सोमवार, 1 दिसंबर 2014

अवैतनिक सचिव


बाल कहानी


                 अवैतनिक सचिव 

                                                                     पवित्रा अग्रवाल


       सुबह स्कूल जाने के लिए तैयार होकर रमेश जब सुरेश के घर पहुँचा तो वहाँ सबको कुछ परेशान पाया। पूछने पर उसने बताया - "हम लोग पीने के लिए उबला पानी इस्तेमाल करते हैं। मम्मी रोज रात को एक स्टील के घड़े में पानी भर कर उसमें पानी गर्म करने की रौड लगा देती है करीब पचास मिनट में पानी उबल जाता है। दूसरे दिन ठंडा होने पर वही पानी मम्मी घड़े में पलट कर रख लेती हैं और वही पानी सब पीते हैं।'
    "यह तो अच्छी बात है'
 "बात तो अच्छी है...पर रात को मम्मी स्विच बंद करना भूल गई...पानी रात भर उबलता रहा, सुबह जब रसोई का दरवाजा खोला तो पूरी रसोई गीली थी। रात को भाप बनकर उड़ा पानी छत व दीवारों से टपक रहा था। पानी गर्म करने की रौड लाल होकर घड़े में लटकी हुई थी। घड़े में बस उतना ही पानी बचा था जो रौड से नीचे था।'
     सुरेश ने बताया कि इस लापरवाही के लिए पापा,मम्मी पर नाराज हुए।...मम्मी कुछ भुलक्कड़ भी हैं। इससे कोई दुर्घटना भी हो सकती थी।
    "लेकिन सुरेश इस तरह की भूल तो कभी, किसी से भी हो सकती है।...हमारे यहाँ बोरवेल है। रोज मोटर चला कर छत की टंकी में पानी भरना पड़ता है।...एक दिन मम्मी मोटर चला कर भूल गई। टी.वी. और कूलर की आवाज में बोरिंग की आवाज सुनाई नहीं दी। दो-तीन घंटे बाद जब उन्होंने टी.वी. बंद किया तो ज्ञात हुआ कि पानी ओवर फ्लो होकर न जाने कितनी देर से बह रहा था। मोटर भी बहुत गर्म हो गई थी.....
 उस दिन से मम्मी ने एक तरकीब निकाली। उन्हें जितनी देर के लिए मोटर चलानी होती है या जितने बजे मोटर बंद करनी होती है उतने बजे का घड़ी में अलार्म लगा देती है।...भूल भी जाए तो अलार्म याद दिला देता है। तुम्हारी मम्मी भी बंद करने के समय का अलार्म लगालें तो ऐसी भूल पुनः नहीं होगी।'
      "अरे वाह रमेश यह तो तुमने घड़ी का बड़ा अच्छा उपयोग बताया।...'
 "यही नहीं मेरी मम्मी तो अलार्म का दैनिक जीवन में बहुत उपयोग करती हैं। उन्हें कोई टी.वी. सीरियल देखना हो तो उस टाइम का अलार्म लगा देती हैं। कभी निश्चित समय कहीं जाना हो,कोई जरूरी दवा खानी हो.. छोटी बहन को स्कूल से लाना हो...तो बस अलार्म लगा कर निश्चिन्त हो जाती हैं।... उनकी ये ट्रिक हम लोग भी जरूरत पर इस्तेमाल कर लेते हैं। हम लोगों ने तो अलार्म पीस का नाम मम्मी की सचिव रख दिया है।'
     "सचिव, वह भी बिना वेतन वाली यानी कि अवैतनिक सचिव।"



-पवित्रा अग्रवाल

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शनिवार, 1 नवंबर 2014

जी का जंजाल

बाल कहानी  

                            जी का जंजाल
                                                  पवित्रा अग्रवाल


       स्कूल साथ साथ जाते हुए पाही ने नयना से पूछा --"नयना तुम्हारा नया मकान बने हुए तो बहुत दिन हो गए ,उसमें रहने कब जा रही हो ?''
      "अरे जाना तो दशहरे पर ही था लेकिन पापा मम्मी के कुछ मित्रों ने कहा कि इस में तो वास्तु के बहुत दोष हैं ।प्रवेश से पहले किसी वास्तु विशेषज्ञ की सलाह ले लो।हमारे मम्मी पापा को इस में विश्वास  नहीं है पर शुभ चिन्तकों के लगातार आग्रह पर मम्मी को भी बहम हो गया और यह बहम जी का जंजाल बन गया।''
     "वास्तु का नाम तो इधर मैं नें भी सुना है बल्कि हमारे पड़ौस में भी एक  वास्तु शास्त्री रहते हैं पर यह क्या है मुझे इस विषय में कुछ नहीं पता।''
    "अच्छा है जो तुम्हें इसका ज्ञान नहीं है,जो इसके जाल में फंस जाता है वह चकर घिन्नी बन जाता है।''
     "मतलब ''
      "मतलब यही है कि इनके चक्कर में फंस कर फायदा हो न हो पर रुपयों को पंख जरूर लग जाते हैं और सब से बड़ी बात यह है कि एक  वास्तु विशेषज्ञ के  हिसाब से बने मकान को दूसरा विशेषज्ञ कभी सही नहीं बताता । वह पहले विशेषज्ञ को अज्ञानी बता कर दोषों की लिस्ट थमा देता है।''
      "तुम्हारे साथ क्या हुआ ?''
     "वही जिसका अनुमान था।जब से विशेषज्ञ जी घर देख कर गए हैं,मम्मी पापा बहुत तनाव में हैं।एक एक पैसा जोड़ कर व आफिस से लोन ले कर पापा ने यह फ्लैट खरीदा था और जब उसमें रहने जाने का समय आया तो वास्तु के चक्कर में फँस गए।लोन लेते समय पापा ने सोचा था कि किराए के मकान का जो आठ हजार रुपए महिने  किराया जाता हैं वह अपने फ्लैट में जाने के बाद लोन की किश्त जमा कराने के काम आ जाएगा ।वह भी नहीं हो पाया।'
       "तो क्या वास्तु के हिसाब से मकान ठीक करवा रहे हो ?'
      "फ्लैट में वह सब सुधार संभव नहीं हैं,प्रवेश द्वार जिस दिशा में है वहीं रहेगा ।रसोई ,बाथरूम,किचन किसी का भी स्थान कैसे बदल सकता है । पापा ने कई लोगों से सलाह ली है ,छोटे मोटे बदलाव भी जो संभव थे कराए हैं।...विशेषज्ञ जी ने तो यहाँ तक कहा है कि इसे बेच कर दूसरा ले लो ।लेने से पूर्व विशेषज्ञ की सलाह जरूर ले लेना ।''
     "पर नयना यह सलाह खरीद ने से पहले ले ली होती तो इन मुश्किलों से बच जाते ।''
    "असल में पापा ने यह मकान रिसेल में लिया था,पापा के परिचित का ही मकान था।वह इस मकान में करीब सात साल रहे।''
    "यदि वास्तु दोष हैं तो जिन से तुमने खरीदा उनको भी इस में परेशानियां उठानी पड़ी होंगी ?''
     "पापा बताते हैं कि खरीदने से पूर्व मकान मालिक से वास्तु आदि के विषय में पूछा था तो उन्हों ने कहा था कि "मैं ने भी बना बनाया लिया था , किसी से सलाह नहीं ली थी ।घर में हवा, पानी, धूप का अभाव नहीं था बस यही बात मुझे भा गई थी ।मेरे बच्चे इसी मकान में रहते हुए पले - बढ़े हैं...आज  दोनो बेटे मल्टी नेशनल कंपनी में काम कर रहे हैं।घर में सुख शान्ति है।'..यह सब बात पापा भी जानते थे।बस ले लिया ।''
      "तो अब तुम्हारे पापा ने क्या सोचा है ....क्या बेचने की सोच रहे हैं ?''
     "पाही  मकान बेचना या खरीदना क्या इतना आसान होता है ?''
     "फिर...''
     "अभी एक सप्ताह पहले पापा के एक मित्र की पत्नी का कैंसर से स्वर्ग वास हो गया था ।पापा बताते हैं वह बहुत संपन्न हैं। उन्होंने जमीन खरीदने से ले कर कोठी बनवाने तक पूरा काम एक वास्तु-विशेषज्ञ की देख रेख में कराया था पर उस में जाने के एक साल के अंदर ही यह सब हो गया । मंदी के चलते उनको व्यापार में भी बहुत घाटा हुआ है।तब से पापा के दिमाग ने पल्टी खाई है और वह भ्रम की स्थिति से बाहर आगए हैं।उनका कहना है कि सुख- दुख सब के जीवन में आते हैं। उन्हें यह तथा कथित विशेषज्ञ नहीं रोक सकते और यदि रोक सकते तो उन के जीवन में सुख ही सुख होते ।'...
    "हाँ नयना तुम्हारे पापा का सोचना ठीक ही है। हमारे पड़ौस में जो वास्तु शास्त्री रहते हैं वह तो समाचार पत्र में इस विषय में कालम भी लिखते हैं। उनके घर से तो रोज झगड़े की आवाजें आती रहती हैं,उनका बेटा भी बहुत बिगड़ा हुआ है... एक बार पुलिस केस में भी फंस गया था।'
    "अच्छा ! वैसे पापा ने भी तय कर लिया है...अब हम इस महिने के अंत में अपने फ्लैट में चले जाएंगे।''

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-पवित्रा अग्रवाल
 
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बुधवार, 1 अक्तूबर 2014

खिड़की खुली न रखना

बाल कहानी    
                           

                  खिड़की खुली न रखना
        
                                                                पवित्रा अग्रवाल


 दीपावली की रात को पूजा हो चुकी थी। मम्मी ने कहा --"चलो जल्दी से घर बंद करो, बुआ के घर दीपावली की शुभ कामनाएं व मिठाई दे आते हैं ।'
  सौम्या ने मम्मी से पूछा -- "मम्मी सब खिड़कियां भी बंद कर दूँ ?'
 "नहीं बेटा खिड़कियां बंद नही करना ।'
 "क्यों मम्मी ?'
 "तुम्हारी दादी ने दीपावली के दिन कभी मुझे खिड़कियाँ बंद नहीं करने दीं।कहती थीं खिड़की दरवाजे बंद देख कर लक्ष्मी जी बाहर से ही लौट जाएगी ।शुरू में मुझे भी यह आदेश अच्छा नहीं लगता था फिर आदत पड़ गई है ।'
 "पर मम्मी अब तो आदेश देने या गुस्सा करने को दादी नहीं हैं, आप फिर भी वही सब कर रही हैं जो दादी के सामने करती थीं ।'
 "हाँ बेटा इतनी जल्दी उनकी बातें भूलने को मन नहीं कर रहा ।...वैसे भी अपने फ्लैट्स बहुत सुरक्षित हैं यहाँ चोरी चकोरी का बिलकुल डर नहीं है।'
 "मम्मी आप ठीक कह रही हैं यहाँ चोरी का डर तो बिलकुल नहीं है पर खिड़की खुली रखने से आग का खतरा बढ़ जाता है ।'
 "दीदी खिड़की से आग का क्या संबंध है ?'
 "तुम्हारे जैसे शरारती बच्चे जब मन में आया कहीं भी पटाखे जलाना शुरू कर देते हैं।पिछले वर्ष मेरी सहेली के घर में इसी तरह आग लग गई थी।बाहर से जलता हुआ राकेट खिड़की से उनके बैडरूम में आ कर बिस्तर पर गिर गया.था.....पर उस समय वह सब लोग घर में ही थे,अत:एक बड़ी दुर्घटना टल गई वरना सभी फ्लैट्स आग की चपेट में आ जाते ।'
 "हाँ दीदी आप ठीक कह रही हैं , मम्मी दीदी से खिड़की के दरवाजे भी बन्द करने को कह दीजिए न ।'
 "सौम्या तुम ठीक ही कह रही हो,इस तरह की सावधानी बरतने में कोई नुकसान नहीं है।घर की सभी खिड़कियां बंद कर दो ।'
 "वैसे दीदी खिड़की दरवाजे बंद करने से एक फायदा और भी है।'
 "क्या ?'
 "दरवाजे बंद होने से बाहर की लक्ष्मी अंदर नहीं आ सकेंगी तो क्या ,जो लक्ष्मी अंदर हैं वह भी तो बाहर नहीं जा सकेंगी ।इस तरह घर की लक्ष्मी तो घर में ही रहेंगी ।'
 सौम्या ने प्यार से छोटी बहन को चपत लगाते हुये कहा -"बात में दम है दादी माँ,अब चलें ?'


-पवित्रा अग्रवाल

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फूलों से प्यार --समीक्षा

 
 
फूलों से प्यार --समीक्षा-1
रोचक शिक्षाप्रद बाल कहानियाँ
                                                   -डॉ. पूर्णिमा शर्मा
                                                   हैदराबाद

साहित्य मनोरंजन, रसास्वादन और चेतना को उद्बुद्ध करने जैसे कई काम करता है. लेकिन उसका सबसे चुनौतीपूर्ण काम शिक्षा प्रदान करने और चरित्र निर्माण करने का होता है. यह काम चुनौतीपूर्ण इसलिए है कि इसकी सिद्धि के लिए साहित्य को उपदेश का सहारा नहीं लेना है. आचार संहिताओं और नैतिक उपदेशों के स्थान पर साहित्य को कांतासम्मित उपदेश का मार्ग अपनाना होता है. विशेष रूप से बाल साहित्य इसी तकनीक को अपना कर अपनी रोचकता और सार्थकता बरकरार रख सकता है. 'फूलों से प्यार' में प्रतिष्ठित  लेखिका, पवित्रा अग्रवाल ने इसी मार्ग को अपना कर रोचक घटनाओं और प्रेरक चरित्रों के माध्यम से नैतिक मूल्यों का सन्देश देने में सफलता पाई है.
यह संग्रह बच्चों के लिए लिखी गयी छोटी छोटी २५ कहानियों का संग्रह है. यह देखकर सुखद आश्चर्य होता है कि इन कहानियों में परियों, भूतों, जादूगरों, चुड़ैलों और चमत्कारों का कोई स्थान नहीं है. पवित्रा जी मानती हैं कि इन तमाम तरह के कथानकों वाली कहानियां बच्चों को यथार्थ से काटकर जीवन से दूर कर देती हैं, इसीलिए उन्होंने अपने आस-पास के वास्तविक जीवन को अपनी बाल कथाओं का आधार बनाया है. ये कहानियां इस धारणा को खंडित करती हैं कि बच्चों के लिए काल्पनिक जगत की कहानियाँ चाहिए. ये कहना बिलकुल ठीक होगा कि ठोस ज़मीनी सच्चाइयों से जुडी पवित्रा अग्रवाल की कहानियां बच्चों में तर्क शक्ति और वैज्ञानिक चेतना को स्थापित करने में समर्थ हैं.
इन कहानियों में बच्चों का मनोविज्ञान अत्यंत सहज रूप में उभर कर सामने आया है. बच्चों की जिज्ञासा वृत्ति, अनुकरण के साथ साथ कुछ मौलिक करने की प्रवृत्ति, प्रश्न करने का स्वभाव और सच तक पहुँचने की बेचैनी इन कहानियों को विकसित करती हैं और इसी दौरान लेखिका बड़ी चतुराई से किसी होशियार माँ की तरह नैतिक शिक्षा का पाठ भी पढ़ा देती है जिसका परम उद्देश्य चरित्र निर्माण है.
साहित्य चाहे बच्चों के लिए लिखा जाए या बड़ों के लिए, उसकी चरम सार्थकता अमंगल का नाश करने में है. अंधविश्वास, कुरीतियाँ, गलत प्रथाएं, सड़े गले और मानव विरोधी रिवाज़ तथा अवैज्ञानिक मान्यताएं कुछ ऐसे कारक हैं जो मनुष्य, मनुष्यता और समाज के लिए अमंगलकारी हैं. सत्साहित्य इन पर चोट करता है. वह किसी भी प्रकार के पाखण्ड का विरोधी होता है - चाहे वह धार्मिक गुरुओं का पाखण्ड हो या समाज के नेताओं का. बहुत साधारण सी दिखने वाली घटनाओं के सहारे पवित्रा अग्रवाल ने 'फूलों से प्यार' में इन तमाम अमंगलकारी तत्वों पर तार्किकता की चोट की है. दीपावली पर जूआ खेलने की छूट को उन्होंने 'सच्चा दोस्त' में निशाना बनाया है, तो तम्बाकू पीने की लत पर 'जन्मदिन का उपहार' में वार किया है. 'खाने के रंग' में गलत आदतों  पर प्रहार किया गया है, तो अन्यत्र हड़ताल की प्रवृत्ति पर चोट की गयी है. यह सारा अमंगलनाश का कार्य लेखिका किसी कुशल कुम्हार की तरह सहार सहार कर चोट देते हुए करती हैं. इसके बाद वे, बाल पाठक के चित्त  को एक खूबसूरत पात्र का आकार देते हुए उस पर मूल्यों की रंगकारी करती हैं. इन मूल्यों में सत्य, ईमानदारी, पर्यावरण संरक्षण, कौटुम्बिक स्नेह, रिश्ते नातों की मर्यादा, कर्त्तव्य निष्ठा, निर्भीकता और मानव प्रेम जैसे सन्देश निहित हैं.
साफ़ सुथरे और तर्क पर आधारित बाल साहित्य के अकाल के ज़माने में 'फूलों से प्यार' की बालकथाएँ महकती बयार का सुख देती हैं. इन कहानियों को प्राइमरी स्तर के सब बच्चों तक पहुंचना चाहिए.

समीक्षा -2
                               
                                                  " फूलों से प्यार '                                  रोचक और प्रेरक बाल कहानियों की सफल प्रस्तुति 
                                                                                                       रोहिताश्व   अस्थाना
               हिन्दी बाल साहित्य की विभिन्न विधाओं में बाल कहानी की सवत्र धूम है।प्रारम्भ में बच्चे संयुक्त परिवारों में अपनी दादी और नानी से हुंकारी भरते हुए भाँति भाँति की बाल कहानियाँ सुनते रहते थे । कालान्तर में संयुक्त परिवार टूट कर एकल परिवारों में बंट गए....लोग रोजी रोटी एवंम काम करने के लिए अलग अलग जगहों पर बस गए। माता पिता भी कार्य व्यस्तता के सिलसिले में बच्चों से दूर होते गए ।बच्चों को कोई बाल कहानियाँ सुनाने वाला नहीं रहा ।वे अपने को उपेक्षित सा अनुभव करने लगे ।
 ऐसे में बाल साहित्यकारों द्वारा बाल मनोविज्ञान एवं बाल परिवेश पर आधारित रोचक तथा प्रेरक बाल कहानियाँ लिखी जाने लगीं जिन्हें आज भी बाल पाठक पढ़ना पसंद करते हैं।
 ऐसी ही एक बाल साहित्यकार हैं श्रीमती पवित्रा अग्रवाल । वैसे वह बड़ों के लिए भी कहानियाँ लिखती हैं तथापि बाल पाठकों के लिए भी उन्हों ने 1978 से अब तक ढेर सारी बाल कहानियाँ लिखी हैं । प्राय:बच्चों व बड़ो की पत्रिकाओं में उनकी कहानियों की धूम रहती है ।
 ऐसी पच्चीस बाल कहानियों का उनका संकलन " फूलों से प्यार' आकर्षक सज-धज के साथ सजिल्द प्रकाशित हुआ है।समस्त कहानियाँ बाल मनोविज्ञान पर आधारित तो हैं ही ,साथ ही बच्चों की रुचियों,अपेक्षाओं एंव जिज्ञासाओं का शमन करने वाली रोचक व प्रेरक भी हैं।यह कहानियाँ बच्चों पर उपदेशों को थोपने वाली नहीं हैं । यही इन कहानियों की सब से बड़ी विशेषता है।
 संकलन की पहली कहानी "सच्चा दोस्त' जुए के खेल से बचने का संदेश देती है। दूसरी कहानी "जन्म दिन का उपहार ' में टीना अपने पिता से हानिकारक तम्बाकू व गुटखा न खाने का वादा जन्म दिन के उपहार के रूप में लेती है ।"चोर भाग गए में ' बच्चियों ने अपनी चतुराई से चोरों को घर में धुसने से पहले ही भगाने का साहसपूर्ण कार्य किया है। "प्यारा सा घर ' अनाथ बच्चों को गोद लेने की समस्या पर केद्रित है । "मुकुल की दीपापली ' - इस पर्व की पृष्ठ भूमि पर आधारित है। "खाने में  रंग ' के अन्र्तगत खाने की वस्तुओं में रंग डालने से होने वाले दुष्प्रभावों को रेखांकित किया है । "प्रेस ने चोर पकड़ा '- बच्चों में प्रचलित किताब की चोरी की आदत पर केन्द्रित है । "स्नेह पर्व होली ' पेन्ट व कैमीकल से होली न खेलने की प्रेरणा देती है ।संकलन की शीर्षक बाल कहानी "फूलों से प्यार ' प्रकृति व पर्यावरण पर केन्द्रित है ,इस कहानी में बच्चों को फूलों से प्यार करने और उन्हें न तोड़ने की शिक्षा मिलती है । "बीच सड़क पर '-  बच्चे बीच सड़क पर बस से न उतरने व दुर्घटना से बचने की शिक्षा ले सकते हैं ।कहानी " छोटी सी धटना ' बच्चों को चोरी की आदत से बचने का संदंश देती है । " जीवन शैली '-बच्चों को दूसरों का गलत अनुकरण न करने और अपनी हैसियत के हिसाब से चलने    की प्रेरणा  देती है । "और ठग पकड़े गए ' नामक कहानी में रमेश की चतुराई से उसकी माँ के जेवर लेंजाते हुए ठग पकड़ लिए जाते हैं।चौदहवीं कहानी " किराए का धर ' बच्चों को संदेश देती है कि घर अपना हो या किराए का घर ,घर होता है उसे हमेशा साफ रखना चाहिए...दीवारों पर कुछ नहीं लिखना चाहिए । " दुविधा ' कहानी
कक्षा में प्रतिस्पर्धा के चलते उत्तर पुस्तिकाओं में धोखा देकर अंक न बढ़वाने और अपने परिश्रम के प्रतिफल पर संतोष करने की प्रेरणा देती है।सोलहवीं कहानी " गन्दा मजाक ' बच्चों को सावधान करती है कि होली पर पान में रंग डाल कर दूसरों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए।
        कहानी " दो कौड़ी की पतंग ' में संदेश छिपा है कि बच्चों को पतंग बहुत सुरक्षित ढ़ंग से उड़ानी चाहिए,  पतंग लूटने के चक्कर में जान भी जा सकती है । " छाले अब नहीं ' में हरी सब्जियों की महत्ता बताई है।
 "खिड़की खुली ना रखना' में दीपावली पर बाहर जाते समय सुरक्षा की दृष्टि से खिड़की बन्द रखनी चाहिए।बाहर से लक्ष्मी आए ना आए पर घर की लक्ष्मी बाहर भी नहीं जा पाती। " दो अजनबी '- रेल गाड़ियों में जहर खुरानी की समस्या पर आधारित है ।इस में बच्चें ने अपनी सूझबूझ से दो लुटेरों को  लूटे गए सामान सहित पुलिस को सोंप दिया । कहाली " सजा देने का हक ' बताती है कि स्कूलों में सजा देने का हक तो अब शिक्षकों को भी नहीं रहा पर कुछ बच्चे मानीटर बनाए जाने पर अंहकार वश अपने सहपाठियों को सजा देने से नहीं चूकते ...।
  " सारी पापा ' एक स्वार्थी बच्चे की कहानी है जो बहन को स्कूल से नहीं लाता ...बीमार माँ को जाना पड़ता है और माँ को बेहोशी की हालत में अस्पताल जाना पड़ता है। " सीटी का कमाल '-  बच्चों को संकट में चतुराई और साहस से काम लेने व हिम्मत न हार ने का संदेश देती है। " सबक ' विकलांग बच्चो को  चिढ़ाने व अपमानित न का संदंश देती है ।अंतिम कहानी  " एक बाल्टी पानी का कमाल ' -दीपावली पर आतिश बाजी करते  समय पानी से भरी बाल्टी साथ रखने व अन्य सावधानियाँ बरतने का संदेश देती है ।
 इस तरह सभी कहानियाँ एक से बढ़ कर एक रोचक ,प्रेरक व बाल उपयांगी बन पड़ी हैं ।कपोल कथाओं व परी कथाओं के विपरीत संकलित कहानियाँ बच्चों को भावी होनहार नागरिक बनाने में पूर्णतया सक्षम हैं।
     
  समीक्षक- रोहिताश्व अस्थाना,
      निकट बावन चुंगी चौराहा,हरदोई- 241001 (उ. प्र.  )
       दूरभाष  - 05852-232392
  

 
 पुस्तक -  फूलो से प्यार ( बाल कहानी संग्रह  )
 लेखिका -     श्रीमती पवित्रा अग्रवाल
 प्रकाशन -    अयन प्रकाशन  1/20 महरौली ,नई दिल्ली - 110030
 संस्करण -    प्रथम -2012 मूल्य - 150/  सजिल्द
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बाल कहानी संग्रह "फूलों से प्यार " पुरस्कृत

                भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार


   मुझे मेरे    बाल कहानी संग्रह "फूलों से प्यार " के लिए 201 2  का द्वितीय    भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार (-प्रकाशन विभाग दिल्ली ) से पुरस्कृत किया गया . यह पुरस्कार दिल्ली में 9 सितम्बर 2014 को सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम में  सूचना एवं प्रसारण  मंत्री  माननीय श्री प्रकाश जावडेकर जी ने प्रदान किया .

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

फौजी का बेटा

बाल कहानी   

           फौजी का बेटा      
                                         
                                                 पवित्रा अग्रवाल



           आजाद अपने कुछ साथियों के साथ स्कूल से लौट रहा था ।उसे घर जाने की जल्दी थी क्यों कि उसकी माँ बीमार थी। वह सुबह स्कूल नहीं आना चाहता था पर मम्मी ने उसे जबरन भेज दिया -- "बेटा अपनी पढ़ाई में ढ़ील मत दो।मैं ठीक हूँ फिर भी तू मोबाइल ले जा,कोई परेशानी हुई तो तुझे फोन कर दूँगी ।''
       " पर... मम्मी स्कूल में मोबाइल ले जाने की इजाजत नहीं है।...यदि किसी ने देख लिया तो  ड़ांट तो पड़ेगी ही ,जुर्माना भी देना पड़ेगा ।... फिर भी मैं ले जाता हूँ  ,साइलेंट मोड में वाइब्रोशन के साथ रख लेता हूँ।जरूरी हो तो आप कर लेना वरना मैं खाने की छुट्टी में आप से बात कर लूँगा ।''
      " हाँ बेटा ,यह ठीक रहेगा।''
     आजाद ने दोपहर में मम्मी से बात कर ली थी। शाम को स्कूल से लौटते समय उसे मम्मी के लिए कुछ फल ले जाने थे ।वह फलों की तलाश में इधर उधर नजर घुमा रहा था तभी उसकी नजर भीड़ भरे इलाके में स्थित एक कचरा कुंडी पर पड़ी।एक आदमी उस में कुछ डाल कर गया था,पर उसके हाव भाव देख कर आजाद को लगा कि कुछ दाल में काला है। उसने अपने आसपास चलते हुए कुछ बच्चों का ध्यान उधर खींचना चाहा पर वह कान में ईयरफोन लगाए गाने सुनने में व्यस्त थे ।
           उसे लगा कि समय अच्छा नहीं है।लोगों को आँख कान खुले रख कर चौकन्ना रहने की जरूरत है।...एक लड़के के कान से ईयरफोन निकाल कर उसने कहा -"अभी मैं ने एक आदमी को उस कचरा कुंडी में कुछ डाल कर जाते देखा है...मुझे शक है कि वह बम भी हो सकता है ।''
         बच्चे ने बड़ी लापरवाही और बेरुखी से उसे घूर कर देखा और कहा --  "कचरे के डिब्बे में कोई कचरा ही डालेगा न '' और अपने कान पर दुबारा ईयरफोन लगाते हुए उस से आगे निकल गया ।
       तभी आजाद को वह आदमी अपनी तरफ आते हुए दिखा।एक पेड़ की आड़ में खड़े हो कर आजाद ने मोबाइल से उसका फोटो भी लेने का प्रयास किया । अब आजाद दुविधा में था कि क्या करूँ ? पुलिस को बताया जाए या नहीं।  यदि वहाँ कुछ नहीं मिला तो वे समझेंगे कि मैं ने उन्हें बिना बात गुमराह कर के उनका समय बर्बाद किया है ।कुछ पुलिस वाले तो इतने बद्दिमाग होते हैं कि गलत सूचना पर उसे चोट भी पंहुचा सकते हैं ।
      आखिर उसने अपनी दुविधा पर विजय पाली ,100 नं.पर फोन मिला कर उसने अपना नाम ,अपने स्कूल का नाम व जगह बता कर अपना शक जाहिर करते हुए कहा कि मैं नहीं जानता कि मेरा शक सही है या गलत ।हो सकता है वहाँ कुछ भी न मिले ।...आप चाहें तो जगह की जाँच कर सकते हैं ?''
      "ठीक है बेटा,जब तुमने अपनी पूरी पहचान बता कर फोन किया है तो हम तुम्हें झूठी अफवाह फैलाने वाला तो नहीं मान सकते।...हम वहाँ जा कर देखेंगे।''
   "सर अब मै अपने घर जा रहा हूँ ...मेरी माँ बीमार है।मेरा मोबाइल नंबर आपके पास रिकार्ड हो गया होगा।मेरी किसी मदद की जरूरत हो तो आप मुझे फोन कर सकते हैं।''
    "ओ के बेटा।''
 एक घन्टे बाद पुलिस का फोन आया ---"आजाद तुम्हारा शक सही निकला ।वहाँ एक जीवित बम पाया गया है।वह यदि फट  जाता तो बहुत सी जाने जा सकती थीं ।हम तुम से मिलना चाहते हैं ...तुम से उसका हुलिया जान कर हमारे एक्सपर्ट गुनहगार का चित्र बनाएँगे ताकि उसे पकड़ा जा सके ।''
     "सर मैं ने मोबाइल से उसका फोटो लिया  था  ,हो सकता है आप को उस से कुछ मदद मिल सके।''
     "ओ वेरी गुड ,यह तुमने बहुत अच्छा किया,तुम मोबाइल के साथ आ जाओ ।''
 आजाद ने अपनी मम्मी को विस्तार से पूरी घटना बताई।सुन कर मम्मी बहुत खुश हुई और बोलीं--
      "शाबाश बेटा,मुझे तुम पर नाज है।फौजी पापा के बहादुर बेटे हो तुम।...सुन कर पापा बहुत खुश होंगे ।''
           थोड़ी देर बाद मम्मी ने टी. वी. चालू किया तो समाचार आ रहा था ---  "एक बच्चे की मदद से एक बहुत बड़ा हादसा होते होते बचा।उसने पुलिस को बम रखे होने का शक जाहिर किया था जो सही निकला। उस साहसी बच्चें से अभी मीडिया का संपर्क नहीं हो पाया है।....अभी अभी खबर आई है कि दो जगह और भी बम विस्फोट हुए हैं।ताजा जानकारी के साथ हम फिर हाजिर होंगे ।''
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-पवित्रा अग्रवाल

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शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

यह भी चोरी है

बाल कहानी
 
                      यह भी चोरी है

                                                                    पवित्रा अग्रवाल

 सोमेश को पुस्तक के पन्ने फाड़ते देख कर मम्मी ने टोका --" बेटा यह किस की किताब है और तुम इस किताब में से पन्ने क्यों फाड़ रहे हो ?'
 "मम्मी यह स्कूल के पुस्तकालय  किताब है, कल इसे पुस्तकालय को लौटाना है और मुझे इस में से डिवेट के लिए कुछ सामग्री चाहिए पर अब पढ़ने का समय नहीं है ।'
  "सामग्री चाहिए तो ये इतनी सारी जीरोक्स की दुकाने हैं , किताब ले जा कर उन पन्नों की जीरोक्स करा लाओ । '
 "अरे मम्मी देखो न बाहर पानी बरसने को है और मेरा मन अभी बाहर जाने को नहीं है।'
 'देखों बेटा यह बहुत गलत बात है ।पुस्तकालय का मतलब है पुस्तकों का घर।स्कूल - कालेज में,गाँव  ,शहर में पुस्तकालय इसी लिए होते हैं कि वहाँ पर विभिन्न विषयों की पुस्तकें एक जगह मिल जाती हैं  ।हमें किसी खास विषय पर कुछ जानकारी चाहिए तो उसके लिए हमें पुस्तकालय से बहुत मदद मिलती है क्यों कि एक एक  जानकारी  प्राप्त करने के लिए पुस्तक खरीदना हरेक के बस की बात नहीं है। जिस विषय पर  किसी  को जानकारी चाहिए ,वह लाइब्रेरी का सहारा लेता है। लाइब्रेरी की पुस्तको की रक्षा करना हर पाठक का फर्ज है।... पन्ने फाड़ने की गल्ती नहीं करनी चाहिए ।'
 "अरे मम्मी एक मेरे न फाड़ने से क्या होगा... बहुत से बच्चे फाड़ते हैं ।कई बार ऐसा हुआ है कि मुझे भी मन चाही सामग्री नहीं मिली ...पन्ने फटे हुए थे ।'
 " और वहीं गलती तुम भी करने जा रहे हो । बेटा यह भी एक तरह की चोरी ही है ।'
  "इसे भी चोरी कहेंगे ?'
 'बिल्कुल यह भी चोरी है ।अब तुम बता रहे थे कि तुम्हारे यहाँ एक बच्चे ने किसी की किताब चुरा ली थी, पकड़े जाने पर उसे सबके सामने सजा दी गई थी  ,इसी तरह यह किताब तुम्हारी नहीं,स्कूल की  है ,चुपके से या चोरी से उसके पन्ने फाड़ना भी चोरी  है ? "
 "हाँ ,आप ठीक कह रही हैं ...थैंक यू मम्मी आपने मुझे एक गलत काम करने से बचा लिया।मैं अभी जाकर इनकी जीरोक्स करा के लाता हूँ।'
 दूसरे दिन सोमेश जब पुस्तकालय में किताब लौटाने गया तो लाइब्रेरी वाले सर दो बच्चों को डाँट रहे थे, उन्होने बच्चो को चुपके से कुछ पन्नें फाड़ते देख लिया था ...उन बच्चों का नाम लिख कर उन पर फाइन लगा दिया गया था ।...सोमेश की किताब भी खोल कर सर ने चैक की थी ।
 सोमेश मन ही मन मम्मी को थैंक्स कह रहा था ।

     
   
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      पवित्रा अग्रवाल

      

                              
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बुधवार, 16 जुलाई 2014

फूलों की चाहत


बाल कहानी

                                   फूलों की चाहत   


                                                                                         पवित्रा अग्रवाल



          
 "दीदी मैं अभी आयी।गुप्ता आन्टी से कुछ फूल माँग कर लाती हूँ।'
 "दिव्या, फूलों का इतनी सुबह क्या करेगी ?'
  "आज मेरी प्रिय टीचर मिस लिली का बर्थ-डे है।उन्हें मैं फूलों का गुलदस्ता भेंट करना चाहती  हूँ। गुप्ता आन्टी का बगीचा बहुत सुन्दर है।उनके यहाँ तरह तरह के फूल हैं।'
 "मैं ने भी देखा है, उनका बगीचा सचमुच बहुत सुन्दर है।जरूर उनके पास माली होगा।'
 "नही दीदी उनके यहाँ कोइ माली नही है,अंकल ,आन्टी बगीचे की देख भाल खुद करते हैं।'
 "जो अपने बगीचे की देख भाल खुद करते हैं,मुझे नही लगता कि उनसे तुम्हे फूल माँगने चाहिये। ऐसे लोगो को अपने पौधों से बच्चों की तरह प्यार होता है।...जब तुमने पहले से सोच रखा था कि मिस को गुलदस्ता भेंट करना है तो उसका इंतजाम करके रखना चाहिये था..बाजार में क्या नही मिलता ?'
 "बाजार मे तो बुके बहुत मंहगा मिलता है दीदी।मैं कोइ रोज तो माँगती नही हूँ,आज पहली बार लेने जा रही हूँ। आन्टी बहुत अच्छी हैं...आप देखना वह मना नही करेगी,मुझे बहुत प्यार करती हैं।'
 "हो सकता है वह दे दें । उनकी जगह मै होती तो एक दो फूल शायद दे भी देती पर गुलदस्ते के लिये तो मना कर देती।'
 "दीदी एक बात बताइये हम फूल नही तोड़ेगे तब भी वह पेड़ पर रहने वाले तो हैं नही, एक दो दिन मे मुर्झा कर खुद गिर जायेंगे।...यदि किसी के काम आजाये तो अच्छा है न। बाजार मे इतने फूल बिकते है वह भी तो किसी के बगीचों से ही आते होंगे ?'
 "बाजार मे बिकने वाले फूल शौकिया बगीचा रखने वालों के बगीचे से नही आते।..बाजार में बिकने के लिये फूल उगाना अपने आप मे एक अलग व्यवसाय है,उनकी बाकायदा खेती की जाती है लेकिन जो अपने घर के बगीचे की देखभाल के लिये अपना पसीना बहाते हैं वह बड़ी बेसब्री से पौधों पर कलियाँ आने का इंतजार करते हैं फिर उनको खिलते हुये देखने का भी।...इतनी मेहनत वह इसलिये तो नहीं करते कि फूल तोड़-तोड़ कर बाट दें।'
 "शायद आप ठीक कह रहीं हैं दीदी,मैं ने इतनी गहरायी से सोचा ही नही था लेकिन अब इतना समय नही है कि बाजार से फूल ला सकूँ यदि आन्टी ने दे दिया तो बस एक गुलाब का फूल लाऊँगी।'
 दिव्या गुप्ता आन्टी के घर पहुँची तो उसने आन्टी को बगीचे के गेट पर दो बच्चों से बात करते हुये खड़ा पाया।उन के चेहरे पर कुछ उदासी छायी थी।तभी आन्टी  का स्वर उसके कान मे पड़ा-"सॉरी बच्चों मैं फूल नही दे सकती ।पूजा के लिये चाहिये तो भी आपको बाजार जाना चाहिये था।'
 "आन्टी प्लीज बस दो-तीन दे दीजिये न।' 
 उन के चेहरे पर तनिक गुस्सा छा गया था - "इतनी देर से समझा रही हूँ फिर भी नही समझ रहे,अब जाओ यहाँ से।'
 तभी आन्टी की नजर दिव्या पर पड़ी । वह बोली - "देखों दिव्या इन फूल माँगने वालो से मैं परेशान हो गई हूँ, रोज कोइ न कोइ फूल माँगने चला आता है । सबको एक-एक, दो-दो भी देने लगूँ तो मेरे बगीचे में एक भी फूल नही बचेगा।किसी को घर में पूजा के लिये फूल चाहिये तो किसी को मंदिर मे चढ़ाने के लिये,किसी को जन्म दिन के लिये चाहिये तो किसी को अपने लाड़लों की माँग पूरी करने के लिये।...तंग हो गइ हूँ मैं।पहले तो मुझे पता ही नही चलता था और फूल गायब हो जाते थे।अब मै ने  सरकाने वाला गेट लगवाया है जिसे बच्चे आसानी से नही खोल पाते तो बैल बजा-बजा के मुसीबत किये रहते हैं,समझ मे नही आता क्या करूँ ?'
 आन्टी की परेशानी दिव्या समझ रही थी।उसने कहा-"आन्टी एक काम और कर के देखिये।आप गेट पर एक बोर्ड यह लिख कर लगवा दीजिये कि यहाँ फूल तोडना और माँगना दोनो सख्त मना है।...मैं समझती हूँ माँगने वालो की सख्या मे कमी जरूर आयेगी।'
 "ठीक है बेटा यह उपाय भी करके देखती हूँ।'
 लौटते समय दिव्या इस बात से बहुत खुश थी कि वह फूल माँगने की गलती करने से बच गयी थी। उसे अहसास हो गया था कि फूलों की चाहत को माँग कर नही खरीद कर पूरा करना चाहिये     
 

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-पवित्रा अग्रवाल
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मेरे ब्लोग्स  

शनिवार, 7 जून 2014

बरफ का गोला


बाल कहानी  

                           बरफ का गोला                                                

                                                                पवित्रा अग्रवाल

        स्कूल के गेट से बाहर निकलते ही रंजीता की नजर ठेले पर बिक रहे बर्फ के रंग बिरंगे गोलों पर पड़ी ।गर्मी से बेहाल रंजीता का दिल भी उसे खाने को मचल उठा। उसने अपनी सहेली विपमा से कहा देख लड़कियाँ कैसे चुसकी ले ले कर बर्फ के गोले खा रही हैं ,चल आज अपन भी खाते हैं।'
       "ना बाबा मैं इनको नहीं खाने वाली ।मम्मी ने मुझे कभी नहीं खाने दिया पर एक बार ऐसे ही स्कूल से निकलते हुए मैं ने भी खूब चुस्की ले ले कर इसे खाया था और मैं बीमार पड़ गई थी। कई दिन मुँह से आवाज नहीं निकली थी, तब से मैं ने तोबा कर ली कि इसे कभी नहीं खाना है।'
       "तुम देखो रोज कितने बच्चें इसे खाते हैं और वास्तव में सबसे ज्यादा भीड़ भी इसी के ठेले पर रहती है,वह तो बीमार नहीं पड़ते । तू किसी और वजह से बीमार पड़ी होगी ।'
      "रंजीता सोचने की कई बातें हैं, इसे  खा कर कितने बीमार पड़ते हैं हमें कैसे पता लगेगा ? गला खराब होना, खाँसी जुकाम होना तो अब आम बीमारी बन गई है। तकलीफ हुई और दवा खाली लेकिन हम में से बहुत से यह जानने की कोशिश नहीं करते कि इस के पीछे कहीं हमारे खान पान की आदतें तो नहीं हैं। जब मैं बीमार हुई तो मम्मी डाक्टर के ले गई थीं। डाक्टर ने सब से पहले यही पूछा कि तुमने आइसक्रीम, बाहर का जूस आदि पिया था क्या ?'
     "मुझसे पहले मम्मी ने कहा "हमारे बच्चे बाहर इस तरह की चीजें नहीं खाते पीते हैं' तब मुझे ध्यान आया कि मैं ने कल बर्फ का गोला खाया था।
     "फिर तूने मम्मी को बताया ?'
 "हाँ मैं ने डाक्टर साहब के सामने ही यह बात स्वीकार करली ।मम्मी को बुरा तो लगा पर वह मेरे सच बोलने पर खुश भी हुई ।'
 "बस आपकी इस तकलीफ का कारण यही बर्फ का गोला है' डाक्टर अंकल ने कहा था
 "पर वहाँ तो बहुत बच्चे इसे खाते हैं ।'
 "उनको भी कुछ हुआ या नहीं आपको कैसे पता चलेगा ।.. जो भी माता पिता अपने बच्चों को जुकाम, खॉसी, गले में दर्द  की तकलीफ ले कर यहाँ आते हैं मैं सब से पहले यही प्रश्न पूछता हूँ और अधिकतर मामलों में रोड साइड स्टालों से इस तरह की चीज खाना उनके इंफैक्शन का कारण होता है।'
 "वह लोग सफाई से नहीं बनाते इस लिए ?'
 "हाँ वह भी एक कारण हो सकता है पर तुम लोगों को इस सब से बचना चाहिए, खास कर ठण्डी चीजों से जैसे बरफ के गोले, आइसक्रीम  ,आदि में यह खतरा ज्यादा होता है ?
 मैं ने पूछा था -"ऐसा क्यों डाक्टर अंकल ?'
  "बेटा आपके घर में पानी साफ करने के लिए कोई प्यूरीफायर  है ?'
 "हाँ है और हम तो स्कूल भी अपना पानी ले कर जाते हैं।'
 " ये बर्फ का गोला बेचने वालों की बर्फ साघारण पानी की होती है ,उसमें भी वह रंग बिरंगे सिरप डाल कर उसे और हानिकारक बना देते हैं। ये सिरप अपने रंगों के कारण सब को अपनी तरफ आकर्षित तो करते हैं पर यही बीमारी की जड़ हैं। ये सब से सस्ते वाले रंगों का यह प्रयोग करते हैं । किसी पर यह जल्दी ही असर दिखाते हैं किसी पर धीरे धीरे केंन्सर आदि बीमारी के रूप में गम्भीर असर दिखाते हैं ।'
 "बस रंजीता उस दिन के बाद से मैं इन ठेलों आदि से कुछ नहीं खाती ।'
 "धन्यवाद विपमा आगे से मैं भी इन बातों का घ्यान रखूँगी ।'

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-पवित्रा अग्रवाल
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गुरुवार, 1 मई 2014

बुरखे वाला लड़का

बाल कहानी                 
                                    बुरखे वाला लड़का                  

                                                                              पवित्रा अगवाल

       सिनेमा हाल के मैनेजेर ने पुलिस जीप रुकते ही उनकी अगवानी की और कहा-- "सर मैं यहाँ का मैनेजर हूं, मैं ने ही आपको फोन किया था।'
      "ओ के, कहाँ है वह लड़का जिसे आपने में बुर्खे में पकड़ा है... किस उम्र का होगा ?"
      "सर जो बुर्खे में था वह तेरह चौदह वर्ष से ज्यादा का नहीं लगता ...साथ में उसका एक साथी भी  था,वह सतरह अठारह वर्ष का होगा ।हमने दोनो को पकड़ लिया है ।'
     "  ओ के , वैल डन ...कहाँ है वे दोनो ?"
       "हमारे आफिस में हैं सर ।'
 पुलिस को आता देख कर दोनों लड़के भय से काँपने लगे थे - "हमने कुछ नहीं किया सर ।'
 "वह सब तो बाद में पता चलेगा।पहले अपने अपने नाम बताओ ।'
       छोटा लड़का बोला - सर मेरा नाम यूनुस है और इसका नाम कमाल है।यही पिक्चर का लालच देकर  मुझे  यहाँ लाया था ।'
 "सच सच बताओ तुम इस बच्चें को बुर्खा पहना कर क्यो लाए थे ,तुम्हें किस ने भेजा था और तुम क्या करना चाहते थे ?'
 "सच मानिए सर यह सिर्फ एक मजाक था ,हम यहाँ कुछ भी गलत नहीं करना चाहते थे ।'
    दोनो लड़कों को दो दो थप्पड़ मारते हुए इंसपैक्टर ने दोनो सिपाहियों से कहा ये यों आसानी से कुबूल करने वाले नहीं है। इन सालों को जीप में डाल कर थाने ले चलो, वहीं सच उगलवायेंगे ।'
       दोनो लड़के पैर छू छू कर माफी माँग रहे थे और  छोड़ देने की विनती कर रहे थे।उन्हें पुलिस स्टेशन लेजाया गया।
    तलाशी में उनके पास से कुछ आपत्तिजनक सामान नहीं मिला था, उनसे पूछताछ जारी थी   नाम, पता, पिता का नाम, पिता का व्यवसाय, स्कूल -कालेज की जानकारी इकट्ठी की गई। तुम्हे यहाँ किसने भेजा ....किस उद्देश्य से आए थे बहुत सारे सवाल थे । अनुमान था कि यह जरूर किसी गलत इरादे से सिनेमा हाल गए थे.. हो सकता हैं  कोई आतंकी साजिश रची जा रही हो जिसमें इन लड़कों  को मोहरा बनाया जा रहा हो ।
     बच्चों से नंबर लेकर उनके घर वालों को पुलिस स्टेशन आने को कहा गया , लडको की पिटाई भी हुई पर वह कुछ बता नहीं पाए।कमाल जो दूसरे लड़के को बुर्खे में लाया था  वह बस एक ही बात कहे जा रहा था कि मैं ने अपने दोस्तों को बेवकूफ बनाने के लिए यह नाटक किया था ,यह सब मजाक था और मजाक के सिवाय कुछ नहीं था ।'
      "तुम्हारे साथ तो कोई दोस्त नहीं पकड़ा गया तुम किन्हें बेवकूफ बनाना चाहते थे ?'
     "सर हमें पकड़े जाते देख वह भाग गए ,शायद वे डर गए होंगे ।'
    "तुम्हारे साथ कितने दोस्त थे ?
     "सर हमे छोड़ कर तीन और थे ।'
     "उनके नाम और मोबाइल नंबर दो ।'
 यूनुस और कमाल के पिता और भाई आदि थाने आ गए थे । सब परेशान थे कि यह क्या किया इन लड़कों ने ।आजकल आतंकवाद के चलते वैसे ही शहर में बहुत सख्ती बरती जा रही है और यह लड़के ऐसा कारनामा कर बैठे।खुदा जाने अब क्या होगा। इनकी तो जिन्दगी बरबाद हो जाएगी ।
    पुलिस उनके तीनों दोस्तों को फोन कर रही थी पर सबके स्विच आफ आ रहे थे ।
   पुलिस ने यूनुस और कमाल को जीप में बैठाया और उन लड़को के घर की तरफ चल दिए । एक लड़का तो घर पर मिल गया पुलिस उसे उठा लाई ।दो लड़के तलाशी लेने पर भी घर में नहीं मिले तो घरवालों से कहा उन को लेकर तुरन्त थाने पहुँचो वरना  तुम्हें पकड़ लिया जाएगा ।'
      लड़कों के स्कूल जाकर भी जानकारी इकट्ठी की गई ।थोड़ी ही देर में घर वाले उन दोनो लड़को को ले कर थाने पहुँच गए ...पुलिस ने अपनी तरह से उन लड़को से भी अलग अलग पूछताछ की । सब ने करीब करीब एक ही बात कही तो पुलिस को विश्वास हो गया कि लड़के बहुत शरारती हैं पर कोई अपराधी वृत्ति के नहीं हैं पर इस पूरी छानबीन के चलते सबको एक रात जेल में बितानी पड़ी । सब के घर वाले परेशान थे कि केस बन गया तो जाने क्या होगा ,बच्चें निर्दोष भी साबित हुए तो भी पुलिस न जाने कितना धन ऐंठ  लेगी।
    पर पुलिस इंसपैक्टर बहुत समझदार था ,इमानदार भी। पुलिस ने बच्चों को उनकी गल्ती बता कर, धमका कर और उनके माता पिता को चेतावनी देकर उन्हें बिना किसी कानूनी पचड़े में फँसाए छोड़ दिया।
     कमाल से सबने पूछा - "तू इस लड़के को बुर्खा पहना कर क्यों ले गया था ?'
 कमाल ने बताया कि उसके कुछ दोस्तों की गर्ल फ्रेण्ड थीं। वह सब मिल कर मुझे  छेड़ते थे कि तेरी कोई गर्ल फ्रेण्ड क्यों नही है । उस मजाक से बचने के लिए मैंने झूठ कहना शुरू कर दिया कि मेरी भी एक गर्ल फ्रेण्ड है पर उसको अपने साथ लेकर यों घूम नहीं सकता ।
 एक दिन दोस्तों ने कहा तू झूठ बोलता है तेरी कोई गर्ल फ्रेण्ड है ही नहीं या फिर तू जरूरत से ज्यादा डरपोक है।..मुझे भी जोश आगया और मैं इस परिचित बच्चे को सिनेमा दिखाने का लालच देकर बुरखा पहना कर यहाँ ले आया और दोस्तो से कह दिया था कि मेरी दोस्त मुँह नहीं खोलेगी... किसी परिचित ने उसे  देख लिया तो हम दोनो मुसीबत में पड़ जाएंगे ।.... पर इस बड़ी मुसीबत में फँसने का तो अंदाजा भी नहीं था ।'
      "हाँ बरखुरदार जोश में तुम होश खो बैठे थे, खुदा के फजल से बस बच ही गए वरना...
      "हाँ अब्बा इंसपैक्टर अंकल बहुत नेक थे , अब हम कभी ऐसी शरारतें नहीं करेंगे।''
   
 
         पवित्रा अग्रवाल
       
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मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

सोनम की समझदारी

बाल कहानी   

                सोनम की समझदारी  

                                                          पवित्रा अग्रवाल 
 
         गर्मी की छुट्टियों में सोनम दिल्ली से अपने मामा के पास हैदराबाद गई हुई थी। उसके मामा ने वहाँ नई कोठी बनवाई थी। परीक्षाओं की वजह से वह गृहप्रवेश के समय नहीं जा पाई थी। कोठी तो बहुत सुंदर थी लेकिन वहाँ थोड़ा सन्नाटा था। आस पास कोई घर इतनी दूरी पर न था कि पुकारने से आवाज वहां पहुँच जाए।
      मामाजी को ऑफिस के काम से एक सप्ताह के लिए दिल्ली जाना पड़ा। सोनम उसकी मामी व उनके दो छोटे बच्चे घर में रह गए थे। मामी वैसे तो घर में कई बार अकेली रही हैं किंतु तब वह फ्लैट में रहती थीं। वहाँ कोई डर नहीं था। इस नए मकान में आने के बाद यह पहला अवसर था जब मामा जी को कहीं बाहर जाना पड़ रहा था। जाते समय वह भी कुछ परेशान थे। वह हम सबको खूब समझा-बुझा कर गए थे। पुलिस व परिचितों के नंबर भी दे गए थे।
 चार दिन आसानी से कट गए। रोज रात को मामाजी दिल्ली से फोन पर बात कर लेते थे। एक दिन आधी रात को दरवाजे के बाहर कुछ आहट सुन कर मामी की नींद खुल गई। उन्होंने सोनम को भी जगा लिया।
       मामी ने दरवाजे पर लगी "मैजिक आई' में से बाहर देखा तो पाया कि एक आदमी रसोई में लगे एग्जौस्ट फैन को हटाने की कोशिश कर रहा है और दो आदमी उसके पास में खड़े हैं। यदि वह पंखा हट गया तो वह दुबला-पतला आदमी उस रास्ते से रसोई में आराम से प्रवेश पा सकता है बस यही सोच कर मामी ने सबसे पहले रसोई का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया ताकि चोर रसोई से घर के अन्य भाग में न आ पाए।
 मामी ने पुलिस को फोन करना चाहा पर फोन उठाते ही वह घबरा कर बोलीं - "अरे सोनम, फोन तो खराब है। अब क्या होगा ? शोर मचाने से भी कोई फायदा नहीं,सब घर दूर-दूर हैं यहाँ कोई हमारी मदद को नहीं आ पाएगा।'
      सोनम ने इशारे से मामी को चुप रहने को कहा फिर जोर से बोली - "मामी, दूसरा फोन ठीक है। मैं अभी पुलिस को फोन करती हूँ।'
     वह दरवाजे के पास जाकर जोर से ऐसे बोलने लगी जैसे फोन पर बात कर रही हो, "हैलो, पुलिस स्टेशन...हैलो इंस्पेक्टर साहब, मैं जुबली हिल्स रोड, कोठी नंबर 36 से बोल रही हूँ। हमारे घर में चोर घुस आए हैं...आप जल्दी आइए...क्या कहा...आप का पुलिस दस्ता इस क्षेत्र में गश्त लगा रहा है...अच्छा, आप वायरलेस पर सूचना देकर हमारे पास भेज रहे हैं...क्या, पाँच मिनट में पुलिस यहाँ पहुँच  जाएगी ...धन्यवाद अंकल, हमें बहुत डर लग रहा है...मामी, पुलिस पाँच मिनट में यहाँ पहुँच जाएगी।'
    सोनम इतनी जोर से बोल रही थी ताकि बाहर चोरों तक भी उसकी आवाज पहुँच सके।
 तभी बाहर भगदड़ की आवाज सुनाई दी, फिर एक कार स्टार्ट करने की आवाज आई।
 "मामी, लगता है चोर पूरी तैयारी के साथ कार लेकर आए थे...लेकिन पुलिस के डर से भाग गए।'
 "अरे सोनम, तू तो बहुत समझदार निकली। फोन कर ने की एÏक्टग कर के ही चोरों को भगा दिया...यह विचार तेरे दिमाग में आया कहाँ से ?... डर के मारे मेरे तो हाथ-पाँव फूल गए थे।'
 "अरे मामी, मैं दिल्ली की लड़की हूँ। इतनी आसानी से हिम्मत नहीं हारती।'
 मामी ने स्नेह से उसे अपने सीने से लगा लिया।
    दूसरे दिन पड़ौसियो ने पुलिस में रिपोर्ट कराई।पुलिस को जब सोनम की समझदारी का पता चला तो वह भी दंग रह गई।
 जब सोनम के माता-पिता को उसकी सूझबूझ का पता चला तो वे बेहद प्रसन्न हुए। दिल्ली से लौट कर मामा ने उसे शाबाशी देते हुए एक डिजिटल डायरी इनाम में दी।

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 -पवित्रा अग्रवाल

 मेरे ब्लॉग्स --

रविवार, 2 मार्च 2014

एक मोहल्ला, एक ही होली

बाल कहानी                            


               एक मोहल्ला, एक ही होली  

                                                                             पवित्रा अग्रवाल 

 
 म. रमेश राव के पिता आठ महीने पहले ही हैदराबाद से ट्रांसफर होकर उत्तर प्रदेश के इस शहर में आए थे। होली का त्यौहार आने वाला था। रमेश राव कुछ ज्यादा ही उत्साहित था। हैदराबाद में होली इतने धूमधाम से नहीं मनाई जाती, जितने उत्साह से उत्तर प्रदेश में मनाई जाती है। वहाँ तो रमेश ने कभी होली जलते हुए भी नहीं देखी थी।
 उसके मोहल्ले के सभी मित्रों ने पंद्रह दिन पहले से होली की तैयारी शुरू कर दीं। सबने नए कपड़े खरीदे थे। होली के तीन-चार दिन पहले से सबके घरों में तरह-तरह की मिठाइयाँ और पकवान बनने प्रारंभ हो गए थे। मोहल्ले के सभी बच्चे घर-घर जाकर होली के लिए चंदा इकट्ठा करने में लगे थे। कभी-कभी रमेश भी उनके साथ चला जाता था। कम चंदा दिए जाने पर सब अधिक देने के लिए आग्रह करते थे, "अरे अंकल इतने कम से काम नहीं चलेगा। लकड़ी के भाव तो देखिए। कितनी महँगी हो गई है।'
 फिर सभी मिलकर रमेश राव के घर भी गए। रमेश के माता-पिता ने बच्चों को बहुत प्यार से नाश्ता करवाया लेकिन चंदा माँगने पर रमेश के पापा ने साफ मना कर दिया।
उन्होंने पूछा- "बच्चों यह तो बताओ इस मोहल्ले में कितनी जगह होली जलाई जाती है ? सुबह से पाँच-छह ग्रुप  चंदा माँगने आ चुके हैं।'
 "अंकल एक तो मोहल्ले की बड़ी होली जलती है, जो बहुत वर्षों से जलती आ रही है। अब लोग
अपनी-अपनी गली और फ्लैट्स के अपार्टमेंट में अलग-अलग भी जलाने लगे हैं।'
 "यह तो गलत है न। होली में लकड़ी जलाई जाती है और लकड़ी के लिए जंगल काटने पड़ते हैं। जितनी ज्यादा संख्या में होली जलाई जाएगी। उतनी ही ज्यादा लकड़ी भी जलेगी।....एक मोहल्ले में एक से ज्यादा होली नहीं जलाई जानी चाहिए। गरीबों को खाना बनाने के लिए लकड़ी नहीं मिल पाती क्योंकि बहुत महँगी है और यहाँ होली जलाने के नाम पर देश में लाखों टन लकड़ी मिनटों में जला कर राख कर दी जाती है।...इस लकड़ी के जलाए जाने से हमारा-तुम्हारा, समाज का, देश का कोई लाभ नहीं होता बल्कि नुकसान ही होता है।...देश की हालत देखते हुए मैं इस तरह लकड़ी जलाए जाने के सख्त खिलाफ हूँ। हमें तो पेड़ों की, जंगलों की रक्षा करनी चाहिए।...बोलो बच्चों क्या मैं गलत कह रहा हूँ ?'
  'आप ठीक कह रहे है अंकल ।'
   "बच्चों होली का मुख्य उद्देश्य आपसी बैर भाव भूल कर दोस्ती, सद्भाव बढ़ाना होना चाहिए। हाँ यदि तुम लोग यह चंदा किसी जरूरतमंद की मदद करने या किसी अच्छे काम के लिए माँगते तो मैं सबसे पहले देता।'
 रमेश राव के दोस्त बिना चंदा पाए लौट गए। रमेश राव बहुत उदास था। उसके दोस्त पापा के विषय में क्या सोचेंगे। पापा को ऐसा नहीं करना चाहिए था।
 दूसरे दिन रमेश अपनी पाकेट मनी के बचाए गए रुपयों में से पचास रुपये अपने दोस्तों को देने गया और अपने पापा के चंदा न दिए जाने की बात पर उनसे क्षमा माँगी।
 उसके दोस्तों में से मयंक बोला, "रमेश तुम्हारे घर से लौटते समय हम सचमुच दुखी और अपमानित महसूस कर रहे थे किंतु जब हमने शांत मन से तुम्हारे पापा की कही गई बातों पर विचार किया तो हमें लगा कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं कहा। हमने उस दृष्टि से कभी सोचा ही नहीं था। एक तरफ तो हम जंगल बचाओ, पेड़ लगाओ की बात करते हैं, दूसरी तरफ इस तरह सैकड़ों टन लकड़ी व्यर्थ जला डालते हैं।...इस वर्ष हम एक शुरुआत तो कर ही सकते हैं कि अपनी गली में अलग-अलग होली नहीं जलाएँगे।  जो रुपये हमने जमा किए हैं
उनसे गरीब बस्ती के उन नंग-धड़ंग बच्चों को वस्त्र देकर आएँगे, जिन्हें पुराने वस्त्र भी नसीब नहीं हैं। क्या आप सबको मेरा सुझाव मंजूर है ?'
 सबने स्वीकृति में गर्दन हिला दी। रमेश भी अब अपने पिता से नाराज नहीं था।



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-पवित्रा अग्रवाल
 

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शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

दंड या पुरस्कार


   बाल  कहानी 

   दंड या पुरस्कार   

 
                              पवित्रा अग्रवाल 
         
       क्ला स से बाहर आते ही दीपक ने पूछा-"अतुल, चोर-सिपाही खेलेगा ?'    
    "नहीं यार, अभी मन नहीं है।'
    "अच्छा मत खेल, हम तो दिनेश के साथ खेलेंगे।...अरे यार...जरा मुड़ कर हमारी तरफ भी देख लो, इतने बुरे तो हम नहीं हैं। खेलने को ही कह रहे हैं, तुमसे कुछ माँग तो नहीं रहे हैं ? लेकिन एक बात साफ है, चोर तुम्हें ही बनना पड़ेगा, हम तो सिपाही बनेंगे।'
     दिनेश बिना किसी तरफ देखे चुपचाप क्लास में चला गया। अतुल ने दीपक को जा घेरा, "क्यों यार, कल कोई खास बात हो गई क्या ? दिनेश को ऐसे क्यों चिढ़ा रहे हो ?'
    "तुझे नहीं मालूम ? अच्छा, कल तू टिफिन के बाद ही घर  चला गया था, यह उसके बाद की बात है। मेरी हिंदी की किताब चोरी हो गई थी। सबसे पूछा, किसी ने नहीं बताया। सर ने क्लास के सभी लड़कों को कमरे से बाहर खड़ा कर दिया और हरेक के बस्ते की तलाशी ली गई। किताब दिनेश के बस्ते से निकली। तभी सर ने उसको तीन-चार छड़ी मारी और चोर की टोपी पहना कर स्कूल में घुमाया।'
     अतुल के चेहरे पर मुस्कान खेल गई, "बहुत अच्छा हुआ, बनता भी बहुत होशियार था।'

  "दिनेश, जरा बस्ता दिखाना, मेरी एक कॉपी नहीं मिल रही।' एक लड़के के यह पूछते ही क्लास के सब लड़के उसके चारों तरफ घिर आए। एक-एक चीज बस्ते से अलग निकाल कर देखी गई किंतु कॉपी नहीं मिली।
   तभी दूसरा लड़का बोला- "ली भी होगी तो पिटने के लिए बस्ते में थोड़े ही रखेगा...छिपा दी होगी कहीं।'
   क्लास में कोई सर नहीं थे। मेज पर डस्टर की चोट करते हुए एक लड़का बोला - "भाइयों, काले-पीले रंग की धारियों वाला मेरा पेन खो गया है। चोरी करना बहुत बुरी बात है.. जिसने भी लिया हो, वह अपने आप बता दे।'
 सबकी निगाहें दिनेश की तरफ हो गई। वह अपना बस्ता क्लास में छोड़कर बाहर निकल गया।

  "क्या बात है दिनेश, तुमने पढ़ाई में ढ़ील डाल दी है। इस महीने तुम्हारे नंबर हर विषय में कम आए हैं। कोई दिक्कत हो तो बताओ हमें लेकिन पढ़ाई में मत पिछड़ो।' सर ने कहा।
 पीछे से कोई फुसफुसाया- "अब पढ़ाई से हट कर ध्यान चोरी में लग गया है। पढ़ने को समय ही कहाँ मिलता है ?'
 दिनेश की आँखें भर आर्इं और टप टप आँसू टपकने लगे। तभी टन-टन-टन स्कूल की घंटी बजी। सर क्लास से बाहर चले गए।
 अतुल को दिनेश पर बहुत दया आई- "दिनेश रोते क्यों हो ? सर की बात का बुरा मत मानना, तुम्हारी तो हमेशा तारीफ करते थे। इस परीक्षा में तुम्हारे कम नंबर देख कर उन्हें दुख हुआ है।'
    फिर अतुल टिफिन खोल कर उसके सामने बैठ गया- "आओ दिनेश, खाना खाएँगे।'
 "नहीं अतुल, मुझे भूख नहीं है। मैं घर से खाकर आता हूँ।'
 "तुम्हें खाना होगा, जितनी भूख हो उतना ही खा लो।'

 "यार, "चोरी मेरा काम' फिल्म लगी है, देखने जाएँगे।'
 "नहीं यार, चोरी मेरा काम नहीं है, मैं तो नहीं जाऊँगा। जिसका काम हो वह जाए।'
 "फिर तो दिनेश को जाना चाहए।'
 "वो देखकर क्या करेगा..यह काम तो उसे आता है।' सब बच्चे हँसने लगे।
 इस तरह बच्चे रोज क्लास में दिनेश को जलील करते थे। अतुल यह सब सहन नहीं कर पाया- "यह तुम लोगों की क्या तमीज है ? शर्म नहीं आती किसी का मजाक उड़ाते ?'
 "अतुल, तू दिनेश की तरफदारी क्यों कर रहा है ? क्या उसने कुछ खिला दिया है ?'
 "खिलाने को रखा क्या है, उसके पास ? अपने खाने को तो है नहीं- ' दीपक ने अपना वाक्य जोड़ा।
 "दीपक, बस बहुत हो चुका.. अब चुप हो जाओ वर्ना अच्छा नहीं होगा। किसी गरीब का मजाक उड़ाना अच्छी बात नहीं है ।'
     तभी प्रार्थना की घंटी बजी और सब लाइन में लगने लगे।

 "मैं कल ही नया कलर बॉक्स लाया था। उसमें से चार-पाँच रंग की ट्यूब  गायब हैं, दिनेश अपना बस्ता दिखाओ' मोहन ने अकड़ कर कहा।
    "बस्ते में न मिलें, तो इसके कपड़े झाड़ना'-दूसरे ने सुझाव दिया।
 रोज रोज के इस तमाशे दिनेश तंग हो गया था..उसे भी गुस्सा आ गया --"मेरे पास नहीं हैं। न मैं बस्ता दिखाऊँगा और न कपड़े झाड़ने दूँगा।'
      "दिखाओगे कैसे नहीं ? तुम्हें दिखाना पड़ेगा।' बस्ता छीनते हुए मोहन ने कहा।
 दिनेश ने ज़बरदस्ती करते मोहन को पीछे धकेल दिया।
    "चोर, पहले चोरी करता है, फिर अकड़ता भी है।' मोहन अपनी नेकर की धूल झाड़ता दिनेश पर पुनः झपटा... उसे जमीन पर पटक कर उस पर चढ़ बैठा और उस पर तड़ातड़ चाँटे व मुक्के भी बरसाने लगा। दिनेश के होंठ से खून बहने लगा था ।
    अतुल से यह सब देखा नहीं गया। अब उसका धैर्य समाप्त हो चुका था। उसका मन उसे बार-बार कचोटता था। दिनेश की इस दशा के लिए कई दिन से वह स्वयं को दोषी मान रहा था। उसने कई बार सोचा दिनेश को सब कुछ बता दे और उससे माफी माँग ले लेकिन इससे क्या फर्क पड़ेगा ? लड़के तो उसे चोर मानते ही रहेंगे। उसने यह बात कई बार अपने सर को भी बताने की सोची किंतु बदले में मिलने वाली सजा की याद आते ही उसका साहस जवाब दे जाता था ।
     लेकिन आज वह हर सजा भोगने को तैयार था। वह अपनी क्लास के शिक्षक के पास पहुँच गया। उस समय वह कमरे में अकेले ही थे।
  "सर आप से कुछ कहना है"
  "कहो क्या बात है ?"
    "सर, कुछ दिनों पहले मुझसे एक गलती हो गई थी, जो किसी को भी नहीं पता है किंतु अब मैं स्वयं ही बता रहा हूँ। मैं यह भी जानता हूँ कि उसके लिए मुझे कड़ी सजा मिलेगी।'
    "क्या गलती हो गई थी, यह तो बताओ ?'
    "सर डेढ़-दो महीने पहले एक किताब चुराने की वजह से दिनेश को शर्मा सर ने मारा था और चोर की टोपी पहना कर स्कूल में घुमाया था....लेकिन सर दिनेश गरीब जरूर है पर चोर नहीं है। उसने चोरी नहीं की थी, वह सब मेरी शरारत थी। ....
    मैं ने दीपक की किताब निकाल कर दिनेश के बस्ते में रखी थी लेकिन अब सब लड़के चोर-चोर कह कर  रोज उसका अपमान करते हैं। इसी झगड़े में आज दिनेश को खून भी निकल आया है।' कहते-कहते अतुल रोने लगा।
         जोशी जी अचंभे में पड़े उसे देख रहे थे -- "अतुल यह तो बहुत बुरा हुआ। एक बार दोषी भले ही सजा से बच जाए किंतु निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए। तभी दिनेश इतना चुप चुप और उदास रहता है। इसी वजह से शायद वह ढंग से पढ़ भी नहीं पाता होगा। इस बार उसके नंबर भी कम आए हैं लेकिन तुमने ऐसा क्यों किया ? इससे तुम्हें क्या मिला ?'
      "सर, मुझे उससे बहुत चिढ़ हो गई थी। लगभग सब मेरी उससे तुलना करते हुए कहा करते थे कि मैं बारहों महीने घर पर भी मास्टर से पढ़ता हूँ, पढ़ने की हर सुविधा मुझे प्राप्त है फिर भी हर परीक्षा में कम अंक लाता हूँ। एक दिनेश है जिसके पास पढ़ने को पूरी पुस्तकें भी नहीं हैं फिर भी वह कितने अच्छे नंबर लाता है.. मेरे लिए शर्म की बात है।'
         अत: उसे अपमानित करने के लिए ही मैंने ये शरारत की थी जो आज तक किसी दूसरे को नहीं पता। दिनेश को सजा मिलने की बात सुन कर भी मैं बहुत खुश हुआ था किंतु अब मेरा मन मुझे रोज धिक्कारता है।'
      "तुमने यह बात मुझे बता कर बहुत अच्छा किया। प्रिंसीपल साहब तथा शर्मा जी को इसका पता चला तो तुम्हें सख्त सजा दिये बिना वे नहीं मानेंगे। पर दिनेश को निर्दोष साबित करने के लिए मुझे यह सब बातें उन्हें बतानी होंगी। बिना बताए काम नहीं चलेगा। अच्छा, अब तुम क्लास में जाओ।'
       अतुल अब यह सोच कर दुखी था कि उसे सब लड़कों के सामने मार पड़ेगी फिर सब लड़के रोज चिढ़ाया करेंगे। उसका मन किसी काम में नहीं लग रहा था। सारे समय उसे यही लगता रहा कि प्रिंसीपल साहब का बुलावा अब आया, बस अब आया।
      छुट्टी की घंटी बजते ही बस्ता उठाकर वह सबसे पहले स्कूल से बाहर निकल गया कि कहीं कोई रोक न ले।

     दूसरे दिन प्रार्थना सभा में प्रार्थना के बाद जोशी जी आगे आए और बोले- "दिनेश यहाँ आओ। बच्चों, तुम्हें याद होगा कि कुछ दिन पूर्व कक्षा आठ के दिनेश को चोरी करने के अपराध में सजा दी गई थी लेकिन अब हमें ज्ञात हुआ है कि दिनेश ने चोरी नहीं की थी। उसे व्यर्थ की सजा मिली। इसका हमें बहुत ही दुख है। दिनेश ने किताब नहीं चुराई थी बल्कि शरारत वश एक लड़के ने किसी की किताब निकाल कर उसके बस्ते में रख दी थी। वह लड़का बहुत शर्मिंदा है और उसने स्वयं ही हमें यह बात बताई है।'
    "सर उसका नाम बताइए। उसे कड़ी से कड़ी सजा दीजिए।' लड़कों के समूह में से आवाजें उभरीं।
    डर से अतुल के पैर काँपने लगे।
 "हाँ, यदि तुम लोगों की इच्छा होगी तो उसे सजा अवश्य दी जाएगी। सजा पाने के लिए वह तैयार है। दिनेश, उसका नाम तो तुम भी जानना     चाहोगे ?'
    दिनेश भौंचक्का-सा आँखें फाड़ कर यह सब देख-सुन रहा था, कुछ सोचकर बोला- "नहीं सर, मैं नाम जान कर क्या करूँगा ? कुछ देर से ही सही किंतु उस लड़के ने निश्चय ही मन से अपनी गलती महसूस की है तभी सजा की चिंता किए बिना उसने स्वयं ही यह सब बता दिया वर्ना आप सबको कैसे पता चलता कि मैं निर्दोष हूँ। वह जो भी है, मैं उसके प्रति आभारी हूँ कि उसने सच बोलने का साहस किया वर्ना मैं इस झूठे आरोप से इतना दुखी हो चुका था कि किसी दिन स्कूल आना बंद करके हमेशा के लिए पढ़ाई छोड़ देता। इस समय उसे दंड नहीं बल्कि सच बोलने का पुरस्कार मिलना चाहिए। मेरी प्रार्थना है कि उसे आप कोई दंड न दें और उसका नाम भी न बतायें ।'
    शर्माजी ने आगे बढ़ कर स्नेह से दिनेश की पीठ थपथपाई - "बहुत प्रतिभाशाली लड़का है। मैंने उस दिन इसकी बातों पर विश्वास  नहीं किया था , व्यर्थ ही सजा दी। बेटे, तुम्हें मेरे विषय में कभी कोई दिक्कत महसूस हो तो नि:संकोच स्कूल में या घर पर मेरे पास आ सकते हो।'
      स्कूल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा था । आठवें क्लास के छात्र समस्त अनुशासन भूल कर हर्ष मिश्रित ध्वनियाँ करते दिनेश की तरफ दौड़े। उससे पूर्व ही आगे बढ़ कर अतुल ने दिनेश को गले से लगा लिया था।


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-पवित्रा अग्रवाल
 
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बुधवार, 1 जनवरी 2014

पंतग लूटने का मजा

बाल कहानी 


   पंतग लूटने का मजा  

                                      पवित्रा अग्रवाल 
 
 "देबू आज तो स्कूल की छुट्टी हो गई है,मेरे घर चल पतंग उड़ायेंगे' --सुमित ने कहा
 "अरे यार अभी तो संक्रान्ति को आने में बहुत दिन हैं...इतने दिन पहले नहीं, वैसे भी अभी तो आसमान में  एक भी पतंग उड़ती नहीं दिखाई दे रही।'
 "शुरुआत हम ही करते हैं,तू देखना एक पतंग उड़ते अनेक पतंगें उड़ने लगेंगी।'
 "सुमित, क्या बाजार में पंतग मिलनी शुरू हो गई ?'
 "पता नहीं पर मेरे पास तो पिछले साल की बहुत सी पंतग रखी हैं ।'
 "तेरी मम्मी गुस्सा तो नहीं करेंगी ?'
 "नही मेरी मम्मी कुछ नहीं कहतीं,उन्हें घर -बाहर का काम ही इतना रहता है कि यह सब देखने की फुर्सत उनके पास नहीं है ।
 " अरे वाह सुमित तेरी मम्मी तो बहुत अच्छी हैं...मेरी मम्मी की तो मेरे हर काम पर नजर रहती है। हर समय  टोका टाकी करती रहती हैं कि यह करो यह मत करो ।'
 "असल में मेरी मम्मी नौकरी करती हैं न इसलिये उनके पास यह सब देखने को समय नहीं रहता ।'
 "पहले मेरी मम्मी भी काम करती थीं पर हम लोगों की देख भाल अच्छी तरह हो सके इसलिये काम छोड़ दिया ।'
 "अच्छा...वैसे मेरे पापा भी यही चाहते थे पर मेरी मम्मी काम छोड़ने को तैयार नहीं थीं ...चल छोड़ इन सब बातों को ... पतंग ले कर छत पर चलते हैं ।'
 "ठीक है चलते हैं ।'
 "वैसे देबू मुझे पतंग उड़ाने की तुलना में लूटने में ज्यादा मजा आता है...पतंग लूटने के चक्कर में एक बार तो मैं छत से नीचे गिरते गिरते बचा था।'
 "फिर भी तेरे मम्मी पापा तुझे पतंग उड़ाने देते हैं ?'
 "मैं ने यह बात किसी को नहीं बताई वरना मेरा पतंग उड़ाना बंद हो जाता ।'
 "सुमित ,मेरी मम्मी ने मुझे एक ही शर्त पर पतंग उड़ाने की छूट दी है कि मैं सिर्फ पतंग उड़ाऊं ,कटी पतंग को लूटने की कोशिश बिल्कुल न करूँ ।'
 "फिर तू उनकी आज्ञा का पालन करता है ?'
 "हाí मैं पतंग लूटने उसके पीछे नहीं भागता ।पतंग लूटने के चक्कर में जान जा सकती है।सब से बुरा तो तब होता है कि जान तो जैसे तैसे बच गई पर जिन्दगी भर के लिए अपाहिज हो गए ।असल में मेरे एक चाचा हैं। वह दूसरे शहर में रहते हैं, वो बैसाखी के सहारे चलते हैं ।पापा ने बताया था कि वह बचपन में पतंग लूटने के चक्कर में छत से गिर पड़े थे ।....
 उनकी हालत देख कर मैं ने मम्मी पापा से वायदा किया था कि मैं पतंग लूटने की कोशिश कभी नहीं करूँगा।..पिछले वर्ष अखवार में पढ़ा था कि एक बच्चा छत पर पड़ी लोहे की रौड से कटी पतंग रोकने के कोशिश कर रहा था,रौड हाइ टेंशन वायर से छू गई ।बच्चे की वहीं मौत हो गई थी ।'
 "हाँ पतंग के दिनों में एसी कई दुर्घटनायें हर वर्ष होती हैं...पर दोस्त देबू मैं भी आज तुझ से वादा करता हूँ कि कटी पतंग को पकड़ने की कोशिश कभी नहीं करूँगा।'
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-पवित्रा अग्रवाल