शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

एक शरारत



बाल कहानी             

 
                        एक शरारत
 
                                                पवित्रा अग्रवाल

  सौरभ सतरह वर्ष का लड़का था । उसकी परीक्षाएं समाप्त हो चुकी थीं।कोलोनी के कुछ दोस्त छत पर बैठ कर कभी कैरम ,कभी चैस, कभी लूडो खेल कर अपना समय बिताते थे।मम्मी इतना कहती थीं कि कुछ समय पढ़ने में लगाया करो उस से ज्ञान बढ़ता है । पर पढ़ने में उसका मन अधिक नहीं लगता था। दोस्तों केसाथ खेलते खेलते उसे ताश खेलने का शौक भी लग गया था । जब मम्मी पापा को पता चला तो उन्हों ने समझाया कि बेटा ताश खेलने में कोइ बुराई नहीं है  पर ताश खेलने वालों को अक्सर जुआ खेलने का चस्का लग जाता है और जुआ खेलना बहुत खराब शौक है ।'
      सौरभ की छोटी बहन सारा ने पूछा - पापा जुआ और ताश में क्या अंतर है ?'
'बेटा ताश खेलते समय जहाँ हार - जीत में पैसे से लेन देन होने लगता है ,वह जुआ कहलाता है। और इसका चस्का बहुत खराब होता है ।अधिक से अधिक पैसे जीतने का लालच बढ़ता जाता है और यह एक बुरी आदत के रूप में जुड़ कर खेलने वाले को बरबाद कर देता है।'
 "कैसे पापा ?'
 "बेटा यह कुछ पैसों से शुरू होकर बड़े स्तर पर ज्यादा रुपयों से खेला जाने लगता है। जो हारता है वह इस लालच में खेलता जाता है कि जीत कर अपना नुकसान पूरा कर लूँ । जो जीतता है उसे और जीतने का लालच खेलने को मजबूर करता है।इस हारने जीतने के लालच में बच्चों के पास पैसे नही होते तो वह चोरी करने लगते हैं। पहले घर से छोटी मोटी चोरी करते हैं फिर बड़ी चोरी भी करने लगते हैं और यह पतन इतना धीरे धीरे होता है कि समय पर नहीं रोका गया तो जिन्दगी भर पीछा नहीं छोड़ता ।समाचार पत्रों में रोज ही आता रहता है कि पुलिस ने छापा मार कर इतने जुआरियों को पकड़ा ।'
 "ओ... तो पापा जुआ खेलना अपराध भी है ?'
 "हाँ बेटा जुआ खेलना अपराध भी है।'
 अब तो सारा को हर समय डर लगा रहता था कि उसका भाई सौरभ कहीं जुआ खेलना शुरू न कर दे ।वह चुपके चुपके उस पर नजर रखने लगी थी। कभी कभी उसे शक भी होने लगा था कि वह लोग पैसों से ताश खेलने लगे हैं पर वह विश्वास के साथ ऐसा नहीं कह सकती थी ।'
      एक दिन जब सब लड़के छत पर ताश खेल रहे थे  पुलिस ...पुलिस 'की आवाज सुन कर छत पर भगदड़ मच गई और डर के मारे सारा का भाई सौरभ तो छत से ही कूद गया।...
     उसी समय सौरभ को अस्पताल ले जाया गया.. उसके सिर में चोट लगी थी.हाथ की हड्डी टूटी थी और भी कई जगह चोट लगी थीं पर वह होश में था और खतरे से बाहर था।
 अब प्रश्न उठा कि तुम छत से कैसे गिरे ?
  तब सौरभ ने बताया कि हम सब छत पर ताश खेल रहे थे तभी किसी ने पुलिस का नाम लिया ,हमने समझा कि पुलिस आ गई। ...कुछ नहीं सूझा कि क्या करें बस पुलिस से बचने के लिए मैं छत से कूद गया ।'
 "क्या तुम जुआ खेल रहे थे ?'
 "न ...न.. नहीं पापा ...।'
 "फिर तुम भागे क्यों...क्या सचमुच पुलिस आई थी ?'
    " पुलिस को मैंने नहीं देखा ... नीचे से किसी ने पुलिस,पुलिस पुकारा और मैं डर गया था...।
  "पर वहाँ तो कोई पुलिस नहीं आई थी ....यह जरूर किसी की शरारत थी ।'
 "पर ऐसी शरारत कोई क्यों करेगा ?'
      डरी डरी सी सारा यह सब बातें सुन रही थी और अपने भाई सौरभ के इस हाल के लिए खुद को दोषी मान रही थी । अब सारा के सब्र का बाँध टूट गया था ।वह पापा - मम्मी और भाई के पास जा कर बिलख बिलख कर रोने लगी थी...'मुझे आप सब माफ कर दें... पुलिस पुलिस मैंने ही पुकारा था ।'
 "पर सारा तुमने ऐसा क्यो किया ? ' 
            "भाई की ताश की आदत छुड़ाने के लिए मैं ने यह झूठ बोला था या कहिए कि मजाक किया था ।मैं देखना चाहती थी कि भाई और उसके दोस्तो पर पुलिस का नाम सुन कर क्या असर होता है। पर मेरा यह छोटा सा मजाक किसी के लिए जान लेवा भी साबित हो सकता है इस की मैंने कल्पना भी नहीं की थी।भाई की इस हालत के लिए मैं ही जिम्मेदार हूँ।'
      "चल बेटा जो होना था वह तो हो गया। हमारी किस्मत अच्छी थी कि भाई बच गया वरना कुछ भी हो सकता था...पर तू कल्पना कर भाई की जगह उसका कोई दोस्त  छत से कूदा होता तो क्या होता ?....उसके घर वाले क्या इतनी आसानी से तुझे या हमें माफ कर देते ?'
  'आप लोग मुझे माफ कर दो ।'... सारा और जोर जोर से रोने लगी थी।
 सौरभ ने कहा - " अब तू रो क्यों रही है, चुप हो जा। कोई दूसरा तो नहीं गिरा न.... तू तो मेरा भला ही चाहती थी । गल्ती मेरी भी तो थी...अब सच कहूं तो उस समय हमने पहली बार हार जीत पर पैसे लगाये भी  थे ...पुलिस के नाम से हम बुरी तरह डर गए थे .मुझे उस समय और  कुछ नहीं सूझा था ... । '

   मम्मी -पापा भौचक्के से रह गए -- "क्या कहा ...तुम सचमुच... ?'
   शर्मिंदा होते हुए सौरभ ने कहा - 'हाँ यह सच है '
 "फिर भी  भैया भूल  तो मुझ से हुई है ।'
 "तुम्हारी इस छोटी सी भूल ने मुझे  जिन्दगी में एक बड़ी भूल करने से बचा लिया है .अब आंसू पोंछ ले और अपने को कोसना बंद कर.'
     'मेरे अच्छे भैया...' कह कर सारा ने भाई का हाथ कस कर पकड़ लिया था ।मम्मी पापा ने भी संतोष की गहरी साँस ली और बच्चों को बाँहों में भर लिया .
 



       पवित्रा अग्रवाल
    
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