रविवार, 2 मार्च 2014

एक मोहल्ला, एक ही होली

बाल कहानी                            


               एक मोहल्ला, एक ही होली  

                                                                             पवित्रा अग्रवाल 

 
 म. रमेश राव के पिता आठ महीने पहले ही हैदराबाद से ट्रांसफर होकर उत्तर प्रदेश के इस शहर में आए थे। होली का त्यौहार आने वाला था। रमेश राव कुछ ज्यादा ही उत्साहित था। हैदराबाद में होली इतने धूमधाम से नहीं मनाई जाती, जितने उत्साह से उत्तर प्रदेश में मनाई जाती है। वहाँ तो रमेश ने कभी होली जलते हुए भी नहीं देखी थी।
 उसके मोहल्ले के सभी मित्रों ने पंद्रह दिन पहले से होली की तैयारी शुरू कर दीं। सबने नए कपड़े खरीदे थे। होली के तीन-चार दिन पहले से सबके घरों में तरह-तरह की मिठाइयाँ और पकवान बनने प्रारंभ हो गए थे। मोहल्ले के सभी बच्चे घर-घर जाकर होली के लिए चंदा इकट्ठा करने में लगे थे। कभी-कभी रमेश भी उनके साथ चला जाता था। कम चंदा दिए जाने पर सब अधिक देने के लिए आग्रह करते थे, "अरे अंकल इतने कम से काम नहीं चलेगा। लकड़ी के भाव तो देखिए। कितनी महँगी हो गई है।'
 फिर सभी मिलकर रमेश राव के घर भी गए। रमेश के माता-पिता ने बच्चों को बहुत प्यार से नाश्ता करवाया लेकिन चंदा माँगने पर रमेश के पापा ने साफ मना कर दिया।
उन्होंने पूछा- "बच्चों यह तो बताओ इस मोहल्ले में कितनी जगह होली जलाई जाती है ? सुबह से पाँच-छह ग्रुप  चंदा माँगने आ चुके हैं।'
 "अंकल एक तो मोहल्ले की बड़ी होली जलती है, जो बहुत वर्षों से जलती आ रही है। अब लोग
अपनी-अपनी गली और फ्लैट्स के अपार्टमेंट में अलग-अलग भी जलाने लगे हैं।'
 "यह तो गलत है न। होली में लकड़ी जलाई जाती है और लकड़ी के लिए जंगल काटने पड़ते हैं। जितनी ज्यादा संख्या में होली जलाई जाएगी। उतनी ही ज्यादा लकड़ी भी जलेगी।....एक मोहल्ले में एक से ज्यादा होली नहीं जलाई जानी चाहिए। गरीबों को खाना बनाने के लिए लकड़ी नहीं मिल पाती क्योंकि बहुत महँगी है और यहाँ होली जलाने के नाम पर देश में लाखों टन लकड़ी मिनटों में जला कर राख कर दी जाती है।...इस लकड़ी के जलाए जाने से हमारा-तुम्हारा, समाज का, देश का कोई लाभ नहीं होता बल्कि नुकसान ही होता है।...देश की हालत देखते हुए मैं इस तरह लकड़ी जलाए जाने के सख्त खिलाफ हूँ। हमें तो पेड़ों की, जंगलों की रक्षा करनी चाहिए।...बोलो बच्चों क्या मैं गलत कह रहा हूँ ?'
  'आप ठीक कह रहे है अंकल ।'
   "बच्चों होली का मुख्य उद्देश्य आपसी बैर भाव भूल कर दोस्ती, सद्भाव बढ़ाना होना चाहिए। हाँ यदि तुम लोग यह चंदा किसी जरूरतमंद की मदद करने या किसी अच्छे काम के लिए माँगते तो मैं सबसे पहले देता।'
 रमेश राव के दोस्त बिना चंदा पाए लौट गए। रमेश राव बहुत उदास था। उसके दोस्त पापा के विषय में क्या सोचेंगे। पापा को ऐसा नहीं करना चाहिए था।
 दूसरे दिन रमेश अपनी पाकेट मनी के बचाए गए रुपयों में से पचास रुपये अपने दोस्तों को देने गया और अपने पापा के चंदा न दिए जाने की बात पर उनसे क्षमा माँगी।
 उसके दोस्तों में से मयंक बोला, "रमेश तुम्हारे घर से लौटते समय हम सचमुच दुखी और अपमानित महसूस कर रहे थे किंतु जब हमने शांत मन से तुम्हारे पापा की कही गई बातों पर विचार किया तो हमें लगा कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं कहा। हमने उस दृष्टि से कभी सोचा ही नहीं था। एक तरफ तो हम जंगल बचाओ, पेड़ लगाओ की बात करते हैं, दूसरी तरफ इस तरह सैकड़ों टन लकड़ी व्यर्थ जला डालते हैं।...इस वर्ष हम एक शुरुआत तो कर ही सकते हैं कि अपनी गली में अलग-अलग होली नहीं जलाएँगे।  जो रुपये हमने जमा किए हैं
उनसे गरीब बस्ती के उन नंग-धड़ंग बच्चों को वस्त्र देकर आएँगे, जिन्हें पुराने वस्त्र भी नसीब नहीं हैं। क्या आप सबको मेरा सुझाव मंजूर है ?'
 सबने स्वीकृति में गर्दन हिला दी। रमेश भी अब अपने पिता से नाराज नहीं था।



--
-पवित्रा अग्रवाल
 

email -- agarwalpavitra78@gmail.com