शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

थोड़ी सी नासमझी

बाल कहानी 

                         थोड़ी सी नासमझी 

                                                                        पवित्रा अग्रवाल
  
       फोन की घन्टी सुन कर माँ ने अमृता को पुकार कर बताया कि तेरी दोस्त सारा का फोन आया है।
  'अच्छा माँ  अभी आई '
 "हैलो कौन सारा....क्या ...कल शाम रोश्नी छत से गिर गई थी ? ...पर वह उस समय छत पर क्या कर रही थी ?'
 'पतंग उड़ा रही थी '
 "उसे पतंग उड़ाना भी आता है ?'
 "हाँ, पतंग के दिनो में अपने भाई का चरक पकड़ते , पकड़ते उसने भी पतंग उड़ाना सीख लिया था।'
 "अरे पहले यह तो बता वह कैसी है ... बहुत चोट तो नहीं लगी ?'
 "बहुत अच्छी किस्मत थी ,छोटी मोटी चोट आई है... हॉ पैर की हड्डी भी टूटी है।'
 "थेंक गॉड , वरना छत से गिर कर तो जान भी जा सकती थी और गम्भीर चोट भी लग सकती थी।  पिछले वर्ष मेरा कजिन भी पतंग उड़ाते समय छत से गिर गया था ,उसका तो सिर फट गया था, कुछ घन्टों में ही उसकी मौत हो गई थी,मालुम है माँ- बाप का वह अकेला बेटा था।'
 " अच्छा ! आज कल तो ज्यादातर परिवारों में एक दो बच्चे ही होते हैं। रोशनी भी तो अकेली बेटी ही है,एक भाई भी है।'
      "पर वह गिर कैसे गई ?'
 "अपने भाई के साथ छत पर पतंग उड़ाने गई  थी । एक पतंग लूटने चक्कर में नीचे गिर गई।'
 'अरे बड़ी बेवकूफी की उसने... कटी पतंग लूटने की क्या जरूरत थी, क्या उसके पास पतंगे नहीं थीं ?'
 "अरे उनके पास बहुत सारी नई - नई पतंगे हैं पर पतंग उड़ाने में ज्यादा बच्चों को पतंग लूटने में  मजा आता है ।'
 "क्या उसकी छत पर रेलिंग नहीं थी ?'
 "उसकी छत पर तो रेलिंग है पर पतंग लूटने के लिए वह अपनी छत से जुड़े व नए बन रहे मकान की छत पर चली गई थी,उस छत की रेलिंग अभी बनी नहीं थी ... मैं भी उसके साथ ही थी पर माँ के डर से जल्दी लौट गई थी ।'
  "बड़ी नासमझी की उसने ... पतंग के दिनों में इस तरह की बहुत सी घटनाए होती रहती हैं। इस विषय में अखबारों में भी खबरे छपती रहती हैं।मेरी मम्मी ने तो छत पर ताला लगा रखा है ,बस एक दिन ही पतंग उड़ाने की छूट मिलती है वह भी किसी बड़े के साथ होने पर ।'
 "ताला तो उनकी छत पर भी लगा रहता है पर आज उसके मम्मी पापा किसी काम से बाहर गए थे ...और इन्हें मौका मिल गया ।'
 "जब रोशनी छत से गिरी तो उसके घर में कोई नहीं था ? '
 "गिरने के पाँच मिनट के अंदर ही उसके मम्मी - पापा आ गए थे ,वे ही उसे लेकर अस्पताल भागे।'
   "कोई खतरे की बात तो नहीं है ?
      ' ना बस डेढ़ - दो महीने के लिए पैर पर प्लास्टर चढ़ गया है। स्कूल नहीं जा पाएगी ... वह तो अच्छा हुआ हाथ सलामत हैं वरना परीक्षा कैसे लिखती ?'
 "सच में सारा थोड़ी सी नासमझी कितनी खरतनाक हो सकती है पर हम समझते ही नहीं ।माँ बाप जब हमें समझाने की कोशिश करते हैं तो हमें वह दुश्मन नजर आते हैं।...स्कूल से लौटते समय उससे मिलने चलेंगे। '


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-पवित्रा अग्रवाल


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