बुधवार, 1 अक्तूबर 2014

खिड़की खुली न रखना

बाल कहानी    
                           

                  खिड़की खुली न रखना
        
                                                                पवित्रा अग्रवाल


 दीपावली की रात को पूजा हो चुकी थी। मम्मी ने कहा --"चलो जल्दी से घर बंद करो, बुआ के घर दीपावली की शुभ कामनाएं व मिठाई दे आते हैं ।'
  सौम्या ने मम्मी से पूछा -- "मम्मी सब खिड़कियां भी बंद कर दूँ ?'
 "नहीं बेटा खिड़कियां बंद नही करना ।'
 "क्यों मम्मी ?'
 "तुम्हारी दादी ने दीपावली के दिन कभी मुझे खिड़कियाँ बंद नहीं करने दीं।कहती थीं खिड़की दरवाजे बंद देख कर लक्ष्मी जी बाहर से ही लौट जाएगी ।शुरू में मुझे भी यह आदेश अच्छा नहीं लगता था फिर आदत पड़ गई है ।'
 "पर मम्मी अब तो आदेश देने या गुस्सा करने को दादी नहीं हैं, आप फिर भी वही सब कर रही हैं जो दादी के सामने करती थीं ।'
 "हाँ बेटा इतनी जल्दी उनकी बातें भूलने को मन नहीं कर रहा ।...वैसे भी अपने फ्लैट्स बहुत सुरक्षित हैं यहाँ चोरी चकोरी का बिलकुल डर नहीं है।'
 "मम्मी आप ठीक कह रही हैं यहाँ चोरी का डर तो बिलकुल नहीं है पर खिड़की खुली रखने से आग का खतरा बढ़ जाता है ।'
 "दीदी खिड़की से आग का क्या संबंध है ?'
 "तुम्हारे जैसे शरारती बच्चे जब मन में आया कहीं भी पटाखे जलाना शुरू कर देते हैं।पिछले वर्ष मेरी सहेली के घर में इसी तरह आग लग गई थी।बाहर से जलता हुआ राकेट खिड़की से उनके बैडरूम में आ कर बिस्तर पर गिर गया.था.....पर उस समय वह सब लोग घर में ही थे,अत:एक बड़ी दुर्घटना टल गई वरना सभी फ्लैट्स आग की चपेट में आ जाते ।'
 "हाँ दीदी आप ठीक कह रही हैं , मम्मी दीदी से खिड़की के दरवाजे भी बन्द करने को कह दीजिए न ।'
 "सौम्या तुम ठीक ही कह रही हो,इस तरह की सावधानी बरतने में कोई नुकसान नहीं है।घर की सभी खिड़कियां बंद कर दो ।'
 "वैसे दीदी खिड़की दरवाजे बंद करने से एक फायदा और भी है।'
 "क्या ?'
 "दरवाजे बंद होने से बाहर की लक्ष्मी अंदर नहीं आ सकेंगी तो क्या ,जो लक्ष्मी अंदर हैं वह भी तो बाहर नहीं जा सकेंगी ।इस तरह घर की लक्ष्मी तो घर में ही रहेंगी ।'
 सौम्या ने प्यार से छोटी बहन को चपत लगाते हुये कहा -"बात में दम है दादी माँ,अब चलें ?'


-पवित्रा अग्रवाल

ईमेल -- agarwalpavitra78gmail.com
 



फूलों से प्यार --समीक्षा

 
 
फूलों से प्यार --समीक्षा-1
रोचक शिक्षाप्रद बाल कहानियाँ
                                                   -डॉ. पूर्णिमा शर्मा
                                                   हैदराबाद

साहित्य मनोरंजन, रसास्वादन और चेतना को उद्बुद्ध करने जैसे कई काम करता है. लेकिन उसका सबसे चुनौतीपूर्ण काम शिक्षा प्रदान करने और चरित्र निर्माण करने का होता है. यह काम चुनौतीपूर्ण इसलिए है कि इसकी सिद्धि के लिए साहित्य को उपदेश का सहारा नहीं लेना है. आचार संहिताओं और नैतिक उपदेशों के स्थान पर साहित्य को कांतासम्मित उपदेश का मार्ग अपनाना होता है. विशेष रूप से बाल साहित्य इसी तकनीक को अपना कर अपनी रोचकता और सार्थकता बरकरार रख सकता है. 'फूलों से प्यार' में प्रतिष्ठित  लेखिका, पवित्रा अग्रवाल ने इसी मार्ग को अपना कर रोचक घटनाओं और प्रेरक चरित्रों के माध्यम से नैतिक मूल्यों का सन्देश देने में सफलता पाई है.
यह संग्रह बच्चों के लिए लिखी गयी छोटी छोटी २५ कहानियों का संग्रह है. यह देखकर सुखद आश्चर्य होता है कि इन कहानियों में परियों, भूतों, जादूगरों, चुड़ैलों और चमत्कारों का कोई स्थान नहीं है. पवित्रा जी मानती हैं कि इन तमाम तरह के कथानकों वाली कहानियां बच्चों को यथार्थ से काटकर जीवन से दूर कर देती हैं, इसीलिए उन्होंने अपने आस-पास के वास्तविक जीवन को अपनी बाल कथाओं का आधार बनाया है. ये कहानियां इस धारणा को खंडित करती हैं कि बच्चों के लिए काल्पनिक जगत की कहानियाँ चाहिए. ये कहना बिलकुल ठीक होगा कि ठोस ज़मीनी सच्चाइयों से जुडी पवित्रा अग्रवाल की कहानियां बच्चों में तर्क शक्ति और वैज्ञानिक चेतना को स्थापित करने में समर्थ हैं.
इन कहानियों में बच्चों का मनोविज्ञान अत्यंत सहज रूप में उभर कर सामने आया है. बच्चों की जिज्ञासा वृत्ति, अनुकरण के साथ साथ कुछ मौलिक करने की प्रवृत्ति, प्रश्न करने का स्वभाव और सच तक पहुँचने की बेचैनी इन कहानियों को विकसित करती हैं और इसी दौरान लेखिका बड़ी चतुराई से किसी होशियार माँ की तरह नैतिक शिक्षा का पाठ भी पढ़ा देती है जिसका परम उद्देश्य चरित्र निर्माण है.
साहित्य चाहे बच्चों के लिए लिखा जाए या बड़ों के लिए, उसकी चरम सार्थकता अमंगल का नाश करने में है. अंधविश्वास, कुरीतियाँ, गलत प्रथाएं, सड़े गले और मानव विरोधी रिवाज़ तथा अवैज्ञानिक मान्यताएं कुछ ऐसे कारक हैं जो मनुष्य, मनुष्यता और समाज के लिए अमंगलकारी हैं. सत्साहित्य इन पर चोट करता है. वह किसी भी प्रकार के पाखण्ड का विरोधी होता है - चाहे वह धार्मिक गुरुओं का पाखण्ड हो या समाज के नेताओं का. बहुत साधारण सी दिखने वाली घटनाओं के सहारे पवित्रा अग्रवाल ने 'फूलों से प्यार' में इन तमाम अमंगलकारी तत्वों पर तार्किकता की चोट की है. दीपावली पर जूआ खेलने की छूट को उन्होंने 'सच्चा दोस्त' में निशाना बनाया है, तो तम्बाकू पीने की लत पर 'जन्मदिन का उपहार' में वार किया है. 'खाने के रंग' में गलत आदतों  पर प्रहार किया गया है, तो अन्यत्र हड़ताल की प्रवृत्ति पर चोट की गयी है. यह सारा अमंगलनाश का कार्य लेखिका किसी कुशल कुम्हार की तरह सहार सहार कर चोट देते हुए करती हैं. इसके बाद वे, बाल पाठक के चित्त  को एक खूबसूरत पात्र का आकार देते हुए उस पर मूल्यों की रंगकारी करती हैं. इन मूल्यों में सत्य, ईमानदारी, पर्यावरण संरक्षण, कौटुम्बिक स्नेह, रिश्ते नातों की मर्यादा, कर्त्तव्य निष्ठा, निर्भीकता और मानव प्रेम जैसे सन्देश निहित हैं.
साफ़ सुथरे और तर्क पर आधारित बाल साहित्य के अकाल के ज़माने में 'फूलों से प्यार' की बालकथाएँ महकती बयार का सुख देती हैं. इन कहानियों को प्राइमरी स्तर के सब बच्चों तक पहुंचना चाहिए.

समीक्षा -2
                               
                                                  " फूलों से प्यार '                                  रोचक और प्रेरक बाल कहानियों की सफल प्रस्तुति 
                                                                                                       रोहिताश्व   अस्थाना
               हिन्दी बाल साहित्य की विभिन्न विधाओं में बाल कहानी की सवत्र धूम है।प्रारम्भ में बच्चे संयुक्त परिवारों में अपनी दादी और नानी से हुंकारी भरते हुए भाँति भाँति की बाल कहानियाँ सुनते रहते थे । कालान्तर में संयुक्त परिवार टूट कर एकल परिवारों में बंट गए....लोग रोजी रोटी एवंम काम करने के लिए अलग अलग जगहों पर बस गए। माता पिता भी कार्य व्यस्तता के सिलसिले में बच्चों से दूर होते गए ।बच्चों को कोई बाल कहानियाँ सुनाने वाला नहीं रहा ।वे अपने को उपेक्षित सा अनुभव करने लगे ।
 ऐसे में बाल साहित्यकारों द्वारा बाल मनोविज्ञान एवं बाल परिवेश पर आधारित रोचक तथा प्रेरक बाल कहानियाँ लिखी जाने लगीं जिन्हें आज भी बाल पाठक पढ़ना पसंद करते हैं।
 ऐसी ही एक बाल साहित्यकार हैं श्रीमती पवित्रा अग्रवाल । वैसे वह बड़ों के लिए भी कहानियाँ लिखती हैं तथापि बाल पाठकों के लिए भी उन्हों ने 1978 से अब तक ढेर सारी बाल कहानियाँ लिखी हैं । प्राय:बच्चों व बड़ो की पत्रिकाओं में उनकी कहानियों की धूम रहती है ।
 ऐसी पच्चीस बाल कहानियों का उनका संकलन " फूलों से प्यार' आकर्षक सज-धज के साथ सजिल्द प्रकाशित हुआ है।समस्त कहानियाँ बाल मनोविज्ञान पर आधारित तो हैं ही ,साथ ही बच्चों की रुचियों,अपेक्षाओं एंव जिज्ञासाओं का शमन करने वाली रोचक व प्रेरक भी हैं।यह कहानियाँ बच्चों पर उपदेशों को थोपने वाली नहीं हैं । यही इन कहानियों की सब से बड़ी विशेषता है।
 संकलन की पहली कहानी "सच्चा दोस्त' जुए के खेल से बचने का संदेश देती है। दूसरी कहानी "जन्म दिन का उपहार ' में टीना अपने पिता से हानिकारक तम्बाकू व गुटखा न खाने का वादा जन्म दिन के उपहार के रूप में लेती है ।"चोर भाग गए में ' बच्चियों ने अपनी चतुराई से चोरों को घर में धुसने से पहले ही भगाने का साहसपूर्ण कार्य किया है। "प्यारा सा घर ' अनाथ बच्चों को गोद लेने की समस्या पर केद्रित है । "मुकुल की दीपापली ' - इस पर्व की पृष्ठ भूमि पर आधारित है। "खाने में  रंग ' के अन्र्तगत खाने की वस्तुओं में रंग डालने से होने वाले दुष्प्रभावों को रेखांकित किया है । "प्रेस ने चोर पकड़ा '- बच्चों में प्रचलित किताब की चोरी की आदत पर केन्द्रित है । "स्नेह पर्व होली ' पेन्ट व कैमीकल से होली न खेलने की प्रेरणा देती है ।संकलन की शीर्षक बाल कहानी "फूलों से प्यार ' प्रकृति व पर्यावरण पर केन्द्रित है ,इस कहानी में बच्चों को फूलों से प्यार करने और उन्हें न तोड़ने की शिक्षा मिलती है । "बीच सड़क पर '-  बच्चे बीच सड़क पर बस से न उतरने व दुर्घटना से बचने की शिक्षा ले सकते हैं ।कहानी " छोटी सी धटना ' बच्चों को चोरी की आदत से बचने का संदंश देती है । " जीवन शैली '-बच्चों को दूसरों का गलत अनुकरण न करने और अपनी हैसियत के हिसाब से चलने    की प्रेरणा  देती है । "और ठग पकड़े गए ' नामक कहानी में रमेश की चतुराई से उसकी माँ के जेवर लेंजाते हुए ठग पकड़ लिए जाते हैं।चौदहवीं कहानी " किराए का धर ' बच्चों को संदेश देती है कि घर अपना हो या किराए का घर ,घर होता है उसे हमेशा साफ रखना चाहिए...दीवारों पर कुछ नहीं लिखना चाहिए । " दुविधा ' कहानी
कक्षा में प्रतिस्पर्धा के चलते उत्तर पुस्तिकाओं में धोखा देकर अंक न बढ़वाने और अपने परिश्रम के प्रतिफल पर संतोष करने की प्रेरणा देती है।सोलहवीं कहानी " गन्दा मजाक ' बच्चों को सावधान करती है कि होली पर पान में रंग डाल कर दूसरों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए।
        कहानी " दो कौड़ी की पतंग ' में संदेश छिपा है कि बच्चों को पतंग बहुत सुरक्षित ढ़ंग से उड़ानी चाहिए,  पतंग लूटने के चक्कर में जान भी जा सकती है । " छाले अब नहीं ' में हरी सब्जियों की महत्ता बताई है।
 "खिड़की खुली ना रखना' में दीपावली पर बाहर जाते समय सुरक्षा की दृष्टि से खिड़की बन्द रखनी चाहिए।बाहर से लक्ष्मी आए ना आए पर घर की लक्ष्मी बाहर भी नहीं जा पाती। " दो अजनबी '- रेल गाड़ियों में जहर खुरानी की समस्या पर आधारित है ।इस में बच्चें ने अपनी सूझबूझ से दो लुटेरों को  लूटे गए सामान सहित पुलिस को सोंप दिया । कहाली " सजा देने का हक ' बताती है कि स्कूलों में सजा देने का हक तो अब शिक्षकों को भी नहीं रहा पर कुछ बच्चे मानीटर बनाए जाने पर अंहकार वश अपने सहपाठियों को सजा देने से नहीं चूकते ...।
  " सारी पापा ' एक स्वार्थी बच्चे की कहानी है जो बहन को स्कूल से नहीं लाता ...बीमार माँ को जाना पड़ता है और माँ को बेहोशी की हालत में अस्पताल जाना पड़ता है। " सीटी का कमाल '-  बच्चों को संकट में चतुराई और साहस से काम लेने व हिम्मत न हार ने का संदेश देती है। " सबक ' विकलांग बच्चो को  चिढ़ाने व अपमानित न का संदंश देती है ।अंतिम कहानी  " एक बाल्टी पानी का कमाल ' -दीपावली पर आतिश बाजी करते  समय पानी से भरी बाल्टी साथ रखने व अन्य सावधानियाँ बरतने का संदेश देती है ।
 इस तरह सभी कहानियाँ एक से बढ़ कर एक रोचक ,प्रेरक व बाल उपयांगी बन पड़ी हैं ।कपोल कथाओं व परी कथाओं के विपरीत संकलित कहानियाँ बच्चों को भावी होनहार नागरिक बनाने में पूर्णतया सक्षम हैं।
     
  समीक्षक- रोहिताश्व अस्थाना,
      निकट बावन चुंगी चौराहा,हरदोई- 241001 (उ. प्र.  )
       दूरभाष  - 05852-232392
  

 
 पुस्तक -  फूलो से प्यार ( बाल कहानी संग्रह  )
 लेखिका -     श्रीमती पवित्रा अग्रवाल
 प्रकाशन -    अयन प्रकाशन  1/20 महरौली ,नई दिल्ली - 110030
 संस्करण -    प्रथम -2012 मूल्य - 150/  सजिल्द
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बाल कहानी संग्रह "फूलों से प्यार " पुरस्कृत

                भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार


   मुझे मेरे    बाल कहानी संग्रह "फूलों से प्यार " के लिए 201 2  का द्वितीय    भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार (-प्रकाशन विभाग दिल्ली ) से पुरस्कृत किया गया . यह पुरस्कार दिल्ली में 9 सितम्बर 2014 को सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम में  सूचना एवं प्रसारण  मंत्री  माननीय श्री प्रकाश जावडेकर जी ने प्रदान किया .