मंगलवार, 5 जून 2012

सजा देने का हक

बाल कहानी - पवित्रा अग्रवाल
                 
                                           सजा देने का हक                                                           
                                                            
       रीमा आज बेचैन  थी।पूजा और वो एक ही स्कूल में व एक ही सैक्शन में हैं।बल्कि वह बैठती  भी एक ही बैंच पर हैं । वह आपस में मित्र भी हैं पर पता नहीं क्यों  आज पूजा अनुपस्थित है जब कि उसकी उपस्थिति सैंन्ट परसेंन्ट रहती है।वैसे वह जानती है कि कल से पूजा उससे नाराज है ,कल उसने पूरे दिन रीमा से बात नहीं की। घर जाकर रीमा  ने पूजा को फोन भी किया था पर आवाज सुन कर ही उसने फोन काट दिया था।नाराजगी का कारण भी वह जानती है ।


      पूजा के देर से आने पर उसने अन्य छात्राओ के साथ उसे भी सजा दी थी पर इस में बुरा मानने की क्या बात हैं... वैसे जब से रीमा कक्षा की मानीटर बनी है तब से पता नहीं क्यों उसकी खास सहेलियाँ भी धीरे - धीरे कर उस से दूर होने लगी हैं।उस के हिसाब से उसकी सहेलियाँ उस के मानीटर बन जाने पर उस से फेवर चाहने लगी हैं जैसे लेट होंने पर उनको सजा से छूट दे दी जाये, उनकी शरारतों को अनदेखा कर दिया जाये किन्तु वह ऐसा नहीं करती तो सब  उसे घंमडी कहने लगी हैं। असल में कक्षा में उसका रुतबा देख कर वह सब उससे जलने लगी हैं।..पर आज पूजा का ना आना पता नहीं क्यों रीमा  बेचैन कर रहा है।

       उसने घर जाते ही सब से पहले पूजा को फोन किया --
     "हैलो क्या मैं पूजा से बात कर सकती हूँ..आज वह स्कूल नहीं आई।'
     "हाँ, आज उसकी तबियत ठीक नही थी,इसी लिये नहीं आ पाई ।'
     "आप पूजा की मम्मी बोल रही हैं ?'
     "हाँ,तुम कौन बोल रही हो ?'
     "नमस्ते आन्टी,मैं उसकी दोस्त रीमा बोल रही हूँ।'
      "अच्छा क्लास मॉनीटर रीमा ।'
      "जी आन्टी,क्या आप मुझे जानती हैं ?'
      "जानती तो नहीं थी, पर अब जान गई हूँ।...क्या हो गया है तुम बच्चों को...मॉनीटर
 बन के क्या खुद को   स्कूल का प्रिंसिपल  समझने लगी हो ? तुम्हें अपने ही साथियों को सजा देने का हक किसने दिया है ?'

      "आन्टी टीचर की अनुपस्थिति में क्लास में अनुशासन की जिम्मेदारी हमारी होती है।'
      "अनुशासन का मतलब यह नही कि तुम सजा भी देने लगो।...पूजा क्लास की मेधावी छात्रा है और समय की पाबंद भी।एक दिन वह लेट हो गई तो तुम ने उसे  एक दो नहीं सीधे पचास सिट- अप की सजा दे दी।..वैसे भी बात सिर्फ पूजा की नहीं है, किसी को भी सजा देने का तुम्हें कोई हक नही है।'

     "आन्टी ऐसा तो हम रोज ही करते हैं।'

     "गलत करती हो, अब नहीं कर पाओगी।आजकल तो टीचर भी छात्रों को सजा देने से डरते हैं । यदि समाचार पत्र  नहीं पढ़ती हो तो आज पढ़ लेना, एक बच्चे को सजा देने की वजह से टीचर को सस्पेंड कर दिया गया है। कल मैं भी प्रिंसिपल  के पास शिकायत करने जाने वाली हूँ ।...पूजा के पैरो में इतना दर्द है कि वह आज स्कूल भी नही जा पाई।'
      "सॉरी आन्टी, आप प्रिंसिपल  से शिकायत मत कीजिये।मैं आज के बाद किसी को सजा नहीं दूँगी,हम लोग तो यह सब मस्ती में करते थे।'

     "वाह मस्ती का अच्छा तरीका है ,सिर्फ क्लास मॉनीटर चुन लिये जाने पर तुम लोग स्वयं को अपने ही साथ के बच्चों से इतना सुपीरियर समझने लगते हो कि उन्हे सजा देने में संकोच नहीं होता।... पर कभी टीचर सजा देती हैं तो माता पिता को बुला लाते हो "

     "आप बिलकुल ठीक कह रहीं हैं आन्टी,मुझे सजा नहीं देनी चाहिये थी ... मुझे मेरी गल्ती का अहसास कराने के लिये थैंक यू आन्टी।....आप ने  मुझे माफ कर दिया न आन्टी ?'
     "बेटा जब तुम्हें अपनी गल्ती का अहसास हो गया तो माफ तो करना ही पड़ेगा न ।'
    "आन्टी मैं पूजा से बात कर के उस से माफी माँगना चाहती हूँ,उस से बात करा दीजिये प्लीज।'

 "हाँ अभी बात कराती हूँ।'

                                            
                                                         ----
-पवित्रा अग्रवाल 




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