शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

सॉरी पापा

बाल कहानी                                                                
 
                                सॉरी पापा
 
                                                             पवित्रा अग्रवाल
 
        मम्मी को मिनी के स्कूल गए एक घंटा हो चुका था और वह अभी तक नहीं लौटी थीं। राहुल परेशान सा इस कमरे से उस कमरे में चक्कर लगा रहा था। तभी फोन की घंटी बज उठी।
            दुकान से पापा का फोन था, "मिनी का फोन आया है। मैं अस्पताल जा रहा हूँ। मम्मी सड़क पर बेहोश हो गई थी। लोगों ने उन्हें अस्पताल पहुँचाया है।...तुम से क्या कहूँ..कितने स्वार्थी हो तुम...खुद आराम से घर में बैठे हो। मिनी को स्कूल से लेने बीमार माँ गई है। तुम जैसी औलाद को तो बिना माँ का होना चाहिए तभी अक़्ल ठिकाने आएगी।' कह कर पापा ने फोन रख दिया था।
          राहुल यह भी नहीं पूछ पाया कि माँ किस अस्पताल में हैं। उसका मन जोर-जोर से रोने को करने लगा। यदि आज माँ को कुछ हो गया तो पापा उसे कभी माफ नहीं करेंगे और वह स्वयं को माँ की मौत का कारण मान कर पछताता रहेगा। कभी-कभी उसे क्या हो जाता है। अब वह इतना छोटा भी नहीं है, नौवीं में पढ़ता है। रोज साइकिल से स्कूल जाता है।
        उसे याद आया कि दोपहर को पापा का फोन मम्मी के पास आया था कि "आज दुकान पर नौकर नहीं आए हैं अत: मैं मिनी को स्कूल से नहीं ला पाऊँगा। राहुल की तो आज छुट्टी है, वह घर पर ही होगा। उससे कहो आटो से जा कर मिनी को ले आए।'
       मम्मी से ये बात सुन कर कि मिनी को स्कूल से आज उसे लाना है। राहुल का मूड खराब हो गया। उसने स्पष्ट कह दिया, "मैं मिनी को लेने नहीं जा सकता। आटो वाले स्कूल पर रुकने को तैयार नहीं होते। लौटते में दूसरा आटो लेना पड़ेगा, जो बड़ी मुश्किल से मिलता है। पिछली बार भी आधा घंटा इंतजार के बाद आटो मिला था। कितनी बार कहा स्कूटर चलाना सिखा दो लेकिन उसके लिए तो मैं छोटा हूँ। स्कूल से मिनी को लाने के लिए मैं बड़ा हो गया हूँ।'
          मम्मी उदास हो गई थी। यदि वह पापा को फोन करतीं तो वह किसी भी तरह मिनी को स्कूल से ले तो आते किंतु राहुल के इन्कार करने पर उसे बहुत डाँट पड़ती। पापा के गुस्से से उसे बचाने के लिए ही मम्मी ने उन्हें फोन नहीं किया और स्वयं मिनी को लेने चली गई ।
         मम्मी वैसे भी स्वस्थ नहीं रहतीं। कुछ महीने पूर्व ही लंबी बीमारी से उठी हैं। डॉक्टर ने उन्हें अधिक थकान वाले काम करने को मना किया है। पापा तो मम्मी का बहुत ख्याल रखते हैं। घर में भी उनकी मदद करते हैं। पापा के कई बार समझाने पर भी वह मम्मी की मदद नहीं करता।
       राहुल समझ गया कि लौटते में मम्मी को आटो नहीं मिला होगा। बाहर बहुत तेज धूप है। आटो वाले उस समय अपने-अपने आटो में पड़े सोते रहते हैं। लंबी दूरी के लिए तो जाने को तैयार हो जाते हैं। दो-तीन किलोमीटर दूर की सवारी तो लेना ही नहीं चाहते या फिर डबल पैसे माँगते हैं। हो सकता है तेज धूप व गर्मी से मम्मी बेहोश हो गई हों।
 राहुल सोच रहा था कि पापा ने सही कहा था , मैं बहुत स्वार्थी हूँ। पिछले वर्ष जब मम्मी अस्पताल में थीं तब घर ,घर नहीं लगता था। काम वाली बाई भी गाँव गई हुई थी। घर कितना अस्त-व्यस्त हो गया था। न समय पर नाश्ता मिलता था न खाना। नाश्ते में इडली, डोसा, ब्रेड  खा-खाकर इतना बोर हो गया था कि आज भी वह सब अच्छा नहीं लगता। न समय पर कपड़े धुले मिलते थे न प्रेस किए हुए। पापा भी घर, अस्पताल, दुकान सब सँभालते-सँभालते बीमार से हो गए थे। अस्पताल से आकर मम्मी ने धीरे-धीरे सब सँभाल लिया...और मैं तो भूल ही गया कि मम्मी कभी बीमार थीं वैसे अब भी उन्हें लगातार दवाएँ खानी पड़ती हैं।...हे भगवान इस बार माँ को कुछ न हो वर्ना मैं अपने को कभी माफ नहीं कर पाऊँगा।
          तीन-चार घंटे बाद पापा माँ को अस्पताल से लेकर आए थे। उसने दरवाजे पर ही धीमे स्वर में पापा से मम्मी को कहते सुना था, "तुम्हें मेरी कसम है, राहुल को अब डाँटना नहीं।'
         पापा ने उससे कुछ कहा तो नहीं किंतु गुस्से से उसे घूर कर देखा था।
 राहुल आँखों में आँसू भर कर, "मुझे माफ कर दो पापा' कह कर मम्मी से लिपट कर रोने लगा था।
 
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-पवित्रा अग्रवाल
 

बुधवार, 7 नवंबर 2012

एक बाल्टी पानी का कमाल

  बाल कहानी                              


         एक बाल्टी पानी का कमाल

                                                 पवित्रा अग्रवाल

               "शुभम अपार्टमेंट' अभी नया बना था। उसमें रहने वाले सभी बच्चों के लिए यहाँ पहली दिवाली थी। यों तो सभी तल्ले बहुत अच्छे बने हैं, हवा व रोशनी भी खूब आती है किंतु बच्चे ये सोच-सोच कर परेशान थे कि दिवाली पर पटाखे कहाँ फोड़े जाएँ। यहाँ तो कोई उपयुक्त जगह नहीं दिख रही। नीचे थोड़ी खुली जगह है लेकिन उसके चारों ओर पाँच मंजिल में मकान बने हैं। खिड़की, दरवाजों से रॉकेट आदि किसी मकान में जाकर गिर सकते हैं। सबसे अच्छी व सुरक्षित जगह बच्चों को इमारत की विशाल छत ही लगी।
              दिवाली के दिन सभी बच्चे अपने-अपने भाई-बहनों के साथ बम-पटाखे, फुलझड़ी, अनार, रॉकेट, मोमबत्ती आदि लेकर छत पर चले गए। कुछ बच्चों के माता-पिता ऊपर आकर निर्देश दे आए कि कोई शरारत नहीं करेगा। लंबी छड़ी से पटाखों को आग लगाना। पटाखे न जलने पर भी नजदीक नहीं जाना।
              सभी मिलकर पटाखे छोड़ रहे थे और उत्साहित हो कर शोर मचा रहे थे। माँ की नजर बचा कर छह वर्ष की नन्हीं संगीता भी न जाने कब छत पर आ गई थी। लाल रंग की मोती जड़ी फ्राक में वह गुड़िया-सी लग रही थी। बच्चों के साथ वह भी खूब मस्ती कर रही थी। तभी एक मोमबत्ती के पास खड़े होने की वजह से उसकी घेरदार फ्राक ने आग पकड़ ली। चारों तरफ "पानी लाओ, ....बचाओ' का शोर मच गया। कोई पानी लेने नीचे जाता, उसके पहले ही एक लड़के ने एक बाल्टी पानी संगीता पर डाल दिया। देखते ही देखते आग बुझ गई। डरी हुई संगीता ने लड़के की टाँगें पकड़ ली थी । उसने संगीता को गोद में उठा लिया।
            इतनी देर में वहाँ बहुत लोग आ गए थे। सबके मुँह पर एक ही सवाल था। आग किसने बुझाई ? सबकी नजर संगीता को गोदी में लेकर खड़े ग्यारह-बारह  वर्षीय लड़के पर पड़ी जिसने पुराने-से कपड़े पहन रखे थे।
          किसी ने पूछा- "बेटे, तुम कौन हो ? इस इमारत के तो नहीं हो...यहाँ कैसे आना हुआ ? '
         "अरे यह तो देवदूत की तरह आया है, इसी की वजह से आज संगीता की जान बची है'
         "मेरा नाम रामू है। मेरी माँ चार सौ दो नंबर में काम करती है। जब स्कूल की छुट्टी होती है तो मैं भी माँ के साथ यहाँ आ जाता हूँ। आज भी माँ के साथ यहाँ आया था। मेरे पास पटाखे नहीं हैं... बच्चों को तरह-तरह के पटाखे जलाते हुए देखना मुझे बहुत अच्छा लगता है। इसलिए पटाखों की आवाज सुनकर मैं भी ऊपर आ गया था।'
         "आग बुझाने के लिए इतनी जल्दी तुम्हारे पास पानी कहाँ से आया ? '
          "आंटी जब से मैं ऊपर आया हूँ तब से मुझे बार-बार यह डर लग रहा था कि कहीं कोई बच्चा जल न जाए। थोड़ी देर पहले मैं चार सौ दो नंबर फ़्लैट में बैठा टी. वी. देख रहा था। टी.वी. पर बार-बार यही बता रहे थे कि पटाखे बहुत सावधानी से जलाने चाहिए वर्ना दुर्घटना हो सकती है। उसमें यह भी बताया था कि "पटाखे जलाते समय एक बाल्टी पानी अपने पास अवश्य रखें।' मैंने छत पर चारों तरफ नजर दौड़ाई तो मुझे एक खाली बाल्टी रखी दिखाई दी। मैंने छत पर बनी पानी की टंकी में से उसे भर कर रख लिया था। देखिए न आंटी एक बाल्टी पानी का कमाल। यह छोटी बच्ची आज बच गई।'
        संगीता की माँ ने रामू को गले से लगा लिया- "बेटे तुमने मेरी इकलौती बेटी की जान बचाई है। मैं तुम्हारा एहसान कैसे उतारूँगी ?...तुम क्या करते हो ? '
       "आंटी, मैं कक्षा छह में पढ़ता हूँ।'
       "तुम्हें पढ़ना अच्छा लगता है ? "
         "हाँ आंटी, मुझे पढ़ना बहुत अच्छा लगता है।'
        "तुम्हारी माँ कहाँ है ? '
 भीड़ पर नजर डाल कर उसने पीछे खड़ी अपनी माँ को सामने लाकर खड़ा कर दिया -       -"यही मेरी माँ है।'
        "बहन, तुम्हारा यह बेटा बहुत लायक है। यह जहाँ तक पढ़ना चाहे, तुम इसे पढ़ाना।...मैं तुम्हारी मदद करूंगी ।'
        सब तरफ रामू की वाह-वाह हो रही थी। रामू और उसकी माँ की आँखें खुशी से भर आई थीं ।
    

-पवित्रा अग्रवाल
 

शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2012

दुविधा

बाल कहानी


                            दुविधा                   
                                                   पवित्रा अग्रवाल


             वैसे तो रोली और सुलभा अच्छी दोस्त हैं किंतु पढ़ाई में दोनों के बीच स्पर्धा चलती है। दोनों ही एक-दूसरे से अधिक नंबर लाने के प्रयास में लगी रहती हैं। क्लास में कभी सुलभा  सैकिंड  आती है तो रोली थर्ड आती है। कभी रोली फस्र्ट होती है तो सुलभा सैकिंड ।
         इस बार छमाही परीक्षा देते ही रोली को चार-पाँच दिन के लिए शहर से बाहर जाना पड़ रहा था। वह जाना तो नहीं चाहती थी क्योंकि परीक्षा के बाद उत्तर पुस्तिकाएँ चैक करके टीचर रिजल्ट तैयार करने से पूर्व देखने के लिए छात्राओं को देती हैं । ताकि सब अपनी-अपनी उत्तर-पुस्तिका देख सकें कि टोटल सही है या नहीं, कोई प्रश्नोत्तर नंबर देने से छूट तो नहीं गया। टीचर कितने भी ध्यान से कॉपी चैक क्यों न करें फिर भी कभी-कभी इस तरह की कुछ ग़लतियाँ हो ही जाती हैं। रिजल्ट कार्ड तैयार होने के बाद फिर त्रुटियों को ठीक करना संभव नहीं होता। इसीलिए पढ़ने में होशियार छात्राएँ इन दिनों स्कूल से अनुपस्थित नहीं रहना चाहतीं।
       बुआ की शादी होने की वजह से रोली को जाना पड़ा। अपनी उत्तर-पुस्तिकाओं को ठीक से चैक करने का काम रोली ने सुलभा को सौंप दिया था। किंतु उसके मन में कहीं एक डर भी था कि सुलभा किसी विषय में उसके नंबर कम न करवा दे। कई बार टीचर गलती से अधिक नंबर भी दे देती है जिन्हें शायद ही कोई लड़की कम करवाने जाती हो। हाँ टीचर जब गलती से कम नंबर दे देती हैं तो बढ़वाने सब चली जाती हैं।
       पहले दिन कुछ विषयों की उत्तर पुस्तिका मिलीं। गणित में रोली के सौ में से निन्यानवे अंक थे। सुलभा के चौरान्वे थे। रोली की पुस्तिका चैक करने पर सुलभा ने पाया कि टीचर ने एक गलत जवाब पर भी उसे पाँच अंक दे रखे हैं। सुलभा ने टीचर को बता कर रोली के पाँच अंक कम करवा दिये।
        दूसरे दिन भी कुछ विषयों की पुस्तिका दी गयीं। सुलभा को टीचर ने बॉयलोजी में दो अंक अधिक दे रखे थे। उसने जल्दी से अपनी उत्तर-पुस्तिका छुपा ली। साथ बैठी लड़की को यदि अधिक नंबर दिये जाने की बात पता चल जाती तो सुलभा को अपने नंबर कम करवाने पड़ते।

       रोली को टीचर ने चार नंबर कम दे रखे थे। सुलभा के मस्तिष्क में संघर्ष चल रहा था। वह दुविधा में थी कि रोली के चार नंबर टीचर से बढ़वाए या नहीं ? और अपने दो नंबर कम करवाए या नहीं ? यदि वह रोली के नंबर बढ़वाती है और अपने कम करवाती है तो वह स्वयं रोली से एक रेंक पीछे रह जाएगी। अभी तो वह सैकंड आ रही है और रोली थर्ड है। इसी सोच विचार में घंटी बज गई और टीचर ने सब से उत्तर-पुस्तिकाएँ वापस ले लीं।
          घर आकर सुलभा बहुत परेशान थी। क्या उसने सही किया ? क्या उसको ऐसा करना चाहिए था ? उसने अपनी परेशानी मम्मी को बताई।
        मम्मी ने भी यही कहा, "सुलभा तुम्हें दोनों के नंबर टीचर से ठीक करवाने चाहिए थे। रोली तुम पर विश्वास  करके यह काम तुम्हें सौंप कर गई थी। जब तुमने ईमानदारी से उसके नंबर कम करवाए हैं तो बढ़वाने की जगह पर बढ़वाने भी चाहिए थे।'
      "लेकिन मम्मी ऐसा करने पर मैं उससे पीछे रह जाऊँगी।'
      "पीछे तो तुम हो ही और ये बात तुम तो जानती भी हो, भले ही क्लास में अन्य कोई नहीं जानता। क्या तुम उससे आगे रहने की खुशी मन से मना पाओगी ?'
     "मम्मी एक बात और, क्या मुझे अपने दो नंबर भी कम करवाने चाहिए ? क्लास में लड़कियाँ नंबर बढ़वाने तो सब चली जाती हैं लेकिन कम करवाने कोई भी नहीं जाता।'
     "देखो बेटा लालच की शुरुआत छोटे स्तर से ही होती है। धीरे-धीरे जब ये आदत में शामिल हो जाता है तो आदमी बड़े लालच में फँस कर और बड़ी बेइमानी करने लगता है। तुम्हारी ईमानदारी से तुम्हारी रैंक तो कम हो जाएगी किंतु मन को कहीं संतोष भी मिलेगा।...अब फैसला तुम्हारे हाथ में है।'
      "ठीक है मम्मी मेरी दुविधा अब समाप्त हो गई। मैं कल जाकर टीचर से दोनों के नंबर ठीक करवा लूँगी। वैसे मुझे इस बात पर टीचर की डाँट खानी पड़ेगी क्योंकि उन्होंने पहले ही कह दिया था, "जिसको नंबर ठीक करवाने हैं, वह आज ही करवा ले। कल मैं ठीक नहीं करूँगी।' खैर मैं टीचर के पास जाऊँगी।'
       दूसरे दिन सुलभा टीचर की डाँट की चिंता किए बिना उनके पास स्टाफ रूम में चली गई।
     "सॉरी मैडम, एक काम था आपसे । रोली के टोटल में आपने चार नंबर कम लिखे हैं और मेरे टोटल में दो नंबर ज्यादा लिख दिये हैं।...उन्हें ठीक करवाने आई हूँ।'
       "कल क्लास में क्यों नहीं करवाए ?'

       "मैडम कल मेरे मन में लालच आ गया था। अभी मैं क्लास में सैकंड हूँ, रोली थर्ड है। टोटल सही करवाने के बाद रोली सैकंड हो जाएगी और मैं थर्ड। बस कल इसी लालच में फँस कर मैंने नंबर ठीक नहीं करवाए किंतु घर जाकर मुझे पछतावा हुआ।'
     टीचर ने बड़े स्नेह से सुलभा की पीठ थपथपाई और बोली,      "मुझे तुम्हारी ईमानदारी पर गर्व है।...तुम जाओ मैं नंबर ठीक कर दूँगी।'
       सुलभा के मन पर छाई उदासी दूर हो गई थी  ।
    

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शनिवार, 8 सितंबर 2012

सबक

बाल कहानी  
 
                                             सबक
                                                                                   पवित्रा  अग्रवाल   
            
         नयना ने अपनी छोटी बहन से पूछा -- "मीनू आज अभी तक लता नहीं आई ? आए तो कहना पहले मेरा कमरा साफ कर देगी।' आज नयना अपनी आदत के अनुसार लता को लँगड़ी नहीं बोल पाई।
        लता चौदह वर्ष की लड़की है, जो नयना के यहाँ झाड़ू-पोंछा और बर्तन माजने का काम करती है। गाँव की है। बचपन में माँ-बाप ने उसे पोलियो की दवा नहीं दिलवाई थी। उसकी सजा उस बच्ची को भोगनी पड़ रही थी। तीन साल की उम्र में उसे पोलियो हो गया था। देखने में बहुत सुंदर है लेकिन लँगड़ा कर चलती है। सात क्लास तक पढ़ी भी है। क्लास में लड़कियाँ लँगड़ी कह कर उसका मजाक उड़ाती थीं। दुखी होकर उसने स्कूल छोड़ दिया और अपनी माँ के साथ घरों पर काम करने लगी।
         पता नहीं नयना मन ही मन उससे क्यों चिढ़ती है। नयना देखने में लता जितनी सुंदर नहीं है। जब भी कोई लता की तारीफ करता है तो नयना को लगता है कि उससे तुलना की जा रही है। शायद उससे चिढ़ने की भी यही वजह है। सामने तो नहीं किंतु लता के पीछे वह उसे लँगड़ी नाम से पुकारती है। माँ ने कई बार टोका है कि उसे नाम से पुकारो किंतु नयना नहीं मानती।
         एक दिन वह लता के पीछे-पीछे उसकी नकल उतारते हुए लँगड़ा कर चल रही थी। लता ने देख लिया। उसने कुछ कहा तो नहीं किंतु उसकी आँखों में आँसू आ गए थे। जिसे नयना की माँ ने देख लिया था। बाद में नयना को बहुत डाँटा था और चेतावनी दी थी कि "आगे से उसे लँगड़ी कहा या नकल उतारी तो लता के सामने ही सजा दूँगी।'
        तब से वह माँ के सामने तो नहीं किंतु भाई-बहनों के सामने उसे लँगड़ी ही कहती है लेकिन आज नयना ने मीनू से अकेले में भी लता के लिए लँगड़ी शब्द इस्तेमाल न करके लता कहा था। यह परिवर्तन मीनू ने भी नोट किया था।
        परसों घर के बगीचे में खेलते समय नयना का पैर मुड़ गया था। तब से वह लँगड़ा कर चल रही है। इसी वजह से वह दो दिन स्कूल भी नहीं गई थी। मीनू ने गौर किया है कि जब तक लता घर में रहती है नयना दीदी एक जगह बैठ कर पढ़ती रहती है। शायद लता के सामने लँगड़ा कर चलने में उसे शर्म आती है।
       लता के आने पर मीनू ने धीरे से कहा -- "नयना दीदी वह लँगड़ी आ गई है... पहले आपका कमरा साफ करने को कह दूँ ?'
       " खबरदार, उसे लँगड़ी कहा तो...
        "लेकिन दीदी आप तो रोज उसे लँगड़ी कहती हो। एक दिन मैंने कह दिया तो डाँट रही हो।'
 नयना की आँखों में अश्रु छलक आए -- "हाँ मीनू वह मेरी गलती थी शायद मुझे सबक सिखाने के लिए ही मेरे पैर में मोच आई है। उसका दुख अब मेरी समझ में आया है। अब ऐसी गलती मैं कभी नहीं करूँगी।'
                                                          

-पवित्रा अग्रवाल

बुधवार, 1 अगस्त 2012

सीटी का कमाल

बाल कहानी                                     सीटी का कमाल      
                                                                           पवित्रा अग्रवाल

           रजत और रीना की परीक्षा समाप्त हुए दस दिन बीत चुके थे। रजत ने आठवें की व रीना ने सातवीं की परीक्षा दी थी। दोनों ही सोच रहे थे कि इतनी लंबी छुट्टियाँ कैसे बीतेंगी। तभी देहरादून से मौसा जी का फोन आ गया कि तुम दोनों छुट्टियों में देहरादून आ जाओ। मम्मी-पापा ने भी उन्हें मौसी के पास जाने की स्वीकृति  दे दी थी। दोनों ही बहुत उत्साहित थे।
          वैसे तो मौसी कामकाजी महिला है। वह टीचर है। गर्मी की छुट्टियाँ हो जाने की वजह से उनकी भी छुट्टियाँ थीं। मौसी के एक ही बेटी है जो रजत, रीना से भी छोटी है। मम्मी पापा ने रजत और रीना को नए कपड़े दिलवाए। मौसी-मौसा जी व उनकी बेटी के लिए गिफ्ट लाकर दिए ।
         उन्हें देहरादून छोड़ने के लिए पापा जाने वाले थे किंतु मौसा जी ने कहा -"बच्चों को आत्मनिर्भर बनने दीजिए। उन्हें वहाँ से ट्रेन के ए.सी. कोच में  आप बैठा दें यहाँ स्टेशन पर हम ले लेंगे।...इस तरह बच्चों में आत्मविश्वास  बढ़ता है। लेने के लिए आप दोनों यहाँ आ जाना। कुछ दिन रुक कर बच्चों को साथ ले जाना तो आपका भी चेन्ज हो जाएगा।'
          ए.सी. में उन्हें बड़ा मजा आया। देहरादून के स्टेशन पर मौसा जी उन्हें लेने आ गए थे। घर पहुँचते ही उन्होंने मौसी व उनकी बेटी पिंकी को घर के बाहर बगीचे में खड़ा पाया। मौसी ने उन दोनों को प्यार से चिपका लिया और अंदर जाते ही उनकी पसंद की पेस्ट्री, पीजा खाने को दिए।
          इतवार के दिन मौसी-मौसाजी उन्हें मसूरी घुमाने ले गए। कैम्पटी फ़ॉल देखने के लिए सीढ़ियों से  बहुत नीचे उतरना पड़ता है। वहाँ सबने खूब मस्ती की।मौसी स्नेक्स बना कर ले गई थीं, खाने में बहुत मजा आया फिर माल रोड पर सैर की...शौपिंग की ।...रोप वे पर गए तो वे बहुत रोमांचित थे पर कुछ भयभीत भी थे कि कही ट्रॉली गिर न पड़े।फिर मौसा जी ने एक अच्छे होटल में सब को खाना खिलाया।
          इस तरह पूरा दिन वहाँ बिता कर वह सब देहरादून लौट आए। सब के साथ पिंकी भी बहुत खुश थी। देहरादून में भी उन्होंने बहुत सी जगह घूमी,  सहस्रधारा गए, रेनुका झील गए।एक दिन मौसा जी ऋषिकेश भी ले गए थे वहाँ उन्होने गंगा जी पर बना बिना पिलर का बहुत बड़ा पुल लक्ष्मण-झूला देखा फिर गंगा जी में स्नान किया।वहाँ के प्रसिद्ध चोटी वाले के यहाँ खाना खाया ...खूब मजा आया।
        एक दिन मौसी-मौसा जी को हरिद्वार अपने मित्र के यहाँ शादी में जाना था। वह उस दिन रात को ही वापस लौट आना चाहते थे लेकिन आंटी ( मौसी की सास) ने कहा, "रात को लौटने में देर हो जाएगी, समय अच्छा नहीं है। बच्चों के पास मैं तो हूँ न ? तुम लोग दूसरे दिन सुबह वहाँ से चलना। यहाँ की चिंता बिल्कुल मत करो।'
         मौसी-मौसा जी कई हिदायतें देते हुए पिंकी के साथ चले गए। रजत और रीना देर रात तक टी.वी. पर फिल्म देखते-देखते सो गए थे। बच्चों को सोया देखकर आंटी ने टी.वी. बंद कर दिया फिर उन्हें बहुत देर तक नींद नहीं आई। अचानक उन्हें ऐसा लगा कि कोई आरी से लोहे की छड़ काट रहा है। कहीं ये चोर तो नहीं हैं। उन्होंने रजत और रीना को भी उठा दिया। उनका शक पक्का हो गया था।
        रीना तो डर कर आंटी से चिपक गई। रजत बोला रीना तू डर मत, हम अभी सौ नंबर पर पुलिस को फोन कर देते हैं किंतु फोन उठाते ही पता चल गया कि फोन के वायर काट दिए गए हैं। तब तो आंटी भी परेशान हो गई बोली, "अब क्या होगा रजत...सहायता के लिए   शोर  मचाया  जाये  ?'
          "आंटी सहायता के लिए शोर मचाने से कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि यहाँ सभी घर दूर-दूर बने हुए हैं। वहाँ तक हमारी आवाज नहीं पहुँचेगी।'
           तभी रजत ने रीना से पूछा- "रीना तू अपनी सीटी लाई है ?...मैं तो अपनी घर ही छोड़ आया।...'
       "हाँ भैया मैं लाई हूँ । उसने तुरंत रजत को अपनी सीटी दे दी। रजत सोचने लगा एक और सीटी होती तो बहुत अच्छा होता। उसने पिंकी के खिलौनों में देखा तो वहाँ भी एक सीटी मिल गई। रजत ने एक सीटी रीना
को देते हुए कहा -- " रीना  तू पीछे वाले बेड रूम की खिड़की में से ये सीटी बजा।मैं बरांडे की तरफ जाकर दूसरी सीटी बजाता हूँ। दोनों ने एक साथ सीटी बजानी शुरू की तो बाहर भगदड़ सी मच गई। किसी के बोलने की आवाज आई-- "जल्दी से पीछे के रास्ते से भाग लो वर्ना पकड़े जाओगे। लगता है पुलिस आ गई है।'
         रीना दौड़ती हुई रजत के पास आई -- "भैया लगता है  चोर भाग गए।'
        आंटी ने कहा --"शाबाश बेटे तुम्हारी समझदारी काम आ गई वर्ना आज न जाने क्या होता ? सीटी की आवाज सुनकर चोर भाग गए हैं।'
        दूसरे दिन सुबह जब मौसी-मौसा जी लौटे तो उन्होंने खिड़की की एक छड़ को कटा हुआ पाया।पूरी बात जान कर दोनों ने रजत को बहुत शाबाशी दी। मौसाजी बोले --" इस समय घर में पचास हजार रुपये कैश थे, जो मुझे आज एक पार्टी को देने हैं। यदि चोर घर में घुस आते तो पता नहीं क्या होता।..मैं  पुलिस स्टेशन रिपोर्ट लिखाने जा रहा हूँ ।'
 
  
-पवित्रा अग्रवाल

सोमवार, 2 जुलाई 2012

और ठग पकड़े गए

बाल कहानी    
                               
    और ठग पकड़े गए


                                                                    पवित्रा अग्रवाल
 
 रमेश की परीक्षायें चल रही थीं।वह पढ़ाई में लगा था ।पढ़ते पढ़ते थक गया तो कुछ चहल कदमी करने अपने कमरे से बाहर निकल आया ।उसने देखा मम्मी दरवाजे पर खड़ी किसी से बात कर रही हैं।उसने खिड़की से देखा दरवाजे पर दो लोग बैठे थे और मम्मी उनसे अपने कुछ गहने साफ करवा रही थीं
 गहने चमकाने की बात सुनते ही वह कुछ चौकन्ना हो गया।उसे  याद आया कि गहने चमकाने के नाम पर महिलाओं के गहने ले कर चम्पत हो जाने की घटनाये तो रोज ही अखवारों में छपती रहती हैं।पता नहीं मम्मी अखवार नहीं पढ़तीं क्या जो इस तरह लुटने को तैयार हैं।वह सोच में पड़ गया कि क्या किया जाए... यदि दरवाजे पर जाएगा तो उन लोगों को पता चल जाएगा कि मम्मी घर पर अकेली नहीं हैं क्योंकि यह ठग लोग तभी आते हैं जब घर के पुरुष काम पर और बच्चे स्कूल गए होते हैं ।
 कुछ सोच कर रमेश पीछे के दरवाजे से घर के बाहर चला गया और दूर एक पेड़ के नीचे खड़े हो कर अपने घर पर नजर रखने लगा।उसने देखा मम्मी गहने उनके पास छोड़ कर अंदर गई हैं।गई क्या हैं उन दोनो ने ही किसी बहाने से कुछ लाने के लिये अंदर भेजा होगा।
 तभी रमेश ने देखा वह दोनो घर का दरवाजा बाहर से बंद कर के तेजी से वहाँ से जाने लगे।रमेश ने सैलफोन से फोन कर के अपने दो मित्रों को भी वहाँ बुला लिया था ।रमेश और उसके दोस्तों  ने भाग  कर उनको पकड़ लिया ।राह चलते लोग भी वहाँ इकट्ठे हो  गये ओर उनकी पिटाई करने लगे।
 बाहर से दरवाजा बंद देख कर मम्मी भी पीछे के दरवाजे से दौड़ती ,हाँफती बाहर आई। रमेश और उसके दोस्तों को वहाँ देख कर उन्हें थोड़ा चैन मिला वह बोली           ---" बेटा पहले इनके सामान की तलाशी लो ,यह मेरे गहने ले कर भागे हैं।'
 तलाशी लेने पर मम्मी के गहने एक की जेब से निकल आये।लोग उनकी फिर लात घूसों से पिटाई करने लगे।
 रमेश बोला-" हमें कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिये, इनको पुलिस के हवाले कर देते हैं'
 वह दोनो ठग  हाथ पैर जोड़ने लगे   -- "नही नही हमें पुलिस के हवाले मत करो,हमने आज पहली बार यह अपराध किया है ।'
 तभी भीड़ देख कर डंडा फटकारते दो पुलिस के जवान वहाँ आ गये -"अरे यहाँ भीड़ क्यो लगा रखी है ?'
 रमेश की पूरी बात सुन कर सिपाही ने उन दोनो ठगों को अपनी गिरफ्त में ले कर कहा --" शाबाश बेटा तुमने बहुत अच्छा काम किया है। अब इनको तो सजा मिलेगी ही पर ये हमारी माताएं , बहने कब समझेंगी ? हम अक्सर महिलाओं  को इन चोर - लुटेरो से सावधान रहने  की अपील समाचार पत्रों के माघ्यम से करते रहते हैं पर फिर भी यह लुटती रहती हैं और हमें दोष दिया जाता है कि पुलिस कुछ नहीं करती ।...बहन जी देखो आपका बच्चा कितना होशियार है... आप भी थोड़ा अखवार आदि पढ़ा करो ।' 
     
      

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मंगलवार, 5 जून 2012

सजा देने का हक

बाल कहानी - पवित्रा अग्रवाल
                 
                                           सजा देने का हक                                                           
                                                            
       रीमा आज बेचैन  थी।पूजा और वो एक ही स्कूल में व एक ही सैक्शन में हैं।बल्कि वह बैठती  भी एक ही बैंच पर हैं । वह आपस में मित्र भी हैं पर पता नहीं क्यों  आज पूजा अनुपस्थित है जब कि उसकी उपस्थिति सैंन्ट परसेंन्ट रहती है।वैसे वह जानती है कि कल से पूजा उससे नाराज है ,कल उसने पूरे दिन रीमा से बात नहीं की। घर जाकर रीमा  ने पूजा को फोन भी किया था पर आवाज सुन कर ही उसने फोन काट दिया था।नाराजगी का कारण भी वह जानती है ।


      पूजा के देर से आने पर उसने अन्य छात्राओ के साथ उसे भी सजा दी थी पर इस में बुरा मानने की क्या बात हैं... वैसे जब से रीमा कक्षा की मानीटर बनी है तब से पता नहीं क्यों उसकी खास सहेलियाँ भी धीरे - धीरे कर उस से दूर होने लगी हैं।उस के हिसाब से उसकी सहेलियाँ उस के मानीटर बन जाने पर उस से फेवर चाहने लगी हैं जैसे लेट होंने पर उनको सजा से छूट दे दी जाये, उनकी शरारतों को अनदेखा कर दिया जाये किन्तु वह ऐसा नहीं करती तो सब  उसे घंमडी कहने लगी हैं। असल में कक्षा में उसका रुतबा देख कर वह सब उससे जलने लगी हैं।..पर आज पूजा का ना आना पता नहीं क्यों रीमा  बेचैन कर रहा है।

       उसने घर जाते ही सब से पहले पूजा को फोन किया --
     "हैलो क्या मैं पूजा से बात कर सकती हूँ..आज वह स्कूल नहीं आई।'
     "हाँ, आज उसकी तबियत ठीक नही थी,इसी लिये नहीं आ पाई ।'
     "आप पूजा की मम्मी बोल रही हैं ?'
     "हाँ,तुम कौन बोल रही हो ?'
     "नमस्ते आन्टी,मैं उसकी दोस्त रीमा बोल रही हूँ।'
      "अच्छा क्लास मॉनीटर रीमा ।'
      "जी आन्टी,क्या आप मुझे जानती हैं ?'
      "जानती तो नहीं थी, पर अब जान गई हूँ।...क्या हो गया है तुम बच्चों को...मॉनीटर
 बन के क्या खुद को   स्कूल का प्रिंसिपल  समझने लगी हो ? तुम्हें अपने ही साथियों को सजा देने का हक किसने दिया है ?'

      "आन्टी टीचर की अनुपस्थिति में क्लास में अनुशासन की जिम्मेदारी हमारी होती है।'
      "अनुशासन का मतलब यह नही कि तुम सजा भी देने लगो।...पूजा क्लास की मेधावी छात्रा है और समय की पाबंद भी।एक दिन वह लेट हो गई तो तुम ने उसे  एक दो नहीं सीधे पचास सिट- अप की सजा दे दी।..वैसे भी बात सिर्फ पूजा की नहीं है, किसी को भी सजा देने का तुम्हें कोई हक नही है।'

     "आन्टी ऐसा तो हम रोज ही करते हैं।'

     "गलत करती हो, अब नहीं कर पाओगी।आजकल तो टीचर भी छात्रों को सजा देने से डरते हैं । यदि समाचार पत्र  नहीं पढ़ती हो तो आज पढ़ लेना, एक बच्चे को सजा देने की वजह से टीचर को सस्पेंड कर दिया गया है। कल मैं भी प्रिंसिपल  के पास शिकायत करने जाने वाली हूँ ।...पूजा के पैरो में इतना दर्द है कि वह आज स्कूल भी नही जा पाई।'
      "सॉरी आन्टी, आप प्रिंसिपल  से शिकायत मत कीजिये।मैं आज के बाद किसी को सजा नहीं दूँगी,हम लोग तो यह सब मस्ती में करते थे।'

     "वाह मस्ती का अच्छा तरीका है ,सिर्फ क्लास मॉनीटर चुन लिये जाने पर तुम लोग स्वयं को अपने ही साथ के बच्चों से इतना सुपीरियर समझने लगते हो कि उन्हे सजा देने में संकोच नहीं होता।... पर कभी टीचर सजा देती हैं तो माता पिता को बुला लाते हो "

     "आप बिलकुल ठीक कह रहीं हैं आन्टी,मुझे सजा नहीं देनी चाहिये थी ... मुझे मेरी गल्ती का अहसास कराने के लिये थैंक यू आन्टी।....आप ने  मुझे माफ कर दिया न आन्टी ?'
     "बेटा जब तुम्हें अपनी गल्ती का अहसास हो गया तो माफ तो करना ही पड़ेगा न ।'
    "आन्टी मैं पूजा से बात कर के उस से माफी माँगना चाहती हूँ,उस से बात करा दीजिये प्लीज।'

 "हाँ अभी बात कराती हूँ।'

                                            
                                                         ----
-पवित्रा अग्रवाल 




बुधवार, 23 मई 2012

किराये का घर

बाल कहानी                                 
                           किराये का घर
                                                                    
                                                                   पवित्रा अग्रवाल


अपने नए घर में आने के बाद से नवीन,अदिति और उनके माता पिता सभी बहुत खुश थे।जब भी घर से बाहर जाते, घर में सजाने के लिए कुछ न कुछ जरूर ले कर आते थे फिर सब मिल कर विचार करते थे कि उसे कहां लगाया जाए ।
 नवीन और अदिति को भी एक अलग कमरा दिया गया था ।कमरे में सामान कुछ इस तरह से जमाया गया था कि आधा-आधा कमरा दोनों का था।दोनो का अलग पलंग था, अलग पढ़ने की मेज और कुर्सी थीं।बुक्स व कपड़े रखने की अलमारी भी अलग-अलग थीं।अब कमरा गन्दा होंने पर दोनो ही एक दूसरे को दोष नहीं दे सकते थे।
 मम्मी ने कहा था दोनो रोज अपना -अपना सामान ठीक से रखना, जो अपनी जगह साफ रखेगा उसे हर महीने एक इनाम मिलेगा।दोनो ही अपनी तरह से अपना हिस्सा सजाने में लगे थे।नवीन ने अपनी पसंद के कुछ पोस्टर  दीवाल पर चिपका दिए थे और अदिति ने अपने जमा किए ग्रीटिग कार्डस में से चुन कर कुछ कार्डस अपनी मेज के ऊपर दीवार पर चिपका लिए थे ।रंग बिरंगी पेंसिलो से दीवार पर अपने स्कूल का टाइम टेबिल भी लिख लिया था और अपनी सहेलियों के फोन नंबर भी सुंदर अक्षरों में लिख लिए थे ।
 सुबह मम्मी की नजर उनकी दीवार पर पड़ी तो वह गुस्से से आग बबूला हो गई ।उन्होने चिल्ला कर दोनो को जगाया --"तुम दोनो को जरा भी तमीज नहीं है, दीवारों पर ये सब क्यों चिपकाए हैं ?और अदिति तूने तो कमाल ही कर दिया ,टाइम टेबिल और फोन नंबर दीवार पर ही लिख दिए ।...तुम लोगो को कब समझ आएगी ?...पापा देखेंगे तो कितना गुस्सा करेंगे...खबरदार जो आज के बाद तुम लोगों ने दीवार को हाथ भी लगाया तो ।'
 नवीन ने डरते - डरते कहा --"मम्मी हम तो पुराने मकान में भी ऐसे ही दीवारों पर लिखते थे तब तो आपने कभी नहीं डांटा ।'
 "और मम्मी वहाँ आप भी दूध का हिसाब किचन की दीवारों पर लिखती थीं "अदिति ने कहा
 एक क्षण को तो मम्मी चुप हो गई फिर समझाते हुए बोलीं-" बच्चों वह मकान किराए का था ,यह हमारा अपना मकान है, वो भी नया ...इसको गंदा नहीं करना चाहिए ।'
 "मम्मी आपने यह तो बताया ही नहीं था कि किराए के घर को गंदा कर सकते हैं, अपने घर को नहीं। आगे से ध्यान रख्रेंगे ।'
 तभी पापा आ गए --"बेटे घर अपना हो या किराए का , घर घर होता है और उसे हमेशा साफ रखना चाहिए।...टाइम टेबुल हार्ड बोर्ड पर लिख कर मेज पर रखा जा सकता है,फोन नंबर लिखने के लिए एक छोटी डायरी का स्तेमाल किया जा सकता है,इस के लिए दीवारों को गंदा नहीं करना चाहिए।'
 "सारी पापा-मम्मी आगे से हम दीवारों पर कुछ नहीं लिखेंगे ,...उन्हें साफ रखेंगे ।'



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मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

छोटी सी घटना

  बाल कहानी


              छोटी सी घटना                                                            
                  
                                                                      पवित्रा अग्रवाल


    शाम हो गई थी। अपना होम वर्क समाप्त करके राहुल घर से बाहर खेलने के लिए निकला ही था कि कोने के घर वाले अंकल उसे मिल गए। उन्होंने पूछा बेटे आपके पापा घर पर हैं ?'
 "हाँ अंकल, आइए पापा घर पर ही हैं' कह कर राहुल ने उन्हें ड्राइंग रूम में बिठाया और पापा को उनके आने की सूचना दी।
    पापा के आते ही नमस्ते-नमस्ते के आदान-प्रदान के बाद अंकल ने पापा से पूछा "पूजा आपकी बेटी है क्या ?'
 "हाँ पूजा मेरी ही बेटी है। क्या किया उसने ? कोई शरारत की है क्या ?' पापा ने पूछा।
 "अजी साहब क्या संस्कार दिए हैं आपने अपनी बेटी को..
 .   पापा ने बीच में ही बात काट कर कहा-- "मगर किया क्या उसने ? उससे कोई गलती हो गई ?'
 अंकल बोले-" नहीं साहब गलती कैसी ? बहुत ही अच्छी बेटी है आपकी.... अभी तीन-चार दिन पहले की बात है वह मेरे घर आई और आते ही मुझ से सीधा सवाल किया, "अंकल आप सिगरेट पीते हैं ?'
       मैं तो सकपका गया कि छोटी सी बच्ची मुझसे यह प्रश्न क्यों पूछ रही है। मैंने हाँ में सिर हिलाया। तो उसने दस रुपये का एक नोट मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा "आपके घर के सामने पड़ी यह सिगरेट की खाली डिब्बी मैंने खेलने के लिए उठाई थी। इस डिब्बी के अंदर दस रुपये का यह नोट निकला है, आपका ही होगा।' कहकर उसने वह नोट मेज पर रख दिया। मैंने उसे वह रुपये देने की बहुत कोशिश की और कहा - "इन रुपयों से तुम टॉफ़ी खरीद कर खा लेना'
    "लेकिन उसने नहीं लिए। तब मैंने उससे उसका व पिता का नाम पूछा तो ज्ञात हुआ वह आपकी बेटी है। सात-आठ वर्ष की छोटी सी बच्ची इतने अच्छे संस्कार, सच मैं उससे बहुत प्रभावित हुआ हूँ। उसे मैं अपने क्लब की तरफ से पुरस्कार दिलवाना चाहता हूँ।'
    पापा को यह बात पता नहीं थी, शायद मम्मी को भी नहीं मालूम थी। यहाँ तक कि मुझे भी उस ने नहीं बताया था। पूजा को बुलाकर पूछा तो उसने स्वीकृति में गर्दन हिला दी।
      वो अंकल यह जानकर और भी प्रभावित हुए कि पूजा के लिए ये घटना इतनी साधारण थी कि इसका जिक्र उसने घर में भी नहीं किया। पापा को बहुत बधाई देकर पूजा के सिर पर स्नेह से हाथ फेरते अंकल चले गए।
     राहुल भी अपनी छोटी बहन से बहुत प्रभावित हुआ क्यों कि मम्मी से तो अक्सर वह जिद्द करके कुछ न कुछ खरीदने के लिए पैसे माँगती रहती है। लेकिन जो रुपये उसे सड़क पर पड़े मिले उनको अंदाजा लगा कर उसके मालिक तक पहुँचा आई। उसे जरा भी लालच नहीं आया। वह रख भी लेती तो कोई उसे चोर नहीं कहता । साथ ही राहुल को अपने ऊपर ग्लानि भी हुई कि बाहर की छोड़ो, घर में भी इधर-उधर रखे पैसे उसे मिलते हैं तो वह माँ को बिना बताए उठा लेता है और उन पैसों से टॉफ़ी, बिस्कुट आदि खरीद कर खा लेता है।
     वह सोच रहा था मैं तो पूजा से दो वर्ष बड़ा हूँ और जब-तब अपने बड़े होने का रौब उस पर जमाता रहता हूँ। हम दोनों के माता-पिता एक हैं लेकिन हम दोनों की नीयत में कितना अंतर है ?
 पूजा के साथ घटी इस छोटी सी घटना से राहुल को बहुत प्रेरणा मिली। उसने निश्चय किया कि भविष्य में वह भी इतना ही ईमानदार बनने की कोशिश करेगा। उसे पूजा पर बहुत प्यार आ रहा था। उसने अपनी बहन की बड़े प्यार से पीठ थपथपाई।
                 

पवित्रा अग्रवाल

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गुरुवार, 1 मार्च 2012

स्नेह पर्व होली

बाल कहानी                                                  
                         स्नेह पर्व होली
                                                                         
                                                                   पवित्रा अग्रवाल
         शाम के चार बज चुके थे। बाहर होली का हुड़दंग शांत हो चुका था। छोटे-बड़े सभी नए-नए कपड़ों में घूमते व एक-दूसरे से हाथ मिलाते नजर आ रहे थे। सब एक-दूसरे के घर होली मिलने जा रहे थे किंतु महेश के यहाँ उसका कोई भी दोस्त अभी तक नहीं आया था। लगता है रामू, राजू, सोनू, महेंद्र, हरीश सब आज उससे नाराज हो गए हैं। नाराज शायद इसलिए हो गए हैं क्योंकि आज वह उनके बहुत आग्रह पर भी उनके साथ होली खेलने बाहर नहीं गया था।
     पिछली होली की याद आते ही वह परेशान हो उठा। पिछली बार भी उसके सभी दोस्तों ने उस से वायदा किया था कि वे सीधे-साधे ढंग से रंगों द्वारा होली खेलेंगे। आँख मुँह में रंग नहीं डालेंगे। वार्निश भी नहीं लगाएँगे। उनके आग्रह पर वह न चाहते हुए भी साथ चला गया था। साथ ही यह भी याद दिला दिया था कि "किसी ने वार्निश या पेन्ट लगाया या मुँह में रंग भरा तो अगली साल वह होली बिल्कुल नहीं खेलेगा।"
       जो दोस्त उसे बुलाने आए थे, उन्होंने अपना वायदा निभाया भी था किंतु मोहल्ले के अन्य लड़के नहीं माने थे और उसे वार्निश से बुरी तरह पोत दिया था। यहाँ तक कि बालों में भी पेन्ट लगा दिया था। सूखा लाल रंग लेकर उसके दाँतों में पेस्ट की तरह मल दिया था। उसके दोस्त मोहल्ले के उन लड़कों से झगड़ने को तैयार हो गए  लेकिन महेश ने उन्हें रोक दिया था। वह नहीं चाहता था कि उल्लास का ये पर्व किसी लड़ाई-झगड़े को जन्म दे किंतु उसने मन ही मन फैसला कर लिया था कि अगले वर्ष वह होली नहीं खेलेगा।
      घर आकर पेन्ट छुटाने में उसे दो घंटे लग गए थे। मम्मी ने मिट्टी के तेल से बाल व हाथ-पाँव का पेन्ट साफ किया था। मम्मी को किसी भी तेज गंध से एलर्जी है। उनकी वजह से घर में अगरबत्ती का इस्तेमाल भी नहीं होता। मिट्टी के तेल की गंध से मम्मी की नाक से पानी बहना शुरू हो गया। दमे की मरीज मम्मी का दमा फिर उखड़ आया था और फिर उन्हें ठीक होने मे बहुत दिन लग गए थे। बस इन्हीं सब परेशानियों से बचने के लिए उसने अपने दोस्तों को नाराज कर लिया था।
       शाम को महेश नए कपड़े पहन कर तैयार हुआ। माता-पिता से आशीर्वाद लिया और अपने दोस्तों के घर की तरफ चल दिया।
         पहले वह सोनू के घर गया। वहीं रामू भी मिल गया। सोनू के सिर पर पट्टी बँधी थी सोनू ने उससे हाथ मिलाया और बोला -- "अच्छा हुआ महेश तुम होली खेलने नहीं आए। आज एक लड़के रघु से हमारा झगड़ा हो गया था। रघु ने चुपके से मेरे सिर पर पेन्ट डाल दिया था। रामू, राजू ने देखा तो उन्होंने पकड़ कर उसे पीछे धक्का दे दिया। पीछे कंकड़ों पर गिरने की वजह से उसके हाथ-पैर छिल गए थे। उसने वहीं से पत्थर उठा कर हमारी तरफ फेंका जो मेरे माथे पर लगा। माथे से खून बहने लगा।.. सामने ही डॉक्टर साहब का दवाखाना था। उनके कंपाउंडर ने मुझे दवा लगा कर पट्टी बाँध दी।
        बाद में रघु और मेरे पापा आ गए थे। उसके पापा ने रघु को पेन्ट से होली खेलने के लिए खूब डाँटा । मेरे पापा ने भी हम सबको समझाया कि यह स्नेह पर्व आपस में प्यार बढ़ाने के लिए होता है, दुश्मनी बढ़ाने के लिए नहीं।'
       अभी वह बात कर ही रहे थे कि वही लड़का रघु भी आ गया और अपनी गलती के लिए क्षमा माँगी। दोनों गले मिले। तभी सोनू की मम्मी गुजिया, नमकीन और मिठाई ले आई थीं। सभी मिल कर खाने लगे।
                                                                                -------


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-पवित्रा अग्रवाल

बीच सड़क पर

बाल कहानी                                     बीच सड़क पर
 
                                                                                                              पवित्रा अग्रवाल
 
          शहर में आटोज की हड़ताल थी। संदीप के पापा शहर से बाहर गए हुए थे। वरना पापा संदीप को स्कूटर से स्कूल छोड़ आते । स्कूल दूर था। रिक्शे से जाने में बहुत समय लगता है। संदीप ने अपने मित्र मयंक के साथ बस द्वारा स्कूल जाने का फैसला किया। मयंक के पास तो बस का पास था।
         मम्मी ने बस टिकट के लिए रेज़गारी देते हुए संदीप से कहा- "बस स्टाप पर ही बस से उतरना। ऐसा नहीं कि स्कूल के पास कहीं बस की गति जरा धीमी हुई और तुम बीच सड़क पर ही उतर जाओ।'
       "मम्मी जब भी मैं बस से स्कूल जाता हूँ आप ये सलाह देना कभी नहीं भूलती।'
      "बेटा सलाह इसलिए देते हैं कि हम तुम्हारे शुभचिंतक हैं। हमें तुम्हारी चिंता है।...बेटे मैंने इसी तरह सड़क पर कई दुर्घटनाएँ होते देखी हैं। स्टाप से गन्तव्य स्थल कुछ दूर पड़ेगा ये सोच कर बहुत से लोग चौराहे पर या सड़क के बीच में ही बस से उतर जाते हैं।...हो सकता है इस तरह बीच में उतर जाने से स्कूल, ऑफ़िस कुछ पास पड़ ज़ाए।....उनका कुछ समय भी बच सकता है किंतु यदि किसी दुर्घटना के शिकार हो गए तो हाथ-पैर तुड़वा कर महीनों अस्पताल में बिस्तर पर भी पड़ा रहना पड़ सकता है।...तुम्हारे सोनू अंकल की मृत्यु इसी तरह बस से उतरते समय हुई थी, पीछे से आ रही कार ने उन्हें टक्कर मार दी थी। वह तो चले गए किंतु उनकी नन्हीं बेटियों नीना-मीना का बचपन पितृ विहीन हो गया।...तुम्हारी आन्टी को भी कितनी आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।...ये क्या तुम नहीं जानते ?'
     "हाँ मम्मी आप बिल्कुल ठीक कह रही हैं। आटो से स्कूल जाते समय मैंने भी कई बार लोगों को इस तरह बीच सड़क पर बस से उतरते और गिरते भी देखा है। उन्हें चोट लगी या नहीं या कितनी लगी यह तो पता नहीं चल पाता क्योंकि तब तक आटो दूर निकल आता है।....आप चिंता न करें मम्मी मैं स्टाप पर ही उतरूँगा।'
       मयंक के साथ संदीप भी बस में चढ़ गया। स्कूल के पास ट्रैफ़िक की वजह से बस की गति कुछ धीमी हुई तो मयंक नीचे उतरने लगा।
     "ठहरो मयंक, इस तरह बीच में उतरना ठीक नहीं। जरा सा समय बचाने के लिए इस तरह कहीं भी उतर जाना खतरनाक हो सकता है।...हम स्टाप पर ही उतरेंगे।'
     "अरे यार संदीप तू तो बड़ा डरपोक है। मैं तो रोज़ इसी तरह उतरता हूँ।... मेरे साथ तो कभी कुछ नहीं हुआ है।...हाँ जो लापरवाही करते हैं उनके साथ दुर्घटना होते मैंने भी देखी हैं।'
     "यार मयंक दुर्घटना बताकर नहीं होती, अचानक होती है और कभी-कभी तो भूल सुधार का मौका भी नहीं देती।...आदमी सीधा ऊपर पहुँच जाता है।...दूसरी दुर्घटनाओं से हमें सबक सीखना चाहिए। खुद शिकार होके सबक सीखा तो क्या फायदा.....नीना-मीना को तू जानता है ना ?...उनके डैडी की मौत इसी तरह हुई थी।'
     "ठीक है संदीप मुझे तुम्हारी सलाह मंजूर है।...हम स्टाप पर ही उतरेंगे।'
                                                   
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 पवित्रा अग्रवाल

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

चोर भाग गए

बाल कहानी                                              


                               चोर भाग गए


                                                            पवित्रा अग्रवाल      
         
          सोहा अपने माँ-बाप की अकेली बेटी है। इस समय वह बारह वर्ष की है और कक्षा आठ में पढ़ती है। मम्मी-पापा दोनों सर्विस करते हैं। इस वजह से सोहा को घर में बहुत देर अकेले ही रहना पड़ता है। कई बार तो वह रात को बारह बजे तक घर में अकेली रही है। पहले उसे डर लगता था किंतु अब उसे आदत पड़ गई है और समय ने उसे साहसी भी बना दिया है।
          मम्मी-पापा शाम को छह बजे ऑफिस से लौटे थे। मम्मी ने आते ही कहा- "सोहा, आज शहर में एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन हो रहा है। मेरी सहेली ने पास भिजवा दिए हैं। हम दोनों वहाँ जाना चाहते हैं, चाहो तो तुम भी चलो।'
        "नहीं मम्मी, आप जाइए, मैं घर में रह लूँगी।'
        "देख लो बेटा, रात को हमें लौटने में दो-तीन बज सकते हैं। तुम कहो तो तुम्हें चाचाजी के घर छोड़ देते हैं। सुबह तुम्हें पापा ले आएँगे।'
        "अरे मम्मी रात को बारह बजे तक तो मैं कई बार अकेली रही हूँ। दो-तीन घंटे ज्यादा सही।...आप आराम से जाइए। मैं पड़ोस से अपनी सहेली रितु को बुला लेती हूँ। हम दोनों बातें करते, टी.वी. देखते हुए सो जाएँगे। आप बाहर से ताला लगा जाइए।'
          मम्मी ने खाना बनाया। सबने साथ-साथ खाना खाया। रितु को भी बुला लिया फिर कई हिदायतें देते हुए मम्मी-पापा कवि सम्मेलन में चले गए।
         रात को दरवाजे पर खटपट की आवाज सुन कर सोहा की नींद खुल गई। उसने दरवाजे की दिशा में कान लगाए तो वह समझ गई कि कोई बाहर से ताला खोलने की कोशिश कर रहा है...और वह निश्चय ही चोर है। बाहर ताला लगा देख कर उन्होंने सोचा होगा कि घर में कोई नहीं है। एक बार को तो सोहा डर गई। उनके यहाँ फोन थोड़े दिन में लगने वाला है। यदि फोन होता तो वह पुलिस को या किसी परिचित को फोन कर देती। अब क्या करे। उसने झट से दरवाजे की अंदर से साँकल लगा दी।...अब उसे कोई डर नहीं था...फिर भी उसके दिमाग में एक बात आई कि मम्मी-पापा के आने का समय हो रहा है। यदि अभी वह लोग आ गए तो निहत्थे मम्मी-पापा को चोर नुकसान पहुँचा सकते हैं, उन पर हमला कर सकते हैं।
          उसने रितु को उठा कर बताया कि लगता है दरवाजे पर कोई है ...लेकिन तू बिल्कुल मत डर, मैंने अंदर से साँकल लगा ली है। अत: ताला तोड़ने के बाद भी वह अंदर नहीं आ सकते लेकिन रितु डर से काँपने लगी थी।
        तभी सोहा को एक तरकीब सूझी। उसने दरवाजे के पास जा कर तेज आवाज में कहा -- "चिन्टू भैया खटपट मत करो , आपने आने में बहुत देर कर दी है ... मम्मी-पापा, ताऊजी-ताईजी सब सो चुके हैं, जाग जाएँगे। बाहर की चाभी तो आपके पास है न, दरवाजा खोल कर अंदर आ जाइए।...कहीं चाभी आपने खो तो नहीं दी ?...आप बोलते क्यों नहीं ?...ठहरिए मैं अभी पापा को बुलाती हूँ।'
       तभी उसने बाहर किसी को बोलते सुना, "अरे घर में तो लगता है बहुत सारे लोग हैं। जल्दी भाग लो नहीं तो अभी पकड़े जाएँगे।'
     " तभी उसने दूसरे कमरे का पर्दा उठा कर देखा। दो - तीन आदमी बाउंड्री से बाहर कूद रहे थे। उसने चैन की साँस ली और डर से काँपती रितु को सँभालते हुए कहा-- "डर मत, वो तो भाग गए।'
     "भाग गये ?...अरे वाह सोहा,तूने तो कमाल कर दिया ...क्या होशियारी से चोरों को भगाया है।'





                                                                                                
                                                                                                                घरोंदा 
                                                                                                    4-7-126  इसामियां बाजार 
                                                                                                    हैदराबाद  - 500027



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गुरुवार, 5 जनवरी 2012

दो कौड़ी की पतंग

 बाल कहानी   
                                  
   दो कौड़ी की पतंग                                                                                                       
                                                                              पवित्रा  अग्रवाल
 
 शशांक ने अपने मित्र रवि से पूछा--"रवि कल से स्कूल बंद हैं इन छुट्टियों में क्या करेगा ?'
 "करना क्या है दोस्त दिन में पढ़ाई करूँगा ,कुछ समय कंप्यूटर पर बैठूंगा और शाम को छत पर जाकर पतंग उड़ाऊँगा ।'
 "तुझे पतंग उड़ानी आती है ?'
 "हाँ ,तुझे नही आती ?'
 शशांक ने उदास स्वर में कहा --"नहीं ।'
 "अरे इसमें उदास होने की क्या बात है,नहीं आती तो मैं सिखा दूँगा।मुझे पतंग उड़ाने में बहुत मजा आता है और उस से ज्यादा मजा पतंग काट कर "वो काटा' कह कर शोर मचाने में आता है ।वैसे पतंग लूटने में भी बहुत मजा आता है...पर लूटता नहीं तूने कभी पतंग लूटी है ?'
 "नहीं '
 "इन छुट्टियों में शाम को तू रोज मेरे घर आ जाया कर ,अपन मिल कर पतंग उड़ायेगे ?'
 "मेरी मम्मी को पतंगों से नफरत हैं,वह मुझे पतंग उड़ाने की परमीशन कभी नहीं देंगी ।'
 "उन्हें पतंग उड़ाना पसन्द क्यों नही है, तेरे पापा को भी पतंग पसन्द नहीं है ? ...संक्रान्ति के दिन तो मेरे मम्मी पापा भी मेरे साथ पतंग उड़ाते हैं ।'
 "पतंग तो मेरे पापा को भी उड़ानी आती है,पहले वह उड़ाते भी थे,पर जब से वो हादसा हुआ है तब से पापा ने पतंग उड़ानी छोड़ दी और मम्मी तो पतंग नाम से ही बिदकती हैं।'
 "क्या हादसा हो  गया था शशांक ?'
 "बहुत दिन पहले की बात है,मेरा एक भाई था,उसे पापा ने ही पतंग उड़ानी सिखाई थी ।वह कभी कभी अपने दोस्तो के साथ छत पर पतंग उड़ाता था ।जब भी वह छत पर जाता था मम्मी हर बार उसे सावधानी से पतंग उड़ाने और पतंग न लूटने की सलाह अवश्य देती थीं फिर बड़बड़ाना शुरू का देती थीं कि रोज अखवार में खबर आती है पर बच्चे दो कौड़ी की पतंग लूटने के लिये ऐसे पागल हो जाते हैं कि जान गवा बैठते हैं या हाथ पैर तुड़वा लेते हैं ।'तब पापा अक्सर मम्मी को डांट देते थे कि तुम हमेशा नेगेटिव ही क्यो सोचती हो,हादसे कहाँ नहीं होते,उन से डर कर घर में तो नहीं बैठा जाता ।..तुम ने उसे इतनी बार समझा तो दिया है बच्चे पर विश्वास  करना भी सीखो।'
 "फिर क्या हुआ ?'
 "होना क्या था एक दिन भाई अपने दोस्तो के साथ छत पर पतंग उड़ा रहा था ,पापा की छुट्टी  थी तो पापा भी ऊपर ही थे ,पापा किसी काम से नीचे आए थे। भाई के दोस्त ने कटी पतंग को लोहे की रॉड से पकड़ने की कोशिश की तो रॉड हाइटेंशन वायर से छू गई,दोस्त को बचाने के चक्कर में भाई भी उसकी चपेट में आ गया , इस तरह दोनो की मौत हो गई ।''
 "ओ माई गाड,यह तो बहुत बुरा हुआ । ''
 "उस दिन के बाद से छत पर ताला पड़ा है। पापा भी कहीं खुद को दोषी मानते हैं और मैंने कभी पतंग उड़ाने की जिद्द नहीं की ।'
 "वह तो एक हादसा था यार ,पापा खुद को दोषी क्यों मानते हैं ?   देश में हजारों लोग पतंग उड़ाते हैं उनमें से कुछ के साथ इस तरह के हादसे हो जाते हैं।दुर्घटनाए कहाँ नहीं होती ट्रेन,एरोप्लेन एक्सीडेंट नहीं होते क्या ....तो क्या लोग इनमें यात्रा करना छोड़ देते हैं ।चल मैं तेरी मम्मी से प्रार्थना करता हूँ कि तुझे मेरे साथ पतंग उड़ाने की परमीशन दे दें ।'
 "कोशिश करना व्यर्थ है रवि वह बिल्कुल नहीं मानेंगी ।'
 "शशांक,रवि तुम दोनो में क्या खिचड़ी पक रही है ?'--मम्मी की आवाज सुन कर दोनो सकपका गए।
 "कुछ नहीं मम्मी,बस ऐसे ही बात कर रहे थे ।'
 "किस से किस बात की परमीशन लेने की बात हो रही थी ?'
 "आन्टी मैं आपसे शशांक को अपने घर लेजाने की रिक्वेस्ट करना चाह रहा था पर वह कह रहा था आप नहीं मानेंगी ।'
 "तुम्हारे घर तो यह रोज जाता है ,आज परमीशन की जरूरत क्यों पड़ रही है,कोई खास बात है ?'
 "असल में आन्टी कल से स्कूल बन्द हैं,मैं शशांक से कह रहा था शाम को मेरे घर आजाना मिल कर पतंग उड़ायेंगे ।'
 मम्मी का चेहरा एकदम से कठोर हो गया फिर आँखें नम होगई --"-नहीं बेटा इस पतंग ने मुझसे मेरा बेटा छीना है, मुझे नफरत हो गई है पतंग से ।'  
 "हाँ आन्टी शशांक ने मुझे बताया था,बहुद दुखद हादसा था वो।   ..पर आन्टी मेरी छत बहुत सुरक्षित  है वहाँ किसी तरह का कोई खतरा नहीं है ,मम्मी पापा ने इसी शर्त पर परमीशन दी है कि मैं केवल पतंग उड़ाऊगा ,कटी पतंग लूटूंगा नहीं ।उनकी शर्त है कि जिस दिन पतंग के पीछे भागते देख लिया उस दिन से छत की चाबी लेली जाएगी ।..
 मम्मी को चुप देख कर शशांक ने कहा--प्लीज मम्मी हाँ कर दीजिये,मेरा भी पतंग उड़ाने को बहुत दिल करता है...सच कहूँ तो मम्मी कई बार मेरा दिल किया कि आपको बिना बताये किसी दोस्त के यहाँ जा कर अपना यह शौक पूरा कर लूँ पर मैं ने ऐसा नहीं किया ।..मैं आपसे वादा करता हूँ कि बहुत सावधानी से  पतंग उड़ाऊँगा ।मम्मी मुझे भी अपनी जान की चिन्ता है मैं भी मरना या अपाहिज होना नही चाहता ।'
 "प्लीज आन्टी '
 "ठीक है चले जाना,पर अपना वादा घ्यान रखना ।'
 "थैंक यू मम्मी,दो कौड़ी की पतंग के पीछे हम कोई खतरा नहीं उठायेंगे '

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-पवित्रा अग्रवाल