शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

सॉरी पापा

बाल कहानी                                                                
 
                                सॉरी पापा
 
                                                             पवित्रा अग्रवाल
 
        मम्मी को मिनी के स्कूल गए एक घंटा हो चुका था और वह अभी तक नहीं लौटी थीं। राहुल परेशान सा इस कमरे से उस कमरे में चक्कर लगा रहा था। तभी फोन की घंटी बज उठी।
            दुकान से पापा का फोन था, "मिनी का फोन आया है। मैं अस्पताल जा रहा हूँ। मम्मी सड़क पर बेहोश हो गई थी। लोगों ने उन्हें अस्पताल पहुँचाया है।...तुम से क्या कहूँ..कितने स्वार्थी हो तुम...खुद आराम से घर में बैठे हो। मिनी को स्कूल से लेने बीमार माँ गई है। तुम जैसी औलाद को तो बिना माँ का होना चाहिए तभी अक़्ल ठिकाने आएगी।' कह कर पापा ने फोन रख दिया था।
          राहुल यह भी नहीं पूछ पाया कि माँ किस अस्पताल में हैं। उसका मन जोर-जोर से रोने को करने लगा। यदि आज माँ को कुछ हो गया तो पापा उसे कभी माफ नहीं करेंगे और वह स्वयं को माँ की मौत का कारण मान कर पछताता रहेगा। कभी-कभी उसे क्या हो जाता है। अब वह इतना छोटा भी नहीं है, नौवीं में पढ़ता है। रोज साइकिल से स्कूल जाता है।
        उसे याद आया कि दोपहर को पापा का फोन मम्मी के पास आया था कि "आज दुकान पर नौकर नहीं आए हैं अत: मैं मिनी को स्कूल से नहीं ला पाऊँगा। राहुल की तो आज छुट्टी है, वह घर पर ही होगा। उससे कहो आटो से जा कर मिनी को ले आए।'
       मम्मी से ये बात सुन कर कि मिनी को स्कूल से आज उसे लाना है। राहुल का मूड खराब हो गया। उसने स्पष्ट कह दिया, "मैं मिनी को लेने नहीं जा सकता। आटो वाले स्कूल पर रुकने को तैयार नहीं होते। लौटते में दूसरा आटो लेना पड़ेगा, जो बड़ी मुश्किल से मिलता है। पिछली बार भी आधा घंटा इंतजार के बाद आटो मिला था। कितनी बार कहा स्कूटर चलाना सिखा दो लेकिन उसके लिए तो मैं छोटा हूँ। स्कूल से मिनी को लाने के लिए मैं बड़ा हो गया हूँ।'
          मम्मी उदास हो गई थी। यदि वह पापा को फोन करतीं तो वह किसी भी तरह मिनी को स्कूल से ले तो आते किंतु राहुल के इन्कार करने पर उसे बहुत डाँट पड़ती। पापा के गुस्से से उसे बचाने के लिए ही मम्मी ने उन्हें फोन नहीं किया और स्वयं मिनी को लेने चली गई ।
         मम्मी वैसे भी स्वस्थ नहीं रहतीं। कुछ महीने पूर्व ही लंबी बीमारी से उठी हैं। डॉक्टर ने उन्हें अधिक थकान वाले काम करने को मना किया है। पापा तो मम्मी का बहुत ख्याल रखते हैं। घर में भी उनकी मदद करते हैं। पापा के कई बार समझाने पर भी वह मम्मी की मदद नहीं करता।
       राहुल समझ गया कि लौटते में मम्मी को आटो नहीं मिला होगा। बाहर बहुत तेज धूप है। आटो वाले उस समय अपने-अपने आटो में पड़े सोते रहते हैं। लंबी दूरी के लिए तो जाने को तैयार हो जाते हैं। दो-तीन किलोमीटर दूर की सवारी तो लेना ही नहीं चाहते या फिर डबल पैसे माँगते हैं। हो सकता है तेज धूप व गर्मी से मम्मी बेहोश हो गई हों।
 राहुल सोच रहा था कि पापा ने सही कहा था , मैं बहुत स्वार्थी हूँ। पिछले वर्ष जब मम्मी अस्पताल में थीं तब घर ,घर नहीं लगता था। काम वाली बाई भी गाँव गई हुई थी। घर कितना अस्त-व्यस्त हो गया था। न समय पर नाश्ता मिलता था न खाना। नाश्ते में इडली, डोसा, ब्रेड  खा-खाकर इतना बोर हो गया था कि आज भी वह सब अच्छा नहीं लगता। न समय पर कपड़े धुले मिलते थे न प्रेस किए हुए। पापा भी घर, अस्पताल, दुकान सब सँभालते-सँभालते बीमार से हो गए थे। अस्पताल से आकर मम्मी ने धीरे-धीरे सब सँभाल लिया...और मैं तो भूल ही गया कि मम्मी कभी बीमार थीं वैसे अब भी उन्हें लगातार दवाएँ खानी पड़ती हैं।...हे भगवान इस बार माँ को कुछ न हो वर्ना मैं अपने को कभी माफ नहीं कर पाऊँगा।
          तीन-चार घंटे बाद पापा माँ को अस्पताल से लेकर आए थे। उसने दरवाजे पर ही धीमे स्वर में पापा से मम्मी को कहते सुना था, "तुम्हें मेरी कसम है, राहुल को अब डाँटना नहीं।'
         पापा ने उससे कुछ कहा तो नहीं किंतु गुस्से से उसे घूर कर देखा था।
 राहुल आँखों में आँसू भर कर, "मुझे माफ कर दो पापा' कह कर मम्मी से लिपट कर रोने लगा था।
 
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-पवित्रा अग्रवाल
 

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