गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

प्यारा सा घर

 बाल कहानी                                     
                                       प्यारा सा घर    


                                                         पवित्रा अग्रवाल 


 निधि ने स्कूल से आकर बैग सोफे पर फैंका और बिना किसी से बोले अपने कमरे में चली गई।न रोज की तरह घर आते ही कुछ खाने को माँगा, न स्कूल की बात की , न सहेलियों की बातों को चटपटे ढ़ंग से मम्मी को बताया।
 मम्मी ने सोचा शायद उसकी तबियत ठीक नहीं है वरना वह कहाँ चुप बैठने वाली है अत:उन्होंने उसके कमरे में जाकर पूछा --"निधि क्या बात है बेटे , आज तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है क्या ?'
   उसने बड़े  रूखेपन से कहा --"क्या हुआ है मुझे , भली चंगी तो हूँ।'            

    "तो चल कुछ खा ले ,आज मैं ने तेरे लिए फ्रूट कस्टर्ड बना कर रखा है।'
       " नहीं खाना ..खालो आप ही।'
        "मम्मी से ऐसे बात करते हैं ?'
      " आप मेरी मम्मी नहीं है..बताइये मेरे मम्मी-पापा कौन हैं..मैं किसकी बेटी हूँ...आप को मैं कहाँ मिली ?
 "किसने कहा कि तू हमारी बेटी नहीं है ?'
 "किसी ने भी कहा हो पर है तो यह सही न..लेकिन आपने यह बात मुझे क्यों  नहीं बताई ?'
 " अभी तुम हो ही कितनी बड़ी,अभी आठवीं कक्षा में ही तो हो सोचा था जब कुछ मैच्योर हो जाओगी तब धीरे धीरे बता देंगे किन्तु उसका नंबर ही नहीं आया और किसी ने तुम्हे बता कर हमारी मुश्किल आसान कर दी है।..यह ठीक है कि हमने तुम्हें जन्म नहीं दिया किन्तु तुम्हें पालने में कोई कमी नही रखी है। हमारा अपना बच्चा होता तो उसे भी हम इस से ज्यादा प्यार नहीं कर सकते थे।...क्या तुम्हें मेरे या पापा के प्यार में कभी कोई कमी नजर आई है ?'
 "हाँ आई है ,पापा तो चाहे जब डाँटते रहते हैं और आप भी पापा की तरफ लेती हैं।'
      " क्या तुम्हारी सहेलियों को उनके मम्मी पापा नहीं डाँटते ?गल्ती करने पर हर माता पिता अपने बच्चो को डाँटते हैं और डाँटना भी चाहिए।गलत बात पर उन्हें नही रोका टोका जाएगा तो बच्चों को कैसे पता चलेगा कि क्या सही है और क्या गलत है।'
       फिर मम्मी ने उसके पास बैठ कर उसके सर पर हाथ फेरते हुये कहा -"बेटा तुम्हें तो याद नही होगी जब तुम पहली या दूसरी कक्षा में पढ़ती थीं तब अक्सर तुम्हारे बैग में से मुझे तरह - तरह के रबड़ व पेंसिल- शार्पनर मिलते थे जो तुम्हारे नही होते थे।उनके रंग बिरंगे रूप  कभी कार शेप में ,कभी तितली के शेप में देख कर हर बच्चे का दिल पाने को मचलता है, तुम्हारा भी करता होगा,तुम उन्हे उठा लाती थीं । ...  शुरू  में तुम्हें प्यार से कई बार समझाया पर तुमने वह आदत नहीं छोड़ी, फिर तुम्हारे साथ सख्ती करनी पड़ी फिर तुम समझ गई कि बिना पूछे किसी की चीज उठाना चोरी कहलाता है । उसके बाद तुमने वह गल्ती कभी नहीं की।...हम तभी तुम्हे नहीं रोकते तो तुम फिर बड़ी बड़ी चीजें उठा कर लातीं और चोरी की आदत पड़ जाती ।'
 वह हिचकियाँ ले ले कर रो रही थी --"मेरे माँ बाप कौन हैं,आप मुझे कहाँ से ले कर आई ?'
      "देखो बेटा मैं ने अपने सब परिचितों में तो यही कह रखा है कि तुम हमारी एक मित्र की बेटी हो।..किन्तु आज मैं तुम से झूठ नहीं बोलूँगी हम तुम्हें अनाथालय  से लाए थे।..तुम्हें कोई अनाथालय के दरवाजे पर छोड़ गया था इसलिए तुम्हारे माँ बाप के बारे में कोई नहीं जानता।'
        "आप मुझे क्यों लाई ?'
  "हमारे बच्चे नही थे । हम दोनो एक बच्चे के लिए तरस रहे थे ।  हम एक ऐसे बच्चे को अपने घर लाना चाहते थे जिस के माता पिता नहीं हों, अब एसे बच्चे तो अनाथालय मे ही मिल सकते हैं। सब ने सलाह दी थी कि लड़का ही लाना।हम अनाथालय गये बहुत से बच्चों को हमने देखा पर बार बार नजर एक डौल सी प्यारी लड़की पर रूक जाती थी जो हमें देख कर मुस्करा रही थी,बस हमने तभी निर्णय कर लिया कि हम उसे ही गोद लेंगे और वह प्यारी सी बच्ची तुम थीं।तुम्हें घर लाने के बाद हमने एक बहुत बड़ी पार्टी दी थी।..तुमने तो वह फोटो देखे हैं न ? निधि एक बात बाद में आराम से सोच कर बताना कि तुम्हें बेटी बना कर क्या हमने कुछ गलत किया ?..पर अभी तो किचन में चल ,बहुत जोर से भूख लगी है कुछ खायेंगे ।'
 निधि ने अपने आँसू पौछते हुए कहा-- "आप चलिए मैं अभी आती हूँ।'
     मम्मी के जाने के बाद निधि को ध्यान आया कि उसकी हर बर्थ डे पर मम्मी उसे लेकर अनाथालय में बच्चो को खाना खिलाने जाती थीं और वह हर बार कहती थी आप अकेली चली जाओ मुझे वहाँ अच्छा नहीं लगता।एक कमरे मे बहुत सारे  छोटे छोटे बिना माँ बाप के बच्चो को देख कर उसे  दुख होता था ।उसे क्या पता था कि कभी वह भी ऐसे ही किसी अनाथालय मे रहती थी। मम्मी ने ऐसी जगह से निकाल कर उसे एक घर दिया ,इतना प्यार दिया और वह इतने अच्छे मम्मी पापा से इसलिए नाराज है कि उन्होंने उसे यह क्यों नहीं बताया कि वह उनकी बेटी नहीं है।
    उसने उठ कर हाथ मुँह धोये, कपड़े बदले और बाहर जा कर मम्मी के गले में बाहे डाल कर बोली
    --" थैंक यू मम्मी।'    
        "किस लिये ?'
       "एक घर और इतना प्यार देने के लिये ।'
 मम्मी की भी आँखें भर आई -- "बेटे तेरे आने से ही तो यह मकान एक घर बन पाया है ।हमारे जीवन में जो खालीपन था वह तुझ से ही भरा है।जा टेबिल पर खाना रखा है खा ले और आज के बाद यह कभी नहीं कहना कि आप  मेरी मम्मी नहीं हैं।'
 

 http://bal-kishore.blogspot.com/
  http://laghu-katha.blogspot.com/