शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

बाल कहानी
 
                    बड़ा दान
 
                                                                पवित्रा अग्रवाल

            अंश स्कूल से जब घर लौटा तो उसके घर के सामने पुरुषों की भीड़ लगी थी और कुछ स्त्रियाँ घर के अंदर जा रही थीं।सब के चहरे पर उदासी थी।वह परेशान हुआ कि सुबह तक तो घर में सब कुछ ठीक ठाक था उसके पीछे ऐसा क्या हो गया।क्या कोई एक्सीडेन्ट हो गया।वह भाग कर घर के अंदर पहुँचा तो गैलरी में दादा जी का शव रखा था।दादी व मम्मी पास बैठी रो रही थीं ।
          दादा जी अंश के दादा ही नहीं दोस्त भी थे।वह घर बाहर ,स्कूल ,दोस्तों की सब बातें उन्हे जरूर बताता था।कभी कोई परेशानी हो , कोई दुविधा हो तो दादा जी चुटकियों में हल कर देते थे।दादा जी के शव को देख कर वह सुबकने लगा--"मम्मी दादा जी को अचानक ये क्या हो गया,सुबह तक तो वह बिल्कुल ठीक थे,मुझे स्कूल बस तक छोड़ कर आये थे।'
          मम्मी ने अंश को गले से लगा लिया--"कुछ भी नहीं हुआ था बेटा,दोपहर को दो-ढ़ाई बजे खाना खाकर आराम करने अपने कमरे में चले गये।तभी अचानक उन्होंने अपने सीने में दर्द की शिकायत की, मैं भाग कर सामने वाली क्लीनिक से डा.सिन्हा को बुला कर लाई तब तक उनकी मौत हो चुकी थी।डाक्टर साहब कह रहे थे कि हार्ट फेल हुआ है।'
        वह मम्मी के पास बैठ कर सुबकता रहा।तभी उसे एक बात याद आई और उसने दादी से पूछा -- "दादी दादा जी तो अब जा चुके हैं क्यों न हम उनकी आँखे दान कर दें।'
       "अंश तू ये क्या बेवकूफी की बातें कर रहा है, क्या ऐसा भी कभी होता है ?'
       " हाँ ऐसा होता है दादी। चार पाँच महीने पहले मेरे दोस्त की दादी की मौत हुई थी तो उनकी आँखे दान कर दी गई थीं।उन आँखों से दो नेत्रहीन लोग  इस दुनियाँ को देख पाये ।'
       "नहीं नहीं मैं उनकी लाश की दुर्गति नहीं होने दूँगी ।दान करने के लिए तो आँखें निकालनी पड़ेंगी ।'
       "नहीं दादी पूरी आँख नहीं निकालनी पड़ेगी,आँख का जो काला भाग होता है न जिसे पुतली कहते हैं बस वही निकालनी पड़ेंगी।लेकिन दादी सोचिए यह कितने पुण्य का काम है ,दादा जी की आत्मा को भी बहुत शान्ति मिलेगी। वैसे दादा जी की भी इच्छा थी कि मृत्यु के बाद उनके नेत्र दान कर दिये जायें।'
      "नेत्र दान की बात तेरे दादा जी ने मुझे तो कभी नहीं बताई, तुझ से कब कह दिया ?'
      "जिस दिन मैंने उन्हें अपने दोस्त की दादी के नेत्र दान की बात बताई थी उसी दिन उन्हों ने कहा था कि  मरने के बाद शरीर तो जल कर समाप्त हो जाता है यदि मृत व्यक्ति की आँखों से दो लोगों को नेत्र - ज्योति मिल जाये तो इस से बड़ा दान तो कुछ हो ही नहीं सकता।..मेरे मरने के बाद मेरी ऑखें भी दान कर देना।'
       पास बैठी एक महिला ने पूछा-- "एक आदमी की आँखों से दो लोगों को ज्याति कैसे मिल जाती है ?'
      "दो आँखें दो लोगों को लगाई जाती हैं।...प्लीज दादी अब ना मत करना।'
       "अच्छे काम  के लिए मैं मना नहीं करुँगी बल्कि मैं अभी से कहे दे रही हूँ मरने के बाद मेरी आँखें भी दान कर देना।जाकर इस काम के लिए अपने पापा को मना ले।'
        अंश की बात सुन कर पापा बोले "मुझे तो कोई जानकारी नहीं हैं कि इस के लिए कहाँ सम्पर्क किया जाए, ना ही यह पता है कि मौत के कितनी देर बाद तक कोर्निया काम आ सकता है।'
        "पापा मैं ने कहीं पढ़ा था कि मौत के पाँच-छै घन्टे के अन्दर पुतलियाँ निकालने का काम हो जाना चाहिये वरना फिर वह काम की नहीं रहतीं ।सामने वाले डाक्टर अंकल से बात करिये पूरी जानकारी मिल जाएगी।'
        डाक्टर साहब ने आई बैंक को फोन मिला कर आई डोनेशन की बात बताई और एक घंटे के अंदर ही"आईबैंक' की यूनिट ने आ कर कोर्निया निकाल लिया और कहा --  "बहुत बहुत धन्यवाद, इस दान से दो लोगो की अंधेरी जिन्दगी रोशनी से भर जायेगी ।'
    दादा जी की शव यात्रा की तैयारी होने लगी थी।
  
    
-पवित्रा अग्रवाल
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