गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

थोड़ी सी सूझबूझ

बाल कहानी
     थोड़ी सी सूझबूझ   
                                                 पवित्रा अग्रवाल       
    बहुत दिन अनुपस्थित रहने के बाद अंगद को स्कूल आया देख कर उसके दोस्त सोमेश ने पूँछा -         
   "अंगद तुम तो बहुत रेगुलर हो पर इतने दिनों से स्कूल क्यों नहीं आ रहे थे ?'
 उदास स्वर में अंगद ने कहा--"सोमेश ,मेरे दादा जी नहीं रहे ।'
 "अरे , क्या वो बीमार थे ?'
 "वैसे उन्हें बी. पी. हाई रहता था तो उसकी वह दवा खाते थे।पर इस समय तो बिल्कुल ठीक थे।मेरी तीन चार दिन की छुट्टी थीं तो दादा,दादी बोले चलो हरिद्वार चलते हैं। गंगा नहा कर एक दो दिन वहाँ रुकेंगे।'…  मैं भी तैयार हो गया।...मुझे क्या पता था कि ऐसा हो जाएगा।'
 "तो क्या उनकी मौत हरिद्वार जा कर हुई थी ?'
 "नहीं हरिद्वार जाते समय ट्रेन में उनकी तबियत खराब हो गई थी।टाइलेट से लौटे तो पसीने में भीगे हुए थे। मैं ने और दादी ने उन्हें बर्थ पर लिटा कर पानी पिलाया फिर उनकी हवा करने लगे । साथ ही गाड़ी  हरिद्वार पहुंचने का इंतजार करने लगे।'
 "हरिद्वार कितनी दूर रह गया था ?'
 "करीब दो घन्टे का रास्ता बचा था ।'
 "फिर तुमने कोई मेडिकल ऐड देने की कोशिश नहीं की ?'
 "मैं क्या मदद करता... मैं कोई डाक्टर तो था नहीं।' 
 "अरे यार मरीज की मदद करने के लिए डाक्टर होना जरूरी नहीं होता। मेरे पापा एक बार दिल्ली से ट्रेन में अकेले आ रहे थे। उनकी तबियत एक दम से खराब हो गई था। उनके साथ के लोगों ने जैसे ही उनकी हालत बिगड़ते देखी  वह लोग एक दम से एक्टिव हो गए।हर केबिन में जाकर पूछा कि आप में से कोई डाक्टर हैं क्या और उन में से एक डाक्टर निकल आया। दवाएं उनके पास थीं,उनसे पापा को आराम हो गया।'
 "उन्हें क्या हुआ था ?'
 "लूज मोशन्स और वोमेटिंग । ऐसे संकट के समय में टी टी से भी तुरंत सम्पर्क करना चाहिए। वह निकटतम स्टेशन पर डाक्टर की व्यवस्था कर के रख सकता हैं,ट्रेन में भी उनकी नजर में कोई डाक्टर हो तो बुला कर मदद कर सकता है।...कहने का मतलब यह कि कोशिश करने पर मदद की उम्मीद बढ़ जाती है।'
 "हाँ यार तू ठीक कह रहा है। मैं उनकी हालत देख कर इतना घबड़ा गया था कि कुछ सूझा ही नहीं। हो सकता है हमारे भी आस पास की बोगी में कोई डाक्टर रहा हो या मैं टी टी से कहता तो वह भी कुछ मदद कर सकता था। कितना डफर हूँ मैं। काश मेरे दिमाग में भी यह ख्याल आया होता..अटैक के बाद दादा जी हरिद्वार तक जीवित रहे थे,स्टेशन पर उतरने के बाद  जब तक डाक्टर साहब आए तब तक उनकी मौत हो चुकी थी ।'
 "बाप रे, अंगद अकेले तूने यह सब कैसे संभाला होगा। फिर तुम उनके शव को यहाँ ले कर आए थे या वहाँ पर ही अंतिम संस्कार कर दिया था ?'
 "अरे यार बड़ा मुश्किल समय था वह। अनजान शहर था । पुलिस ऐसे पूछताछ कर रही थी जैसे हमने उनकी हत्या कर दी हो। मोबाइल पास में था ,निकट के रिश्तेदारों को सूचना दी। तो पता लगा कि हमारे एक रिश्तेदार उस समय गंगा नहाने हरिद्वार आए हुए थे। समाचार मिलते ही वह स्टेशन आ गए। आते ही उन्हों ने सब स्थिति संभाल ली थी।. .. फिर धीरे धीरे परिवार के अन्य लोग आ गए। दूसरे दिन सुबह हरिद्वार में ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया था। कभी कभी मैं गिल्टी महसूस करता हूँ...समय पर मदद मिल जाती तो शायद दादा जी बच जाते।'
 "अंगद, अपने को दोष देने से कोई फायदा नहीं है। तेरी जगह मैं होता तो शायद मैं भी कुछ नहीं कर पाता। वह तो पापा को इस तरह की मदद ट्रेन में मिली थी तो हमें लगा था कि उनके साथ यात्रा कर रहे लोग कितने होशियार और सूझ बूझ वाले थे। हमारे सामने उन्हों ने एक उदाहरण पेश किया था कि अचानक आए संकट से घबड़ाना नहीं चाहिए । थोड़ी सूझबूझ से उसका सामना करना चाहिए।.....चल अब क्लास में चलते हैं।'
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-पवित्रा अग्रवाल

शनिवार, 2 नवंबर 2013

बाल कहानी                           मुकुल की दीपावली
                                                             
                                                                         पवित्रा अग्रवाल
          पापा के स्थानांतरण का समाचार सुन कर मुकुल उदास हो गया था। अब फिर एक नई जगह, नया स्कूल, नये साथी, नये शिक्षक। पता नहीं नई जगह उसका मन लगेगा या नहीं लेकिन जाना तो था ही। अभी वह पाँचवीं क्लास पास कर चुका था। नये स्कूल में दाखिला लेते समय भी वह उत्साहित नहीं था। कक्षा में मुकुल के बराबर की सीट पर सुकेश बैठता था। धीरे-धीरे वह दोनों एक-दूसरे के घनिष्ठ मित्र बन गए और मुकुल की उदासी कहीं गुम होती चली गई।
        सुकेश के घर से स्कूल करीब एक किलोमीटर दूर था। वह पैदल ही स्कूल जाया करता था। रास्ते में मुकुल का घर पड़ता था। सुकेश मुकुल को उसके घर से लेते हुए साथ स्कूल जाता था। दोनों साथ ही लौटते थे। स्कूल में भी साथ ही खेलना, साथ ही खाना।
 दीपावली के चार-पाँच दिन पहले सुकेश ने मुकुल से कहा, "आज स्कूल से लौटते समय कुछ पटाखे, बम आदि लेते हुए घर चलेंगे...तुम्हें चाहिए तो तुम भी खरीद लेना।'
 पटाखों का नाम सुनते ही मुकुल की आँखों में चमक आ गई फिर एकाएक वह उदास हो गया और बोला- "मैं तुम्हारे साथ चलूँगा लेकिन पटाखे नहीं ख़रीदूँगा। हमारे घर दीपावली नहीं मनाई जाती।"
  "अरे दीपावली तो हम हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है। तुम्हारे यहाँ दीपावली क्यों नहीं मनाई जाती ?'
  "पहले हमारे घर में भी दीपावली मनाई जाती थी....करीब सात वर्ष पहले जब मैं चार वर्ष का था तब मेरी बहन की मृत्यु दीपावली के दिन हो गई थी। तब से हमारे घर में दीपावली नहीं मनाई जाती।'
    'अरे यह तो पुरानी बातें हैं इन को अब कौन मानता है,तुम्हारे घर में जरूर तुम्हारे दादा-दादी होंगे इसी लिए तुम्हारे यहाँ दीपावली को खोटा मान लिया गया है।'
 "हमारे दादा-दादी नहीं हैं और हमारे यहाँ इस त्योहार को खोटा भी नहीं माना जाता पर इस दिन मम्मी-पापा  बहुत उदास हो जाते हैं...हमारे एक ही बहन थी...उसकी याद आ जाती है फिर दीपावली मनाने का मन ही नहीं करता।'
 "क्या हुआ था तुम्हारी बहन को ?' सुकेश ने पूछा।
 "मेरी बहन के ह्यदय में छेद था। मुझ से वह दो वर्ष बड़ी थी। दीपावली के दिन अचानक उसकी तबियत खराब हो गई। दीपावली का दिन होने की वजह से डॉक्टर भी समय से नहीं मिल पाए। अस्पताल तक जाते-जाते रास्ते में ही उसकी मृत्यु हो गई थी।"
 मुकुल को सांत्वना देते हुए सुकेश बोला, "यह तो सचमुच बहुत बुरा हुआ, वैसे भी एक बहन तो सब की होनी ही चाहिये ।घर की रौनक बहन से ही होती है... एक बात बताओ, तुम्हारा मन दीपावली मनाने को नहीं करता ?'
 "सच कहूँ सुकेश, दीपावली का न मनाया जाना तो मुझे बुरा नहीं लगता लेकिन अब पटाखे, बम, अनार जलाने को मेरा भी मन करने लगा है।'
 "कोई बात नहीं मुकुल, आज मैं भी पटाखे नहीं ख़रीदूँगा। अपन सीधे घर जाएँगे।'

          
 आज दीपावली थी। सुकेश दोपहर को अचानक मुकुल के घर चला आया और मुकुल की
मम्मी से बोला - "आंटी, मैं मुकुल को अपने घर ले जाना चाहता हूँ। हम साथ-साथ दीपावली मनाएँगे, सुबह उसे वापस भेज दूँगा।'
 "लेकिन बेटे, हम ने बहुत दिन से दीपावली नहीं मनाई।'  आँखें पोंछते हुए मुकुल की मम्मी ने कहा।
      सुकेश कुछ कहता, उससे पहले ही मुकुल के पिताजी बोले - "हाँ रेखा यह सही है कि हमने बहुत दिन से दीपावली नहीं मनाई पर हमारे घर दीपावली मनाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है... तब मुकुल छोटा था और पटाखों से डरता था और हमारा दुख भी ताजा था  इसलिए दीपावली मनाने का मन नहीं करता था ....पर अब मुकुल बड़ा हो रहा है उसका मन भी पटाखे जलाने को करता होगा। यह उम्र हंसने-खेलने की है... मायूस होकर घर में बैठने की नहीं।..इस वर्ष से हम भी दीपावली मनाएँगे।'
      "ठीक है बेटे, तुम्हारे पापा ने इजाजत दे दी है तो कपड़े बदल कर चले जाओ लेकिन पटाखे छोड़ने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना। एक बाल्टी पानी पास में अवश्य रखना ताकि गलती से किसी के कपड़ों में  आग लग जाए तो बुझाई जा सके। लंबी स्टिक से पटाखे को आग लगाना। पटाखों के बंडल को पटाखे जलाने की जगह से दूर रखना....हो सके तो घर के बड़े सदस्यों की देख-रेख में बम, अनार, रॉकेट आदि जलाना।'
    मम्मी ने कुछ रुपये मुकुल को देते हुए कहा - "इन से तुम पटाखे खरीद लाना।'
   " मैं बाजार से मिठाई,दीये और पूजा का सामान लेने जा रहा हूँ...पटाखे खरीद कर तुम दोनों पहले यहाँ दीपावली मनाओ फिर दोस्तों के साथ मनाना।'
 "थैंक्यू मम्मी, थैंक्यू पापा' कहते हुए मुकुल के चेहरे पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गई और वह सुकेश के साथ पटाखे लेने चल पड़ा।

-पवित्रा अग्रवल

 ईमेल - agarwalpavitra78@gmail,com
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शुक्रवार, 4 अक्तूबर 2013

विकलांगता का दुख

बाल कहानी

             विकलांगता का दुख  
 
                                           
                                                  पवित्रा अग्रवाल
 

      मदन ने जब आँखें खोलीं तो सामने पिता, माँ व दादी खड़े थे। उसने इधर-उधर नजर दौड़ाई तो जगह    अनजानी लगी।
  "माँ मैं कहाँ हूँ ?'
  "बेटे, तुम अस्पताल में हो। कल स्कूल जाते समय तुम्हारी कार का एक्सीडेंट हो गया था।'
  "मेरी आँख पर यह पट्टी क्यों है ? हाथ पर भी प्लास्टर है। क्या हाथ की हड्डी टूट गई है ?'
  "हाँ बेटे, तुम्हारे हाथ की हड्डी टूट गई है। एक आँख में भी चोट लगी है।'
          आँख में चोट लगने की बात सुन कर मदन घबरा गया, "आँख में चोट ? माँ कहीं ऐसा तो नहीं कि इस एक आँख से अब मैं देख ही न पाऊँ ?'
  "ऐसा कुछ नहीं होगा। तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगे ।'
          मदन आँखें बंद करके लेट गया। उसे बहुत सी बातें याद आ रही थीं। पिछले वर्ष कक्षा में सोनू के   प्रथम आने पर उसने अपने मित्र अमित से कहा था, "यार, इस बार तो लँगड़े सोनू ने बाजी मार ली।'
        अमित को उसकी बात पसंद नहीं आई थी। उसने कहा था, "मदन, क्या तू खाली सोनू नहीं कह सकता। नाम से पहले लँगड़ा या ऐसा कोई भी विशेषण लगाना जरूरी है ? शर्म की बात है हमारे लिए कि शारीरिक रूप से स्वस्थ होने के बाद भी पढ़ाई में हम  उससे पीछे हैं।'
        "लँगड़ा है, इसीलिए तो प्रथम आ गया। न तो वह खेल सकता है और न कहीं ज्यादा आ जा सकता है। खाली बैठा क्या करे ... पढ़ता रहता होगा।...ज्यादा पढ़ेगा तो प्रथम तो आएगा ही।'
       अमित ने कहा, "मदन, ये सब फालतू के तर्क हैं। पता नहीं दूसरों की कमियाँ ढूँढ़ने में तुझे क्या मजा आता है। हमें दूसरों की अच्छाई देखनी चाहिए। दिलीप के हाथ में छह उँगली हैं तो तू उसे छंगा कहता है। मोहन को हकला कहता है। सुरेश को मोटा होने की वजह से हाथी कहता है। यह अच्छी बात नहीं है। शारीरिक दोष तो किसी में कभी भी आ सकता है।एक दुर्घटना में सोनू की टाँग कट गई थी तो वह लँगड़ा कर चलता है। तू किसी की शारीरिक कमी का मजाक उड़ाना छोड़ दे।'
      ये बातें याद करके मदन रोने लगा था । उसे लगा कि वह अब एक आँख से देख नहीं पाएगा।
        माँ-पापा यहाँ तक कि डॉक्टर ने भी उसे विश्वास  दिलाया था कि वह ठीक हो जाएगा।
 लेकिन कुछ भी ठीक नहीं हुआ था। आँख में कार का शीशा चुभ गया था। डॉक्टर उसकी आँख नहीं बचा पाए। उसे एक कृत्रिम आँख लगा दी गई थी। वह अपने कमरे में बैठा रहता। सोचता रहता था कि नकली आँख देख कर बच्चे उसका मजाक उड़ाएँगे।
         माता-पिता ने उसे बहुत समझाया  लेकिन स्कूल भेजने में सफल नहीं हुए फिर अमित ने ही मदन को समझाया था और कहा था, "यह तुम्हारा भ्रम है। कोई मजाक नहीं उड़ाएगा। नवाब पटौदी की भी एक आँख दुर्घटना में खराब हो गई थी। उनकी भी कृत्रिम आँख लगी थी । उसके बाद भी वह विज्ञापनों में काम कर रहे और जहाँ तक मुझे याद पड़ता है बाद में भी वह क्रिकेट खेले हैं। उनकी योग्यता के सामने शारीरिक दोष छिप गया। तुम भी इस दुर्घटना को भूल जाओ और मेरे साथ स्कूल चलो। सब तुम्हें बहुत याद करते हैं।'
           दुर्घटना के बहुत दिन बाद आज वह स्कूल गया था। शिक्षक व कक्षा के सभी छात्रों ने बड़े प्यार से उसका स्वागत किया था। सोनू भी हमेशा की तरह उससे बड़ी गर्मजोशी से मिला था लेकिन मदन सोनू से नजर नहीं मिला पा रहा था। वह स्वयं को शर्मिंदा महसूस कर रहा था। विकलांगता का दुख उसकी समझ में आ गया था। अब उसे दूसरे की तकलीफों का एहसास होने लगा था। बिना कुछ कहे उसने सोनू को गले से लगा लिया। दोनों की आँखों में आँसू थे।.



-पवित्रा अग्रवाल
 
 
मेरे ब्लोग्स  
 

रविवार, 1 सितंबर 2013

गणेश चन्दा

बाल कहानी    
                         
          गणेश चन्दा
   
                                                                       पवित्रा अग्रवाल


  "सोनम दरवाजे पर कौन था ?'
 " माँ गणेश का चन्दा मांगने के लिए चार पाँच लड़कों का ग्रुप आया  है।'
 " अरे हाँ अब गणेश चतुर्थी आ रही है यानि गणेश बैठाने के दिन, अब बच्चें दरवाजे की        घन्टी बजा बजा कर परेशान करते रहेंगे ।'
  "आप कल जब घर पर नहीं थीं तब भी,तीन चार ग्रुप चन्दा माँगने आए थे।'
 "फिर तूने उन्हें चन्दा दिया ?"
 "नहीं मम्मी आप घर पर नहीं थी ,मैं किसी को जानती नहीं  ... मैं ने तो दरवाजा भी नहीं खोला।'
 "अच्छा किया ।...हर गली,नुक्कड़ मे तीन चार गणेश बैठाते हैं। इस तरह अपने घर के आसपास कम से कम  छह- सात गणेश  लगेंगे । कुछ साल पहले एक बड़ा सा गणेश लगता था, सब वहीं पूजा कर लेते थे पर अब हर कोई अपने घर के सामने गणेश लगाने को तैयार बैठा है और हर किसी को चन्दा चाहिए। '
 "हाँ माँ अपने अपने गणेश अलग बैठाने का शौक है तो बैठाए, पर सब से चन्दा क्यों माँगते फिरते हैं ?..."
     " बेटा इस क्यों का कोई जवाब नहीं है। "
  "माँ वह लोग दरवाजे पर खड़े हैं,पहले उनसे बात करलो ।'
 "ठीक है अभी बात करती हूँ - " क्या बात है बच्चों, क्यों बैल बजा रहे हो ?'
 "आन्टी गणेश का चन्दा लेने आए हैं।'
 'अपने एरिये में बहुत वर्षो से इतना बड़ा गणेश लगता है, वह पूजा करने के लिए बस नहीं होता ?'
 "वहाँ बहुत भीड़ हो जाती है आन्टी फिर हम तो अपने घर के बाहर छोटा सा गणेश लगाते हैं,अच्छी तरह पूजा करने को भी मिल जाती है।'
 "क्या तुम लोग स्कूल नहीं जाते हो ?'
" जाते हैं न आन्टी, मैं नौ क्लास में पढ़ता हूँ, यह सब भी ऐसे ही अलग अलग कक्षाओं में पढ़ते हैं'
 "जो समय तुम इस काम में व्यर्थ  कर रहे हो वह समय तुम्हें अच्छे से पढ़ने लिखने में लगाना चाहिए।'
 "आन्टी गणेश इसी लिए तो बैठा रहे हैं ताकि अच्छे से पूजा कर सकें और वह हमें आशीर्वाद दें।'
 "यदि तुम बड़े गणेश की पूजा करोगे  या किसी दूसरे गणेश मंदिर में जा कर पूजा करोगे तो क्या भगवान तुम्हें आशीर्वाद नहीं देंगे ?'
 "देंगे पर इस से ज्यादा खुश होंगे , प्लीज आन्टी दीजिए न यह तो धर्म का काम है ।'
 "हाँ बेटा धर्म का काम है और हम हर वर्ष बड़े गणेश को बड़ा चन्दा देते हैं और पूजा करने के लिए एक    गणेश बहुत हैं तुम लोगों को भी उन्हीं की पूजा करनी चाहिए ...हम ज्यादा गणेश  बैठाने के पक्ष में नहीं हैं । '
 "पर क्यों आन्टी ?'
 " बच्चों इस विषय में तुम्हें मैं जरूर बताना चाहूँगी। गणेश प्रतिमाए क्या मुफ्त में मिलती है ?"
 "आन्टी मुफ्त में मिलतीं तो हम चन्दा क्यों माँगते,बहुत मंहगी मिलती हैं और बड़े गणेश तो सुना हैं साइज के हिसाब  से चालीस -  पचास हजार तक आते हैं ?'
 "बेटा एक बात बताओ ...अपने शहर में कितने गणेश बिठाए जाते होंगे ? '               
 "कम से कम छह  हजार ..और हर वर्ष इनकी संख्या बढ़ती जा रही है।'
  "यानि करोड़ों रुपए के गणेश ख़रीदे जाते हैं  जाते हैं और  कुछ दिन पूजा के बाद उनको नदी ,तालाबों में डाल कर जल को प्रदूषित किया जाता है ... और यह हिसाब तो एक शहर का है, पूरे देश में कितना धन इस पर खर्च होता होगा ? और यह तो सिर्फ प्रतिमाओं की कीमत है...बाकी सब अलग ..बेटा तुम  सोचो आज कितने बच्चें धन के अभाव में स्कूल नहीं जा पाते, ऊँची पढाई नहीं कर पाते ।'
 "हाँ आन्टी बहुत से तो पढ़ाई की उम्र तक ही नहीं पहुँच पाते... उस से पहले ही भूख और बीमारी के
शिकार हो कर मर जाते हैं।'
 "हाँ बेटा मैं बस तुम लोगों को यही बताना चाह रही थी ...यह पैसा सही जगह लगे तो कितनों का भला हो सकता है।'
 "पर आन्टी एक दो के न लगाने से क्या फर्क पड़ना है ?'
      "बेटा लोगों को जागरूक करना पड़ेगा।हम जैसे लोग चन्दा माँगने वालों को चन्दा न देकर उन्हें न देने की वजह बताऐ। मीडिया समाचार पत्रों व टी वी चैनलों के माघ्यम से इस तरह के संदेश को प्रसारित हों तो धीरे धीरे ही सही जरूर जागृति आएगी ।'
 "हाँ आन्टी हम ने इस तरह से कभी सोचा ही नहीं और किसी ने इस तरह से हमें समझाया भी नहीं ।'
 " आन्टी अब बात हमारी समझ में आ गई है। हम अब से बड़े गणेश की ही पूजा करेंगे और दूसरे लोगो को भी समझाने की कोशिश करेंगे ।'
 "थैंक्यू आन्टी हमारा मार्गदर्शन करने के लिए ।'

 
 

मंगलवार, 6 अगस्त 2013

पानी के बताशे

बाल कहानी                            
                                    पानी के बताशे

                                                                                                पवित्रा अग्रवाल

       ट्यूशन  पढ़ कर लौटते हुए शालिनी की नजर चाट के ठेले पर पड़ी। गोल गप्पे देख कर उस के मुंह में पानी भर आया।उसने अपनी सहेली से कहा -- "रोहिणी देख सामने की बंडी पर पानी के बताशे मिल रहे हैं ।"
  "तुम इन्हें पानी के बताशे बोलती हो, हम इन्हें गोल गप्पे कहते हैं।''
   "हाँ कुछ लोग पानी पूरी  भी कहते  हैं पर यार है बड़े मजे की चीज। इन्हें देख कर तो मेरे मुंह में पानी  आ रहा है,चल खाते हैं।''
   "नहीं शालिनी मैं बाहर के गोल गप्पे कभी नहीं खाती । मेरी मम्मी ने कभी खाने ही नहीं दिए। सब से   ज्यादा इंफैक्शन की जड़ हैं ये ।''
   " वो कैसे ?''
  " देख शालिनी आज कल पीने का पानी कितना गंदा आ रहा है। अपने घरों में एक्वागार्ड या इसी तरह की पानी साफ करने की कोई न कोई मशीन लगी है।... पर इनके पानी का कोई भरोसा नहीं है।''
  " हाँ सो तो है।''
  " देख जिन हाथों से ये रुपए पैसे लेते हैं, उन्ही हाथों से यह चाट बना रहे हैं...इन्ही से घड़े में  हाथ डुबो कर बताशों में पानी भर भर कर लोगों कों खिलाते भी जा रहे हैं। इस तरह हाथ की सारी गंदगी उस   पानी में घुलती जाती है।''
  "हाँ रोहिणी बात तो तूने बिलकुल सच कही है पर यह रूपए पैसे वाली बात मेरी समझ में नहीं आई।''
 " ये रुपए पैसे सैंकड़ों लोगों के हाथ से गुजरते हैं।जैसे हम खाँसते या छींकते समय मुंह पर हाथ रखते  हैं, हाथ गंदे हो गए न,सफाई कर्मचारी कचरा उठा रहा है किसी ने रूपए दिए तो उन्हीं हाथों से ले कर उसने जेब में रख लिए ... कहने मतलब यह है कि  रूपए पैसे लेते देते समय हाथों की गंदगी रुपयों में लगती रहती है और रुपयों की यात्रा जारी रहती है । ''  
  " ओ हाँ रोहिणी रुपए पैसे तो वाकई गंदे होते हैं। यह गंदगी भी हाथों द्वारा पानी में घुल जाती होगी । छी, अब तो मैं बाहर पानी के बताशे कभी भी नहीं खाऊंगी।...पर ये मुझे बहुत पसंद हैं तुझे अच्छे नहीं  लगते ?'
  " अच्छे क्यों नहीं लगते शालिनी, मुझे भी बहुत पसंद हैं । मैं खाती भी हूँ पर घर पर ।...आजकल तो बाजार में गोल गप्पों का पैकेट मिलता है,पापा वही ले आते हैं।मम्मी आलू ओर मटरा उबाल लेती हैं और पानी भी घर में ही बना लेती हैं ।इस तरह हम लोग तो अक्सर घर में खाते ही रहते हैं ।''
  " पर बाहर का पानी बहुत मजेदार होता है ,वैसा घर में नहीं बन पाता होगा ।''
  " घर में भी अच्छा बन जाता है,मम्मी तो धनियां ,पोधीना जाने क्या क्या डाल कर बनाती हैं,सब मसालों  का खेल है। वैसे बाजार में पानी पुड़ी मसाले का पैकेट भी आता है।...पर सब से खास बात शालिनी  यह है कि स्वाद के चक्कर में हम स्वास्थ्य से खिलवाड़ तो नहीं कर सकते न ।''
  " बिलकुल ठीक कहा तूने रोहिणी ,स्वास्थ्य से खिलवाड़ का मतलब है ...डाक्टर्स के चक्कर लगाओ, दवाएं खाओ।... मतलब समय व धन दोनो की बरबादी।''
  " देख शालिनी सामने की दुकान पर गोल गप्पों का पैकेट मिल रहा है।चल लेते हैं साथ ही इसके   मसाले का पैकेट भी ले लेंगे।''
 " पर पानी कौन बनाएगा ?''
 " शालिनी,पहले मेरे घर चल मम्मी से पानी  बनवा लेंगे,तू भी देख लेना कैसे बनता है।..हमारी फ्रिज में हमेशा कुछ उबले आलू जरूर रहते हैं।...अब तू गोल गप्पे खा कर ही जाना और हाँ हमारे घर से अपनी मम्मी को फोन कर देना...वरना वह चिन्ता करेंगी।''
 " अरे मेरे मुंह में तो फिर पानी आने लगा '' दोनो हँसती हैं
       
     
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agarwalpavitra78@gmail.com
--
-पवित्रा अग्रवाल

सोमवार, 1 जुलाई 2013

नया विश्वास

बाल कहानी 

                 
    नया विश्वास                                                                        
                                                                    पवित्रा अग्रवाल
 
                रजनी आठवीं कक्षा में पढ़ती थी। कक्षा में वह प्रथम तो कभी नहीं आई किन्तु हमेशा प्रथम दस में रहती थी। नृत्य, नाटक, डिवेट आदि में हमेशा भाग लेती थी और पुरस्कार भी पाती थी। नृत्य का प्रशिक्षण तो वह तीन-चार वर्ष की उम्र से ले रही थी। कत्थक नृत्य में वह प्रवीण हो चुकी थी। नृत्य के कई स्टेज प्रोग्राम दे चुकी थी। पढ़ने में उसकी रुचि  थी।  वह स्नातक की डिग्री तो लेना चाहती थी किन्तु नृत्य व अभिनय को अपना कैरियर बनाना चाहती थी। उसका बाल मन भविष्य के सपने देखने लगा था।
            एक दिन पैदल स्कूल जा रही थी । सड़क पार करते समय वह एक बस से टकरा गई। बस का पहिया उसके पैर पर से उतर गया था। घुटने से नीचे का एक पैर डॉक्टर को काटना पड़ा था।....इस दुर्घटना में उसकी टाँग ही नहीं गई बल्कि सब सपने भी टूट कर बिखर गए थे। माता-पिता के बहुत समझाने पर भी वह स्कूल नहीं जा रही थी। उसने अपने घुँघरू उठा कर खिड़की से बाहर फेंक दिये थे। दिन भर अपने कमरे में उदास सी बैठी रहती थी। स्वभाव से चिड़चिड़ी हो गई थी ।
          उन्हीं दिनों उसके शहर में फिल्मी सितारों का एक ग्रुप आया था जो नृत्य का स्टेज प्रोग्राम देने वाला था। माता-पिता जिद्द करके रजनी को भी उस प्रोग्राम में ले गए।
         एक नृत्यांगना को देख कर वह चहकी- "मम्मी ये तो सुधा चन्द्रन है। ये टी.वी. के बहुत से सीरियल्स में काम कर रही है।'
         पापा ने कहा, "तुम ने सही पहचाना, ये सुधा चन्द्रन ही है। तुम्हें इनका नृत्य कैसा लगा ?'
        "बहुत अच्छा लगा पापा' कह कर वह फिर उदास हो गई। उसे नृत्यांगना व अभिनेत्री बनने का अपना सपना फिर याद आ गया था। उसकी आँखें भर आई। उसके सपने मात्र स्वप्न बन कर ही रह गए थे जो अब कभी पूरे नहीं हो पाएँगे। वह अपाहिज की जिन्दगी जीते हुए यों ही एक दिन दुनिया से चली जाएगी।
          तभी उसे माँ का स्वर सुनाई दिया-- "रजनी क्या सुधा की तरह तुम नृत्य नहीं कर सकती ?'
 रजनी ने लाचारी से एक बार अपनी टाँग को देखा फिर कहा, "मम्मी आप जानती हैं मैं कभी नृत्य नहीं कर सकती फिर भी आप यह प्रश्न पूछ कर क्या मेरा मजाक उड़ा रही हैं ?'
         "कैसी बातें करती हो रजनी ... मैं माँ होकर तुम्हारा मजाक उड़ाऊँगी ? शायद तुम्हे पता नहीं कि इस नृत्यांगना सुधा की भी एक टाँग दुर्घटना में कट गई थी। यह नकली पैर से नृत्य कर रही है यदि यह नृत्य व अभिनय कर सकती है तो तुम क्यों नहीं कर सकती ?'
        ये आप क्या कह रही है माँ, मुझे विश्वास  नहीं होता। बचपन में मैंने एक फिल्म देखी थी उसमें फिल्म की हीरोइन ने नकली पैर से नृत्य किया था....लेकिन वह तो फिल्मों की बातें है।.....वास्तविक जीवन में ये सब कहाँ हो पाता है।"
         "अरे उसकी हीरोइन यही सुधा तो थी। उस फिल्म का नाम था " नाचे मयूरी'...वह फिल्म सुधा के वास्तविक जीवन पर ही बनी थी।....'
       "सच माँ... मुझे ये नहीं मालूम था। ये फिल्म मुझे फिर से दिखाना।...पापा मैं सुधा चन्द्रन से मिलना चाहती हूँ।'
      "ठीक है बेटा मैं उनसे बात करके तुझे मिलवाने की व्यवस्था करता हूँ।'
 प्रोग्राम के बाद में रजनी सुधा के साथ थी।
      सुधा ने संक्षेप में रजनी को अपनी आत्मकथा सुनाई कि किस तरह वह भी निराश हो गई थी। उसके माता-पिता ने जयपुर ले जाकर नकली पैर लगवाया था। धीरे-धीरे डाँस की प्रैक्टिस प्रारंभ की।...
इस बीच कई बार निराशाओं ने घेरा। अंत में मैं ने अपंगता पर विजय पा ली है यह तो तुमने देख ही लिया है।"
         ' जी '
        " रजनी तुम भी निराश मत होना , हिम्मत से काम लो। इच्छा शक्ति को दृढ़ करो। हीनता की भावना को अपने पास भी मत फटकने दो। अपना एक लक्ष्य निर्धारित करो फिर उस दिशा में प्रयास प्रारंभ कर दो सफलता जरूर मिलेगी।'
      ' आपसे मिलकर मुझ में एक नए विश्वास  ने जन्म लिया है। अब मैं जीवन से उतनी निराश नहीं हूँ।'
         रजनी ने पुन: स्कूल जाने का निर्णय कर लिया। जल्दी ही वह पापा-मम्मी के साथ कृत्रिम पैर लगवाने जयपुर जाएगी। उसने निश्चय कर लिया है कि वह भी जीवन में कुछ पा कर रहेगी।

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गुरुवार, 6 जून 2013

लगाम जरूरी लगाम जरूरी

बाल कहानी
                          
                              लगाम जरूरी                                                                                                                                                                        पवित्रा अग्रवाल
              कालेज में कक्षाएं शुरू हो चुकी थीं। अपने प्रिय मित्र संयम को न देख कर प्राण और हीमेश को कुछ चिन्ता होने लगी ।
             प्राण ने कहा -- "परीक्षाओ के दिन हैं ,इन दिनों तो सब बच्चों पर तैयारी का भूत सवार रहता है पर संयम क्यों नहीं आया ।...किसी से पता करना होगा ।'
          "संयम राहुल के घर के पास  ही रहता है। यह क्लास समाप्त होने पर राहुल के पास चल कर पूछते हैं।'
         " हाँ याद आया ,दोनो एक ही अपार्टमेंन्ट में रहते हैं , शायद उसको कुछ जानकारी हो ।'
          शिक्षक के जाते ही प्राण और हीमेश कक्षा से बाहर आए तो राहुल सामने ही खड़ा मिल गया।
         "राहुल आज संयम कालेज क्यों नहीं आया ?'
         "तुम्हें नहीं पता ?...  संयम के बहुत चोट आई है, इस समय वह अस्पताल में है।'
         "उसे चोट कैसे लगी ,कहीं गिर गया था क्या ?'
        "अरे नहीं, वह रात को अपने किसी दोस्त के यहाँ से बाइक पर लौट रहा था, सामने से आती किसी कार से टक्कर  हो गई थी, तो वह गिर पड़ा... सब से अधिक चोट सिर में लगी है...अभी वह बेहोश है और उसकी हालत चिन्ताजनक है।'
       "  वह  बाइक पर वह अकेला था ? '
       "नहीं साथ में उसका कजिन भी था ।'
        "उसको चोट नहीं आई ?'
       "वह बच गया , पर उसके हाथ की  हड्डी टूटी है ।'
       "निश्चित रूप से उसने हैलमेट नहीं लगा रखा होगा ।'
        "हाँ तुम्हारा अनुमान बिलकुल सही है ....डाक्टर्स भी यही कह रहे थे कि यदि उसने हैलमेट लगा रखा होता तो वह सिर की चोट से बच सकता था। पुलिस भी आ गई थी...संयम के पास लाइसेंन्स भी नहीं था।'
        "हमारे बराबर का ही तो है, इस उम्र में लाइसेंन्स बन ही नहीं सकता। उसके बाइक लेने के बाद मैं ने भी घर में जिद्द की थी कि मुझे भी बाइक दिला दो...पर मम्मी पापा ने सख्ती से मना कर दिया ।...बोले अभी तुम्हें अठारह साल का होने में एक वर्ष है, उस से पहले तुम्हें न तो लाइसेन्स मिलेगा और ना बाइक...मैं ने  उन्हें बताया कि हमारे साथ के कई लड़के बाइक पर आते हैं और उनके पास लाइसेन्स भी है।'
         पापा ने कहा - "उन लोगों ने उम्र गलत बता कर लाइसेंन्स ले लिया होगा...जो कि सही नहीं है।पापा बड़बड़ाए थे कि पता नहीं कैसे माँ बाप हैं जो बच्चों की गलत जिद्द को पूरा करने के लिए इस तरह झूठ का सहारा लेते हैं...*
        मम्मी ने भी पापा की बात को सही ठहराते हुए कहा था - " बच्चों को झूठ और बेइमानी का पाठ तो वही पढ़ा रहे हैं।'
      "हाँ तुम्हारे मम्मी पापा ने ठीक कहा था।...मैं तो अठारह का हो चुका हूँ ...मेरे पास लाइसेंन्स भी है और घर पर बाइक भी।... फिर भी मुझे कालेज बाइक से आने की छूट नहीं है ।कभी बाइक से जाता भी हूँ तो हैलमेंट लगाने की शर्त पर ही बाइक दी जाती है...साथ ही चेतावनी भी कि किसी दिन तुम को बिना हैलमेंट के बाइक चलाते देख लिया तो उसके बाद तुम्हें बाइक नहीं दी जाएगी।'
        "हाँ राहुल हमें इस तरह का अनुशासन बुरा तो लगता है पर वह हमारे भले के लिए ही ऐसा करते हैं।'
        राहुल ने पुन: कहा -"सुना है कि कार चलाने वाला बच्चा भी कम उम्र का था।....लोगों ने कार का नंबर नोट कर लिया है।...एक दो दिन में पकड़ कर उस पर भी कार्य वाही होगी।'
        "ऐसे लोगों के साथ ट्रेफिक पुलिस वालों को भी सख्ती करनी  चाहिए ।'
      " हाँ यार लगाम तो लगानी चाहिए । ...देख वो हमारी मैडम क्लास लेने आ रही हैं,हम चलते हैं ...शाम को संयम को देखने अस्पताल चलेंगे ।'
                                                             ------
      
    ईमेल -- agarwalpavitra78@gmail.com-पवित्रा अग्रवाल

शुक्रवार, 3 मई 2013

स्वाद में क्या रखा है


बाल कहानी   
                            स्वाद में क्या रखा है
                                                                                               पवित्रा अग्रवाल
 ध्रुव को घर से बाहर जाता देख कर माँ ने उसे रोकते हुए पूछा--
 "बेटा ध्रुव तुम कहीं बाहर जा रहे हो ?'
 "हाँ माँ अपने दोस्त कपिल के पास जा रहा हूँ....आपको कुछ काम था ?'
 "तुझे तो मालुम है आज पापा के कुछ दोस्त डिनर पर आ रहे हैं।खाना बनाने के लिए मिसरानी भी    आ गई है।उसे कुछ सामान चाहिए था।तू बाजार से ला देगा ?'
 "क्यों नहीं माँ ...आप लिस्ट बना कर दे दीजिए मैं अभी साइकिल पर जा कर ला देता हूँ ।'
 "लिस्ट तो मैं ने बना दी है। अभी ला कर देती हूँ ।'
 "कौन कौन सी सब्जियाँ बनवा रही हो माँ ?'
 "छोले,मटर पनीर,दम आलू बनवा रही हूँ।'
 "और क्या क्या बनवा रही हो ?'
 "वेजीटेबिल पुलाव ,रायता और नान ।'
 "मिठाई में क्या रहेगा ?'
 "रस मलाई और गुलाब जामुन मैं ने लिस्ट में लिख दी हैं , तुम ले आना ।'
 "मम्मी इस लिस्ट में अजीमो मोटो भी लाने को लिखा है।...अजीमो मोटो क्यों ?'
 "पता नहीं ये क्या होता है।...मैं ने तो कभी डाला नहीं पर मिसरानी कह रही थी इस से सब्जी का स्वाद बहुत बढ़ जाता है।'
 "माँ आप जो खाना बनाती हो क्या वह कम स्वादिष्ट होता है ?..पर स्वाद बढ़ाने के लिए इस तरह के रसायन डालना अच्छी बात नहीं है।'
 "क्या इस से कुछ नुकसान होता है ?'
 "माँ यह एक तरह का रसायन है ।इसका साइन्टीफिक नाम सोडियम मोनो ग्लूकोनेट है।अक्सर होटलों आदि में स्वाद बढ़ाने के लिए इसे डाला जाता है । स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होता है।कहते हैं इसका असर सीधे दिमाग पर होता है ।माँ मिसरानी से मना करदो कि हमें खाने में अजीमों मोटो नहीं डालना है।ऐसा स्वाद किस काम का जो बीमारियों को दावत दे।'
 "तू बिलकुल ठीक कह रहा है इसे मत लाना ।पर तुम यह सब कैसे जानते हो...क्या स्कूल  में यह भी पढ़ाया जाता है ?'
 "आप को तो पता है माँ मुझे स्वास्थ्य  संबंधी विषयों में बहुत इन्ट्रेस्ट है और पत्र .पत्रिकाएं पढ़ने का शौक भी है और आज कल पत्र पत्रिकाओं में सब आता है।..माँ आप भी समय निकाल कर पत्रिकाए पढ़ा करो ।..आप कहें तो मैं आपके लिए हिन्दी की पत्रिकाएं ला दिया करूँगा ।'
 "हाँ बेटा ला देना मैं भी अब से पढ़ने की आदत डालूँगी ।' 

                                                   -----
                                 
-पवित्रा अग्रवाल


शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

सवाल सुरक्षा का

बाल कहानी 
                            
  सवाल सुरक्षा का

                                                     
                                        पवित्रा अग्रवाल       

          
            आटो के हार्न की आवाज सुन कर मम्मी ने नागेश से कहा, "नागेश जल्दी से स्कूल बैग और लंच बास्केट उठाओ तुम्हारा आटो आ गया।'
           "मम्मी मैं इस आटो से नहीं जाऊंगा।आटो वाला एक बार में दस बच्चों को ले जाता है। मुझे तो अक्सर आटो ड्राइवर के बराबर में खड़े होकर स्कूल जाना पड़ता है। कल ही हमारे स्कूल के बाहर एक एक्सीडेंट हुआ है। उस आटो में दस-ग्यारह बच्चे सवार थे। तीन तो आटो वाले के पास थे। एक उसके दाएँ, एक बाएँ खड़ा था, एक उसने अपनी गोद में बैठा रखा था।सात-आठ बच्चे पीछे बैठे थे। आटो को अचानक ब्रेक  लगाने से कई बच्चे आटो से गिर गए, उनमें से दो की हालत गंभीर है।'
        "तुमने पहले तो कभी नहीं बताया कि आटो वाला दस बच्चों को एक बार में ले जाता है।...आटो में इतनी जगह ही कहाँ होती है कि उसमें इतने सारे बच्चे अपने भारी-भारी स्कूल बैग, पानी की बाटल, लंच बास्केट के साथ समा सकें। आटो तय करते समय ही मैंने उससे स्पष्ट कह दिया था कि पाँच-छह बच्चों से ज्यादा बच्चे नहीं ले जाएगा।'
         "मम्मी पहले तो वह छह बच्चों को ही ले जाता था। धीरे-धीरे बढ़ा कर अब वह दस बच्चों को ले जाने लगा है।'
          "चल आटो ड्राइवर रामलू से मैं अभी बात करती हूँ।'

         "रामलू तुम से हमने पहले ही कहा था कि तुम एक साथ पाँच-छह बच्चों से ज्यादा  नहीं  ले जा ओगे।...नागेश कह रहा है अब तुम दस बच्चों को ले जाते हो ?'
        "अम्माँ आपके बच्चों को मैं सही सलामत रोज घर लाता हूँ कि नहीं ?...कभी किसी को चोट लगी है ?..'
        "कल ही आटों से गिर कर दो बच्चे अस्पताल में पड़े मौत से लड़ रहे हैं। पिछले वर्ष भी कई बच्चों की इसी तरह हुई मौत का समाचार अखबारों में पढ़ा था।...हम अपने बच्चों को तुम्हारे साथ तभी भेजेंगे जब तुम बच्चे कम कर लोगे।...नागेश को उसके पापा स्कूटर से छोड़ आएँगे।'
       दूसरे दिन रामलू फिर आया, "अम्माँ कल आप दूसरे बच्चों के सामने बोले थे न कि नागेश को तुम्हारे साथ तभी भेजेंगे जब तुम छह से ज्यादा बच्चे नहीं ले  जाओगे।...सब बच्चे अपने घर जाकर बोले होंइगे। आज सब लोगाँ आपकी ही बात बोल रहे  हैं  कि छह बच्चों से ज्यादा लेके जाते तो अपना बच्चा नहीं भिजाते।'
          "सब ने ठीक ही कहा है।...सवाल हमारे बच्चों की सुरक्षा का है।'
          "अम्माँ जिंदगी और मौत तो ऊपर वाले के हाथ है। आप क्या समझते जिस आटो  में चार-छह बच्चे होंइगे उस का एक्सीडेंट कभी नहीं होइगा ?'
          "देखो रामलू एक्सीडेंट तो कभी किसी का भी हो सकता है फिर भी कुछ एक्सीडेंट सावधानी बरतने से टाले जा सकते हैं। यदि सावधान रहा जाए तो एक्सीडेंट की संख्या कम अवश्य हो सकती है। पिछले वर्ष दुर्घटनाओं को देखते हुए ट्रैफिक पुलिस ने "छह बच्चों से ज्यादा ले जाने वाले आटो का चालान हो जाएगा ' ये नियम बनाया था लेकिन तुम लोगों ने आटों स्ट्राइक कर दी...लेकिन इस मामले में हम माँ-बाप कोई समझौता नहीं करेंगे।'
       "ठीक है अम्माँ अब से हम छह से ज्यादा बच्चे लेके नहीं जाएगे।..अब तो बच्चे को भेजेंगे न ?'
      'हाँ क्यों नहीं  भेजेंगे ?'
       आज के हालात देख कर नागेश की मम्मी की समझ में आ गया था कि बच्चों की सुरक्षा के लिए सिर्फ ट्रैफिक पुलिस पर निर्भर नहीं होना चाहिए। हम माता-पिता को भी अपनी भूमिका निभानी होगी।...हम निश्चित रूप से आटो वालों द्वारा अधिक बच्चों को ले जाने पर रोक लगा सकते हैं किंतु इसके लिए हर माता-पिता को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। 

--  
-पवित्रा अग्रवाल
 

गुरुवार, 7 मार्च 2013

गंदा मजाक


बाल कहानी
                                  गंदा मजाक
 
                                                                           पवित्रा अग्रवाल
 
           आखिर बच्चों का प्रिय त्यौहार होली आ ही गई ।होलिका दहन हो चुका था। अन्य बच्चों की तरह वृन्दा और नंदा की ऑखों में भी नींद नही थी और वह जल्दी से सुबह होने का इंतजार कर रही थीं ।
           होली के दिन उनके घर बहुत मेहमान मिलने आते थे और वे सब भी अपने अपने मित्र और रिश्तेदारों के घर शुभ कामनाए देने जाते थे ।मम्मी ने गुजियाँ व कई तरह की मिठाइयां,नमकीन बनाई थीं।साथ ही  सौंफ ,इलायची व पान का इंतजाम भी किया था।
           वृंदा - नंदा दोनो बहनों ने अपनी सहेलियों  के लिये विशेष रूप से मीठे पान तैयार किये थे पर सहेलियों  को शरारती बहनो की फितरत पता थी और वे स्वंय  भी उनकी तरह  ही शरारती थीं।...उन्हें लग रहा था कि पान में कुछ गड़बड़ हो सकती है ।इसलिए किसी ने भी पान नहीं खाया ।बहुत आग्रह पर एक दो ने पान ले तो लिया पर मुंह में नहीं रखा ।वह दोनो अपने दोस्तों से जब पान लेने का आग्रह कर रही थीं तब उनकी इंगलिश टीचर जो मम्मी की अच्छी मित्र थीं घर आई ।सभी बच्चों ने उन्हें "हैप्पी होली' कहा ।टीचर को पान बहुत पसंद था ।उन्हों ने प्लेट मे से एक पान ले कर मुंह में रख लिया ।
         बच्चो ने पूछा "टीचर आपको पान पसंद है ?'
       " हाँ पान मुझे अच्छा लगता है पर मैंने इसको अपनी आदत नहीं बनने दिया है ' कह कर टीचर मम्मी से मिलने चली गई ।
        दूसरे दिन पता चला कि टीचर को फूड पोइजनिंग हो गया है,वो अस्पताल में भर्ती हैं।मन ही मन दोनों बहने डर गई थीं कि टीचर हमारा पान खाकर तो बीमार नहीं हो गई।मम्मी उन्हें देखने अस्पताल गई थीं ।
        मम्मी ने घर आते ही बताया --"पता नहीं क्योँ  तुम्हारी टीचर पूछ रही थीं कि पान आपने किस की दुकान से मंगाया था..पान खाते ही उनका जी मिचलाने लगा था उसके बाद उनकी तबियत बिगड़ती चली गई थी।क्या तुम दोनों ने कुछ गड़बड़ की थी ?'
        दोनो कुछ नहीं बोलीं पर उनके झुके सिर इस बात की गवाही दे रहे थे कि उन्हों ने कुछ गलत किया था।
       "बोलो वृंदा - नंदा तुम लोगों ने पान में कुछ मिलाया था ?'
       "हाँ मम्मी अपने दोस्तों के लिये हम ने कुछ पानों में चुटकी भर रंग डाला था पर हमारे पान अलग प्लेट में थे । हमने टीचर को दिये भी नहीं थे ...हम से बात करते हुए टीचर ने एक पान उठा कर मुंह में रख लिया ।उन्हे रोकने का हमें मौका ही नही मिला ...सॉरी मम्मी ।'
       "सॉरी मुझे से नहीं अपनी टीचर से बोलना...मुझे तुम दोनो से ऐसी उम्मीद नहीं थी ।यह तो बड़ा गंदा मजाक है ।तुम्हे अपने दोस्तों के साथ भी ऐसा मजाक नहीं करना चाहिये था ।थोड़ा रंग - गुलाल लगाने तक तो ठीक है पर खाने की वस्तु में मिलावट ....इस से तो किसी की जान भी जा सकती है।'
        "आगे से हम ऐसी गल्ती फिर कभी नहीं करेंगे ।...प्लीज मम्मी पापा को यह सब मत बताना ।' कह कर दोनो बहने रोने लगी थीं
         "पापा से कहने न कहने की बात बाद में सोचेंगे...  पहले तुम दोनो टीचर के पास जा कर उन से माफी माँग कर आओ ।'
        "हाँ मम्मी हम आज ही उनके पास जा कर अपनी गल्ती के लिये क्षमा माँगेंगे ।'

 

--
-पवित्रा अग्रवाल
 

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

बाल कहानी
 
                    बड़ा दान
 
                                                                पवित्रा अग्रवाल

            अंश स्कूल से जब घर लौटा तो उसके घर के सामने पुरुषों की भीड़ लगी थी और कुछ स्त्रियाँ घर के अंदर जा रही थीं।सब के चहरे पर उदासी थी।वह परेशान हुआ कि सुबह तक तो घर में सब कुछ ठीक ठाक था उसके पीछे ऐसा क्या हो गया।क्या कोई एक्सीडेन्ट हो गया।वह भाग कर घर के अंदर पहुँचा तो गैलरी में दादा जी का शव रखा था।दादी व मम्मी पास बैठी रो रही थीं ।
          दादा जी अंश के दादा ही नहीं दोस्त भी थे।वह घर बाहर ,स्कूल ,दोस्तों की सब बातें उन्हे जरूर बताता था।कभी कोई परेशानी हो , कोई दुविधा हो तो दादा जी चुटकियों में हल कर देते थे।दादा जी के शव को देख कर वह सुबकने लगा--"मम्मी दादा जी को अचानक ये क्या हो गया,सुबह तक तो वह बिल्कुल ठीक थे,मुझे स्कूल बस तक छोड़ कर आये थे।'
          मम्मी ने अंश को गले से लगा लिया--"कुछ भी नहीं हुआ था बेटा,दोपहर को दो-ढ़ाई बजे खाना खाकर आराम करने अपने कमरे में चले गये।तभी अचानक उन्होंने अपने सीने में दर्द की शिकायत की, मैं भाग कर सामने वाली क्लीनिक से डा.सिन्हा को बुला कर लाई तब तक उनकी मौत हो चुकी थी।डाक्टर साहब कह रहे थे कि हार्ट फेल हुआ है।'
        वह मम्मी के पास बैठ कर सुबकता रहा।तभी उसे एक बात याद आई और उसने दादी से पूछा -- "दादी दादा जी तो अब जा चुके हैं क्यों न हम उनकी आँखे दान कर दें।'
       "अंश तू ये क्या बेवकूफी की बातें कर रहा है, क्या ऐसा भी कभी होता है ?'
       " हाँ ऐसा होता है दादी। चार पाँच महीने पहले मेरे दोस्त की दादी की मौत हुई थी तो उनकी आँखे दान कर दी गई थीं।उन आँखों से दो नेत्रहीन लोग  इस दुनियाँ को देख पाये ।'
       "नहीं नहीं मैं उनकी लाश की दुर्गति नहीं होने दूँगी ।दान करने के लिए तो आँखें निकालनी पड़ेंगी ।'
       "नहीं दादी पूरी आँख नहीं निकालनी पड़ेगी,आँख का जो काला भाग होता है न जिसे पुतली कहते हैं बस वही निकालनी पड़ेंगी।लेकिन दादी सोचिए यह कितने पुण्य का काम है ,दादा जी की आत्मा को भी बहुत शान्ति मिलेगी। वैसे दादा जी की भी इच्छा थी कि मृत्यु के बाद उनके नेत्र दान कर दिये जायें।'
      "नेत्र दान की बात तेरे दादा जी ने मुझे तो कभी नहीं बताई, तुझ से कब कह दिया ?'
      "जिस दिन मैंने उन्हें अपने दोस्त की दादी के नेत्र दान की बात बताई थी उसी दिन उन्हों ने कहा था कि  मरने के बाद शरीर तो जल कर समाप्त हो जाता है यदि मृत व्यक्ति की आँखों से दो लोगों को नेत्र - ज्योति मिल जाये तो इस से बड़ा दान तो कुछ हो ही नहीं सकता।..मेरे मरने के बाद मेरी ऑखें भी दान कर देना।'
       पास बैठी एक महिला ने पूछा-- "एक आदमी की आँखों से दो लोगों को ज्याति कैसे मिल जाती है ?'
      "दो आँखें दो लोगों को लगाई जाती हैं।...प्लीज दादी अब ना मत करना।'
       "अच्छे काम  के लिए मैं मना नहीं करुँगी बल्कि मैं अभी से कहे दे रही हूँ मरने के बाद मेरी आँखें भी दान कर देना।जाकर इस काम के लिए अपने पापा को मना ले।'
        अंश की बात सुन कर पापा बोले "मुझे तो कोई जानकारी नहीं हैं कि इस के लिए कहाँ सम्पर्क किया जाए, ना ही यह पता है कि मौत के कितनी देर बाद तक कोर्निया काम आ सकता है।'
        "पापा मैं ने कहीं पढ़ा था कि मौत के पाँच-छै घन्टे के अन्दर पुतलियाँ निकालने का काम हो जाना चाहिये वरना फिर वह काम की नहीं रहतीं ।सामने वाले डाक्टर अंकल से बात करिये पूरी जानकारी मिल जाएगी।'
        डाक्टर साहब ने आई बैंक को फोन मिला कर आई डोनेशन की बात बताई और एक घंटे के अंदर ही"आईबैंक' की यूनिट ने आ कर कोर्निया निकाल लिया और कहा --  "बहुत बहुत धन्यवाद, इस दान से दो लोगो की अंधेरी जिन्दगी रोशनी से भर जायेगी ।'
    दादा जी की शव यात्रा की तैयारी होने लगी थी।
  
    
-पवित्रा अग्रवाल
-- 09393385447
     --
 
 
 

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

और ठग पकड़े गए

बाल कहानी
    
                     और ठग पकड़े गए
                                                  
 
                                                                 पवित्रा अग्रवाल
 
             रमेश की परीक्षायें चल रही थीं।वह पढ़ाई में लगा था ।पढ़ते पढ़ते थक गया तो कुछ चहल कदमी करने अपने कमरे से बाहर निकल आया । उसने देखा मम्मी दरवाजे पर खड़ी किसी से बात कर रही हैं । उसने खिड़की से देखा दरवाजे पर दो लोग बैठे थे और मम्मी उनसे अपने कुछ गहने साफ करवा रही थीं
            गहने चमकाने की बात सुनते ही वह कुछ चौकन्ना हो गया । उसे  याद आया कि गहने चमकाने के नाम पर महिलाओं के गहने ले कर चम्पत हो जाने की घटनाये तो रोज ही अखवारों में छपती रहती हैं । पता नहीं मम्मी अखवार नहीं पढ़तीं क्या जो इस तरह लुटने को तैयार हैं  । वह सोच में पड़ गया कि क्या किया जाए... यदि दरवाजे पर जाएगा तो उन लोगों को पता चल जाएगा कि मम्मी घर पर अकेली नहीं हैं क्योंकि यह ठग लोग तभी आते हैं जब घर के पुरुष काम पर और बच्चे स्कूल गए होते हैं ।
          कुछ सोच कर रमेश पीछे के दरवाजे से घर के बाहर चला गया और दूर एक पेड़ के नीचे खड़े हो कर अपने घर पर नजर रखने लगा । उसने देखा मम्मी गहने उनके पास छोड़ कर अंदर गई हैं । गई क्या हैं उन दोनो ने ही किसी बहाने से कुछ लाने के लिये अंदर भेजा होगा।
        तभी रमेश ने देखा वह दोनो घर का दरवाजा बाहर से बंद कर के तेजी से वहाँ से जाने लगे । रमेश ने सैलफोन से फोन कर के अपने दो मित्रों को भी वहाँ बुला लिया था । रमेश और उसके दोस्तो ने भाग  कर उनको पकड़ लिया । राह चलते लोग भी वहाँ इकट्ठे हा गये और पूरी बात जान कर  उनकी पिटाई करने लगे।
           बाहर से दरवाजा बंद देख कर मम्मी भी पीछे के दरवाजे से दौड़ती ,हाँफती बाहर आई। रमेश और उसके दोंस्तों को वहाँ देख कर उन्हें थोड़ा चैन मिला वह बोली ---" बेटा पहले इनके सामान की तलाशी लो ,यह मेरे गहने ले कर भागे हैं।'
          तलाशी लेने पर मम्मी के गहने एक की जेब से निकल आये।लोग उनकी फिर लात घूसों से पिटाई करने लगे।
           रमेश बोला-" हमें कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिये, इनको पुलिस के हवाले कर देते हैं'
         वह दोनो हाथ पैर जोड़ने लगे   -- "नही नही हमें पुलिस के हवाले मत करो,हमने आज पहली बार यह अपराध किया है ।'
         तभी भीड़ देख कर डंडा फटकारते दो पुलिस के जवान वहाँ आ गये -"अरे यहाँ भीड़ क्यो लगा रखी है ?'
        रमेश की पूरी बात सुन कर सिपाही ने उन दोनो ठगों को अपनी गिरफ्त में ले कर कहा --" शाबाश बेटा तुमने बहुत अच्छा काम किया है। अब इनको तो सजा मिलेगी ही पर ये हमारी माताये, बहने कब समझेंगी ? हम अक्सर महिलाओ को इन चोर - लुटेरो से सावधान रहने  की अपील समाचार पत्रों के माघ्यम से करते रहते हैं पर फिर भी यह लुटती रहती हैं और हमें दोष दिया जाता है कि पुलिस कुछ नहीं करती ।...बहन जी देखो आपका बच्चा कितना होशियार है... आप भी थोड़ा अखवार आदि पढ़ा करो ।'
     
                                                       --------  


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-पवित्रा अग्रवाल