शनिवार, 30 जुलाई 2011

बहादुर बालक



       बाल कहानी 
                                                         बहादुर बालक                                                                                                                       पवित्रा अग्रवाल


                सोहन को गाड़ी का इंतजार करते रात के दस बज गए थे पर गाड़ी नहीं आई थी। जनवरी के दिन थे पिछले चार पाँच दिनों से सर्दी काफी पड़ रही थी।हवा भी तेज थी ।ठंड से उसका शरीर काँप रहा था ।
               आज उसने आठ किलो मूँगफली खरीदी थीं जो करीब करीब पूरी बिक गई थीं। इस जगह उसका मन नहीं लग रहा था।उसने सुन रखा था कि दिल्ली बहुत बड़ी जगह है,वहाँ बच्चों को नौकरी आसानी से मिल जाती है।अत:आज उसने दिल्ली जाने का फैसला कर लिया था और सोचा था जब तक काम नहीं मिलेगा वहाँ भी मूँगफली बेच कर काम चलाएगा ।
               लगभग ग्यारह बजे गाड़ी धड़धड़ाती हुई स्टेशन पर आकर खड़ी हो गई।वह भी जल्दी से एक डिब्बे में चढ़ गया। वह बहुत थक गया था उसे बहुत जोर से नींद आ रही थी । डिब्बे में ज्यादा लोग नहीं थे। सब खिड़कियाँ बन्द होने की वजह से सर्दी भी कुछ कम थी। वह ऊपर की एक खाली सीट पर सिकुड़ कर लेट गया और जल्दी ही उसे नींद आगई।
               अचानक किसी स्त्री के चिल्लाने की आवाज सुन कर वह हड़बड़ा कर जग गया ।उसने नीचे झांक कर देखा कि कोट पेंट पहने एक काले कलूटे से अधेड़ आदमी ने एक लड़की का मुँह दबा रखा था।वह लड़की का पर्स छीन चुका था उसके कुंडल छीनना चाह रहा था । उसकी लम्बी लम्बी मूछें व लाल लाल डरावनी आँखें थीं। उसके एक हाथ में पिस्तौल भी थी जिसे देख कर सोहन बहुत डर गया।वहाँ कुछ यात्री थे जो कंबल में दुबके सोने का बहाना कर थे ।
                सोहन पर उस बदमाश की नजर नहीं पड़ी थी पर सोहन बहुत भयभीत था। उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अकेला क्या करूँ ।तभी उसे अपने थैले में रखे मूंगफली के लिए बनाए गए नमक मिर्च के मसाले की याद आ गई। धीरे से मुट्ठी में मसाला भर कर जैसे ही वह उठने को हुआ, आदमी ने ऊपर देखा। तभी सोहन ने झट से मसाला उसकी आँखों पर फेंक दिया।आदमी ने घबड़ा कर लड़की को छोड़ दिया और अपनी आँखें मलता हुआ दर्द से चिल्लाने  लगा  फिर सोहन ने उसे तराजू की डंडी से मारना शुरू किया और पर्स छीन कर उस लड़की को दे दिया। तभी बदमाश भाग कर दरवाजे से बाहर कूद गया पर उसका कोट सोहन के हाथ में आगया था। तब तक  एक दो लोग और आ गए ।सोहन को उन लोगो पर बहुत गुस्सा आ रहा था - "आप लोग अब आए हैं पहले आ गए होते तो हम उसको पकड़ तो सकते थे।'
               "अरे हमें तो पता ही नहीं चला,शोरगुल सुन कर अभी आँख खुली है''
          तब तक कोई स्टेशन आगया था।उन लोगों ने नीचे उतर कर गार्ड को सूचना दी फिर पुलिस आई।उन लोगों ने बताया कि  गाड़ी से कूदने पर हो सकता है बदमाश को चोट लगी हो, वैसे भी वह अभी बहुत दूर तक नहीं जा पाया होगा ।
          गाड़ी स्टेशन पर रुकी रही। थोड़ी ही देर में पुलिस के सिपाही एक आदमी को पकड़ कर लाए।वह लंगड़ा कर चल रहा था उसके सिर से खून बह रहा था।उसे देख कर सोहन चिल्लाया--"साब यह वही आदमी है।यह कोट भी इसी का है।''
          दरोगा जी ने सोहन की पीठ थपथपाई और कहा-"इस आदमी की हमें बहुत दिन से तलाश थी।एक महीने के अंदर इस लाइन पर ऐसी कई वारदात हो चुकी हैं पर यह हमारे चंगुल में नही आ पा रहा था। वहाँ खड़े सब आदमी उस बारह तेरह वर्षीय बालक की बहादुरी की तारीफ कर रहे थे।दरोगा जी ने कुछ अन्य यात्रियों को भी उस डिब्बे में बैठा दिया था।
           लड़की बता रही थी कि जब वह इस डिब्बे में चढ़ी तब इसमें काफी लोग थे जो बीच में उतर गए होंगे।  वह डाक्टरी की परीक्षा पास करके अपने घर दिल्ली लौट रही है,अकेली होने की वजह से वह  फर्स्ट  क्लास के डिब्बे में नहीं बैठी ।
         फिर उस लड़की ने जिस का नाम कविता था,सोहन से पूछा--"तुम्हारा नाम क्या है ?.. पढ़ते भी हो ?''
        "मेरा नाम सोहन है,मुझे पढ़ने का मौका कभी नहीं मिला ।''
        "अकेले कहाँ जा रहे हो ?''
         उसने कहा - ""दिल्ली नौकरी की तलाश में जा रहा हूँ ।''
        "तुम्हारे माता पिता कहाँ रहते हैं ?''
        यह सुन कर सोहन की आँखें भर आई ।आँसू पोंछते हुए वह बोला --"मेरे माता पिता नहीं हैं।अनाथालय में रहता था।वह लोग बहुत परेशान करते थे,भीख मँगवाते थे फिर भी पेट भर कर खाना नहीं देते थे और जिस दिन भीख कम मिलती थी उस दिन खाने को मार मिलती थी।एक दिन मौका देख कर मैं भाग कर दूसरी जगह चला गया।कुछ दिन भीख माँगी फिर पैसे इकट्ठे कर के मूंगफली बेचने लगा।अब दिल्ली जा रहा हूँ वैसे वहाँ भी मेरा कोई नहीं है।''
            उस लड़की कविता ने उसके आँसू पोंछ कर उस की पीठ थपथपाई और कहा -"अच्छे बच्चे रोते नहीं हैं..  तुम तो बहुत बहादुर हो।तुम मेरे साथ चलो...वहाँ हमारा बहुत बड़ा कारखाना हैं,काफी लोग वहाँ काम करते हैं... किन्तु तुम्हारी उम्र तो अभी पढ़ने की है।''
           "हाँ जीजी मुझे पढ़ना बहुत अच्छा लगता है।..आप लोग जो काम कहेंगे मैं करूँगा ,साथ में पढ़ाई भी करने को मिल जाए तो आपका एहसान जिन्दगी भर नहीं भूलूँगा ।''
           "हाँ ,मैं अपने पिता जी से बात करूँगी।..तुम्हारा कुछ न कुछ इंतजाम जरूर हो जाएगा।''
             दिल्ली स्टेशन आ गया था ।सामान उठा कर दोनो नीचे प्लेटफार्म पर उतर आए थे । बाहर बहुत सर्दी थी।तभी कविता का ध्यान सोहन की तरफ गया जो ठंड से काँप रहा था ।कविता ने अपनी शाल सोहन को देते हुए कहा ""सोहन इसे ओढ़ लो ,बहुत सर्दी है।''
          "नहीं जीजी मुझे तो इस की आदत है पर आपको सर्दी लग जाएगी ।''
           "देखो मैंने दो दो स्वेटर पहने हुए हैं फिर भी सर्दी लगी तो बैग में से दूसरी शाल निकाल लूँगी,तुम इसे ओढ़ लो।''
             फिर कविता की नजरें अपने पिता को तलाशने लगी थीं ।