रविवार, 8 नवंबर 2015

मेरी कहानी

बाल कहानी 
                        मेरी कहानी
                                        
                                                 पवित्रा अग्रवाल

     दीपावली के बाद जब स्कूल खुला तो गुंजन हमेशा की तरह प्रार्थना शुरू होंने के समय ही स्कूल पहुँचा और उसके लाइन में लगते ही प्रार्थना शुरू हो गई।प्रार्थना समाप्त होने के बाद उसके क्लास टीचर.राहुल सर ने उसका नाम पुकार कर उसे आगे आने को कहा,वह एकदम से घबड़ा गया कि अनजाने में मुझ से कुछ गलती होगई है क्या जो सर इस तरह बुला रहे हैं।वह सकुचाता हुआ उनके पास जा कर खड़ा हो गया --   'कहिये सर क्या मुझ से कोई गल्ती हो गई है ?'
   "हाँ तुम से बहुत बड़ी गल्ती हो गई है,इसी लिये तो तुम्हें यहाँ बुलाया है'सर ने गम्भीरता से कहा ।'
 "क्या सर ?'
     "बच्चो यह है गुंजन गुप्ता,हमारे स्कूल में कक्षा आठ का छात्र है।बहुत शान्त स्वभाव का है व अपने काम से काम रखने वाला है।पढ़ने मे भी अच्छा ही है किन्तु यह एक बाल कहानीकार है और देश की कुछ प्रमुख बाल पत्रिकाओ में इस की कहानियाँ छप चुकी हैं यह बात शायद हम में से कोई नहीं जानता था।अभी दीपावली पर यहाँ के प्रमुख समाचार पत्र द्वारा आयोजित बाल कहानी प्रतियोगिता में गुंजन की कहानी "वरदान 'को प्रथम पुरस्कार मिला है। कहानी के साथ  सचित्र परिचय प्रकाशित न हुआ होता तो हमे पता भी नहीं चलता कि यह हमारे यहाँ का छात्र है।स्कूल के वार्षिक  समारोह में हम गुंजन को स्कूल-गौरव की उपाधि से सम्मानित करेंगे। इसने हमारे स्कूल का गौरव बढाया है।'
 बच्चों ने तालियों से उसका स्वागत किया।
      वार्षिक समारोह के दिन उसका सम्मान करते हुये टीचर ने कहा--"गुजंन हमे दीपावली पर प्रथम पुरस्कार प्राप्त कहानी के विषय में कुछ बताओ, साथ में यह भी बताओ कि तुम कब से लिख रहे हो और तुम्हारे लेखन की शुरुआत कैसे हुई ?'
    "सर मैं ने दो वर्ष से ही लिखना शुरु किया है,उस से पहले मैं ने सोचा भी नहीं था कि मैं कभी कुछ लिखूँगा।... तीन वर्ष पूर्व दीपावली के दिन मेरे साथ एक दुर्घटना हो गई थी बस उसने मेरी दुनियाँ ही बदल दी ।आम बच्चों की तरह दीपावली पर मैं भी खूब धूम धड़ाका करता था,दीपावली के चार.पाँच महीने पहले से मैं अपनी पाकेट मनी बचाना शुरू कर देता था।दीपावली पर मम्मी-पापा भी पटाखों के लिये रुपये देते थे।उन सब पैसों से मैं तरह तरह के पटाखे,बम,अनार, राकेट आदि खरीद लाता था।दीपावली के दिनों में टी.वी पर बार बार बताते व दिखाते थे कि पटाखे जलाते समय क्या क्या सावधानी बरतनी चाहिये...वरना दुर्घटना जान लेवा भी हो सकती है पर मुझ पर उसका कोई असर नहीं होता था।मम्मी भी टोकती रहती थीं कि पटाखे एक लम्बी स्टिक से जलाना,पास में एक बाल्टी पानी रखना मत भूलना,पटाखों के पैकेट आग से दूर रखना पर सुनता कौन था,इस कान से सुना उस कान से निकाल देता था।....
     अक्सर पटाखे जलाते समय मम्मी पापा में से एक  जना मेरे साथ अवश्य रहता था।वह दीवाली की रात थी ।मम्मी पूजा की तैयारी में व्यस्त थीं।मैं मौका पा कर अपने पटाखों के पैकेट के साथ चुपके से बाहर निकल गया।अनार जलाया लेकिन नहीं जला तो दुबारा झुक कर अनार जला रहा था कि वह एक दम से जल गया मेरा मुंह, बाल व एक आँख भी झुलस गये और सब तो ठीक हो गया पर एक आँख की रोशनी वापस नहीं आ पाई।
  एक आँख खोने का मुझे बहुत सदमा पहुंचा था..फिर पापा ने मुझे कृत्रिम आँख लगवा दी पर मुझ में बहुत हीनता की भावना आ गई थी,स्कूल जाने से भी कतराने लगा था।उन दिनो मैं बहुत चिड़चिड़ा,और एकान्त प्रिय होगया था..अपने को आसपास से काट कर कमरे में कैद सा कर लिया था।
पापा ने कुछ बाल पत्रिकाये ला कर दीं,उनमें मेरा मन रमने लगा ।कभी कभी उन में शारीरिक रूप से
विकलांग बच्चों की प्रेरणास्पद सत्य कथायें भी रहती थीं।एक बार पढ़ा था व फोटो भी देखा था कि दोनों हाथ न होने पर भी लड़की पैरो से अपने सब काम करती थी व लिखती भी पैरो से थी, एक लड़की मुंह में ब्रश दबा कर चित्र बनाती थी ।
    उन्ही दिनो पापा ने हैलन कैलर की जीवनी ला कर दी जो न देख सकती थी,न बोल और सुन सकती थी फिर भी उसने अपनी इन कमियों पर विजय पाकर दुनिया में अपना नाम रोशन किया था।मुझे लगा अरे मेरा दोष तो इनके सामने कुछ भी नहीं है।एक आँख ही तो खोई है दूसरी तो सलामत है।बस उन्ही दिनो मैं ने ऐसे बच्चो में आत्म विश्वास भरने के लिये लेख ,कहानी लिखनी शुरू कीं फिर उन्हें छपने भेजने लगा।शुरू में रचनायें लौट कर भी आई लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी फिर धीरे धीरे छपने भी लगीं।
      मेरी यह आत्म कथा सुन कर आप सब को अंदाजा हो गया होगा कि मेरी उस कहानी "वरदान' का नायक मैं ही हूँ।सच कहूँ सर तो मेरी आँख की रोशनी जाना भी अब मुझे वरदान सा लगता है।हाँ अब भी जब कभी मैं किसी से अपने  लिये "काना गुंजन' शब्द का स्तेमाल सुनता हूँ तो मेरी आत्मा रोती है फिर यह लेखन ही मुझे सहारा देता है।'
 "तुम बच्चो से कुछ कहना चाहोगे ?'
  " हाँ सर बस यही कहना चाहूँगा कि दूसरे की कमियों का मजाक नहीं उड़ाना चाहिये ।दुर्घटनाये किसी के साथ कभी भी हो सकती हैं।..दूसरी बात दीपावली पर खतरनाक किस्म के बम आदि नही छुड़ाने चाहिये इनसे धन की बर्बादी तो होती ही है,भयंकर दुर्घटनाये भी हो जाती हैं और प्रदूषण भी फैलता। साथ ही पटाखे जलाते समय बहुत सावधान रहना चाहिये।..आप द्वारा दिया गया यह सम्मान मुझे और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता रहेगा, बहुत बहुत धन्यवाद सर ।'
    
  (यह कहानी मेरे दूसरे बाल कहानी संग्रह 'चिड़िया मैं बन जाऊँ  से ली गई है )    
       

-पवित्रा अग्रवाल

ईमेल --   agarwalpavitra78@gmail.com