बुधवार, 16 जुलाई 2014

फूलों की चाहत


बाल कहानी

                                   फूलों की चाहत   


                                                                                         पवित्रा अग्रवाल



          
 "दीदी मैं अभी आयी।गुप्ता आन्टी से कुछ फूल माँग कर लाती हूँ।'
 "दिव्या, फूलों का इतनी सुबह क्या करेगी ?'
  "आज मेरी प्रिय टीचर मिस लिली का बर्थ-डे है।उन्हें मैं फूलों का गुलदस्ता भेंट करना चाहती  हूँ। गुप्ता आन्टी का बगीचा बहुत सुन्दर है।उनके यहाँ तरह तरह के फूल हैं।'
 "मैं ने भी देखा है, उनका बगीचा सचमुच बहुत सुन्दर है।जरूर उनके पास माली होगा।'
 "नही दीदी उनके यहाँ कोइ माली नही है,अंकल ,आन्टी बगीचे की देख भाल खुद करते हैं।'
 "जो अपने बगीचे की देख भाल खुद करते हैं,मुझे नही लगता कि उनसे तुम्हे फूल माँगने चाहिये। ऐसे लोगो को अपने पौधों से बच्चों की तरह प्यार होता है।...जब तुमने पहले से सोच रखा था कि मिस को गुलदस्ता भेंट करना है तो उसका इंतजाम करके रखना चाहिये था..बाजार में क्या नही मिलता ?'
 "बाजार मे तो बुके बहुत मंहगा मिलता है दीदी।मैं कोइ रोज तो माँगती नही हूँ,आज पहली बार लेने जा रही हूँ। आन्टी बहुत अच्छी हैं...आप देखना वह मना नही करेगी,मुझे बहुत प्यार करती हैं।'
 "हो सकता है वह दे दें । उनकी जगह मै होती तो एक दो फूल शायद दे भी देती पर गुलदस्ते के लिये तो मना कर देती।'
 "दीदी एक बात बताइये हम फूल नही तोड़ेगे तब भी वह पेड़ पर रहने वाले तो हैं नही, एक दो दिन मे मुर्झा कर खुद गिर जायेंगे।...यदि किसी के काम आजाये तो अच्छा है न। बाजार मे इतने फूल बिकते है वह भी तो किसी के बगीचों से ही आते होंगे ?'
 "बाजार मे बिकने वाले फूल शौकिया बगीचा रखने वालों के बगीचे से नही आते।..बाजार में बिकने के लिये फूल उगाना अपने आप मे एक अलग व्यवसाय है,उनकी बाकायदा खेती की जाती है लेकिन जो अपने घर के बगीचे की देखभाल के लिये अपना पसीना बहाते हैं वह बड़ी बेसब्री से पौधों पर कलियाँ आने का इंतजार करते हैं फिर उनको खिलते हुये देखने का भी।...इतनी मेहनत वह इसलिये तो नहीं करते कि फूल तोड़-तोड़ कर बाट दें।'
 "शायद आप ठीक कह रहीं हैं दीदी,मैं ने इतनी गहरायी से सोचा ही नही था लेकिन अब इतना समय नही है कि बाजार से फूल ला सकूँ यदि आन्टी ने दे दिया तो बस एक गुलाब का फूल लाऊँगी।'
 दिव्या गुप्ता आन्टी के घर पहुँची तो उसने आन्टी को बगीचे के गेट पर दो बच्चों से बात करते हुये खड़ा पाया।उन के चेहरे पर कुछ उदासी छायी थी।तभी आन्टी  का स्वर उसके कान मे पड़ा-"सॉरी बच्चों मैं फूल नही दे सकती ।पूजा के लिये चाहिये तो भी आपको बाजार जाना चाहिये था।'
 "आन्टी प्लीज बस दो-तीन दे दीजिये न।' 
 उन के चेहरे पर तनिक गुस्सा छा गया था - "इतनी देर से समझा रही हूँ फिर भी नही समझ रहे,अब जाओ यहाँ से।'
 तभी आन्टी की नजर दिव्या पर पड़ी । वह बोली - "देखों दिव्या इन फूल माँगने वालो से मैं परेशान हो गई हूँ, रोज कोइ न कोइ फूल माँगने चला आता है । सबको एक-एक, दो-दो भी देने लगूँ तो मेरे बगीचे में एक भी फूल नही बचेगा।किसी को घर में पूजा के लिये फूल चाहिये तो किसी को मंदिर मे चढ़ाने के लिये,किसी को जन्म दिन के लिये चाहिये तो किसी को अपने लाड़लों की माँग पूरी करने के लिये।...तंग हो गइ हूँ मैं।पहले तो मुझे पता ही नही चलता था और फूल गायब हो जाते थे।अब मै ने  सरकाने वाला गेट लगवाया है जिसे बच्चे आसानी से नही खोल पाते तो बैल बजा-बजा के मुसीबत किये रहते हैं,समझ मे नही आता क्या करूँ ?'
 आन्टी की परेशानी दिव्या समझ रही थी।उसने कहा-"आन्टी एक काम और कर के देखिये।आप गेट पर एक बोर्ड यह लिख कर लगवा दीजिये कि यहाँ फूल तोडना और माँगना दोनो सख्त मना है।...मैं समझती हूँ माँगने वालो की सख्या मे कमी जरूर आयेगी।'
 "ठीक है बेटा यह उपाय भी करके देखती हूँ।'
 लौटते समय दिव्या इस बात से बहुत खुश थी कि वह फूल माँगने की गलती करने से बच गयी थी। उसे अहसास हो गया था कि फूलों की चाहत को माँग कर नही खरीद कर पूरा करना चाहिये     
 

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-पवित्रा अग्रवाल
ईमेल --agarwalpavitra78@gmail.com

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