शनिवार, 2 नवंबर 2013

बाल कहानी                           मुकुल की दीपावली
                                                             
                                                                         पवित्रा अग्रवाल
          पापा के स्थानांतरण का समाचार सुन कर मुकुल उदास हो गया था। अब फिर एक नई जगह, नया स्कूल, नये साथी, नये शिक्षक। पता नहीं नई जगह उसका मन लगेगा या नहीं लेकिन जाना तो था ही। अभी वह पाँचवीं क्लास पास कर चुका था। नये स्कूल में दाखिला लेते समय भी वह उत्साहित नहीं था। कक्षा में मुकुल के बराबर की सीट पर सुकेश बैठता था। धीरे-धीरे वह दोनों एक-दूसरे के घनिष्ठ मित्र बन गए और मुकुल की उदासी कहीं गुम होती चली गई।
        सुकेश के घर से स्कूल करीब एक किलोमीटर दूर था। वह पैदल ही स्कूल जाया करता था। रास्ते में मुकुल का घर पड़ता था। सुकेश मुकुल को उसके घर से लेते हुए साथ स्कूल जाता था। दोनों साथ ही लौटते थे। स्कूल में भी साथ ही खेलना, साथ ही खाना।
 दीपावली के चार-पाँच दिन पहले सुकेश ने मुकुल से कहा, "आज स्कूल से लौटते समय कुछ पटाखे, बम आदि लेते हुए घर चलेंगे...तुम्हें चाहिए तो तुम भी खरीद लेना।'
 पटाखों का नाम सुनते ही मुकुल की आँखों में चमक आ गई फिर एकाएक वह उदास हो गया और बोला- "मैं तुम्हारे साथ चलूँगा लेकिन पटाखे नहीं ख़रीदूँगा। हमारे घर दीपावली नहीं मनाई जाती।"
  "अरे दीपावली तो हम हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है। तुम्हारे यहाँ दीपावली क्यों नहीं मनाई जाती ?'
  "पहले हमारे घर में भी दीपावली मनाई जाती थी....करीब सात वर्ष पहले जब मैं चार वर्ष का था तब मेरी बहन की मृत्यु दीपावली के दिन हो गई थी। तब से हमारे घर में दीपावली नहीं मनाई जाती।'
    'अरे यह तो पुरानी बातें हैं इन को अब कौन मानता है,तुम्हारे घर में जरूर तुम्हारे दादा-दादी होंगे इसी लिए तुम्हारे यहाँ दीपावली को खोटा मान लिया गया है।'
 "हमारे दादा-दादी नहीं हैं और हमारे यहाँ इस त्योहार को खोटा भी नहीं माना जाता पर इस दिन मम्मी-पापा  बहुत उदास हो जाते हैं...हमारे एक ही बहन थी...उसकी याद आ जाती है फिर दीपावली मनाने का मन ही नहीं करता।'
 "क्या हुआ था तुम्हारी बहन को ?' सुकेश ने पूछा।
 "मेरी बहन के ह्यदय में छेद था। मुझ से वह दो वर्ष बड़ी थी। दीपावली के दिन अचानक उसकी तबियत खराब हो गई। दीपावली का दिन होने की वजह से डॉक्टर भी समय से नहीं मिल पाए। अस्पताल तक जाते-जाते रास्ते में ही उसकी मृत्यु हो गई थी।"
 मुकुल को सांत्वना देते हुए सुकेश बोला, "यह तो सचमुच बहुत बुरा हुआ, वैसे भी एक बहन तो सब की होनी ही चाहिये ।घर की रौनक बहन से ही होती है... एक बात बताओ, तुम्हारा मन दीपावली मनाने को नहीं करता ?'
 "सच कहूँ सुकेश, दीपावली का न मनाया जाना तो मुझे बुरा नहीं लगता लेकिन अब पटाखे, बम, अनार जलाने को मेरा भी मन करने लगा है।'
 "कोई बात नहीं मुकुल, आज मैं भी पटाखे नहीं ख़रीदूँगा। अपन सीधे घर जाएँगे।'

          
 आज दीपावली थी। सुकेश दोपहर को अचानक मुकुल के घर चला आया और मुकुल की
मम्मी से बोला - "आंटी, मैं मुकुल को अपने घर ले जाना चाहता हूँ। हम साथ-साथ दीपावली मनाएँगे, सुबह उसे वापस भेज दूँगा।'
 "लेकिन बेटे, हम ने बहुत दिन से दीपावली नहीं मनाई।'  आँखें पोंछते हुए मुकुल की मम्मी ने कहा।
      सुकेश कुछ कहता, उससे पहले ही मुकुल के पिताजी बोले - "हाँ रेखा यह सही है कि हमने बहुत दिन से दीपावली नहीं मनाई पर हमारे घर दीपावली मनाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है... तब मुकुल छोटा था और पटाखों से डरता था और हमारा दुख भी ताजा था  इसलिए दीपावली मनाने का मन नहीं करता था ....पर अब मुकुल बड़ा हो रहा है उसका मन भी पटाखे जलाने को करता होगा। यह उम्र हंसने-खेलने की है... मायूस होकर घर में बैठने की नहीं।..इस वर्ष से हम भी दीपावली मनाएँगे।'
      "ठीक है बेटे, तुम्हारे पापा ने इजाजत दे दी है तो कपड़े बदल कर चले जाओ लेकिन पटाखे छोड़ने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना। एक बाल्टी पानी पास में अवश्य रखना ताकि गलती से किसी के कपड़ों में  आग लग जाए तो बुझाई जा सके। लंबी स्टिक से पटाखे को आग लगाना। पटाखों के बंडल को पटाखे जलाने की जगह से दूर रखना....हो सके तो घर के बड़े सदस्यों की देख-रेख में बम, अनार, रॉकेट आदि जलाना।'
    मम्मी ने कुछ रुपये मुकुल को देते हुए कहा - "इन से तुम पटाखे खरीद लाना।'
   " मैं बाजार से मिठाई,दीये और पूजा का सामान लेने जा रहा हूँ...पटाखे खरीद कर तुम दोनों पहले यहाँ दीपावली मनाओ फिर दोस्तों के साथ मनाना।'
 "थैंक्यू मम्मी, थैंक्यू पापा' कहते हुए मुकुल के चेहरे पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गई और वह सुकेश के साथ पटाखे लेने चल पड़ा।

-पवित्रा अग्रवल

 ईमेल - agarwalpavitra78@gmail,com
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