शुक्रवार, 15 मई 2015

'चिड़िया मै बन जाऊँ'की समीक्षा

युवा बाल साहित्यकार मनोहर मनु की कुछ पत्रिकाओं , पुस्तकों पर कई जगह बेबाक समीक्षात्मक टिप्पणी पढ़ कर लगा था कि यह एक अच्छे समीक्षक भी होंगे .इस युवा द्वारा अपने बाल कहानी संग्रह की बड़ी गहराई से की गई समीक्षा पढ़ कर अभिभूत हूँ .बहुत बहुत धन्यवाद , बधाई और शुभ कामनाएं मनोहर मनु जी .
प्रख्यात साहित्यकार पवित्रा अग्रवाल जी का बाल कहानी संग्रह 'चिडि़या मैं बन जाऊँ' पोस्ट बाॅक्स 23 पौड़ी को लगभग डेढ़ माह पहले ही मिल गया था।
अपरिहार्य कारणों से... तुरत-फुरत में अपने मन की बात लिख नहीं सका। आवरण सतरंगी है। हार्ड बाउण्ड में संग्रह आया है। अयन प्रकाशन 1/20 महरौली,नई दिल्ली 110030 से यह पुस्तक 200 रुपए में मंगाई जा सकती है। कागज़ बेहतरीन क्वालिटी में है। 88 पृष्ठों में 25 कहानियां हैं। औसतन तीन पेज की कहानियां हैं। यही इस संग्रह की विशेषता है।
कोई एक कहानी भी पाठक को उचटने नहीं देती। हर कहानी का अपना अदांज है। हर कहानी ठोस धरातल पर खड़ी है। बाल साहित्य में चिर-परिचित पवित्रा जी का यह दूसरा बाल कहानी संग्रह है। बाल साहित्य में लेखिका  चार दशक से  हैं । यही कारण है कि कोई भी कहानी किसी भी स्तर पर कमजोर नहीं है। पत्र-पत्रिकाओं में पवित्रा जी अक्सर ही नहीं नियमित छपती हैं। डा. रोहिताश्व अस्थाना जी ने इस संग्रह की भूमिका लिखी है।
पहली ही कहानी बाल मन की चंचलता को दर्शाती है। सपना जिसे लगता है कि उससे अच्छा तो चिडि़या है। कोई रोक-टोक नहीं,जहां मर्जी आए वहीं उड़कर चली जाए। लेकिन जब वह सपने में ही सही चिडि़या बन जाती है,तब जाकर उसे पता चलता है कि चिडि़या होना और चिडि़या बन कर खुद को बचाए-बनाए रखना बेहद मुश्किल है।
'दो चोटी वाली' स्कूल जीवन में एक-दूसरे के रूप,गुण,स्वभाव और आकारादि को लेकर पुकारे गए विशेषणों पर आधारित है। यह बड़ी ही दिलचस्प कहानी है। अक्सर कक्षा-कक्षों में कई बार एक बच्चे की गलती होने पर भी समूची कक्षा को दण्ड मिल जाता है।
'खाली कागज का कमाल' अलग दृष्टिकोण से बुनी गई कहानी है। अक्सर अपह्त बच्चे की मनोदशा पर कई कहानियां लिख ली जाती हैं। लेकिन तुषार जिसका अपहरण हो गया है। वह अपने से अधिक अपने घरवालों के बारे में सोचता है। वह सोचता है कि चार दिन से उसके घर वाले किस कदर और किस हद तक परेशान हो रहे होंगे। इससे अधिक दिलचस्प बात यह है कि पाठक तुषार तक उसके मम्मी-पापा और पुलिस के पहुंचने में तुषार और पप्पू की अक्लमंदी को पढ़ते-पढ़ते मुस्कराते भी हैं और कईयों को पहली बार जानकारी मिलेगी कि खाली कागज में भी कुछ लिखा हुआ हो सकता है और उसे पढ़ा जा सकता है।
ऐसा नहीं है कि लेखिका ने केवल चतुर,होशियार,समझदार,पढ़ाकू बच्चों पर ही केंद्रित कहानियां लिखी हों। माँ, मुझे माफ कर दो कहानी तो छोटी उम्र के बच्चे बिन्नू पर केंद्रित है। जो अच्छी परवरिश और संगत के अभाव में बुरी आदतों का शिकार हो गया था। कैसे एक घटना से बिन्नू सिहर जाता है और हमेशा के लिए जुआ खेलना छोड़ देता है।
रेखांकित करने वाली बात यह है कि पवित्रा जी अनुभव से सीखने और घटनाओं से सबक लेने वाली कहानियां लिखती हैं। एक भी कहानी सीख या संदेश देती नज़र नहीं आती। कहीं भी कथा का कोई अंश पढ़ने के प्रवाह को बाधक नहीं बनाता।
पढ़ने-लिखने की ललक पैदा करने वाली बात हो या फिर त्योहारों के दौरान होने वाली मस्ती,हल्की-फुल्की नोंक-झोंक। स्कूली जीवन में आपसी प्रतिस्र्पद्धा,त्योहारों के बिगड़ते स्वरूप की बात हो या नेत्रदान के प्रति आम अभिभावकों की समझदारी। स्कूली जीवन में छात्रों के व्यवहार के साथ-साथ शिक्षकों के स्वभाव और उनके छात्रों के साथ किए गए एक-एक व्यहार पर भी पवित्रा जी ने कलम उठाई है।
बच्चों की समझदारी पर भी पवित्रा जी ने कई कहानियां लिखी है। अचानक आ गए संकट पर बच्चे न तो घबराते हैं और न ही अपना घैर्य खोते हंै। वे आई अचानक आई मुसीबत को बड़ी कुशलता से निपटाते हैं। ऐसी ही कहानी है सोनम की समझदारी।
इस संग्रह में छोटी-छोटी आदतों,भूलों पर भी बड़ी दिलचस्प कहानियां हैं। पतंगबाजी और कई बार पतंग लूटने के कृत्य से हुई हानि पर भी लेखिका बेहद गंभीतर मुद्दे उठाती है। इसी तरह अवेतनिक सचिव में इशारा घरों में पंखों को खुला छोड़ देना,नल का खुला बहते रहना। इस कहानी में तो इमरशन राॅड ही केंद्र में है। बड़ों की बड़ी-बड़ी खराब आदतों को कहानी में सरलता और रोचकता से रेखांकित किया गया है। अलार्म का रोजमर्रा के जीवन में कैसे उपयोग हो सकता है, इस पर भी लेखिका ने बड़े रोचक ढंग से कहानी में वर्णन किया है।
वास्तुशास्त्र पर भी लेखिका ने बड़े सधे तौर पर कहानी लिखी है। जी का जंजाल कहानी यह बताने में बेहद सफल है कि घर के आकार बनावट दिशा आदि से कोई परिवार सुखी या दुखी नहीं होता। इस तरह कहानीकार का अंधविश्वासों पर भी एक प्रहार है।
पटाखों के छोड़ने,रंगों के बुरे प्रभाव के साथ-साथ प्रदूषण पर भी पवित्रा जी की लेखनी बालमन के अनुसार चलती है।
यात्रा के दौरान क्या सावधानी रखनी चाहिए। क्यों कर अपने नाक,कान,आंख खुले रखने चाहिए,इस पर बेहद कारगर और सटीक कहानी है थोड़ी सी सूझबूझ। अचानक आए संकट से घबराकर कुछ नहीं होता, बल्कि सोच-विचार करने से ही कोई हल निकलता है। यही सार पवित्रा जी की कई कहानियों के केंद्र में अधिकतर रहता है। बच्चों की बहादुरी से लेकर छोटी-बड़ी या छिटपुट हरकतों से कई बार बड़ी हानियां हो जाती हैं, इस पर कहानीकार का ध्यान है।
बच्चों को फूल बड़े ही प्यारे होते हैं। बड़ों को भी। लेकिन फूलों की परवरिश और उन्हें पौधों पर ही अपनी आयु गुजारने देना कितना चाहते हैं। पूजा-पाठ और त्योहार के नाम पर सैकड़ों फूल हर रोज पौधों से तोड़ लिए जाते हैं। इस ओर भी लेखिका ने फलों की चाहत के माध्यम से पाठकों का ध्यान खींचा है। यही नहीं लेखिका नई सूचना तकनीक के इस्तेमाल पर भी गंभीरता से कहानी बुनती है। फौजी का बेटा कहानी भी इसी तरह की है। प्लास्टिक की थैलियांे के अधिकाधिक प्रयोगों से होने वाले नुकसान पर भी कहानीकार का ध्यान है। पाॅलिथीन पर आधारित कपड़े की थैली क्यों? कहानी कहीं से भी सूचनात्मक और विषयाधारित भावशून्य कहानी नहीं बनती।
होली और दीवाली पर आधारित कई कहानियां हैं। लेकिन हर कहानी का केंद्रीय भाव विशिष्ट और दूसरी कहानी से जुदा है। जेण्डर, विकलांगता आधारित कहानियां भी संग्रह में हैं। लेकिन यह कहानियां आम कहानियों  से विशिष्ट हैं। कथा,संवाद और भाव के साथ-साथ कहन भी बड़ा सुंदर है।
मैं 1952 में जन्मी इन बालसाहित्यकार को नहीं जानता। हां इनकी कई कहानियां बचपन से पढ़ रहा हूं। मेरे पसंदीदा रचनाकारों में एक नाम पवित्रा अग्रवाल जी का सदा से रहा है। मुझे अच्छा लगा कि उनका यह कहानी संग्रह मुझे पोस्ट बाक्स 23 के माध्यम से मिला।
कुल मिलाकर एक-एक कहानी सधी हुई है। कथा प्रवाह देखते ही बनता है। संवाद कहीं भी क्लिष्ट नहीं है। संवाद जीवंत हैं और अपने आस-पास के लगते हैं। लेखिका जेण्डर का ध्यान रखती है। कहानी की लंबाई के प्रति वे सजग हैं। पात्रों की संख्या हर कहानी में कहानी के हिसाब से ही हैं। कहीं भी अनावश्यक विस्तार न तो पात्रों में दीखता है न हीं कथा में। एक पाठक को और क्या चाहिए।

गुरुवार, 7 मई 2015

चोरी का माल




बाल कहानी  

                                चोरी का माल                                          
                                                                            पवित्रा अग्रवाल

    अमन पापा के साथ अपनी ज्वैलरी की दुकान पर बैठा था तभी एक दीन हीन सा आदमी आया और दुखी स्वर में बोला साहब मुझे पैसों की बहुत जरूरत है, बीबी दवाखाने में है. पचास हजार रुपए अभी जमा कराने हैं ,लेट होगया तो वह मर जाएगी '
 ‘इसमें हम तुम्हारी क्या मदद कर सकते हैं ?’
          उसने इधर उधर नजर दौड़ाई और बोला मैं बेचने को पत्नी के गहने लाया हूँ...उन्हें खरीद कर आप मेरी मदद कर सकते हैं।’
 ‘अरे हम तुम को जानते नहीं, पहचानते नहीं ऐसे गहने हम कैसे खरीद सकते हैं ? तुम अपने किसी पहचान वाले के यहाँ बेच सकते हो या गिरवी रख सकते हो ।'
"मैं इलाज के लिए गाँव से शहर आया हूँ ,यहाँ हमें कोई नहीं जानता.. साहब दया करो ।'
 "हम ऐसे कैसे खरीद सकते हैं, हमे क्या पता कि यह सोना कितना शुद्ध है'
‘आप जाँच करा ले ‘
 पापा ने गहने अंदर लेजा कर उनकी जाँच कराई फिर उनका वजन किया और बाहर आकर बोले – ‘ सोने में बहुत खोट है ,यह हमारे काम का नहीं है।’
  ‘वजन तो करिए कितना है कुछ कम पैसे दे देना’
 ‘वजन तो चालीस ग्राम है, हम चालीस हजार से ज्यादा नहीं देंगे ‘
 ‘क्या साब सोना तीस हजार से ज्यादा चल रहा है ,यह तो बीस ग्राम के भी पैसे नहीं है’
 "नहीं भाई आप किसी दूसरी दुकान पर जा कर बेच दो ...हमें नहीं चाहिए।’
 ‘ऐसा कैसे साब कम से कम एक लाख तो दीजिए।’
  तभी पुलिस को वहाँ घूमता देख कर वह आदमी डर गया बोला-‘ ठीक है कहीं दूसरी जगह दिखा लेता हूँ’
‘पापा आज ही मैं ने पेपर में पढ़ा था कि पुलिस ने जनता से चोरी का माल न खरीदने की अपील की है. साथ ही यह भी लिखा था कि चोर से चोरी का माल खरीदने वाला भी अपराधी ही माना जाएगा ...और पापा मुझे तो यह आदमी चोरी का माल बेचने वाला लगा, ...आपने देखा पापा पुलिस को देखते ही चल दिया .’
'हाँ बेटा तू सही हो सकता है. इस तरह की खबरें आती ही नहीं रहतीं,हमारे बाजार के कई लोग चोरी का माल खरीदने के आरोप में पुलिस द्वारा पकड़े भी जा चुके हैं।पर बेटा डर डर कर जीने से काम नहीं चलता, थोड़ी रिस्क तो लेनी ही पड़ती है।इसका माल अच्छा था, हो सकता है सचमुच उसकी पत्नी बीमार हो ।'
 ‘यदि पुलिस को देख कर वह चला न गया होता तो क्या आप वह गहने खरीद लेते ?’
 ‘सौदा पट जाता तो शायद खरीद लेता ,पहले भी कई बार खरीद चुका हूँ...भगवान की कृपा से अब तक तो नहीं फँसा हूँ।’
   ‘पापा देखिए, पुलिस ने किसी आदमी को पकड़ा हुआ है और उसे साथ लेकर सामने वाली ज्वेलरी शॉप में गए है .
 ‘ पुलिस ने उसे  चोरी का माल बेचते या कहीं चोरी करते पकड़ा  होगा , पूछा होगा कि माल कहाँ कहाँ बेचा ,जिस दुकान पर वह ले जाएगा पुलिस उसे भी गिरफ्त में ले लेगी फिर उससे भी पूछताछ होगी ।’
‘पापा इन लोगों को सचमुच याद रहता होगा कि कहाँ माल बेचा या भूल भी हो सकती है ?’
 ‘भूल भी हो सकती है... पर पुलिस को क्या ,वह आदमी जिस दुकान पर बेचने की बात कहेगा,  पुलिस तो उसे ही पकड़ कर ले जाएगी ।’
 ‘अच्छा हुआ पापा आपने उस आदमी से सोना नहीं खरीदा वरना किसी दिन  आप भी मुश्किल में पड़ सकते थे .’
 “बेटा इस व्यापार में यह बहुत साधारण सी बात है और करीब करीब हर कोई इस तरह से खरीद फरोख्त करते है और हम भी कोई ऐसे ही नहीं खरीद लेते, देख भाल कर लेते हैं .’
  ‘ पर पापा आज आप मुझ से प्रोमिज कीजिये कि आगे से आप इस तरह से कभी कोई सोना चांदी नहीं खरीदेंगे ...कुछ दिन बाद बहन की शादी है. उससे पहले या कभी बाद में भी आप ऐसे किसी मुसीबत में फंस गए तो ?’
‘हाँ बेटा यह बात तो तूने बिलकुल ठीक कही है यदि मेरे साथ भी कभी एसा हुआ तो  तेरी बहन के ससुराल में मेरी क्या इज्जत रह जाएगी और उसे भी जीवन भर ताने सुनने पड़ेंगे  ।’
‘तो पक्का प्रोमिज पापा ,आज से आप इस तरह का माल खरीदने के लालच में नहीं पड़ेंगे ?’
 ‘हाँ पक्का प्रोमिस बेटा .’
‘धन्यवाद पापा अब मैं तनाव मुक्त हो कर अपनी पढ़ाई कर पाउँगा .’




पवित्रा अग्रवाल

  ईमेल -
agarwalpavitra78@gmail.com

 
 
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