गुरुवार, 1 मार्च 2012

बीच सड़क पर

बाल कहानी                                     बीच सड़क पर
 
                                                                                                              पवित्रा अग्रवाल
 
          शहर में आटोज की हड़ताल थी। संदीप के पापा शहर से बाहर गए हुए थे। वरना पापा संदीप को स्कूटर से स्कूल छोड़ आते । स्कूल दूर था। रिक्शे से जाने में बहुत समय लगता है। संदीप ने अपने मित्र मयंक के साथ बस द्वारा स्कूल जाने का फैसला किया। मयंक के पास तो बस का पास था।
         मम्मी ने बस टिकट के लिए रेज़गारी देते हुए संदीप से कहा- "बस स्टाप पर ही बस से उतरना। ऐसा नहीं कि स्कूल के पास कहीं बस की गति जरा धीमी हुई और तुम बीच सड़क पर ही उतर जाओ।'
       "मम्मी जब भी मैं बस से स्कूल जाता हूँ आप ये सलाह देना कभी नहीं भूलती।'
      "बेटा सलाह इसलिए देते हैं कि हम तुम्हारे शुभचिंतक हैं। हमें तुम्हारी चिंता है।...बेटे मैंने इसी तरह सड़क पर कई दुर्घटनाएँ होते देखी हैं। स्टाप से गन्तव्य स्थल कुछ दूर पड़ेगा ये सोच कर बहुत से लोग चौराहे पर या सड़क के बीच में ही बस से उतर जाते हैं।...हो सकता है इस तरह बीच में उतर जाने से स्कूल, ऑफ़िस कुछ पास पड़ ज़ाए।....उनका कुछ समय भी बच सकता है किंतु यदि किसी दुर्घटना के शिकार हो गए तो हाथ-पैर तुड़वा कर महीनों अस्पताल में बिस्तर पर भी पड़ा रहना पड़ सकता है।...तुम्हारे सोनू अंकल की मृत्यु इसी तरह बस से उतरते समय हुई थी, पीछे से आ रही कार ने उन्हें टक्कर मार दी थी। वह तो चले गए किंतु उनकी नन्हीं बेटियों नीना-मीना का बचपन पितृ विहीन हो गया।...तुम्हारी आन्टी को भी कितनी आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।...ये क्या तुम नहीं जानते ?'
     "हाँ मम्मी आप बिल्कुल ठीक कह रही हैं। आटो से स्कूल जाते समय मैंने भी कई बार लोगों को इस तरह बीच सड़क पर बस से उतरते और गिरते भी देखा है। उन्हें चोट लगी या नहीं या कितनी लगी यह तो पता नहीं चल पाता क्योंकि तब तक आटो दूर निकल आता है।....आप चिंता न करें मम्मी मैं स्टाप पर ही उतरूँगा।'
       मयंक के साथ संदीप भी बस में चढ़ गया। स्कूल के पास ट्रैफ़िक की वजह से बस की गति कुछ धीमी हुई तो मयंक नीचे उतरने लगा।
     "ठहरो मयंक, इस तरह बीच में उतरना ठीक नहीं। जरा सा समय बचाने के लिए इस तरह कहीं भी उतर जाना खतरनाक हो सकता है।...हम स्टाप पर ही उतरेंगे।'
     "अरे यार संदीप तू तो बड़ा डरपोक है। मैं तो रोज़ इसी तरह उतरता हूँ।... मेरे साथ तो कभी कुछ नहीं हुआ है।...हाँ जो लापरवाही करते हैं उनके साथ दुर्घटना होते मैंने भी देखी हैं।'
     "यार मयंक दुर्घटना बताकर नहीं होती, अचानक होती है और कभी-कभी तो भूल सुधार का मौका भी नहीं देती।...आदमी सीधा ऊपर पहुँच जाता है।...दूसरी दुर्घटनाओं से हमें सबक सीखना चाहिए। खुद शिकार होके सबक सीखा तो क्या फायदा.....नीना-मीना को तू जानता है ना ?...उनके डैडी की मौत इसी तरह हुई थी।'
     "ठीक है संदीप मुझे तुम्हारी सलाह मंजूर है।...हम स्टाप पर ही उतरेंगे।'
                                                   
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 पवित्रा अग्रवाल

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