ रहे हैं। अब गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हुई हैं। दो महीने के लिए कनेक्शन फिर ले लूंगी।'
    "मुझे भी कुछ करना होगा। वर्ना इन छुट्टियों में रत्ना "मैं बोर हो रही हूँ, मन नहीं लग रहा' की रट लगा कर मुझे परेशान कर देगी। कहती हूँ नानी या दादी के पास चली जा तो वह अकेली वहाँ जाने को तैयार नहीं है। मैं छह-सात दिन से ज्यादा नही रुक  सकती वर्ना इसके पापा परेशान हो जाते हैं।'
 प्रीति की मम्मी ने पूछा, "रत्ना को पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ने का शौक नहीं है ?'
 "मैं कोई पत्रिका नहीं लेती, उसे भी पढ़ने का शौक नहीं है।'
 "देखिए बहन शौक तो पैदा करना पड़ता है। शुरू में मेरे बच्चों को भी शौक नहीं था फिर भी मैं उनके लिए पत्रिकाएँ मँगाती थी। वह पन्ने पलटते, तस्वीरें देखते, चुटकुले पढ़ते और रख देते। फिर जब मुझ से कहते मम्मी हम बोर हो रहे हैं तो मैं उन्हें पत्रिका थमा कर कहती, "मैं भी बोर हो रही हूँ  किंतु पढ़ने का मेरे पास समय नहीं है। तुम ये कहानी पढ़ो तो मैं भी सुन लूंगी।' धीरे-धीरे उन्हें पत्रिकाएँ अच्छी लगने लगी। कई बार रात को कहते, "हमें नींद नहीं आ रही है' तब मैं पत्रिका उनके हाथ में दे देती कि इसे पढ़ो, पढ़ते-पढ़ते नींद आ जाएगी। आज हालत ये है कि बिना पढ़े उन्हें नींद नहीं आती। बच्चे पढ़ें या न पढ़ें उनकी उम्र व रुचि के हिसाब से पत्रिकाएँ अवश्य मँगानी चाहिए।'
 "तुम ठीक कह रही हो मैं अब नियमित रूप से उसके लिए बाल पत्रिका मँगाया करूँगी।'
     तभी पास बैठी प्रीति ने कहा, "आंटी दो बाल पत्रिकाएँ तो हमारे यहाँ कई वर्ष से आती हैं। मैंने सभी अंक बहुत सँभाल कर रखे हुए हैं क्योंकि रत्ना ने उन्हें नहीं पढ़ा है तो उसके लिए तो वह नई के समान ही हैं वह मुझ से लेकर पढ़ सकती है।.... आप भी पत्रिका मँगाने को कह रही हैं तो आप वह पत्रिका मँगाना जो मैं नहीं मँगाती, इस तरह हम आपस में बदल कर पढ़ लेंगे।'
 "हाँ प्रीति तुम्हारा सुझाव बहुत अच्छा है। हम ऐसा ही करेंगे।'
 प्रीति ने दो पत्रिकाएँ रत्ना को देते हुए कहा, "इन्हें पढ़ने के बाद मुझे वापस कर देना और फिर दूसरी दो ले जाना।'
 पत्रिका लेकर रत्ना घर चली गई। दूसरे दिन शाम को प्रीति रत्ना का इंतजार करती रही क्योंकि वह रोज खेलने आती थी। रत्ना को न आते देख प्रीति उसके घर चली गई।
"आंटी रत्ना कहाँ है ? आज तो वह खेलने भी नहीं आयी।'
 "अरे बेटा वह तो तुम्हारी दी पत्रिकाओं को पढ़ने में इतनी मस्त है कि उसके पास बोर होने को समय ही नहीं है। बैठी होगी अपने कमरे में...सच बेटा तुमने तो हम दोनों की परेशानी का समाधान कर दिया।'
 रत्ना से पत्रिका छीनते हुए प्रीति बोली -- "अरे मैंने पत्रिका इसलिए तो नहीं दी थी कि तुम मुझे ही भूल जाओ। चलो खेलेंगे, बाद में पढ़ना।'
 पत्रिका वहीं रख कर दोनों खेलने चल दी थीं।
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गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

पानी क्या ड्रम पी गया

बाल कहानी                              
             पानी क्या ड्रम पी गया ?
 
                                           पवित्रा अग्रवाल

                                                                                                                                                                                                                                      ट्यूशन   सुबह सुबह ट्यूशन पढ़ कर अनूप घर आया तो मम्मी बहुत गुस्से में थीं .बैग रखते हुए उसने पूछा “मम्मी आज सुबह सुबह इतने गुस्से में क्यों हो ?.पापा तो बाहर गए हुए हैं ,तो क्या  दादी से झगडा हुआ है ?” 
‘नहीं .’
‘तब तो फिर जरुर ऊपर वाली आंटी से हुआ होगा पर क्यों मम्मी ?
“क्यों कि तेरी मम्मी को झगडा करने की आदत है ‘
‘मैं ने ऐसा तो नहीं कहा ,...बताओ न मम्मी आप इतने गुस्से में क्यों हैं ?’
    “गुस्सा नहीं आएगा तो और क्या होगा ? किराये का मकान है, इस में बोरवैल भी नहीं है . अपना मकान होता तो कब का बोरिंग करा लेती .शहर में पानी की कितनी किल्लत है सब जानते हैं ...एक दिन छोड़ कर पानी आता है,जब मैं उठी तो ड्रम खाली पड़ा था .मैंने सोचा आज पानी नहीं आया होगा पर मंदिर से आकर दादी ने बताया कि उनके मंदिर जाते समय  ड्रम भरने वाला था पर इस समय वह एकदम खाली है. आखिर पानी कहाँ गया ? ऊपर वालों के सिवाय और कौन ले सकता है ?”
‘मम्मी वह लोग तो मोटर लगा कर पानी चढाते हैं ,क्या आपने मोटर की आवाज सुनी थी ?”
‘नहीं मोटर की आवाज तो मैं ने नहीं सुनी ’
‘तो आप क्या समझती हैं... आंटी आपके ड्रम में से बाल्टी भर भर कर ऊपर पानी ले गई होंगी ?’
‘यह सब मैं  नहीं जानती पर कोई तो पानी लेकर गया है ?’
       तभी ऊपर वाली आंटी आगई – ‘अनूप आप की मम्मी तो लड़ने के बहाने ढूँढती रहती हैं ,ड्रम खाली देख कर इन्होंने नीचे से चिल्ला चिल्ला कर लड़ना शुरू कर दिया ...हमने तो आज एक बाल्टी पानी भी नहीं भरा है .सुबह सुबह इतना अच्छा प्रेशर होता है कि बिना मोटर चलाये ही  हमारा ड्रम भर सकता है पर पानी आते ही आप की दादी नल खोल लेती हैं तो पानी ऊपर नहीं चढ़ पाता और बाद में हमें मोटर से पानी चढ़ाना पड़ता है और कभी करेंट चला जाये तो बहुत मुश्किल होती है .लेकिन रोज रोज की किटकिट से बचने के लिए हमने कुछ भी कहना छोड़ दिया है .अब भी इनको चैन नहीं है ,अब तो हम पर पानी की चोरी का इल्जाम भी लगा रही हैं . कुछ दिन चैन से रह लेने दो , हम जल्दी ही दूसरे मकान में चले जायेंगे .’
   “मैं इल्जाम नहीं लगा रही .अनूप अब तू ही बता या तो दादी झूठ बोल रही हैं या फिर पानी को ड्रम पी गया ”
“एक मिनट मम्मी ,जब आप कमरे से बाहर आई  तो पाइप ड्रम के अन्दर था या बाहर पड़ा था ?”
“पाइप तो ड्रम के अन्दर ही था ”
“नल खुला था या बंद था ?”
'खुला था '.
'नल में पानी आरहा था या जा चुका था ?'
'पानी तो जा चुका था .'
तब तो बात साफ है कि ड्रम का पानी किसी ने नहीं लिया है .
तब पानी गया कहाँ ,क्या ड्रम पी गया ?
पानी ड्रम ने नहीं नल ने पिया है
अनूप यह मजाक का समय नहीं है
मै मजाक नहीं कर रहा ,सच बोल रहा हूँ मम्मी .
'मैंने भी यही कहा था कि पानी नल में वापस चला गया है पर आपकी मम्मी तो कुछ सुनने को तैयार ही नहीं थीं”
मम्मी अभी ड्रम में कितना पानी बचा है ?
चौथाई ड्रम पानी है, दो दिन कैसे काम चलेगा ?
“मम्मी ड्रम में पाइप जहाँ तक डूबा था उतना पानी वापस नल में चला गया .और जो पानी पाइप से नीचे था वह बच गया ...और दादी मंदिर जाने से पहले आप नल बंद कर देतीं तो हमारा ड्रम खाली नहीं होता और ऊपर वाली आंटी को भी कुछ पानी मिल जाता . ‘सॉरी आंटी .मम्मी की तरफ से मैं आप से माफ़ी मांगता हूँ’ ....मम्मी आप भी थोडा सब्र से काम लिया करो .आगे से ध्यान रखो ड्रम में पाइप थोडा ही डूबने दो ताकि नल जाने पर पानी वापस न लौटे . दूसरी बात ड्रम भरते ही पाइप हटा कर नल बंद कर देना चाहिए  वरना आप के उठने तक पानी नाली में व्यर्थ ही बहता रहेगा और यह पानी की भयंकर बर्बादी है.जो किसी हालत में नहीं होनी चाहिए  और आंटी भी तो हमारी तरह किरायेदार हैं , पानी उन्हें भी तो मिलना  चाहिए .”
                                                
( यह कहानी नवम्बर 15 की  नंदन पत्रिका में छपी थी )
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रविवार, 13 मार्च 2016

रंग भरा गुब्बारा

 
 
 
 
 
होली के अवसर पर
--

बाल कहानी

                    रंग भरा गुब्बारा   

                                             पवित्रा अग्रवाल

       होली के दूसरे दिन सुबह यश जल्दी उठ गया। उसे अखबार का इंतजार था। रोज अखबार सुबह छह बजे तक आ जाता था। सात बजे तक नहीं आया तो उसे ध्यान आया कि आज तो समाचार पत्र नहीं आते।...वह बेचैन हो उठा।...पता नहीं कल जो आदमी स्कूटर से गिरा था, उसका क्या हाल है। यदि मामूली चोट लगी होगी तो अखबार में उसका जिक्र नहीं होगा। यदि हालत गंभीर होगी या मौत हो चुकी होगी तो समाचार पत्र में न्यूज अवश्य आएगी।
     यश पूरे दिन परेशान रहा। दूसरे दिन उठते ही सबसे पहले उसने समाचार पत्र लेकर वह पृष्ठ खोला, जिसमें दुर्घटना आदि के समाचार छपते हैं। तभी उसकी नजर एक समाचार पर रुक गई। उसमें लिखा था "एक शरारती बच्चे द्वारा रंग भरा गुब्बारा फेंकने से चालीस वर्षीय सुमेर स्कूटर पर संतुलन खो बैठने से गिर पड़े। उनके सिर में गंभीर चोट आई है। हालत नाजुक है।'
      समाचार पढ़ कर यश रो पड़ा। यद्यपि वह घायल आदमी न उसका रिश्तेदार था और न कोई परिचित।
    उसने अंदाजा लगाया कि वह पापा की उम्र का ही होगा। मेरी उम्र के उसके भी बेटे-बेटी होंगे, पत्नी होगी। हो सकता है बूढ़े माँ-बाप भी हों। हो सकता है वह घर में कमाने वाला अकेला  व्यक्ति     हो....यदि उसे कुछ हो गया तो उसके परिवार का क्या होगा।...होली पर की गई मेरी ये छोटी सी शरारत किसी के लिए जान लेवा साबित हो सकती है ऐसा तो मैंने सोचा भी नहीं था।
     परसों होली वाले दिन छोटे गुब्बारों में रंगीन पानी भरते देख कर मम्मी ने टोका था,  -"यश, सीधे-साधे रंगों से होली खेलना। राह चलते लोगों पर ये गुब्बारे मत फेंकना। इससे किसी को चोट लग सकती है, कोई दुर्घटना भी हो सकती है।'
      "कुछ नहीं होता मम्मी आप तो वैसे ही डरती हैं।'
     उसकी बात सुने बिना ही मम्मी दूसरे कमरे में चली गई थीं। यश रंगों की पुड़िया, पिचकारी व गुब्बारे लेकर अपने दोस्तों के घर की तरफ चल दिया था। बहुत जल्दी उसके रंग समाप्त हो गए थे और रंग लेने के लिए वह अपने घर की तरफ लौट रहा था। उसके हाथ में एक गुब्बारा बचा था। स्कूटर पर जाते हुए एक आदमी पर उसकी नजर पड़ी। उसे ताज्जुब हुआ कि उसके ऊपर किसी ने भी रंग क्यों नहीं डाला। बस हाथ का गुब्बारा उसने स्कूटर वाले पर उछाल दिया था।...उस आदमी को स्कूटर के साथ गिरते देख कर वह डर गया और भाग कर अपने घर आ गया। उसे किसी ने शायद गुब्बारा फेंकते नहीं देखा था।
     मम्मी ने उसे टोका भी था कि 'अरे आज तो तू बड़ी जल्दी होली खेल कर घर आ गया।'
 "हाँ मम्मी सिर में थोड़ा दर्द है।'
    मम्मी ने माथे पर हाथ लगा कर देखा फिर कहा, "बुखार तो नहीं है।...पानी गर्म कर देती हूँ, जल्दी से नहा-धो ले। अभी तो रंग छुड़ाने में ही आधा घंटा लगेगा...फिर खाना खाकर थोड़ी देर सो जाना।'
    उसे कई दोस्त बुलाने आए। 'उसके सिर में दर्द है' कह कर मम्मी ने उन्हें बाहर से ही लौटा दिया।
    कल भी पूरे दिन वह परेशान रहा। मम्मी ने कारण पूछा तो वह बोला "कुछ नहीं मम्मी, परीक्षा आरही हैं न उसी की वजह से थोड़ा तनाव हो रहा है।'
    आज अखबार में स्कूटर वाले की गंभीर हालत का समाचार पढ़ कर तो वह बहुत दुखी हो गया। जल्दी से तैयार हुआ। टिफिन बॉक्स बैग में रखा। मम्मी आवाज ही देती रह गई। वह बिना नाश्ता किए घर के बाहर बने मंदिर में गया। भगवान से स्कूटर वाले का जीवन बचाने की प्रार्थना की और स्कूल चला गया।
      क्लास में लेट आने पर टीचर ने राहुल को बाहर खड़े रहने को कहा तो वह बोला,
       -" मैडम मेरे लेट होने की वजह सुन लें। फिर भी आप सजा देंगी तो मुझे मंजूर होगी।...मेरे ताऊजी का होली वाले दिन एक एक्सीडेंट हो गया था। दो दिन से वह बेहोश थे।मैं पापा और ताई जी को हास्पिटल में चाय-नाश्ता दे कर आ रहा हूँ इसीलिए कुछ लेट हो गया।'
   "ठीक है अंदर आओ।...कैसे हो गया था एक्सीडेंट ? अब वे कैसे हैं ?'--टीचर ने पूछा
 "होली वाले दिन स्कूटर चलाते हुए एक रंग भरा गुब्बारा उनके मुँह पर आकर लगा। संतुलन बिगड़ जाने से वह गिर पड़े थे।...आज वे होश में आए हैं।...अब खतरे से बाहर है।'
 अनायास ही यश के हाथ जुड़ गए और उसके मुँह से निकला "थैंक गॉड।'
 बराबर में बैठे छात्र ने चौंक कर पूछा "तुझे क्या हुआ ?'
     "कुछ नहीं उसके ताऊजी खतरे से बाहर हैं यह जान कर अच्छा लगा।'
 टीचर ने पढ़ाना शुरू कर दिया था किंतु यश का ध्यान पढ़ने में नहीं था।...वह बहुत खुश था उसकी वजह से जो व्यक्ति दुर्घटना का शिकार हो गया था, उस व्यक्ति का जीवन अब बच गया है वर्ना वह कभी अपने को माफ नहीं कर पाता। उसने मन ही मन कसम खाई कि इस तरह की होली अब वह कभी नहीं खेलेगा और दोस्तों को भी नहीं खेलने देगा।


पवित्रा अग्रवाल

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बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

तितली को उड़ने दो

बाल कहानी 
                       तितली को उड़ने दो
        

                                                     पवित्रा अग्रवाल


       सोनू ने माँ से कहा -- "मम्मी आप रोज सुबह पापा के साथ मार्निग वाक को जाती हैं, अब हमारे स्कूल    की  छुट्टियाँ हो गई हैं... हम भी आपके साथ चलें ?'
 "यह तो बहुत अच्छी बात है ,पर हम तो सुबह छह बजे वहाँ पहुँच जाते हैं, तुम्हें जल्दी उठना पड़ेगा ।'
 "हाँ मम्मी आप उठा देना हम चलेंगे ।'.
. दूसरे दिन मम्मी की एक आवाज में ही सोनू व पम्मी उठ कर जल्दी से तैयार हो कर बगीचे में पहुंच गए   पम्मी ने चहकते हुए कहा --'वाह मम्मी बहुत सुंदर गार्डन है, कितने सुंदर सुंदर फूल खिले हैं।'
  सोनू ने कहा -- " देख पम्मी वहाँ बच्चों के खेलने के लिए बहुत तरह के झूले भी है ?'
 " हाँ भैया वह देखो स्केटिंग सीखने के लिए भी इंतजाम है... मम्मी हमें भी स्केट्स ले दो, हम भी   स्केटिंग सीखेंगे।'  
 "ठीक है दिला देंगे।... बच्चों तुम को जो खेलना है खेलो, मैं अब वाक करके आती  हूँ।'
 "ठीक है माँ आप जाइए ।'
 बच्चों को तितलियों के पीछे भागते देख कर मम्मी ने पूछा - "अरे तुम लोग यह क्या कर रहे हो ?'
 "अरे मम्मी देखिए कितनी सुन्दर तितली है और बहुत फुर्तीली भी है ,हम दोनो इतनी देर से कोशिश कर  रहे हैं पर यह पकड़ में नही आ रही ।'
     "पर तुम इसे क्यों पकड़ना चाहते हो... पकड़ोगे तो वह मर जाएगी।"
 "अरे मम्मी बहुत दिनों बाद तितली को देखा है। हमारे कई दोस्तों ने तो तितली को देखा भी नही है।इसे  ले जा कर अपने दोस्तों को दिखाएगे । "
 मम्मी के कुछ कहने से पहले ही पम्मी ने पूछा -"मम्मी तितली कहाँ रहती हैं ?'
 "बेटे बाग - बगीचे ही तितलियों का घर होते हैं। यहीं  फूलों के बीच यह सो जाती हैं।'
 " इतनी कम क्यों दिखती हैं ?'
 "हाँ इनकी संख्या दिन पर दिन कम होती जा रही है।'
     "क्यों मम्मी ?'
   "बेटा बाग बगीचे, हरियाली सब कम होते जा रहे हैं तो तितली रहेंगी कहाँ ?...जो कुछ बच भी जाती हैं  तो बच्चे उन्हें जीने नहीं देते ।'
 "फिर तो मम्मी एक दिन ऐसा आएगा कि इनकी प्रजाति ही समाप्त हो जाएगी ।'
 "हाँ बच्चों ऐसा भी हो सकता है।'
    " मम्मी फूल और तितलियाँ ही तो बगीचे की शान होते हैं । हमें इनको समाप्त नहीं होने देना चाहिए ।'
 "पर हम क्या कर सकते हैं मम्मी ?'
 "पहली बात  फूलों को तोड़ना नहीं चाहिए।.. फूल नहीं होंगे तो तितली भी नहीं आएगी ?'
    "मम्मी अभी कुछ बच्चे फूल तोड़ रहे थे तो  वाचमेन ने उन को बहुत डाँटा भी था ।'
    "मम्मी हमें अपनी बालकनी में फूलों के पौधे लगाने हैं तो तितली वहाँ भी आंएगी ?'
 "हाँ आ सकती हैं।'
 "मम्मी इस इतवार को नर्सरी से पौधे लाएंगे और उनकी देख भाल भी हम दोनो करेंगे ।'
 "और क्या क्या करोगे ?'
 " हम फूल नहीं तोड़ेंगे और तितलियो को उड़ने देंगे ।... अपने दोस्तों को भी समझाएंगे।....मम्मी अपना सैल फोन  दीजिए, हम इनका फोटो तो  खीच सकते हैं ?'
 "हाँ फोटो खीच सकते हो...पर हमे इनकी रक्षा करनी है वरना एक दिन यह लुप्त हो जाएंगी फिर  फोटो  में ही मिलेंगी ।'
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शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

दादा जी की नसीहतें

बाल कहानी
                        


              दादा जी  की  नसीहतें

                                                                पवित्रा अग्रवाल

      पड़ौस के घर में एक परिवार रहने आया था ,उसमें दादाजी के उम्र के एक व्यक्ति और उनकी पत्नी थीं ।वह लंगड़ा कर चलते थे और कड़क स्वभाव के थे ।वह अपने साथ बहुत से गमले लाए थे जिस में बहुत तरह के रंग बिरंगे फूल खिलते थे । वह अपने पौधों की बच्चों की तरह देख भाल करते थे ,वह बांसुरी भी बहुत अच्छी बजाते थे।
       बच्चे उन पौधों को देख कर बहुत ललचाते थे . उनका बस चलता तो वह एक भी फूल पौधों पर नहीं छोड़ते पर उनका कड़क स्वभाव देख कर बच्चे उनसे दूर ही रहते थे ।
       एक दिन पौधों के पास किसी को न देख कर सौमेश अपने को नहीं रोक पाया और दो तीन फूल तोड़ लिए, तब ही वहाँ दादाजी आ गए और उसका हाथ पकड़ कर बोले---' यह क्या किया तुमने ... आगे से ऐसा गल्ती मत करना वरना तुम्हारे पापा से शिकायत कर दूँगा,अब जाओ यहाँ से '
     तब से उन दादाजी टाइप व्यक्ति का नाम बच्चों ने लंगड़दीन रख दिया और उन्हें देख कर एक गाना गाते थे -- "लंगड़दीन ,बजाए बीन '
     पतंग के दिन आने वाले थे ।बाजार रंग बिरंगी छोटी बड़ी पतंगों से भरा पड़ा था. रास्ता चलते बच्चे बड़ी हसरत से पंतगों को देखते थे पर अभी स्कूल खुले हुए थे तो पतंग उड़ाने की छूट उन्हें नहीं मिली थी। पर जैसे जैसे पतंग के दिन नजदीक आ रहे थे, दादा जी का दखल बढ़ने लगा था ।वह निकलते बैठते बच्चों को बहुत नसीहतें देने लगे थे ।
      किसी से कहते, सुनो आराम से पतंग उड़ाना , लूटने के लिए उसके पीछे मत दौड़ना, गिर गए तो जान भी जा सकती है।... देखों बच्चों लोहे की छड़ से पतंग लूटने की कोशिश कभी नहीं करना .’
      कुछ बच्चे ये नसीहतें सुन सुन कर उनसे चिढने लगे थे .स्कूल की छुट्टी होते ही बच्चे पतंग उड़ाने की फ़िराक में रहते थे .दोपहर को पापा लोग तो काम पर चले जाते थे ,जिन की मम्मी नौकरी करती थीं वह भी घर में नहीं होती थीं ,बस बच्चों को पतंग उडाने का मोंका मिल जाता था .
      बस ऐसे ही एक दिन अमित के मम्मी पापा काम पर गए हुए थे , दादी गाँव में थीं. अमित अपने दो तीन दोस्तों के साथ छत पर पहुँच गया था. सब अपनी अपनी पतगें और चरक लेकर आ गए थे और बड़ी तल्लीनता से पतंग उड़ा रहे थे.तभी एक बहुत बड़ी और बहुत सुंदर उड़ती पतंग पर बच्चों की नजर गई तो वह पतंग उड़ाना भूल कर उस को ही देखते रह गए और उसे पाने के लिए उस पतंग से पेच लड़ा कर उसे काटने की कोशिश करने लगे .
       देखते ही देखते वह पतंग कट कर नीचे की तरफ आने लगी और बच्चे अपनी पतंगों को हवा में ही छोड़ कर उसे पकड़ने की कोशिश करने लगे.एक बच्चे  ने वहां पड़ी लोहे की सरिया को उठाना चाहा तो दूसरे बच्चे को लंगड़दीन की बात याद आगई , बच्चे ने छड़ उसके हाथ से ले कर दूसरे कोने में डाल दी पर उस समय बच्चे किसी भी तरह पतंग लूट लेना चाहते थे और तभी अचानक वह हादसा हो गया . अमित छत से नीचे गिर गया था .आस पास कोई नहीं दिख रहा था. बच्चे  मदद के लिए चिल्लाने लगे .
     शोर सुन कर लंगड़दीन बाहर आये, बच्चे को बेहोश पड़ा देख कर जल्दी से बच्चों की मदद से ऑटो में डाल कर अस्पताल ले गए .जगह जगह से खून बह रहा था . डाक्टर को सौंप  कर वह हताश से बैठ गए थे .तब बच्चों ने बताया कि पतंग लूटने के चक्कर में अमित छत से गिरा है. अमित के माता –पिता घर पर नहीं थे और किसी को उनका मोबाइल नंबर भी नहीं पता था. समस्या थी कि उन्हें कैसे सूचित किया जाये .अमित के दोस्त को उसके चाचा जी का घर पता था, किसी तरह उसके माता पिता आगये थे .
     डॉक्टर ने आकर बताया कि बच्चा अभी भी बेहोश है , यदि समय से न लाया गया होता तो खून बहुत बह जाता . हमें उम्मीद है कि वह जल्दी ही होश में आजायेगा , बस एक बार उसे होश आजाये फिर चिंता की कोई बात नहीं है .चोटें और  फ्रेक्चर की चिंता नहीं है. समय लगेगा पर वह ठीक हो जायेगा '
     बच्चे आदर से लंगड़दीन को दादाजी कहने लगे थे. अमित के माता पिता ने दादाजी का शुक्रिया अदा किया .उन के  कहने पर बच्चे दादा जी के साथ घर लौट गए थे .रास्ते में दादा जी ने बताया कि बच्चों मुझे मालूम है कि तुम लोग मुझे लंगड़दीन कहते हो’
      बच्चों ने शर्मिंदा होकर सॉरी  बोला .
    ' बच्चों  मैं  हमेशा से एसा नहीं था. जब मै पन्द्रह वर्ष का था तब पतंग लूटने के चक्कर में मै भी छत से गिर गया था और लंगड़ा हो गया था . इसी लिए मै जब तब तुम लोगों को सावधानी से पतंग उड़ाने की नसीहतें देता रहता था पर मेरी कोशिश बेकार गई '
     ‘नहीं दादा जी आप की नसीहत बेकार नहीं गई .आज एक लडके ने पतंग लूटने के लिए लोहे की रॉड उठा ली थी पर तभी  मुझे आप की बात याद आगई और मैं ने उससे  रॉड छीन कर दूर फेंक दी ...हो सकता है उसके साथ भी कोई  दुर्घटना हो जाती '
     ‘एक बार फिर सॉरी दादा जी,अब हम आपकी बात मानेंगे .कृपया हमारी बदतमीजियों के लिए हमें  माफ़ कर दीजिये .’
‘ठीक है बच्चों अब सब  अपने अपने घर जाओ '  
    अब बच्चों की समझ में आ गया था कि  जब बड़े कुछ कहते हैं तो उसके पीछे कारण होता है .उनकी बातों  को यूँ ही  हवा में उड़ा देना ठीक नहीं .
                               
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