सोमवार, 1 जुलाई 2013

नया विश्वास

बाल कहानी 

                 
    नया विश्वास                                                                        
                                                                    पवित्रा अग्रवाल
 
                रजनी आठवीं कक्षा में पढ़ती थी। कक्षा में वह प्रथम तो कभी नहीं आई किन्तु हमेशा प्रथम दस में रहती थी। नृत्य, नाटक, डिवेट आदि में हमेशा भाग लेती थी और पुरस्कार भी पाती थी। नृत्य का प्रशिक्षण तो वह तीन-चार वर्ष की उम्र से ले रही थी। कत्थक नृत्य में वह प्रवीण हो चुकी थी। नृत्य के कई स्टेज प्रोग्राम दे चुकी थी। पढ़ने में उसकी रुचि  थी।  वह स्नातक की डिग्री तो लेना चाहती थी किन्तु नृत्य व अभिनय को अपना कैरियर बनाना चाहती थी। उसका बाल मन भविष्य के सपने देखने लगा था।
            एक दिन पैदल स्कूल जा रही थी । सड़क पार करते समय वह एक बस से टकरा गई। बस का पहिया उसके पैर पर से उतर गया था। घुटने से नीचे का एक पैर डॉक्टर को काटना पड़ा था।....इस दुर्घटना में उसकी टाँग ही नहीं गई बल्कि सब सपने भी टूट कर बिखर गए थे। माता-पिता के बहुत समझाने पर भी वह स्कूल नहीं जा रही थी। उसने अपने घुँघरू उठा कर खिड़की से बाहर फेंक दिये थे। दिन भर अपने कमरे में उदास सी बैठी रहती थी। स्वभाव से चिड़चिड़ी हो गई थी ।
          उन्हीं दिनों उसके शहर में फिल्मी सितारों का एक ग्रुप आया था जो नृत्य का स्टेज प्रोग्राम देने वाला था। माता-पिता जिद्द करके रजनी को भी उस प्रोग्राम में ले गए।
         एक नृत्यांगना को देख कर वह चहकी- "मम्मी ये तो सुधा चन्द्रन है। ये टी.वी. के बहुत से सीरियल्स में काम कर रही है।'
         पापा ने कहा, "तुम ने सही पहचाना, ये सुधा चन्द्रन ही है। तुम्हें इनका नृत्य कैसा लगा ?'
        "बहुत अच्छा लगा पापा' कह कर वह फिर उदास हो गई। उसे नृत्यांगना व अभिनेत्री बनने का अपना सपना फिर याद आ गया था। उसकी आँखें भर आई। उसके सपने मात्र स्वप्न बन कर ही रह गए थे जो अब कभी पूरे नहीं हो पाएँगे। वह अपाहिज की जिन्दगी जीते हुए यों ही एक दिन दुनिया से चली जाएगी।
          तभी उसे माँ का स्वर सुनाई दिया-- "रजनी क्या सुधा की तरह तुम नृत्य नहीं कर सकती ?'
 रजनी ने लाचारी से एक बार अपनी टाँग को देखा फिर कहा, "मम्मी आप जानती हैं मैं कभी नृत्य नहीं कर सकती फिर भी आप यह प्रश्न पूछ कर क्या मेरा मजाक उड़ा रही हैं ?'
         "कैसी बातें करती हो रजनी ... मैं माँ होकर तुम्हारा मजाक उड़ाऊँगी ? शायद तुम्हे पता नहीं कि इस नृत्यांगना सुधा की भी एक टाँग दुर्घटना में कट गई थी। यह नकली पैर से नृत्य कर रही है यदि यह नृत्य व अभिनय कर सकती है तो तुम क्यों नहीं कर सकती ?'
        ये आप क्या कह रही है माँ, मुझे विश्वास  नहीं होता। बचपन में मैंने एक फिल्म देखी थी उसमें फिल्म की हीरोइन ने नकली पैर से नृत्य किया था....लेकिन वह तो फिल्मों की बातें है।.....वास्तविक जीवन में ये सब कहाँ हो पाता है।"
         "अरे उसकी हीरोइन यही सुधा तो थी। उस फिल्म का नाम था " नाचे मयूरी'...वह फिल्म सुधा के वास्तविक जीवन पर ही बनी थी।....'
       "सच माँ... मुझे ये नहीं मालूम था। ये फिल्म मुझे फिर से दिखाना।...पापा मैं सुधा चन्द्रन से मिलना चाहती हूँ।'
      "ठीक है बेटा मैं उनसे बात करके तुझे मिलवाने की व्यवस्था करता हूँ।'
 प्रोग्राम के बाद में रजनी सुधा के साथ थी।
      सुधा ने संक्षेप में रजनी को अपनी आत्मकथा सुनाई कि किस तरह वह भी निराश हो गई थी। उसके माता-पिता ने जयपुर ले जाकर नकली पैर लगवाया था। धीरे-धीरे डाँस की प्रैक्टिस प्रारंभ की।...
इस बीच कई बार निराशाओं ने घेरा। अंत में मैं ने अपंगता पर विजय पा ली है यह तो तुमने देख ही लिया है।"
         ' जी '
        " रजनी तुम भी निराश मत होना , हिम्मत से काम लो। इच्छा शक्ति को दृढ़ करो। हीनता की भावना को अपने पास भी मत फटकने दो। अपना एक लक्ष्य निर्धारित करो फिर उस दिशा में प्रयास प्रारंभ कर दो सफलता जरूर मिलेगी।'
      ' आपसे मिलकर मुझ में एक नए विश्वास  ने जन्म लिया है। अब मैं जीवन से उतनी निराश नहीं हूँ।'
         रजनी ने पुन: स्कूल जाने का निर्णय कर लिया। जल्दी ही वह पापा-मम्मी के साथ कृत्रिम पैर लगवाने जयपुर जाएगी। उसने निश्चय कर लिया है कि वह भी जीवन में कुछ पा कर रहेगी।

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