बुधवार, 7 नवंबर 2012

एक बाल्टी पानी का कमाल

  बाल कहानी                              


         एक बाल्टी पानी का कमाल

                                                 पवित्रा अग्रवाल

               "शुभम अपार्टमेंट' अभी नया बना था। उसमें रहने वाले सभी बच्चों के लिए यहाँ पहली दिवाली थी। यों तो सभी तल्ले बहुत अच्छे बने हैं, हवा व रोशनी भी खूब आती है किंतु बच्चे ये सोच-सोच कर परेशान थे कि दिवाली पर पटाखे कहाँ फोड़े जाएँ। यहाँ तो कोई उपयुक्त जगह नहीं दिख रही। नीचे थोड़ी खुली जगह है लेकिन उसके चारों ओर पाँच मंजिल में मकान बने हैं। खिड़की, दरवाजों से रॉकेट आदि किसी मकान में जाकर गिर सकते हैं। सबसे अच्छी व सुरक्षित जगह बच्चों को इमारत की विशाल छत ही लगी।
              दिवाली के दिन सभी बच्चे अपने-अपने भाई-बहनों के साथ बम-पटाखे, फुलझड़ी, अनार, रॉकेट, मोमबत्ती आदि लेकर छत पर चले गए। कुछ बच्चों के माता-पिता ऊपर आकर निर्देश दे आए कि कोई शरारत नहीं करेगा। लंबी छड़ी से पटाखों को आग लगाना। पटाखे न जलने पर भी नजदीक नहीं जाना।
              सभी मिलकर पटाखे छोड़ रहे थे और उत्साहित हो कर शोर मचा रहे थे। माँ की नजर बचा कर छह वर्ष की नन्हीं संगीता भी न जाने कब छत पर आ गई थी। लाल रंग की मोती जड़ी फ्राक में वह गुड़िया-सी लग रही थी। बच्चों के साथ वह भी खूब मस्ती कर रही थी। तभी एक मोमबत्ती के पास खड़े होने की वजह से उसकी घेरदार फ्राक ने आग पकड़ ली। चारों तरफ "पानी लाओ, ....बचाओ' का शोर मच गया। कोई पानी लेने नीचे जाता, उसके पहले ही एक लड़के ने एक बाल्टी पानी संगीता पर डाल दिया। देखते ही देखते आग बुझ गई। डरी हुई संगीता ने लड़के की टाँगें पकड़ ली थी । उसने संगीता को गोद में उठा लिया।
            इतनी देर में वहाँ बहुत लोग आ गए थे। सबके मुँह पर एक ही सवाल था। आग किसने बुझाई ? सबकी नजर संगीता को गोदी में लेकर खड़े ग्यारह-बारह  वर्षीय लड़के पर पड़ी जिसने पुराने-से कपड़े पहन रखे थे।
          किसी ने पूछा- "बेटे, तुम कौन हो ? इस इमारत के तो नहीं हो...यहाँ कैसे आना हुआ ? '
         "अरे यह तो देवदूत की तरह आया है, इसी की वजह से आज संगीता की जान बची है'
         "मेरा नाम रामू है। मेरी माँ चार सौ दो नंबर में काम करती है। जब स्कूल की छुट्टी होती है तो मैं भी माँ के साथ यहाँ आ जाता हूँ। आज भी माँ के साथ यहाँ आया था। मेरे पास पटाखे नहीं हैं... बच्चों को तरह-तरह के पटाखे जलाते हुए देखना मुझे बहुत अच्छा लगता है। इसलिए पटाखों की आवाज सुनकर मैं भी ऊपर आ गया था।'
         "आग बुझाने के लिए इतनी जल्दी तुम्हारे पास पानी कहाँ से आया ? '
          "आंटी जब से मैं ऊपर आया हूँ तब से मुझे बार-बार यह डर लग रहा था कि कहीं कोई बच्चा जल न जाए। थोड़ी देर पहले मैं चार सौ दो नंबर फ़्लैट में बैठा टी. वी. देख रहा था। टी.वी. पर बार-बार यही बता रहे थे कि पटाखे बहुत सावधानी से जलाने चाहिए वर्ना दुर्घटना हो सकती है। उसमें यह भी बताया था कि "पटाखे जलाते समय एक बाल्टी पानी अपने पास अवश्य रखें।' मैंने छत पर चारों तरफ नजर दौड़ाई तो मुझे एक खाली बाल्टी रखी दिखाई दी। मैंने छत पर बनी पानी की टंकी में से उसे भर कर रख लिया था। देखिए न आंटी एक बाल्टी पानी का कमाल। यह छोटी बच्ची आज बच गई।'
        संगीता की माँ ने रामू को गले से लगा लिया- "बेटे तुमने मेरी इकलौती बेटी की जान बचाई है। मैं तुम्हारा एहसान कैसे उतारूँगी ?...तुम क्या करते हो ? '
       "आंटी, मैं कक्षा छह में पढ़ता हूँ।'
       "तुम्हें पढ़ना अच्छा लगता है ? "
         "हाँ आंटी, मुझे पढ़ना बहुत अच्छा लगता है।'
        "तुम्हारी माँ कहाँ है ? '
 भीड़ पर नजर डाल कर उसने पीछे खड़ी अपनी माँ को सामने लाकर खड़ा कर दिया -       -"यही मेरी माँ है।'
        "बहन, तुम्हारा यह बेटा बहुत लायक है। यह जहाँ तक पढ़ना चाहे, तुम इसे पढ़ाना।...मैं तुम्हारी मदद करूंगी ।'
        सब तरफ रामू की वाह-वाह हो रही थी। रामू और उसकी माँ की आँखें खुशी से भर आई थीं ।
    

-पवित्रा अग्रवाल