शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2012

दुविधा

बाल कहानी


                            दुविधा                   
                                                   पवित्रा अग्रवाल


             वैसे तो रोली और सुलभा अच्छी दोस्त हैं किंतु पढ़ाई में दोनों के बीच स्पर्धा चलती है। दोनों ही एक-दूसरे से अधिक नंबर लाने के प्रयास में लगी रहती हैं। क्लास में कभी सुलभा  सैकिंड  आती है तो रोली थर्ड आती है। कभी रोली फस्र्ट होती है तो सुलभा सैकिंड ।
         इस बार छमाही परीक्षा देते ही रोली को चार-पाँच दिन के लिए शहर से बाहर जाना पड़ रहा था। वह जाना तो नहीं चाहती थी क्योंकि परीक्षा के बाद उत्तर पुस्तिकाएँ चैक करके टीचर रिजल्ट तैयार करने से पूर्व देखने के लिए छात्राओं को देती हैं । ताकि सब अपनी-अपनी उत्तर-पुस्तिका देख सकें कि टोटल सही है या नहीं, कोई प्रश्नोत्तर नंबर देने से छूट तो नहीं गया। टीचर कितने भी ध्यान से कॉपी चैक क्यों न करें फिर भी कभी-कभी इस तरह की कुछ ग़लतियाँ हो ही जाती हैं। रिजल्ट कार्ड तैयार होने के बाद फिर त्रुटियों को ठीक करना संभव नहीं होता। इसीलिए पढ़ने में होशियार छात्राएँ इन दिनों स्कूल से अनुपस्थित नहीं रहना चाहतीं।
       बुआ की शादी होने की वजह से रोली को जाना पड़ा। अपनी उत्तर-पुस्तिकाओं को ठीक से चैक करने का काम रोली ने सुलभा को सौंप दिया था। किंतु उसके मन में कहीं एक डर भी था कि सुलभा किसी विषय में उसके नंबर कम न करवा दे। कई बार टीचर गलती से अधिक नंबर भी दे देती है जिन्हें शायद ही कोई लड़की कम करवाने जाती हो। हाँ टीचर जब गलती से कम नंबर दे देती हैं तो बढ़वाने सब चली जाती हैं।
       पहले दिन कुछ विषयों की उत्तर पुस्तिका मिलीं। गणित में रोली के सौ में से निन्यानवे अंक थे। सुलभा के चौरान्वे थे। रोली की पुस्तिका चैक करने पर सुलभा ने पाया कि टीचर ने एक गलत जवाब पर भी उसे पाँच अंक दे रखे हैं। सुलभा ने टीचर को बता कर रोली के पाँच अंक कम करवा दिये।
        दूसरे दिन भी कुछ विषयों की पुस्तिका दी गयीं। सुलभा को टीचर ने बॉयलोजी में दो अंक अधिक दे रखे थे। उसने जल्दी से अपनी उत्तर-पुस्तिका छुपा ली। साथ बैठी लड़की को यदि अधिक नंबर दिये जाने की बात पता चल जाती तो सुलभा को अपने नंबर कम करवाने पड़ते।

       रोली को टीचर ने चार नंबर कम दे रखे थे। सुलभा के मस्तिष्क में संघर्ष चल रहा था। वह दुविधा में थी कि रोली के चार नंबर टीचर से बढ़वाए या नहीं ? और अपने दो नंबर कम करवाए या नहीं ? यदि वह रोली के नंबर बढ़वाती है और अपने कम करवाती है तो वह स्वयं रोली से एक रेंक पीछे रह जाएगी। अभी तो वह सैकंड आ रही है और रोली थर्ड है। इसी सोच विचार में घंटी बज गई और टीचर ने सब से उत्तर-पुस्तिकाएँ वापस ले लीं।
          घर आकर सुलभा बहुत परेशान थी। क्या उसने सही किया ? क्या उसको ऐसा करना चाहिए था ? उसने अपनी परेशानी मम्मी को बताई।
        मम्मी ने भी यही कहा, "सुलभा तुम्हें दोनों के नंबर टीचर से ठीक करवाने चाहिए थे। रोली तुम पर विश्वास  करके यह काम तुम्हें सौंप कर गई थी। जब तुमने ईमानदारी से उसके नंबर कम करवाए हैं तो बढ़वाने की जगह पर बढ़वाने भी चाहिए थे।'
      "लेकिन मम्मी ऐसा करने पर मैं उससे पीछे रह जाऊँगी।'
      "पीछे तो तुम हो ही और ये बात तुम तो जानती भी हो, भले ही क्लास में अन्य कोई नहीं जानता। क्या तुम उससे आगे रहने की खुशी मन से मना पाओगी ?'
     "मम्मी एक बात और, क्या मुझे अपने दो नंबर भी कम करवाने चाहिए ? क्लास में लड़कियाँ नंबर बढ़वाने तो सब चली जाती हैं लेकिन कम करवाने कोई भी नहीं जाता।'
     "देखो बेटा लालच की शुरुआत छोटे स्तर से ही होती है। धीरे-धीरे जब ये आदत में शामिल हो जाता है तो आदमी बड़े लालच में फँस कर और बड़ी बेइमानी करने लगता है। तुम्हारी ईमानदारी से तुम्हारी रैंक तो कम हो जाएगी किंतु मन को कहीं संतोष भी मिलेगा।...अब फैसला तुम्हारे हाथ में है।'
      "ठीक है मम्मी मेरी दुविधा अब समाप्त हो गई। मैं कल जाकर टीचर से दोनों के नंबर ठीक करवा लूँगी। वैसे मुझे इस बात पर टीचर की डाँट खानी पड़ेगी क्योंकि उन्होंने पहले ही कह दिया था, "जिसको नंबर ठीक करवाने हैं, वह आज ही करवा ले। कल मैं ठीक नहीं करूँगी।' खैर मैं टीचर के पास जाऊँगी।'
       दूसरे दिन सुलभा टीचर की डाँट की चिंता किए बिना उनके पास स्टाफ रूम में चली गई।
     "सॉरी मैडम, एक काम था आपसे । रोली के टोटल में आपने चार नंबर कम लिखे हैं और मेरे टोटल में दो नंबर ज्यादा लिख दिये हैं।...उन्हें ठीक करवाने आई हूँ।'
       "कल क्लास में क्यों नहीं करवाए ?'

       "मैडम कल मेरे मन में लालच आ गया था। अभी मैं क्लास में सैकंड हूँ, रोली थर्ड है। टोटल सही करवाने के बाद रोली सैकंड हो जाएगी और मैं थर्ड। बस कल इसी लालच में फँस कर मैंने नंबर ठीक नहीं करवाए किंतु घर जाकर मुझे पछतावा हुआ।'
     टीचर ने बड़े स्नेह से सुलभा की पीठ थपथपाई और बोली,      "मुझे तुम्हारी ईमानदारी पर गर्व है।...तुम जाओ मैं नंबर ठीक कर दूँगी।'
       सुलभा के मन पर छाई उदासी दूर हो गई थी  ।
    

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