शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

एक शरारत



बाल कहानी             

 
                        एक शरारत
 
                                                पवित्रा अग्रवाल

  सौरभ सतरह वर्ष का लड़का था । उसकी परीक्षाएं समाप्त हो चुकी थीं।कोलोनी के कुछ दोस्त छत पर बैठ कर कभी कैरम ,कभी चैस, कभी लूडो खेल कर अपना समय बिताते थे।मम्मी इतना कहती थीं कि कुछ समय पढ़ने में लगाया करो उस से ज्ञान बढ़ता है । पर पढ़ने में उसका मन अधिक नहीं लगता था। दोस्तों केसाथ खेलते खेलते उसे ताश खेलने का शौक भी लग गया था । जब मम्मी पापा को पता चला तो उन्हों ने समझाया कि बेटा ताश खेलने में कोइ बुराई नहीं है  पर ताश खेलने वालों को अक्सर जुआ खेलने का चस्का लग जाता है और जुआ खेलना बहुत खराब शौक है ।'
      सौरभ की छोटी बहन सारा ने पूछा - पापा जुआ और ताश में क्या अंतर है ?'
'बेटा ताश खेलते समय जहाँ हार - जीत में पैसे से लेन देन होने लगता है ,वह जुआ कहलाता है। और इसका चस्का बहुत खराब होता है ।अधिक से अधिक पैसे जीतने का लालच बढ़ता जाता है और यह एक बुरी आदत के रूप में जुड़ कर खेलने वाले को बरबाद कर देता है।'
 "कैसे पापा ?'
 "बेटा यह कुछ पैसों से शुरू होकर बड़े स्तर पर ज्यादा रुपयों से खेला जाने लगता है। जो हारता है वह इस लालच में खेलता जाता है कि जीत कर अपना नुकसान पूरा कर लूँ । जो जीतता है उसे और जीतने का लालच खेलने को मजबूर करता है।इस हारने जीतने के लालच में बच्चों के पास पैसे नही होते तो वह चोरी करने लगते हैं। पहले घर से छोटी मोटी चोरी करते हैं फिर बड़ी चोरी भी करने लगते हैं और यह पतन इतना धीरे धीरे होता है कि समय पर नहीं रोका गया तो जिन्दगी भर पीछा नहीं छोड़ता ।समाचार पत्रों में रोज ही आता रहता है कि पुलिस ने छापा मार कर इतने जुआरियों को पकड़ा ।'
 "ओ... तो पापा जुआ खेलना अपराध भी है ?'
 "हाँ बेटा जुआ खेलना अपराध भी है।'
 अब तो सारा को हर समय डर लगा रहता था कि उसका भाई सौरभ कहीं जुआ खेलना शुरू न कर दे ।वह चुपके चुपके उस पर नजर रखने लगी थी। कभी कभी उसे शक भी होने लगा था कि वह लोग पैसों से ताश खेलने लगे हैं पर वह विश्वास के साथ ऐसा नहीं कह सकती थी ।'
      एक दिन जब सब लड़के छत पर ताश खेल रहे थे  पुलिस ...पुलिस 'की आवाज सुन कर छत पर भगदड़ मच गई और डर के मारे सारा का भाई सौरभ तो छत से ही कूद गया।...
     उसी समय सौरभ को अस्पताल ले जाया गया.. उसके सिर में चोट लगी थी.हाथ की हड्डी टूटी थी और भी कई जगह चोट लगी थीं पर वह होश में था और खतरे से बाहर था।
 अब प्रश्न उठा कि तुम छत से कैसे गिरे ?
  तब सौरभ ने बताया कि हम सब छत पर ताश खेल रहे थे तभी किसी ने पुलिस का नाम लिया ,हमने समझा कि पुलिस आ गई। ...कुछ नहीं सूझा कि क्या करें बस पुलिस से बचने के लिए मैं छत से कूद गया ।'
 "क्या तुम जुआ खेल रहे थे ?'
 "न ...न.. नहीं पापा ...।'
 "फिर तुम भागे क्यों...क्या सचमुच पुलिस आई थी ?'
    " पुलिस को मैंने नहीं देखा ... नीचे से किसी ने पुलिस,पुलिस पुकारा और मैं डर गया था...।
  "पर वहाँ तो कोई पुलिस नहीं आई थी ....यह जरूर किसी की शरारत थी ।'
 "पर ऐसी शरारत कोई क्यों करेगा ?'
      डरी डरी सी सारा यह सब बातें सुन रही थी और अपने भाई सौरभ के इस हाल के लिए खुद को दोषी मान रही थी । अब सारा के सब्र का बाँध टूट गया था ।वह पापा - मम्मी और भाई के पास जा कर बिलख बिलख कर रोने लगी थी...'मुझे आप सब माफ कर दें... पुलिस पुलिस मैंने ही पुकारा था ।'
 "पर सारा तुमने ऐसा क्यो किया ? ' 
            "भाई की ताश की आदत छुड़ाने के लिए मैं ने यह झूठ बोला था या कहिए कि मजाक किया था ।मैं देखना चाहती थी कि भाई और उसके दोस्तो पर पुलिस का नाम सुन कर क्या असर होता है। पर मेरा यह छोटा सा मजाक किसी के लिए जान लेवा भी साबित हो सकता है इस की मैंने कल्पना भी नहीं की थी।भाई की इस हालत के लिए मैं ही जिम्मेदार हूँ।'
      "चल बेटा जो होना था वह तो हो गया। हमारी किस्मत अच्छी थी कि भाई बच गया वरना कुछ भी हो सकता था...पर तू कल्पना कर भाई की जगह उसका कोई दोस्त  छत से कूदा होता तो क्या होता ?....उसके घर वाले क्या इतनी आसानी से तुझे या हमें माफ कर देते ?'
  'आप लोग मुझे माफ कर दो ।'... सारा और जोर जोर से रोने लगी थी।
 सौरभ ने कहा - " अब तू रो क्यों रही है, चुप हो जा। कोई दूसरा तो नहीं गिरा न.... तू तो मेरा भला ही चाहती थी । गल्ती मेरी भी तो थी...अब सच कहूं तो उस समय हमने पहली बार हार जीत पर पैसे लगाये भी  थे ...पुलिस के नाम से हम बुरी तरह डर गए थे .मुझे उस समय और  कुछ नहीं सूझा था ... । '

   मम्मी -पापा भौचक्के से रह गए -- "क्या कहा ...तुम सचमुच... ?'
   शर्मिंदा होते हुए सौरभ ने कहा - 'हाँ यह सच है '
 "फिर भी  भैया भूल  तो मुझ से हुई है ।'
 "तुम्हारी इस छोटी सी भूल ने मुझे  जिन्दगी में एक बड़ी भूल करने से बचा लिया है .अब आंसू पोंछ ले और अपने को कोसना बंद कर.'
     'मेरे अच्छे भैया...' कह कर सारा ने भाई का हाथ कस कर पकड़ लिया था ।मम्मी पापा ने भी संतोष की गहरी साँस ली और बच्चों को बाँहों में भर लिया .
 



       पवित्रा अग्रवाल
    
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रविवार, 8 नवंबर 2015

मेरी कहानी

बाल कहानी 
                        मेरी कहानी
                                        
                                                 पवित्रा अग्रवाल

     दीपावली के बाद जब स्कूल खुला तो गुंजन हमेशा की तरह प्रार्थना शुरू होंने के समय ही स्कूल पहुँचा और उसके लाइन में लगते ही प्रार्थना शुरू हो गई।प्रार्थना समाप्त होने के बाद उसके क्लास टीचर.राहुल सर ने उसका नाम पुकार कर उसे आगे आने को कहा,वह एकदम से घबड़ा गया कि अनजाने में मुझ से कुछ गलती होगई है क्या जो सर इस तरह बुला रहे हैं।वह सकुचाता हुआ उनके पास जा कर खड़ा हो गया --   'कहिये सर क्या मुझ से कोई गल्ती हो गई है ?'
   "हाँ तुम से बहुत बड़ी गल्ती हो गई है,इसी लिये तो तुम्हें यहाँ बुलाया है'सर ने गम्भीरता से कहा ।'
 "क्या सर ?'
     "बच्चो यह है गुंजन गुप्ता,हमारे स्कूल में कक्षा आठ का छात्र है।बहुत शान्त स्वभाव का है व अपने काम से काम रखने वाला है।पढ़ने मे भी अच्छा ही है किन्तु यह एक बाल कहानीकार है और देश की कुछ प्रमुख बाल पत्रिकाओ में इस की कहानियाँ छप चुकी हैं यह बात शायद हम में से कोई नहीं जानता था।अभी दीपावली पर यहाँ के प्रमुख समाचार पत्र द्वारा आयोजित बाल कहानी प्रतियोगिता में गुंजन की कहानी "वरदान 'को प्रथम पुरस्कार मिला है। कहानी के साथ  सचित्र परिचय प्रकाशित न हुआ होता तो हमे पता भी नहीं चलता कि यह हमारे यहाँ का छात्र है।स्कूल के वार्षिक  समारोह में हम गुंजन को स्कूल-गौरव की उपाधि से सम्मानित करेंगे। इसने हमारे स्कूल का गौरव बढाया है।'
 बच्चों ने तालियों से उसका स्वागत किया।
      वार्षिक समारोह के दिन उसका सम्मान करते हुये टीचर ने कहा--"गुजंन हमे दीपावली पर प्रथम पुरस्कार प्राप्त कहानी के विषय में कुछ बताओ, साथ में यह भी बताओ कि तुम कब से लिख रहे हो और तुम्हारे लेखन की शुरुआत कैसे हुई ?'
    "सर मैं ने दो वर्ष से ही लिखना शुरु किया है,उस से पहले मैं ने सोचा भी नहीं था कि मैं कभी कुछ लिखूँगा।... तीन वर्ष पूर्व दीपावली के दिन मेरे साथ एक दुर्घटना हो गई थी बस उसने मेरी दुनियाँ ही बदल दी ।आम बच्चों की तरह दीपावली पर मैं भी खूब धूम धड़ाका करता था,दीपावली के चार.पाँच महीने पहले से मैं अपनी पाकेट मनी बचाना शुरू कर देता था।दीपावली पर मम्मी-पापा भी पटाखों के लिये रुपये देते थे।उन सब पैसों से मैं तरह तरह के पटाखे,बम,अनार, राकेट आदि खरीद लाता था।दीपावली के दिनों में टी.वी पर बार बार बताते व दिखाते थे कि पटाखे जलाते समय क्या क्या सावधानी बरतनी चाहिये...वरना दुर्घटना जान लेवा भी हो सकती है पर मुझ पर उसका कोई असर नहीं होता था।मम्मी भी टोकती रहती थीं कि पटाखे एक लम्बी स्टिक से जलाना,पास में एक बाल्टी पानी रखना मत भूलना,पटाखों के पैकेट आग से दूर रखना पर सुनता कौन था,इस कान से सुना उस कान से निकाल देता था।....
     अक्सर पटाखे जलाते समय मम्मी पापा में से एक  जना मेरे साथ अवश्य रहता था।वह दीवाली की रात थी ।मम्मी पूजा की तैयारी में व्यस्त थीं।मैं मौका पा कर अपने पटाखों के पैकेट के साथ चुपके से बाहर निकल गया।अनार जलाया लेकिन नहीं जला तो दुबारा झुक कर अनार जला रहा था कि वह एक दम से जल गया मेरा मुंह, बाल व एक आँख भी झुलस गये और सब तो ठीक हो गया पर एक आँख की रोशनी वापस नहीं आ पाई।
  एक आँख खोने का मुझे बहुत सदमा पहुंचा था..फिर पापा ने मुझे कृत्रिम आँख लगवा दी पर मुझ में बहुत हीनता की भावना आ गई थी,स्कूल जाने से भी कतराने लगा था।उन दिनो मैं बहुत चिड़चिड़ा,और एकान्त प्रिय होगया था..अपने को आसपास से काट कर कमरे में कैद सा कर लिया था।
पापा ने कुछ बाल पत्रिकाये ला कर दीं,उनमें मेरा मन रमने लगा ।कभी कभी उन में शारीरिक रूप से
विकलांग बच्चों की प्रेरणास्पद सत्य कथायें भी रहती थीं।एक बार पढ़ा था व फोटो भी देखा था कि दोनों हाथ न होने पर भी लड़की पैरो से अपने सब काम करती थी व लिखती भी पैरो से थी, एक लड़की मुंह में ब्रश दबा कर चित्र बनाती थी ।
    उन्ही दिनो पापा ने हैलन कैलर की जीवनी ला कर दी जो न देख सकती थी,न बोल और सुन सकती थी फिर भी उसने अपनी इन कमियों पर विजय पाकर दुनिया में अपना नाम रोशन किया था।मुझे लगा अरे मेरा दोष तो इनके सामने कुछ भी नहीं है।एक आँख ही तो खोई है दूसरी तो सलामत है।बस उन्ही दिनो मैं ने ऐसे बच्चो में आत्म विश्वास भरने के लिये लेख ,कहानी लिखनी शुरू कीं फिर उन्हें छपने भेजने लगा।शुरू में रचनायें लौट कर भी आई लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी फिर धीरे धीरे छपने भी लगीं।
      मेरी यह आत्म कथा सुन कर आप सब को अंदाजा हो गया होगा कि मेरी उस कहानी "वरदान' का नायक मैं ही हूँ।सच कहूँ सर तो मेरी आँख की रोशनी जाना भी अब मुझे वरदान सा लगता है।हाँ अब भी जब कभी मैं किसी से अपने  लिये "काना गुंजन' शब्द का स्तेमाल सुनता हूँ तो मेरी आत्मा रोती है फिर यह लेखन ही मुझे सहारा देता है।'
 "तुम बच्चो से कुछ कहना चाहोगे ?'
  " हाँ सर बस यही कहना चाहूँगा कि दूसरे की कमियों का मजाक नहीं उड़ाना चाहिये ।दुर्घटनाये किसी के साथ कभी भी हो सकती हैं।..दूसरी बात दीपावली पर खतरनाक किस्म के बम आदि नही छुड़ाने चाहिये इनसे धन की बर्बादी तो होती ही है,भयंकर दुर्घटनाये भी हो जाती हैं और प्रदूषण भी फैलता। साथ ही पटाखे जलाते समय बहुत सावधान रहना चाहिये।..आप द्वारा दिया गया यह सम्मान मुझे और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता रहेगा, बहुत बहुत धन्यवाद सर ।'
    
  (यह कहानी मेरे दूसरे बाल कहानी संग्रह 'चिड़िया मैं बन जाऊँ  से ली गई है )    
       

-पवित्रा अग्रवाल

ईमेल --   agarwalpavitra78@gmail.com

शनिवार, 12 सितंबर 2015

एक कहानी का कमाल

बाल कहानी
                              
         

    एक कहानी का कमाल

                                                                   पवित्रा अग्रवाल
 
 "रक्षा तू तो पन्द्रह दिन के लिए अपने दादा,दादी के पास  भोपाल जाने वाली थी,नहीं गई क्या ?''
 "वर्षा मैं जाने वाली ही नहीं थी ट्रेन में मम्मी के साथ चढ़ भी गई थी पर ...
 "पर क्या ?''
 "कुछ नहीं वर्षा अचानक ट्रेन में मम्मी की तबियत खराब हो गई थी।''
 "मम्मी को क्या हों गया था ? अब वह कैसी हैं ?''
 " हार्ट अटैक आया था,हमें आगरा उतरना पड़ा पर अब वह ठीक हैं।''
 "पर ट्रेन में तू तो मम्मी के साथ अकेली थी, तुझे कैसे पता चला कि हार्ट अटैक है फिर तूने क्या किया ?''
 " दिल्ली से ट्रेन में बैठने के कुछ देर बाद ही मम्मी के सीने में दर्द उठा था ।ए.सी. में भी वह पसीने में नहा गई थीं।''
 " फिर ?''
 " फिर क्या ..मैं ने भाग कर अटेंडेन्ट से कहा कि जल्दी से टी टी से कहो कि बर्थ नंबर छह पर डाक्टर की जरूरत है।साथ ही मैं ने कम्पार्टमेंन्ट में भी जोर जोर से पुकारना शुरू कर दिया कि क्या आप लोगों में से कोई डाक्टर है ?...यदि कोई डाक्टर है तो कृप्या मेरी मदद करें, मेरी माँ बहुत बीमार है।''
 तभी केबिन का पर्दा हटा कर एक सज्जन बाहर आए और बोले बेटा मैं डाक्टर हूँ, कहाँ है तुम्हारी माँ ?''
  "माँ को देख कर उन्होंने सब से पहले एक गोली निकाल कर माँ की जीभ के नीचे रख दी  फिर उनका ब्लडप्रेशर देखा , स्टेथस्कोप से चेक किया  और भी  जो हो सकता था किया फिर मुझ से बोले,--

  "बेटा तुम्हारी  समझदारी की  वजह से तुम्हारी मां  का  समय रहते  प्राथमिक उपचार कर पाया हूँ पर  यह हार्ट अटैक है . आगरा का  स्टेशन आने वाला है। …  आगरा में तुम्हारा कोई परिचित रहता  है क्या ?''
 "  मैं ने कहा "हाँ अंकल यहाँ मेरे मामा जी रहते हैं और वह डाक्टर हैं।''
 "यह तो बहुत अच्छी बात है तुम उन्हें फोन कर के मम्मी की हालत के बारे बताओं फिर मुझ से भी बात करा दो '
डाक्टर अंकल  ने मामा जी से बात करने के बाद मुझ से  कहा --
 "बेटा तुम्हारे मामा जी  एम्बुलेन्स ले कर स्टेशन आ रहे हैं....तुम्हारे साथ कोई और भी है?''
 "नहीं अंकल ''
 "कोई बात नहीं, तुम हिम्मत रखो बेटा। मैं टी टी से कह कर आगरा के स्टेशन पर भी डाक्टर का इंतजाम करने को कहता हूँ ।तब तक तुम्हारे मामा भी आ जाएंगे।''
 तब तक टी टी अंकल  भी आ गऐ थे ।
 समय पर डाक्टरी मदद मिल गई थी ।मम्मी अब ठीक हैं।दस दिन आगरा रहना पड़ा था।''
 "तू तो बड़ी हिम्मत वाली हैं ...तेरी जगह मैं होती तो मेरे तो हाथ पाँव फूल जाते और मैं मम्मी के पास बैठ कर बस रोना शुरू कर देती।''
 "शायद मै भी ऐसा ही करती पर यह कमाल तो एक कहानी का है। अभी कुछ दिन पहले ही  अपनी  बुआ के "बाल कहानी संग्रह' में एक कहानी पढ़ी थी जिसमें एक किशोर उम्र का लड़का अपने दादा - दादी  के साथ ट्रेन में कहीं जा रहा था रास्ते में उसके दादा जी को दिल का दौरा पड़ा था पर उस लड़के  ने न टी टी को बताया, न मदद के लिए किसी को पुकारा बस दादी के संग बैठ कर स्टेशन आने का इंतजार ही करता रहा ।'
 "फिर उसके दादा जी बच गए थे ?'
     " समय पर मदद मिल जाती तो जरूर बच जाते... स्टेशन पर उतरने तक वो जीवित थे पर डाक्टर के आने तक उनकी मौत हो चुकी थी ।.... तब स्टेशन पर सब लोग उस लड़के से कह रहे थे कि तुम भी कितने बेवकूफ हो  यदि कोशिश करते तो ट्रेन में यात्रा कर रहा कोई डाक्टर  मिल सकता था ... टी टी को बता दिया होता तो वह डाक्टर का इंतजाम कर सकता था पर तुम ने कुछ नहीं किया ।'
      "मेरी बुआ हमेशा मुझे पत्रिकाएं पढ़ने को प्रेरित करती रहती हैं" बिना समय गवांए मैं इतनी  जल्दी  सक्रिय हो गई,निश्चय ही यह उनकी कहानी का असर था ।  ...ट्रेन में वह डाक्टर मुझे भगवान का रूप लगे थे पर अफसोस कि मैं उन का नाम और पता भी नहीं पूछ सकी।''
 "क्या मुझे वह बाल कहानी संग्रह पढ़ने को देगी ?'
 "हाँ ले लेना पर एक संग्रह पढ़ने से काम नहीं चलेगा, हमें अपनी उम्र के हिसाब से पुस्तकें व पत्रिकाएं पढ़ने की आदत डालनी चाहिए  ।'
 "हाँ  तुम बिलकुल  ठीक कह रही  हो , मैं आज ही मम्मी के साथ बाजार जा कर कुछ बाल पत्रिकाएं खरीद कर लाऊंगी  ।'
   
    


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गुरुवार, 6 अगस्त 2015

बताना जरुरी है


बाल कहानी
                          बताना जरुरी है                                  
                                                                   पवित्रा अग्रवाल

   ग्यारहवीं क्लास में पढने वाली श्वेता ने कालेज जाते समय अपनी मम्मी से कहा --
“मम्मी आज मुझे कॉलेज से लौटने में थोड़ी देर हो जाएगी .”
“क्यों श्वेता ? “
‘आज मेरी दोस्त मधु  का जन्मदिन है ,इसलिए वह हमें पार्टी दे रही है .”
“किसी होटल में ?”
“नहीं माँ होटल तो बहुत मंहगा पड़ता है.हमारे कॉलेज के पास एक फ़ास्ट फ़ूड सेंटर है ,हम सभी को उसके आइटम टेस्टी  भी लगते हैं और हमारी पसंद की सब चीजें वहां मिल जाती हैं .”
“बेटा देख कर खाना .इस तरह के फ़ास्ट फ़ूड सेंटरों में सफाई का ध्यान कम रखा जाता है .”
“माँ हम वहां बहुत बार खा चुके हैं.सभी दोस्त खास मौकों पर वहीँ पार्टी करते हैं.”
शाम को श्वेता घर आई तो बोली – ‘माँ पेट में बहुत मरोड़ सा हो रहा है .लगता है उल्टी  भी आएगी ..कहते कहते वह भाग कर टॉयलेट में चली गई .आवाज से पता चल रहा था कि वह उलटी कर रही है .

       “माँ लगता है आपका कहना सही हो गया  ...लूज मोशन भी शुरू हो गए हैं.”
“बेटा अब मैं क्या बोलूँ ... तुम लोग सुनते नहीं हो ...सुबह ही मैं ने तुम्हें बताया था... .  मेरे पास दवा है, जल्दी फायदा हो जायेगा .”
     तभी श्वेता की दोस्त रानी का फोन आगया – “श्वेता मुझे और मधु को उल्टियाँ  हो रही हैं .डॉक्टर भैया छुट्टियों में आये हुए हैं इसलिए  फ़ौरन दवा दे दी वरना अभी डॉक्टर के पास जाना पड़ता .मधु को भी भैय्या की बताई दवा देदी है .तुम को भी कुछ हुआ है क्या ?”
     “हाँ रानी मेरा भी यही हाल है ,दवा लेली है .हम सब को एक साथ यह उल्टी- दस्त हुए हैं , इसका मतलब तो साफ है कि खाने में गड़बड़ थी .मम्मी ने तो सुबह ही वहां खाने को मना किया था ...अब आगे से वहां नहीं खायेंगे .”
'श्वेता भैया कह रहे हैं कि कल उस फ़ास्ट फ़ूड वाले को  डांट कर आना ....ठीक है अब फोन रखती हूँ .

     मम्मी ने पूछा --लगता है  तुम्हारी दोस्तों का भी यही हाल है ? ... श्वेता तुम लोगों ने वहां खाया क्या था ?”
“मम्मी हम सब ने चाय पी थी और नूडल्स , सेंडविच खाए थे .”
     ‘नूडल्स में कई तरह की सोसेज पड़ती हैं ,उसी में कुछ गड़बड़ हुई है .तुम सब जा  कर कल फ़ूड सेंटर वाले को  बताना कि उसका खाना ख़राब था .”
“रानी भी यही कह रही थी पर माँ अब इस सब से क्या फायदा , आगे से हम उसके यहाँ नहीं जायेंगे .” 
   “पर उसे जाकर बताना बहुत जरुरी है बेटा ताकि आगे से वह सावधानी बरते .वरना उसे कैसे  पता चलेगा की उस के खाने से तुम सब बीमार हो गए थे .’  
“मम्मी मानलो वह अपनी गल्ती मानने को तैयार नहीं हुआ और झगडा करने लगा तो ...?”
“   पहली बात तो वह ऐसा नहीं करेगा क्यों कि वह भी जानता है कि दूसरे  लोगों को यह पता चला  कि उसका खाना खाने से बच्चे बीमार हो गये थे  तो  सब वहां आना छोड़ देंगे ....उसका व्यापार चौपट हो जायेगा .''
 'मम्मी फिर भी  यह सब जरुरी है क्या ?'
     "बेटा यह गंभीर मामला है  और सब के स्वास्थ्य से जुडा है ,उसे बताना बहुत जरुरी है ....तुम 7-8 लड़कियाँ मिल कर जाना फिर भी यदि वह बहस  या झगड़ा करने लगे तो उस से कह  देना कि हम अभी  कॉलेज में  जाकर सब को बता देंगे और  प्रिंसपल से भी  शिकायत करेंगे  .तो तुम्हारे इस फ़ूड सेंटर में  ताला पड़ जाएगा  और अन्दर भी जा सकते हो  ”
“ हाँ माँ शायद आप  ठीक कह रही हैं , कल  हम  सब मिल कर उस से बात करेंगे .”
 दूसरे दिन श्वेता बहुत खुश हो कर लौटी थी - मम्मी वह फ़ूड सेंटर वाला अच्छा है ,हमें उसने शिकायत करने के लिये  धन्यवाद कहा ,वह तो पैसे भी वापस कर रहा था पर हमने कहा सफाई से बना हुआ अच्छा खाना खिलाओ यही काफी है .फिर भी उसने हम सब को काफ़ी पिलाई  और पैसे भी नहीं लिए .'


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शनिवार, 4 जुलाई 2015

खेल खेल में

बाल कहानी
                                  
   खेल खेल में


                                          
                                                
                                                          पवित्रा अग्रवाल

      अंकुश स्कूल से लौटा तो मम्मी ने कहा --"बेटा अंकुश तीन दिन के लिए मुझे और तेरे पापा को मुंबई जाना  है बुआ के यहाँ ,उनकी बेटी की सगाई है...तू चलेगा ?'
 "नहीं मम्मी परीक्षाए निकट आ रही हैं तो आजकल पढ़ाई का विशेष प्रेशर है...एक्सट्रा क्लासेज भी हो रही हैं।पर आप तीन दिन के लिए क्यों जा रही हैं।सफर एक रात का ही तो है।'
 "बेटा जा तो एक दिन के लिए भी सकती हूँ पर भागम भाग हो जाएगी ,साथ ही थकान भी ।वैसे भी फूफा जी के न रहने पर बुआ को आजकल मदद की जरूरत है। फिर सब से बड़ी बात उन्हों ने जल्दी आने का विशेष आग्रह भी किया है पर तुझे अकेला छोड़ने को मन नहीं कर रहा ।'
 "मम्मी जाना जरूरी हैं तो आप दोनो चले जाइए ।'
   "ठीक हैं बेटा कल रात को बस से जाना है।कल मैं तेरे लिए दो सब्जी और दाल बना कर रख दूँगी । रोटी बाहर से ले आना और दाल ,सब्जी जो खानी हो माइक्रोअवन में गरम कर लेना ।कभी बाहर खाने का मन हो तो बाहर खालेना ।वैसे मला हुआ थोड़ा आटा भी रखा है पर तू रोटी बनाने के चक्कर में नहीं पड़ना और रात को सोते समय गैस नीचे से बन्द करना नहीं भूलना ।'
 "ठीक है माँ, आप चिन्ता मत करो ।आप जब आएगी तो मैं अपको सही सलामत मिलूँगा।'
 "अंकुश रात को सोने के लिए अपने किसी दोस्त को भी बुला सकते हो।दो लोगों में समय अच्छा व्यतीत हो जाएगा। साथ में पढ़ लिख भी सकते हो ,स्कूल भी साथ जा सकते हो।वैसे भी मेरे पीछे एक तो इतवार ही पड़ेगा ,बस दो दिन तुम्हें स्कूल जाना है ।'
   "मम्मी आपने दोस्त वाला अच्छा आइडिया दिया है। आप लव को जानती हैं न ,वह मेरा बड़ा अच्छा दोस्त है।उसकी मम्मी भी मुझे अच्छी तरह जानती हैं।मेरे कहने पर वह लव को जरूर मेरे साथ रहने की अनुमति दे देंगी।कल स्कूल से लौटते समय मैं उसे अपने साथ ले आऊंगा।'
    स्कूल में अंकुश ने लव को मम्मी- पापा के बाहर जाने की बात बता कर अपने घर चलने की बात की तो उसने कहा "हाँ अंकुश मैं तेरे पास रुक जाऊंगा।स्कूल से लौटते समय तू मेरे घर चलना, वहाँ मम्मी से परमीशन भी ले लूंगा और जरूरत का सामान भी ।वैसे भी कल इतवार है।'
     लव की मम्मी ने लव को अंकुश के घर जाने की अनुमति दे दी थी।साथ ही उन्हों ने कहा ---  " स्कूल ले जाने के लिए दोनो का लंच मैं बना दूँगी ,स्कूल जाते समय सुबह का नाश्ता यहाँ करके टिफिन लेते हुए चले जाना।...स्कूल से लौट कर दोनो यहाँ से खाना खा कर रात को अपने घर सोने चले जाना ।'
     "नहीं आन्टी लंच आप दे देना ,रात का खाना हम अपने आप मेनेज करेंगे।'
 "अंकुश क्या तुम को खाना बनाना आता है ?'
 "थोड़ा थोड़ा आता है आन्टी जैसे दाल ,चावल बना लेता हूँ।आटा मला हो तो पराठे भी बना लेता हूँ पर सब अलग अलग शेप के होते हैं।मैगी ,सैंडविच भी बना लेता हूँ।'
 "अरे तुम तो बहुत कुछ बना लेते हो ।हमारे लव को तो गैस जलाना भी नहीं आता ।'
 "आप कुछ करने दें तभी तो आएगा न माँ ।डर के मारे गैस के पास भी तो खड़ा नहीं होने देतीं ।'
 "मुझे तो मम्मी ने सब खेल खेल में सिखा दिया।'
 "खेल खेल में कैसे ?'
 "मम्मी दाल या चावल का कुकर गैस पर रख कर नहाने चली जाती थीं और मुझ से कहती थीं कि इतनी सीटी बज जाए तो गैस बंद कर देना ।जब वह दाल को छोंक लगाती थीं तो कभी कभी मैं भी उनके पास खड़ा होता था बस ऐसे ही खेल खेल में थोड़ा बहुत काम आ गया है ।शाम की चाय तो अक्सर मैं ही बनाता हूँ।'
     "अच्छा,तुम्हारी मम्मी तो बहुत समझदार हैं।वाकई यह समय की माँग है, आज लडकियों को ही नहीं लड़कों को भी खाना बनाना आना चाहिए ।'
 "फिर आप मुझे भी सिखा दीजिए न माँ।'
 "हाँ लव तुझे भी थोड़ा बहुत रसोई का काम आना चाहिए ,मैं तुझे सिखाउंगी ।'
 "आप चिन्ता मत करिए आन्टी इसका श्री गणेश तो मेरे घर से ही शुरू हो जाएगा ।'
 "नहीं बेटा तुम्हारे घर में अभी कोई बड़ा व्यक्ति नहीं है इसलिए तुम लोग खाना बनाने के चक्कर में नहीं पड़ना।बच्चे हो, अति उत्साह में कोई घटना -दुर्घटना न हो जाए ।'
     आप बिल्कुल चिन्ता नहीं करें आन्टी हम इतने छोटे भी नहीं हैं।..मैं पन्द्रह साल का हूँ ।मैं रसोई में मम्मी की बहुत मदद करता हूँ फिर भी आन्टी हम खाना नहीं बनाएगे।बस चाय बनायेंगे और मिल्क बायलर में दूध गरम करेंगे ।घर के बराबर ही होटल है उसमें  रुमाली रोटी बहुत अच्छी बनती हैं ,वह ले आएगे। सब्जियाँ तो मम्मी बना कर रख गई हैं उन्हें बस माइक्रो अवन में गरम करना है फिर स्कूल के लिए लंच तो आप बना कर दे ही देंगी ।'
 "हाँ मम्मी आप हमारी बिल्कुल चिन्ता नहीं करना और अपना घर दूर ही कितना है कोई परेशानी हुइ तो आपके पास आ जाएगे ...और फोन तो है ही ,आप से बात करते रहेंगे ।'
 "हाँ आन्टी लव ठीक कह रहा है। ....लव जल्दी से अपना जरूरी सामान ले ले।घर पर मम्मी इंतजार कर रही होंगी ।..अब हम चलें आन्टी ।'
 'ठीक है बेटा जाओ और हाँ अपना फोन नंबर मुझे जरा नोट करा दो ।'



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बुधवार, 10 जून 2015

गुस्सैल

बाल कहानी                 

                                            गुस्सैल

                                                                    पवित्रा अग्रवाल

         एक लडका था. उसका नाम था खुश ।नाम तो उसका खुश था जिसका मतलब होता है प्रसन्न  पर वह अपने स्वभाव से बहुत गुस्से वाला था इसिलए सबने उसका नाम गुस्सैल रख दिया था । वह अपने माता पिता की अकेली संतान था उसकी हर माँग एक बार में ही पूरी हो जाती थी   इसीलिए वह जिद्दी भी हो गया था ।वह सातवीं कक्षा में पढ़ता था .वहॉं भी उसका वही हाल था ,रोज उसकी शिकायतें स्कूल से भी आने लगी थीं । वह खेल के मैदान में , क्लास  में हर जगह अपने साथियों से झगड़ा करता और मारपीट पर उतर आता ।उसे ना सुनने की आदत नहीं थी ,वह चाहता था सब उसकी बात माने पर वह किसी की बात सुनना या मानना नहीं चाहता था ।
     एक दिन स्कूल से फिर शिकायत आई थी , पापा ने उसको बहुत डॉंटा तो वह गुस्सा  हो कर अपने कमरे में चला गया । मम्मी  जब उसको खाना खाने के लिए कमरे में  बुलाने गई तो वह अपने कमरे में नहीं था। घर में ,पास पड़ौस में ,दोस्तों  के यहॉं उसको सब जगह ढूँढा पर वो कहीं नहीं मिला ।
      खुश को डॉंट खाने की बिलकुल आदत नहीं थी  इसीलिए  उसको बहुत गुस्सा आया ।वह जानता था कि उसके चले जाने पर मॉं व पापा बहुत परेशान हो जाऐंगे बस उनको परेशान व दुखी करने के लिए वह घर से निकल गया  और बिना सोचे समझे वह चलता ही गया . एक जगह वह ठोकर खाकर नीचे गिर गया , उसने चारों तरफ देखा तो उसे समझ ही नहीं आया कि वह कहॉं है । उसे जोर से भूख लग रही थी, प्यास भी लगी थी । उसने जेब में हाथ डाला तो उसके पास बीस रुपए थे । उसने पास की दुकान से एक समोसा खरीद कर खाया जोकि दस रुपए का था । अब उसके पास दस रुपए ही बचे थे ।उसे यह भी पता नहीं था कि वह घर से कितनी दूर आ गया है । उसने दुकान वाले अंकल से पूछा कि अंकल लकड़ी का पुल  कितना दूर है ?’’
‘’लकड़ी का पुल   तो यहॉं से बहुत दूर है ,तुम वहां  रहते हो  ?’’
‘’जी अंकल ‘’
     ‘’तुम कुछ परेशान भी दिखाई दे रहे हो, क्या  घर से गुस्सा  हो कर आए हो ,बोलो बच्चे चुप क्यों  हो ,रात होने वाली है किन्ही गलत लोगों के हाथ पड़ गए तो बहुत बुरा होगा और कभी अपने माता पिता के पास  नहीं पहुँच पाओगे ।‘’
       वहॉं तीन चार लोग और भी आ गए थे , ‘’हॉं बेटा बच्‍चों को बहला फुसला कर ले जाने वाले लोगों का गिरोह घूमता रहता है,एक बार उनके चंगुल में फँस गए तो छूटना बहुत मुशकिल है।‘’
‘’हॉं बेटा वह तो अंग भंग करके  किसी दूर शहर में ले जाकर भीख मगवाऐंगे या कही ले जाकर बेच देंगे।‘’
यह सब सुन कर खुश बहुत डर गया और रोने लगा ।
 ‘’अब रो मत बच्चे ,तुम्हारा नाम क्या है ?’
 ‘मेरा नाम खुश है ‘
     ‘’खुश बेटा ,रो मत  अभी कुछ भी नहीं बिगड़ा है .अपने घर का फोन नंबर बताओ हम तुम्हारे  पापा को अभी फोन कर के यहॉं बुला लेते हैं,वह लोग भी परेशान हो रहे होंगे ।‘’
     खुश को मम्मी पापा दोनों का मोबाइल नंबर याद था पर उसने मम्मी का नम्बर दिया . अंकल ने मम्मी से बात की “क्या आप खुश की मम्मी बोल रही हैं ? ...हाँ  खुश हमारे पास है .   नहीं नहीं  हमें कुछ नहीं चाहिए ...आप सालारजंग म्यूजियम पर आकर अपने बच्चे को ले जाइए,लगता है  वह आप लोगों से गुस्सा हो कर घर से भाग आया है ,उसकी किस्मत अच्छी थी जो वह गलत हाथों में नहीं पड़ा .’’
      “ बेटा  तुम्हारे मम्मी पापा अभी आरहे हैं. मम्मी पापा प्यार करते हैं  तो  गलत बात पर डाटेंगे भी ,इस तरह कोई घर से भागता है क्या ? “
‘सौरी अंकल ‘
‘बेटा सौरी हम से नहीं अपने मम्मी पापा से बोलना ...तुम्हारी किस्मत अच्छी थी कि तुम हमारे साथ हो. तुम्हें मालूम है रोज पचासों बच्चे घर से गायब होते है पर पुलिस की कोशिशों से भी वह कभी नहीं मिलते .कुछ तो खुद ही घर से गुस्सा हो कर भागते है और जब तक वह अपनी गलती समझ पायें तब तक वह गुंडों के चगुल में ऐसे फसते है कि फिर कभी निकल नहीं पाते .’
     “हाँ अंकल मैंने टी.वी.में ऐसे बहुत से समाचार सुने हैं और सावधान इंडिया में देखे भी हैं पर मुझे गुस्सा बहुत आता है .’
     ‘तो बेटा इस गुस्से पर नियंत्रण करने की कोशिश करो वरना तुम्हारी जिन्दगी नरक बन जाएगी और तुम पछताने के सिवा कुछ नहीं कर पाओगे .’
   “मै आप लोगों से वायदा करता हूँ कि अपने गुस्से पर  नियंत्रण करने की पूरी कोशिश करूँगा ’
                                                                                                  
        पवित्रा अग्रवाल
                                  
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शुक्रवार, 15 मई 2015

'चिड़िया मै बन जाऊँ'की समीक्षा

युवा बाल साहित्यकार मनोहर मनु की कुछ पत्रिकाओं , पुस्तकों पर कई जगह बेबाक समीक्षात्मक टिप्पणी पढ़ कर लगा था कि यह एक अच्छे समीक्षक भी होंगे .इस युवा द्वारा अपने बाल कहानी संग्रह की बड़ी गहराई से की गई समीक्षा पढ़ कर अभिभूत हूँ .बहुत बहुत धन्यवाद , बधाई और शुभ कामनाएं मनोहर मनु जी .
प्रख्यात साहित्यकार पवित्रा अग्रवाल जी का बाल कहानी संग्रह 'चिडि़या मैं बन जाऊँ' पोस्ट बाॅक्स 23 पौड़ी को लगभग डेढ़ माह पहले ही मिल गया था।
अपरिहार्य कारणों से... तुरत-फुरत में अपने मन की बात लिख नहीं सका। आवरण सतरंगी है। हार्ड बाउण्ड में संग्रह आया है। अयन प्रकाशन 1/20 महरौली,नई दिल्ली 110030 से यह पुस्तक 200 रुपए में मंगाई जा सकती है। कागज़ बेहतरीन क्वालिटी में है। 88 पृष्ठों में 25 कहानियां हैं। औसतन तीन पेज की कहानियां हैं। यही इस संग्रह की विशेषता है।
कोई एक कहानी भी पाठक को उचटने नहीं देती। हर कहानी का अपना अदांज है। हर कहानी ठोस धरातल पर खड़ी है। बाल साहित्य में चिर-परिचित पवित्रा जी का यह दूसरा बाल कहानी संग्रह है। बाल साहित्य में लेखिका  चार दशक से  हैं । यही कारण है कि कोई भी कहानी किसी भी स्तर पर कमजोर नहीं है। पत्र-पत्रिकाओं में पवित्रा जी अक्सर ही नहीं नियमित छपती हैं। डा. रोहिताश्व अस्थाना जी ने इस संग्रह की भूमिका लिखी है।
पहली ही कहानी बाल मन की चंचलता को दर्शाती है। सपना जिसे लगता है कि उससे अच्छा तो चिडि़या है। कोई रोक-टोक नहीं,जहां मर्जी आए वहीं उड़कर चली जाए। लेकिन जब वह सपने में ही सही चिडि़या बन जाती है,तब जाकर उसे पता चलता है कि चिडि़या होना और चिडि़या बन कर खुद को बचाए-बनाए रखना बेहद मुश्किल है।
'दो चोटी वाली' स्कूल जीवन में एक-दूसरे के रूप,गुण,स्वभाव और आकारादि को लेकर पुकारे गए विशेषणों पर आधारित है। यह बड़ी ही दिलचस्प कहानी है। अक्सर कक्षा-कक्षों में कई बार एक बच्चे की गलती होने पर भी समूची कक्षा को दण्ड मिल जाता है।
'खाली कागज का कमाल' अलग दृष्टिकोण से बुनी गई कहानी है। अक्सर अपह्त बच्चे की मनोदशा पर कई कहानियां लिख ली जाती हैं। लेकिन तुषार जिसका अपहरण हो गया है। वह अपने से अधिक अपने घरवालों के बारे में सोचता है। वह सोचता है कि चार दिन से उसके घर वाले किस कदर और किस हद तक परेशान हो रहे होंगे। इससे अधिक दिलचस्प बात यह है कि पाठक तुषार तक उसके मम्मी-पापा और पुलिस के पहुंचने में तुषार और पप्पू की अक्लमंदी को पढ़ते-पढ़ते मुस्कराते भी हैं और कईयों को पहली बार जानकारी मिलेगी कि खाली कागज में भी कुछ लिखा हुआ हो सकता है और उसे पढ़ा जा सकता है।
ऐसा नहीं है कि लेखिका ने केवल चतुर,होशियार,समझदार,पढ़ाकू बच्चों पर ही केंद्रित कहानियां लिखी हों। माँ, मुझे माफ कर दो कहानी तो छोटी उम्र के बच्चे बिन्नू पर केंद्रित है। जो अच्छी परवरिश और संगत के अभाव में बुरी आदतों का शिकार हो गया था। कैसे एक घटना से बिन्नू सिहर जाता है और हमेशा के लिए जुआ खेलना छोड़ देता है।
रेखांकित करने वाली बात यह है कि पवित्रा जी अनुभव से सीखने और घटनाओं से सबक लेने वाली कहानियां लिखती हैं। एक भी कहानी सीख या संदेश देती नज़र नहीं आती। कहीं भी कथा का कोई अंश पढ़ने के प्रवाह को बाधक नहीं बनाता।
पढ़ने-लिखने की ललक पैदा करने वाली बात हो या फिर त्योहारों के दौरान होने वाली मस्ती,हल्की-फुल्की नोंक-झोंक। स्कूली जीवन में आपसी प्रतिस्र्पद्धा,त्योहारों के बिगड़ते स्वरूप की बात हो या नेत्रदान के प्रति आम अभिभावकों की समझदारी। स्कूली जीवन में छात्रों के व्यवहार के साथ-साथ शिक्षकों के स्वभाव और उनके छात्रों के साथ किए गए एक-एक व्यहार पर भी पवित्रा जी ने कलम उठाई है।
बच्चों की समझदारी पर भी पवित्रा जी ने कई कहानियां लिखी है। अचानक आ गए संकट पर बच्चे न तो घबराते हैं और न ही अपना घैर्य खोते हंै। वे आई अचानक आई मुसीबत को बड़ी कुशलता से निपटाते हैं। ऐसी ही कहानी है सोनम की समझदारी।
इस संग्रह में छोटी-छोटी आदतों,भूलों पर भी बड़ी दिलचस्प कहानियां हैं। पतंगबाजी और कई बार पतंग लूटने के कृत्य से हुई हानि पर भी लेखिका बेहद गंभीतर मुद्दे उठाती है। इसी तरह अवेतनिक सचिव में इशारा घरों में पंखों को खुला छोड़ देना,नल का खुला बहते रहना। इस कहानी में तो इमरशन राॅड ही केंद्र में है। बड़ों की बड़ी-बड़ी खराब आदतों को कहानी में सरलता और रोचकता से रेखांकित किया गया है। अलार्म का रोजमर्रा के जीवन में कैसे उपयोग हो सकता है, इस पर भी लेखिका ने बड़े रोचक ढंग से कहानी में वर्णन किया है।
वास्तुशास्त्र पर भी लेखिका ने बड़े सधे तौर पर कहानी लिखी है। जी का जंजाल कहानी यह बताने में बेहद सफल है कि घर के आकार बनावट दिशा आदि से कोई परिवार सुखी या दुखी नहीं होता। इस तरह कहानीकार का अंधविश्वासों पर भी एक प्रहार है।
पटाखों के छोड़ने,रंगों के बुरे प्रभाव के साथ-साथ प्रदूषण पर भी पवित्रा जी की लेखनी बालमन के अनुसार चलती है।
यात्रा के दौरान क्या सावधानी रखनी चाहिए। क्यों कर अपने नाक,कान,आंख खुले रखने चाहिए,इस पर बेहद कारगर और सटीक कहानी है थोड़ी सी सूझबूझ। अचानक आए संकट से घबराकर कुछ नहीं होता, बल्कि सोच-विचार करने से ही कोई हल निकलता है। यही सार पवित्रा जी की कई कहानियों के केंद्र में अधिकतर रहता है। बच्चों की बहादुरी से लेकर छोटी-बड़ी या छिटपुट हरकतों से कई बार बड़ी हानियां हो जाती हैं, इस पर कहानीकार का ध्यान है।
बच्चों को फूल बड़े ही प्यारे होते हैं। बड़ों को भी। लेकिन फूलों की परवरिश और उन्हें पौधों पर ही अपनी आयु गुजारने देना कितना चाहते हैं। पूजा-पाठ और त्योहार के नाम पर सैकड़ों फूल हर रोज पौधों से तोड़ लिए जाते हैं। इस ओर भी लेखिका ने फलों की चाहत के माध्यम से पाठकों का ध्यान खींचा है। यही नहीं लेखिका नई सूचना तकनीक के इस्तेमाल पर भी गंभीरता से कहानी बुनती है। फौजी का बेटा कहानी भी इसी तरह की है। प्लास्टिक की थैलियांे के अधिकाधिक प्रयोगों से होने वाले नुकसान पर भी कहानीकार का ध्यान है। पाॅलिथीन पर आधारित कपड़े की थैली क्यों? कहानी कहीं से भी सूचनात्मक और विषयाधारित भावशून्य कहानी नहीं बनती।
होली और दीवाली पर आधारित कई कहानियां हैं। लेकिन हर कहानी का केंद्रीय भाव विशिष्ट और दूसरी कहानी से जुदा है। जेण्डर, विकलांगता आधारित कहानियां भी संग्रह में हैं। लेकिन यह कहानियां आम कहानियों  से विशिष्ट हैं। कथा,संवाद और भाव के साथ-साथ कहन भी बड़ा सुंदर है।
मैं 1952 में जन्मी इन बालसाहित्यकार को नहीं जानता। हां इनकी कई कहानियां बचपन से पढ़ रहा हूं। मेरे पसंदीदा रचनाकारों में एक नाम पवित्रा अग्रवाल जी का सदा से रहा है। मुझे अच्छा लगा कि उनका यह कहानी संग्रह मुझे पोस्ट बाक्स 23 के माध्यम से मिला।
कुल मिलाकर एक-एक कहानी सधी हुई है। कथा प्रवाह देखते ही बनता है। संवाद कहीं भी क्लिष्ट नहीं है। संवाद जीवंत हैं और अपने आस-पास के लगते हैं। लेखिका जेण्डर का ध्यान रखती है। कहानी की लंबाई के प्रति वे सजग हैं। पात्रों की संख्या हर कहानी में कहानी के हिसाब से ही हैं। कहीं भी अनावश्यक विस्तार न तो पात्रों में दीखता है न हीं कथा में। एक पाठक को और क्या चाहिए।

गुरुवार, 7 मई 2015

चोरी का माल




बाल कहानी  

                                चोरी का माल                                          
                                                                            पवित्रा अग्रवाल

    अमन पापा के साथ अपनी ज्वैलरी की दुकान पर बैठा था तभी एक दीन हीन सा आदमी आया और दुखी स्वर में बोला साहब मुझे पैसों की बहुत जरूरत है, बीबी दवाखाने में है. पचास हजार रुपए अभी जमा कराने हैं ,लेट होगया तो वह मर जाएगी '
 ‘इसमें हम तुम्हारी क्या मदद कर सकते हैं ?’
          उसने इधर उधर नजर दौड़ाई और बोला मैं बेचने को पत्नी के गहने लाया हूँ...उन्हें खरीद कर आप मेरी मदद कर सकते हैं।’
 ‘अरे हम तुम को जानते नहीं, पहचानते नहीं ऐसे गहने हम कैसे खरीद सकते हैं ? तुम अपने किसी पहचान वाले के यहाँ बेच सकते हो या गिरवी रख सकते हो ।'
"मैं इलाज के लिए गाँव से शहर आया हूँ ,यहाँ हमें कोई नहीं जानता.. साहब दया करो ।'
 "हम ऐसे कैसे खरीद सकते हैं, हमे क्या पता कि यह सोना कितना शुद्ध है'
‘आप जाँच करा ले ‘
 पापा ने गहने अंदर लेजा कर उनकी जाँच कराई फिर उनका वजन किया और बाहर आकर बोले – ‘ सोने में बहुत खोट है ,यह हमारे काम का नहीं है।’
  ‘वजन तो करिए कितना है कुछ कम पैसे दे देना’
 ‘वजन तो चालीस ग्राम है, हम चालीस हजार से ज्यादा नहीं देंगे ‘
 ‘क्या साब सोना तीस हजार से ज्यादा चल रहा है ,यह तो बीस ग्राम के भी पैसे नहीं है’
 "नहीं भाई आप किसी दूसरी दुकान पर जा कर बेच दो ...हमें नहीं चाहिए।’
 ‘ऐसा कैसे साब कम से कम एक लाख तो दीजिए।’
  तभी पुलिस को वहाँ घूमता देख कर वह आदमी डर गया बोला-‘ ठीक है कहीं दूसरी जगह दिखा लेता हूँ’
‘पापा आज ही मैं ने पेपर में पढ़ा था कि पुलिस ने जनता से चोरी का माल न खरीदने की अपील की है. साथ ही यह भी लिखा था कि चोर से चोरी का माल खरीदने वाला भी अपराधी ही माना जाएगा ...और पापा मुझे तो यह आदमी चोरी का माल बेचने वाला लगा, ...आपने देखा पापा पुलिस को देखते ही चल दिया .’
'हाँ बेटा तू सही हो सकता है. इस तरह की खबरें आती ही नहीं रहतीं,हमारे बाजार के कई लोग चोरी का माल खरीदने के आरोप में पुलिस द्वारा पकड़े भी जा चुके हैं।पर बेटा डर डर कर जीने से काम नहीं चलता, थोड़ी रिस्क तो लेनी ही पड़ती है।इसका माल अच्छा था, हो सकता है सचमुच उसकी पत्नी बीमार हो ।'
 ‘यदि पुलिस को देख कर वह चला न गया होता तो क्या आप वह गहने खरीद लेते ?’
 ‘सौदा पट जाता तो शायद खरीद लेता ,पहले भी कई बार खरीद चुका हूँ...भगवान की कृपा से अब तक तो नहीं फँसा हूँ।’
   ‘पापा देखिए, पुलिस ने किसी आदमी को पकड़ा हुआ है और उसे साथ लेकर सामने वाली ज्वेलरी शॉप में गए है .
 ‘ पुलिस ने उसे  चोरी का माल बेचते या कहीं चोरी करते पकड़ा  होगा , पूछा होगा कि माल कहाँ कहाँ बेचा ,जिस दुकान पर वह ले जाएगा पुलिस उसे भी गिरफ्त में ले लेगी फिर उससे भी पूछताछ होगी ।’
‘पापा इन लोगों को सचमुच याद रहता होगा कि कहाँ माल बेचा या भूल भी हो सकती है ?’
 ‘भूल भी हो सकती है... पर पुलिस को क्या ,वह आदमी जिस दुकान पर बेचने की बात कहेगा,  पुलिस तो उसे ही पकड़ कर ले जाएगी ।’
 ‘अच्छा हुआ पापा आपने उस आदमी से सोना नहीं खरीदा वरना किसी दिन  आप भी मुश्किल में पड़ सकते थे .’
 “बेटा इस व्यापार में यह बहुत साधारण सी बात है और करीब करीब हर कोई इस तरह से खरीद फरोख्त करते है और हम भी कोई ऐसे ही नहीं खरीद लेते, देख भाल कर लेते हैं .’
  ‘ पर पापा आज आप मुझ से प्रोमिज कीजिये कि आगे से आप इस तरह से कभी कोई सोना चांदी नहीं खरीदेंगे ...कुछ दिन बाद बहन की शादी है. उससे पहले या कभी बाद में भी आप ऐसे किसी मुसीबत में फंस गए तो ?’
‘हाँ बेटा यह बात तो तूने बिलकुल ठीक कही है यदि मेरे साथ भी कभी एसा हुआ तो  तेरी बहन के ससुराल में मेरी क्या इज्जत रह जाएगी और उसे भी जीवन भर ताने सुनने पड़ेंगे  ।’
‘तो पक्का प्रोमिज पापा ,आज से आप इस तरह का माल खरीदने के लालच में नहीं पड़ेंगे ?’
 ‘हाँ पक्का प्रोमिस बेटा .’
‘धन्यवाद पापा अब मैं तनाव मुक्त हो कर अपनी पढ़ाई कर पाउँगा .’




पवित्रा अग्रवाल

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मंगलवार, 14 अप्रैल 2015

पिंकी के नखरे

नन्हें बच्चों की कहानी                                     

          पिंकी के नखरे  
                                                    
                                                         पवित्रा अग्रवाल
 
          एक लड़की थी । उसका नाम पिंकी था । वह बहुत जिद्दी हो गई थी । मम्मी जब भी कहीं बाहर जातीं तो वह कपड़े पहनने में बहुत रोती थी ।मम्मी पहनने को जो भी कपड़े निकालतीं वह उन्हें उठा कर दूर फेंक देती थी। यह ड्रेस नहीं पहननी, इसमें बटन हैं मुझे बटन वाले कपड़े अच्छे नहीं लगते ।....मुझे यह कलर पसन्द नहीं है, यह भी अच्छी नहीं है ,वह भी अच्छी नहीं है।अब पिंकी की  मम्मी ने नए नए कपड़े लाने बन्द कर दिए क्यों कि पिंकी को कोई भी पसन्द नहीं आते थे । एक दिन पिंकी ने कहा -" मम्मी आज मेरी  फ्रेण्ड नीलू की बर्थ डे हैं ,शाम को वहाँ जाना है।'
            शाम को मम्मी ने बहुत सुन्दर फ्राक निकाल कर पहनने को दी पर फ्राक देख कर पिंकी ने उसे हटा दिया। मुझे यह नहीं पहननी। मम्मी ने तीन ड्रेस और निकाल कर दी और कहा इनमें से जो पसन्द है वह पहन लो पर पिंकी को कोई भी अच्छी नहीं लगी ,वह रोने लगी मुझे यह नहीं पहनना ।वह रोज जो कपड़े पहनती थी उनमें से एक ड्रेस लाकर बोली "यह पहननी है '
 मम्मी ने कहा --" बेटा यह पार्टी में पहनने की नहीं हैं ...बहुत खराब लग रही है ।'
           पर पिंकी ने रोना बन्द नहीं किया ।मम्मी ने वही ड्रेस पहना दी फिर वह जूते पहन ने में रोने लगी ये जूते अच्छे नहीं है, वह जूते अच्छे नहीं हैं । मम्मी ने उसकी पसन्द के पुराने जूते ही पहना दिए। फिर वह मम्मी के साथ नीचे पार्टी में चली गई।नीलू ने बहुत सुन्दर नीले रंग की फ्राक पहन रखी थी, नए जूते पहने थे उसका घर फूलों से और बैलून से बहुत सुन्दर सजाया गया था। पिंकी के बहुत सारे दोस्त रिषभ ,सोनम, मीता,आकाश वहाँ आ गए थे । सब ने पिंकी को देखा तो कहा अरे पिंकी तू इतनी खराब ड्रेस पहन कर क्यों आई है ?आन्टी इसके पास अच्छे वाले कपड़े नहीं हैं क्या ?'
 "बेटा इस पर बहुत सारे नए और अच्छे अच्छे कपड़े हैं पर उसने कोई भी नहीं पहने। अपनी पसन्द से यह कपड़े पहन कर आई है।'
      "पिंकी तू तो सबसे गंदी लग रही है।जा, जाकर अच्छे वाले कपड़े पहन कर आ तो तू भी हम सब की तरह सुन्दर लगेगी । पिंकी ने एक बार सब के कपड़े देखे फिर उसने अपने कपड़े देखे । पिंकी मम्मी के पास जाकर बोली "मम्मी घर चलो '
  "नहीं बेटा अभी तो नीलू केक काटेगी फिर सब  हैप्पी बर्थ वाला गाना गाएंगे फिर बच्चे नए नए गेम खेलेंगे, उसके बाद पार्टी होगी ,तब सब घर जाएगे।'
 "मम्मी मुझे अच्छे वाले कपड़े पहनने हैं, जूते भी दूसरे पहन ने हैं ,जल्दी घर चलो ।'
 "तेरे पास तो अच्छे कपड़े हैं नहीं, तू क्या पहनेगी ?'
 "मेरे पास भी अच्छे अच्छे कपड़े हैं,मुझे भी इन जैसे अच्छे कपड़े पहना दो ।'
 "ऊपर जा कर तू फिर रोएगी ?'
 "नहीं रोऊँगी, मम्मी आप अच्छी वाली पहना देना ।'
 "पिंकी जब दूसरी ड्रेस पहन कर आई तो सभी बच्चों ने कहा --'वाह पिंकी के कपडे तो बहुत अच्छे हैं...इन्हें  कौन लाया ? '
 "मेरी मम्मी ।'
  नीलू की मम्मी ने कहा - " पिंकी तुम्हारी मम्मी तो बहुत अच्छी ड्रेस लाती है । तुम गुड गर्ल हो न...अब मम्मी की लाई सब ड्रेस पहनना, उन्हें गन्दा तो नहीं कहोगी ?
 " नहीं कहूँगी, आन्टी अब रोऊँगी भी नहीं।सब कपड़े पहनूँगी ।'
         "गुड गर्ल,...चलो बच्चों नीलू को बुलाओ अब केक काटते हैं ।'
केक काटने की बात सुनते ही चहकते हुए सब बच्चे केक के पास इकट्ठे हो गए थे .

                                          ---------पवित्रा अग्रवाल

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रविवार, 1 फ़रवरी 2015

खाली कागज का कमाल

बाल कहानी
                       
            खाली कागज का कमाल      

                                                                      पवित्रा अग्रवाल
 
 
        तुषार भूख से व्याकुल था। सुबह से चाय तक पीने को नहीं मिली थी। इस अनजान जगह में अपहरण करके लाए हुए चार दिन हो चुके थे किंतु वह अभी तक अपने उस अपहरणकर्ता को ढंग से पहचान भी नहीं पाया है। पहचाने भी कैसे, उसका लगभग आधा चेहरा तो बड़े फ्रेम के काले चश्मे में छिपा रहता है।
      मम्मी-पापा, पप्पू-सोनू, दादी माँ चार दिन से कितने परेशान होंगे। किसी से खाना भी नहीं खाया गया होगा। पापा ने शायद अखबार में फोटो निकलवाया होगा। थाने में भी रिपोर्ट लिखाई होगी। सोचते-सोचते वह फिर रोने लगा। वह भी कितना पागल था, जो बातों में आ गया। इस तरह अपहरण करके ले जाने के कितने क़िस्से-कहानियाँ वह पढ़ता-सुनता रहा है फिर भी अपना अपहरण करा बैठा।
    हैड मास्टर साहब ने बुलाकर कहा था, "तुषार तुम्हारे घर से किसी का फोन आया है कि आज ड्राइवर कार लेकर तुम्हें लिवाने नहीं आ सकेगा वे फैक्ट्री के रमेश नाम के नौकर को भेज रहे हैं, वह काला चश्मा लगाता है , तुमको पहचानता भी है, उसके साथ टैक्सी करके आ जाना।'
     छुट्टी के समय स्कूल के गेट पर पहुँचते ही काला चश्मा लगाए हुए एक आदमी आगे आया "चलिए छोटे साहब।'
 "तुमने मुझे कैसे पहचान लिया,...मैंने तो तुम्हें पहले कभी नहीं देखा।'
 "पहले मैं चश्मा नहीं लगाता था। कुछ दिन पहले आँख का ऑपरेशन करवाया है, तभी से लगाने लगा हूँ. इसीलिए आप नहीं पहचान पा रहे हैं।'
 "चलो जल्दी से टैक्सी पकड़ो। बहुत ठंडी हवा है, सर्दी लग रही है।'
 पास में खड़ी एक टैक्सी में वे बैठ गए थे जिसे एक सरदार जी चला रहे थे। तभी उसने चौंक कर कहा - "रमेश टैक्सी गलत रास्ते पर जा रही है।'
 "खैर चाहते हो तो चुपचाप बैठो, खबरदार जो शोर मचाया।'
       टैक्सी के चारों तरफ के शीशे बंद थे। चिल्लाने पर भी आवाज बाहर नहीं जा सकती थी। इसीलिए वह सहम कर चुप हो गया। न जाने कितनी सड़कें, चौराहे, गलियाँ, मोड़ पार करने के बाद एक सुनसान जगह कुछ खँडहरों के बीच टैक्सी उन्हें उतार कर चली गई। एक-दो घंटे बाद रात घिर आई थी। चारों तरफ गहरा अंधेरा था। एक-दूसरे को ठीक से देख पाना भी मुश्किल था। तब उसे बहुत पैदल चलना पड़ा, उसके बाद एक कोठरी में बंद कर दिया गया था।
      दरवाजे पर ताला खुलने की आवाज से उसका ध्यान भंग हुआ। उसने अंदाजा लगाया कि चश्मे वाला आदमी खाना लेकर आया होगा, दरवाजा खुलने के साथ ही हल्का सा प्रकाश भी कमरे में घुस आया।  उसकी नजर चश्मे वाले के पैरों पर पड़ी। उसके दोनों पैरों में छह-छह उँगली थीं।
 तभी उसे अपने घर में काम कर चुके एक नौकर रमुआ का ख्याल आया। उसने अपने मम्मी-पापा से सुना था कि उसके हाथ-पैरों में छह-छह उँगलियाँ थीं... रंग गोरा था, एक आँख की पुतली पर सफेदी फैली थी। जब वह स्वयं चार-पाँच वर्ष का था तभी अलमारी में से गहने निकालते हुए मम्मी ने रमुआ को पकड़ा था...पापा के आने तक वह भाग चुका था। रमुआ की उसे याद नहीं है पर अब वह चश्मे में छिपी उसकी आँखें देखना चाहता था।
       वह कागज में रोटी- सब्जी रख कर उसे खाने को दे गया था। दरवाजे में कई सुराख थे जिसमें से   काफी रोशनी अंदर आ सकती थी किंतु उस पर बाहर से किसी कपड़े का पर्दा डाल दिया गया था जिससे  कमरे में अंधेरा रहता और वह बाहर भी नहीं देख सकता था।
      भूख उसे तेजी से लगी थी। मोटी-मोटी रोटियों को छूते ही उसे फिर माँ याद आ गई। माँ के हाथ के बने करारे परांठे याद आ गए। मन न होते हुए भी उसने रोटी खाई व लोटे से पानी पी गया।
 अभी वह गिलास में चाय देकर बाहर निकला ही था कि कमरे में रोशनी की एक रेखा देखकर उसने किवाड़ की दरार से बाहर झाँका। वह आदमी चश्मा हाथ में लिए सरदार से बातें कर रहा था। यह देखकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा कि उसकी एक आँख खराब थी उसमें सफेदी फैली थी। उसने प्रसन्नता से अपनी पीठ स्वयं थपथपाई कि वह भी कहानी के पात्रों जैसा नन्हा जासूस हो गया है। तभी उसकी आशा पुन: निराशा में बदल गई। ठीक है उसने जासूसी करके अपहरणकर्ता का पता लगा लिया है, उसे पहचान लिया है लेकिन क्या फायदा.. यह जानकारी वह घर या पुलिसवालों तक कैसे पहुँचाए , पाँच दिन हो चुके हैं। किसी भी दिन यह मुझे मार डालेंगे। वह फिर सुबकने लगा।
     किवाड़ों पर हुई खटपट की आवाज सुनकर उसने सोचा, अभी तो वह चाय देकर गया था पुन: क्यों आ रहा है.. क्या पता कहीं दूसरी जगह ले जाए या हो सकता है मार ही दे।
 चश्मे वाले ने उसके हाथ में एक लिफाफा थमाया और कहा, "पेन तुम्हारे बस्ते में होगा, कागज भी होगा। अपने पापा को पत्र लिखो कि जिंदा देखना चाहते हैं तो माँगी हुई रकम बताई हुई जगह पर पहुँचा दें। पुलिस को बताने की कोशिश हर्गिज़ न करें वर्ना बेटे को हमेशा के लिए खो देंगे।'
      किसी के खाँसने की आवाज सुन कर वह बाहर जाते हुए बोला, "दरवाजे का पर्दा हटा देता हूँ, कमरे में रोशनी हो जाएगी। जल्दी से पत्र लिख दो, लिफाफे पर पता भी लिख दो..... मैं अभी आकर ले जाऊँगा।'
      "वाह बेटे, तुम तो बहुत तेज हो। जैसा मैंने कहा था वैसा ही लिख दिया। पत्र को खाली कागज में क्यों लपेट दिया है ?' उसने कागज को उलट-पलट कर देखते हुए कहा।
 "थोड़ी देर पहले आप कह रहे थे बादल हो रहे हैं, पानी बरस सकता है। इसीलिए पत्र को खाली कागज में लपेट दिया है। लिफाफा भीग भी जाए तो पत्र न भीगे। अक्षर मिट गए तो पापा पढ़ेंगे कैसे। फिर मुझे कैसे ले जाएँगे।'
 "शाबाश ठीक किया तुमने।'
       पत्र गए तीन दिन हो चुके थे। इस बीच वह सोते-जागते तरह-तरह की कल्पनाएँ करता रहा था। सपने में कभी उसे चश्मे वाला छुरा लिए अपनी तरफ आता हुआ दिखता। कभी सब बीमार माँ के पास बैठे हुए दिखाई देते। कभी उदास खड़े पापा दिखते, कभी रोती हुई बहन दिखती।
 तभी उसे एक तेज आवाज सुनाई दी- "तुषार... तुषार, तुम कहाँ हो'
       अरे यह तो पापा की आवाज है। वह चौंक कर उठा और दरवाजा पीटने लगा -" पापा मैं यहाँ हूँ, इस कोठरी में।'
     तभी ताला तोड़ने की आवाज आई। दरवाजा खुलते ही पहले दरोगा जी अंदर आए फिर पापा आए। वह पापा से लिपट कर जोर-जोर से रोने लगा।...पापा भी उसे सीने से लगाए रो रहे थे - "मेरे बेटे मैं आ गया, तू ठीक तो है न ?'
     घर जाते हुए उसने रास्ते में पूछा - "पापा उस दिन कार मुझे लेने क्यों नहीं आई थी।'
 "बेटे फोन पर किसी ने कहा था कि आज स्कूल में फंक्शन है। तुषार को लेने के लिए कार दो घंटे लेट भेजना, ऐसा कई बार हो चुका है... हमें क्या पता था कि धोखा हो सकता है।'
 घर पर उसे देखने वालों की भीड़ इकट्ठी थी। सब इतने खुश थे, जैसे कोई उत्सव हो। सबको मिठाई बाँटी जा रही थी।
 तभी उसने पूछा- "मम्मी उस घर का पता कैसे लगा ?'
 "जब अपहरणकर्ता का ही पता लग गया फिर उसके घर का पता लगाना कौन सा मुश्किल था।...सब तेरे उस पत्र के साथ आए खाली कागज का कमाल है।'
 "माँ, उस कागज को पढ़ा किसने ? मैंने तो अंधेरे में तीर मारा था। मुझे उम्मीद नहीं थी कि कोई उसे पढ़ पाएगा।'
 पप्पू ने गर्व से सीना फुलाकर कहा - "भैया मैंने पढ़ा था।'
 "तूने,...तूने कैसे पढ़ा ?'
       "चार-पाँच दिन पहले तुम्हारे दोस्त संदीप भैया आए थे। उदास थे, बहुत देर बैठे रहे। वही बता रहे थे कि अपहरण वाले दिन उन्होंने तुम को एक पेन्सिल दी थी जिसका लिखा कागज पर दिखाई नहीं देता। उन्होंने पढ़ने की तरकीब भी बताई थी। तुम्हारे पत्र के साथ आए खाली कागज को पापा ने उलट-पलट कर बेकार समझ कर फेंक दिया था। मैं तब खाना खा रहा था। मुझे संदीप भैया की बात याद आ गई। मैंने कागज उठा लिया और उस पर दाल की गर्म कटोरी रख कर घुमादी।....देखते ही देखते कागज पर लिखे तुम्हारे अक्षर चमकने लगे। बिना पढ़े ही मैं उसे लेकर पापा के पास गया। पत्र से पता लग गया कि अपहरण रमुआ ने किया है फिर क्या था, घर में हलचल मच गई। पापा तभी पुलिस स्टेशन गए और उनकी सहायता से तुम्हें ढूँढ़ लाए।'
 तभी पापा खुशी से चहकते हुए घर में घुसे और कुर्सी पर आराम से बैठते हुए बोले- "साला रमुआ भी पकड़ में आ गया है।'
       फिर कुछ ठहर कर पूछा - "तुषार बेटे उस खाली कागज का रहस्य क्या था ?'
 "भैया क्या वह जादू की पेन्सिल थी ?'
    "अरे नहीं, जादू कैसा..... असल में वह पेन्सिल मोम की थी इसीलिए उसके लिखे अक्षर कागज पर दिखाई नहीं दे रहे थे। पप्पू ने उस पर गर्म कटोरी रख दी, गर्मी पाकर मोम पिघल गया और    अक्षर स्पष्ट दिखने लगे, यही उसका रहस्य था।'
    "भाई कुछ भी हो खाली कागज ने कमाल कर दिखाया। वर्ना पता नहीं तुझे फिर से देख भी पाते या नहीं।' माँ की आँखों में हर्ष के आँसू थे


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-पवित्रा अग्रवाल
 

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शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

थोड़ी सी नासमझी

बाल कहानी 

                         थोड़ी सी नासमझी 

                                                                        पवित्रा अग्रवाल
  
       फोन की घन्टी सुन कर माँ ने अमृता को पुकार कर बताया कि तेरी दोस्त सारा का फोन आया है।
  'अच्छा माँ  अभी आई '
 "हैलो कौन सारा....क्या ...कल शाम रोश्नी छत से गिर गई थी ? ...पर वह उस समय छत पर क्या कर रही थी ?'
 'पतंग उड़ा रही थी '
 "उसे पतंग उड़ाना भी आता है ?'
 "हाँ, पतंग के दिनो में अपने भाई का चरक पकड़ते , पकड़ते उसने भी पतंग उड़ाना सीख लिया था।'
 "अरे पहले यह तो बता वह कैसी है ... बहुत चोट तो नहीं लगी ?'
 "बहुत अच्छी किस्मत थी ,छोटी मोटी चोट आई है... हॉ पैर की हड्डी भी टूटी है।'
 "थेंक गॉड , वरना छत से गिर कर तो जान भी जा सकती थी और गम्भीर चोट भी लग सकती थी।  पिछले वर्ष मेरा कजिन भी पतंग उड़ाते समय छत से गिर गया था ,उसका तो सिर फट गया था, कुछ घन्टों में ही उसकी मौत हो गई थी,मालुम है माँ- बाप का वह अकेला बेटा था।'
 " अच्छा ! आज कल तो ज्यादातर परिवारों में एक दो बच्चे ही होते हैं। रोशनी भी तो अकेली बेटी ही है,एक भाई भी है।'
      "पर वह गिर कैसे गई ?'
 "अपने भाई के साथ छत पर पतंग उड़ाने गई  थी । एक पतंग लूटने चक्कर में नीचे गिर गई।'
 'अरे बड़ी बेवकूफी की उसने... कटी पतंग लूटने की क्या जरूरत थी, क्या उसके पास पतंगे नहीं थीं ?'
 "अरे उनके पास बहुत सारी नई - नई पतंगे हैं पर पतंग उड़ाने में ज्यादा बच्चों को पतंग लूटने में  मजा आता है ।'
 "क्या उसकी छत पर रेलिंग नहीं थी ?'
 "उसकी छत पर तो रेलिंग है पर पतंग लूटने के लिए वह अपनी छत से जुड़े व नए बन रहे मकान की छत पर चली गई थी,उस छत की रेलिंग अभी बनी नहीं थी ... मैं भी उसके साथ ही थी पर माँ के डर से जल्दी लौट गई थी ।'
  "बड़ी नासमझी की उसने ... पतंग के दिनों में इस तरह की बहुत सी घटनाए होती रहती हैं। इस विषय में अखबारों में भी खबरे छपती रहती हैं।मेरी मम्मी ने तो छत पर ताला लगा रखा है ,बस एक दिन ही पतंग उड़ाने की छूट मिलती है वह भी किसी बड़े के साथ होने पर ।'
 "ताला तो उनकी छत पर भी लगा रहता है पर आज उसके मम्मी पापा किसी काम से बाहर गए थे ...और इन्हें मौका मिल गया ।'
 "जब रोशनी छत से गिरी तो उसके घर में कोई नहीं था ? '
 "गिरने के पाँच मिनट के अंदर ही उसके मम्मी - पापा आ गए थे ,वे ही उसे लेकर अस्पताल भागे।'
   "कोई खतरे की बात तो नहीं है ?
      ' ना बस डेढ़ - दो महीने के लिए पैर पर प्लास्टर चढ़ गया है। स्कूल नहीं जा पाएगी ... वह तो अच्छा हुआ हाथ सलामत हैं वरना परीक्षा कैसे लिखती ?'
 "सच में सारा थोड़ी सी नासमझी कितनी खरतनाक हो सकती है पर हम समझते ही नहीं ।माँ बाप जब हमें समझाने की कोशिश करते हैं तो हमें वह दुश्मन नजर आते हैं।...स्कूल से लौटते समय उससे मिलने चलेंगे। '


 email -- agarwalpavitra78@gmail.com

-पवित्रा अग्रवाल


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