शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

दंड या पुरस्कार


   बाल  कहानी 

   दंड या पुरस्कार   

 
                              पवित्रा अग्रवाल 
         
       क्ला स से बाहर आते ही दीपक ने पूछा-"अतुल, चोर-सिपाही खेलेगा ?'    
    "नहीं यार, अभी मन नहीं है।'
    "अच्छा मत खेल, हम तो दिनेश के साथ खेलेंगे।...अरे यार...जरा मुड़ कर हमारी तरफ भी देख लो, इतने बुरे तो हम नहीं हैं। खेलने को ही कह रहे हैं, तुमसे कुछ माँग तो नहीं रहे हैं ? लेकिन एक बात साफ है, चोर तुम्हें ही बनना पड़ेगा, हम तो सिपाही बनेंगे।'
     दिनेश बिना किसी तरफ देखे चुपचाप क्लास में चला गया। अतुल ने दीपक को जा घेरा, "क्यों यार, कल कोई खास बात हो गई क्या ? दिनेश को ऐसे क्यों चिढ़ा रहे हो ?'
    "तुझे नहीं मालूम ? अच्छा, कल तू टिफिन के बाद ही घर  चला गया था, यह उसके बाद की बात है। मेरी हिंदी की किताब चोरी हो गई थी। सबसे पूछा, किसी ने नहीं बताया। सर ने क्लास के सभी लड़कों को कमरे से बाहर खड़ा कर दिया और हरेक के बस्ते की तलाशी ली गई। किताब दिनेश के बस्ते से निकली। तभी सर ने उसको तीन-चार छड़ी मारी और चोर की टोपी पहना कर स्कूल में घुमाया।'
     अतुल के चेहरे पर मुस्कान खेल गई, "बहुत अच्छा हुआ, बनता भी बहुत होशियार था।'

  "दिनेश, जरा बस्ता दिखाना, मेरी एक कॉपी नहीं मिल रही।' एक लड़के के यह पूछते ही क्लास के सब लड़के उसके चारों तरफ घिर आए। एक-एक चीज बस्ते से अलग निकाल कर देखी गई किंतु कॉपी नहीं मिली।
   तभी दूसरा लड़का बोला- "ली भी होगी तो पिटने के लिए बस्ते में थोड़े ही रखेगा...छिपा दी होगी कहीं।'
   क्लास में कोई सर नहीं थे। मेज पर डस्टर की चोट करते हुए एक लड़का बोला - "भाइयों, काले-पीले रंग की धारियों वाला मेरा पेन खो गया है। चोरी करना बहुत बुरी बात है.. जिसने भी लिया हो, वह अपने आप बता दे।'
 सबकी निगाहें दिनेश की तरफ हो गई। वह अपना बस्ता क्लास में छोड़कर बाहर निकल गया।

  "क्या बात है दिनेश, तुमने पढ़ाई में ढ़ील डाल दी है। इस महीने तुम्हारे नंबर हर विषय में कम आए हैं। कोई दिक्कत हो तो बताओ हमें लेकिन पढ़ाई में मत पिछड़ो।' सर ने कहा।
 पीछे से कोई फुसफुसाया- "अब पढ़ाई से हट कर ध्यान चोरी में लग गया है। पढ़ने को समय ही कहाँ मिलता है ?'
 दिनेश की आँखें भर आर्इं और टप टप आँसू टपकने लगे। तभी टन-टन-टन स्कूल की घंटी बजी। सर क्लास से बाहर चले गए।
 अतुल को दिनेश पर बहुत दया आई- "दिनेश रोते क्यों हो ? सर की बात का बुरा मत मानना, तुम्हारी तो हमेशा तारीफ करते थे। इस परीक्षा में तुम्हारे कम नंबर देख कर उन्हें दुख हुआ है।'
    फिर अतुल टिफिन खोल कर उसके सामने बैठ गया- "आओ दिनेश, खाना खाएँगे।'
 "नहीं अतुल, मुझे भूख नहीं है। मैं घर से खाकर आता हूँ।'
 "तुम्हें खाना होगा, जितनी भूख हो उतना ही खा लो।'

 "यार, "चोरी मेरा काम' फिल्म लगी है, देखने जाएँगे।'
 "नहीं यार, चोरी मेरा काम नहीं है, मैं तो नहीं जाऊँगा। जिसका काम हो वह जाए।'
 "फिर तो दिनेश को जाना चाहए।'
 "वो देखकर क्या करेगा..यह काम तो उसे आता है।' सब बच्चे हँसने लगे।
 इस तरह बच्चे रोज क्लास में दिनेश को जलील करते थे। अतुल यह सब सहन नहीं कर पाया- "यह तुम लोगों की क्या तमीज है ? शर्म नहीं आती किसी का मजाक उड़ाते ?'
 "अतुल, तू दिनेश की तरफदारी क्यों कर रहा है ? क्या उसने कुछ खिला दिया है ?'
 "खिलाने को रखा क्या है, उसके पास ? अपने खाने को तो है नहीं- ' दीपक ने अपना वाक्य जोड़ा।
 "दीपक, बस बहुत हो चुका.. अब चुप हो जाओ वर्ना अच्छा नहीं होगा। किसी गरीब का मजाक उड़ाना अच्छी बात नहीं है ।'
     तभी प्रार्थना की घंटी बजी और सब लाइन में लगने लगे।

 "मैं कल ही नया कलर बॉक्स लाया था। उसमें से चार-पाँच रंग की ट्यूब  गायब हैं, दिनेश अपना बस्ता दिखाओ' मोहन ने अकड़ कर कहा।
    "बस्ते में न मिलें, तो इसके कपड़े झाड़ना'-दूसरे ने सुझाव दिया।
 रोज रोज के इस तमाशे दिनेश तंग हो गया था..उसे भी गुस्सा आ गया --"मेरे पास नहीं हैं। न मैं बस्ता दिखाऊँगा और न कपड़े झाड़ने दूँगा।'
      "दिखाओगे कैसे नहीं ? तुम्हें दिखाना पड़ेगा।' बस्ता छीनते हुए मोहन ने कहा।
 दिनेश ने ज़बरदस्ती करते मोहन को पीछे धकेल दिया।
    "चोर, पहले चोरी करता है, फिर अकड़ता भी है।' मोहन अपनी नेकर की धूल झाड़ता दिनेश पर पुनः झपटा... उसे जमीन पर पटक कर उस पर चढ़ बैठा और उस पर तड़ातड़ चाँटे व मुक्के भी बरसाने लगा। दिनेश के होंठ से खून बहने लगा था ।
    अतुल से यह सब देखा नहीं गया। अब उसका धैर्य समाप्त हो चुका था। उसका मन उसे बार-बार कचोटता था। दिनेश की इस दशा के लिए कई दिन से वह स्वयं को दोषी मान रहा था। उसने कई बार सोचा दिनेश को सब कुछ बता दे और उससे माफी माँग ले लेकिन इससे क्या फर्क पड़ेगा ? लड़के तो उसे चोर मानते ही रहेंगे। उसने यह बात कई बार अपने सर को भी बताने की सोची किंतु बदले में मिलने वाली सजा की याद आते ही उसका साहस जवाब दे जाता था ।
     लेकिन आज वह हर सजा भोगने को तैयार था। वह अपनी क्लास के शिक्षक के पास पहुँच गया। उस समय वह कमरे में अकेले ही थे।
  "सर आप से कुछ कहना है"
  "कहो क्या बात है ?"
    "सर, कुछ दिनों पहले मुझसे एक गलती हो गई थी, जो किसी को भी नहीं पता है किंतु अब मैं स्वयं ही बता रहा हूँ। मैं यह भी जानता हूँ कि उसके लिए मुझे कड़ी सजा मिलेगी।'
    "क्या गलती हो गई थी, यह तो बताओ ?'
    "सर डेढ़-दो महीने पहले एक किताब चुराने की वजह से दिनेश को शर्मा सर ने मारा था और चोर की टोपी पहना कर स्कूल में घुमाया था....लेकिन सर दिनेश गरीब जरूर है पर चोर नहीं है। उसने चोरी नहीं की थी, वह सब मेरी शरारत थी। ....
    मैं ने दीपक की किताब निकाल कर दिनेश के बस्ते में रखी थी लेकिन अब सब लड़के चोर-चोर कह कर  रोज उसका अपमान करते हैं। इसी झगड़े में आज दिनेश को खून भी निकल आया है।' कहते-कहते अतुल रोने लगा।
         जोशी जी अचंभे में पड़े उसे देख रहे थे -- "अतुल यह तो बहुत बुरा हुआ। एक बार दोषी भले ही सजा से बच जाए किंतु निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए। तभी दिनेश इतना चुप चुप और उदास रहता है। इसी वजह से शायद वह ढंग से पढ़ भी नहीं पाता होगा। इस बार उसके नंबर भी कम आए हैं लेकिन तुमने ऐसा क्यों किया ? इससे तुम्हें क्या मिला ?'
      "सर, मुझे उससे बहुत चिढ़ हो गई थी। लगभग सब मेरी उससे तुलना करते हुए कहा करते थे कि मैं बारहों महीने घर पर भी मास्टर से पढ़ता हूँ, पढ़ने की हर सुविधा मुझे प्राप्त है फिर भी हर परीक्षा में कम अंक लाता हूँ। एक दिनेश है जिसके पास पढ़ने को पूरी पुस्तकें भी नहीं हैं फिर भी वह कितने अच्छे नंबर लाता है.. मेरे लिए शर्म की बात है।'
         अत: उसे अपमानित करने के लिए ही मैंने ये शरारत की थी जो आज तक किसी दूसरे को नहीं पता। दिनेश को सजा मिलने की बात सुन कर भी मैं बहुत खुश हुआ था किंतु अब मेरा मन मुझे रोज धिक्कारता है।'
      "तुमने यह बात मुझे बता कर बहुत अच्छा किया। प्रिंसीपल साहब तथा शर्मा जी को इसका पता चला तो तुम्हें सख्त सजा दिये बिना वे नहीं मानेंगे। पर दिनेश को निर्दोष साबित करने के लिए मुझे यह सब बातें उन्हें बतानी होंगी। बिना बताए काम नहीं चलेगा। अच्छा, अब तुम क्लास में जाओ।'
       अतुल अब यह सोच कर दुखी था कि उसे सब लड़कों के सामने मार पड़ेगी फिर सब लड़के रोज चिढ़ाया करेंगे। उसका मन किसी काम में नहीं लग रहा था। सारे समय उसे यही लगता रहा कि प्रिंसीपल साहब का बुलावा अब आया, बस अब आया।
      छुट्टी की घंटी बजते ही बस्ता उठाकर वह सबसे पहले स्कूल से बाहर निकल गया कि कहीं कोई रोक न ले।

     दूसरे दिन प्रार्थना सभा में प्रार्थना के बाद जोशी जी आगे आए और बोले- "दिनेश यहाँ आओ। बच्चों, तुम्हें याद होगा कि कुछ दिन पूर्व कक्षा आठ के दिनेश को चोरी करने के अपराध में सजा दी गई थी लेकिन अब हमें ज्ञात हुआ है कि दिनेश ने चोरी नहीं की थी। उसे व्यर्थ की सजा मिली। इसका हमें बहुत ही दुख है। दिनेश ने किताब नहीं चुराई थी बल्कि शरारत वश एक लड़के ने किसी की किताब निकाल कर उसके बस्ते में रख दी थी। वह लड़का बहुत शर्मिंदा है और उसने स्वयं ही हमें यह बात बताई है।'
    "सर उसका नाम बताइए। उसे कड़ी से कड़ी सजा दीजिए।' लड़कों के समूह में से आवाजें उभरीं।
    डर से अतुल के पैर काँपने लगे।
 "हाँ, यदि तुम लोगों की इच्छा होगी तो उसे सजा अवश्य दी जाएगी। सजा पाने के लिए वह तैयार है। दिनेश, उसका नाम तो तुम भी जानना     चाहोगे ?'
    दिनेश भौंचक्का-सा आँखें फाड़ कर यह सब देख-सुन रहा था, कुछ सोचकर बोला- "नहीं सर, मैं नाम जान कर क्या करूँगा ? कुछ देर से ही सही किंतु उस लड़के ने निश्चय ही मन से अपनी गलती महसूस की है तभी सजा की चिंता किए बिना उसने स्वयं ही यह सब बता दिया वर्ना आप सबको कैसे पता चलता कि मैं निर्दोष हूँ। वह जो भी है, मैं उसके प्रति आभारी हूँ कि उसने सच बोलने का साहस किया वर्ना मैं इस झूठे आरोप से इतना दुखी हो चुका था कि किसी दिन स्कूल आना बंद करके हमेशा के लिए पढ़ाई छोड़ देता। इस समय उसे दंड नहीं बल्कि सच बोलने का पुरस्कार मिलना चाहिए। मेरी प्रार्थना है कि उसे आप कोई दंड न दें और उसका नाम भी न बतायें ।'
    शर्माजी ने आगे बढ़ कर स्नेह से दिनेश की पीठ थपथपाई - "बहुत प्रतिभाशाली लड़का है। मैंने उस दिन इसकी बातों पर विश्वास  नहीं किया था , व्यर्थ ही सजा दी। बेटे, तुम्हें मेरे विषय में कभी कोई दिक्कत महसूस हो तो नि:संकोच स्कूल में या घर पर मेरे पास आ सकते हो।'
      स्कूल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा था । आठवें क्लास के छात्र समस्त अनुशासन भूल कर हर्ष मिश्रित ध्वनियाँ करते दिनेश की तरफ दौड़े। उससे पूर्व ही आगे बढ़ कर अतुल ने दिनेश को गले से लगा लिया था।


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-पवित्रा अग्रवाल
 
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