शनिवार, 1 नवंबर 2014

जी का जंजाल

बाल कहानी  

                            जी का जंजाल
                                                  पवित्रा अग्रवाल


       स्कूल साथ साथ जाते हुए पाही ने नयना से पूछा --"नयना तुम्हारा नया मकान बने हुए तो बहुत दिन हो गए ,उसमें रहने कब जा रही हो ?''
      "अरे जाना तो दशहरे पर ही था लेकिन पापा मम्मी के कुछ मित्रों ने कहा कि इस में तो वास्तु के बहुत दोष हैं ।प्रवेश से पहले किसी वास्तु विशेषज्ञ की सलाह ले लो।हमारे मम्मी पापा को इस में विश्वास  नहीं है पर शुभ चिन्तकों के लगातार आग्रह पर मम्मी को भी बहम हो गया और यह बहम जी का जंजाल बन गया।''
     "वास्तु का नाम तो इधर मैं नें भी सुना है बल्कि हमारे पड़ौस में भी एक  वास्तु शास्त्री रहते हैं पर यह क्या है मुझे इस विषय में कुछ नहीं पता।''
    "अच्छा है जो तुम्हें इसका ज्ञान नहीं है,जो इसके जाल में फंस जाता है वह चकर घिन्नी बन जाता है।''
     "मतलब ''
      "मतलब यही है कि इनके चक्कर में फंस कर फायदा हो न हो पर रुपयों को पंख जरूर लग जाते हैं और सब से बड़ी बात यह है कि एक  वास्तु विशेषज्ञ के  हिसाब से बने मकान को दूसरा विशेषज्ञ कभी सही नहीं बताता । वह पहले विशेषज्ञ को अज्ञानी बता कर दोषों की लिस्ट थमा देता है।''
      "तुम्हारे साथ क्या हुआ ?''
     "वही जिसका अनुमान था।जब से विशेषज्ञ जी घर देख कर गए हैं,मम्मी पापा बहुत तनाव में हैं।एक एक पैसा जोड़ कर व आफिस से लोन ले कर पापा ने यह फ्लैट खरीदा था और जब उसमें रहने जाने का समय आया तो वास्तु के चक्कर में फँस गए।लोन लेते समय पापा ने सोचा था कि किराए के मकान का जो आठ हजार रुपए महिने  किराया जाता हैं वह अपने फ्लैट में जाने के बाद लोन की किश्त जमा कराने के काम आ जाएगा ।वह भी नहीं हो पाया।'
       "तो क्या वास्तु के हिसाब से मकान ठीक करवा रहे हो ?'
      "फ्लैट में वह सब सुधार संभव नहीं हैं,प्रवेश द्वार जिस दिशा में है वहीं रहेगा ।रसोई ,बाथरूम,किचन किसी का भी स्थान कैसे बदल सकता है । पापा ने कई लोगों से सलाह ली है ,छोटे मोटे बदलाव भी जो संभव थे कराए हैं।...विशेषज्ञ जी ने तो यहाँ तक कहा है कि इसे बेच कर दूसरा ले लो ।लेने से पूर्व विशेषज्ञ की सलाह जरूर ले लेना ।''
     "पर नयना यह सलाह खरीद ने से पहले ले ली होती तो इन मुश्किलों से बच जाते ।''
    "असल में पापा ने यह मकान रिसेल में लिया था,पापा के परिचित का ही मकान था।वह इस मकान में करीब सात साल रहे।''
    "यदि वास्तु दोष हैं तो जिन से तुमने खरीदा उनको भी इस में परेशानियां उठानी पड़ी होंगी ?''
     "पापा बताते हैं कि खरीदने से पूर्व मकान मालिक से वास्तु आदि के विषय में पूछा था तो उन्हों ने कहा था कि "मैं ने भी बना बनाया लिया था , किसी से सलाह नहीं ली थी ।घर में हवा, पानी, धूप का अभाव नहीं था बस यही बात मुझे भा गई थी ।मेरे बच्चे इसी मकान में रहते हुए पले - बढ़े हैं...आज  दोनो बेटे मल्टी नेशनल कंपनी में काम कर रहे हैं।घर में सुख शान्ति है।'..यह सब बात पापा भी जानते थे।बस ले लिया ।''
      "तो अब तुम्हारे पापा ने क्या सोचा है ....क्या बेचने की सोच रहे हैं ?''
     "पाही  मकान बेचना या खरीदना क्या इतना आसान होता है ?''
     "फिर...''
     "अभी एक सप्ताह पहले पापा के एक मित्र की पत्नी का कैंसर से स्वर्ग वास हो गया था ।पापा बताते हैं वह बहुत संपन्न हैं। उन्होंने जमीन खरीदने से ले कर कोठी बनवाने तक पूरा काम एक वास्तु-विशेषज्ञ की देख रेख में कराया था पर उस में जाने के एक साल के अंदर ही यह सब हो गया । मंदी के चलते उनको व्यापार में भी बहुत घाटा हुआ है।तब से पापा के दिमाग ने पल्टी खाई है और वह भ्रम की स्थिति से बाहर आगए हैं।उनका कहना है कि सुख- दुख सब के जीवन में आते हैं। उन्हें यह तथा कथित विशेषज्ञ नहीं रोक सकते और यदि रोक सकते तो उन के जीवन में सुख ही सुख होते ।'...
    "हाँ नयना तुम्हारे पापा का सोचना ठीक ही है। हमारे पड़ौस में जो वास्तु शास्त्री रहते हैं वह तो समाचार पत्र में इस विषय में कालम भी लिखते हैं। उनके घर से तो रोज झगड़े की आवाजें आती रहती हैं,उनका बेटा भी बहुत बिगड़ा हुआ है... एक बार पुलिस केस में भी फंस गया था।'
    "अच्छा ! वैसे पापा ने भी तय कर लिया है...अब हम इस महिने के अंत में अपने फ्लैट में चले जाएंगे।''

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-पवित्रा अग्रवाल
 
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