सोमवार, 25 अप्रैल 2011

प्रेस ने चोर पकड़ा

                  
                                                  प्रेस ने चोर पकड़ा
 
                                                                                                     पवित्रा अग्रवाल  
        अभय और नीरा जुड़वाँ भाई-बहन थे।दोनों ही पढ़ने में बहुत तेज थे।कुछ दिन पूर्व उन के पिता की मृत्यु हो गई थी।वह अपने पीछे कोई जमा पूँजी नहीं छोड़ गए थे।पिता के जाने के बाद बच्चों के परवरिश की जिम्मेदारी माँ को ही निभानी थी किन्तु वह अधिक पढ़ी-लिखी नहीं थी।बहुत सोच विचार के बाद वह दो घरों में सुबह शाम खाना बनाने का काम करने लगी थीं।
        अपनी कम आय के बावजूद माँ चाहती थीं कि अभय और नीरा की पढ़ाई चलती रहे।दोनों ही कक्षा सात में पढ़ते थे।पढ़ने के अतिरिक्त नीरा को गाने का बहुत शौक था।पास पड़ोस के रेडियो से आते गाने  उसे न जाने कब याद हो जाया करते थे।स्कूल के हर उत्सव में वह कोई न कोई गाना अवश्य गाती थी और हर बार पुरस्कार पाती थी।
       एक बार उसके स्कूल में एक सांस्कृतिक प्रोग्राम का आयोजन किया गया। नीरा ने उस में - "ए मेरे वतन के लोगों,जरा आँख में भर लो पानी' देश भक्ति का गीत गाया।श्रोताओं ने मंत्रमुग्ध हो कर वह गाना सुना।गाने की समाप्ति पर हॉल ताली की गड़गड़ाहटों से गूँज उठा।
        उन्हीं श्रोताओं में शहर के मशहूर डॉक्टर देवेन भी थे।कार्यक्रम समाप्त होने के बाद उन्होंने नीरा को अपने पास बुलाया और उस से बहुत सारी बातें कीं।साथ ही उसे कक्षा सात की किताबों का पूरा सैट पुरस्कार में दिया। 
       नीरा और अभय दोनों के पास पूरी किताबें नहीं थीं।उन्होने कुछ पुरानी किताबें आधे दामों पर खरीदी थीं किन्तु किसी किताब के आगे के पन्ने गायब थे, किसी किताब के पीछे के।मजबूरी में दोनों भाई-बहन उन्हीं से काम चला रहे थे।किताबों का नया सैट देख कर दोनों चहक उठे।
       माँ जिन घरों में काम करती थी वहाँ से पुराने अखबार खरीद लाती थी । खाली समय में वे दोनो  लिफाफे बना कर दुकानों पर बेच देते थे।उन मे से सुन्दर चित्र छाँट कर उन्हों ने किताबों पर कवर चढ़ा लिए थे।
        अभय का स्कूल घर के पास में ही था।दोनों आपस में अदल-बदल कर किताबें स्कूल ले जाते थे।एक दिन अभय का एक घंटा खाली था।वह कुछ अन्य साथियों के साथ मैदान में खेलने चला गया। अगला घंटा गणित का था,उस ने गणित की किताब निकालने के लिए बस्ता खोला तो उसकी नई किताब गायब थी। उसकी आँखों से झर झर आँसू बहने लगे।मास्टर साहब के कहने पर उसने सब के बस्तों की तलाशी  ली। कई बच्चों के पास नई किताबें थीं पर सब पर उन बच्चों के नाम लिखे थे। 
        मास्टर साहब के पूछने पर अभय ने बताया " किताब पर मेरा नाम नहीं लिखा था पर उस पर मेरी बहन का नाम लिखा होना चाहिए' लेकिन किसी भी पुस्तक पर उसकी बहन का नाम नहीं लिखा था।वह बहुत परेशान था।सोच रहा था अब दूसरी किताब कहाँ से आएगी ..नीरा को क्या जवाब दूँगा ? पढ़ाई में उसका मन नहीं लग रहा था।
       आधी छुट्टी की घंटी बजने पर वह मास्टर साहब से इजाजत ले कर घर चला गया।उस दिन नीरा के स्कूल की छुट्टी थी।अभय को उदास देख कर वह बोली -"अभय क्या हुआ...मुँह क्यों लटका रखा है ? लगता है बच्चू को गृहकार्य पूरा न करने पर सजा मिली है...कान खिचायी हुई या मुर्गा भी बनाया गया ?'
       कोई और दिन होता तो अभय उसकी चोटी पकड़ कर घुमा देता या हँसी में ही सही दो मुक्के उसकी पीठ पर जमा देता किन्तु आज एक गंभीर मामला था ।अपराधी की तरह नजरें झुका कर बोला -" मुझ  से तेरी गणित की किताब खो गई है...पता नहीं किसने चुरा ली।...उस पर तेरा नाम लिखा था या नहीं ?'

      "क्या कहा किसी ने किताब चुरा ली ?...उस पर तो मैं ने नाम तक नहीं लिखा था।'
     "नाम भी नहीं लिखा था फिर कैसे मिल सकती है ? चुरा कर किसी ने अपना नाम लिख लिया होगा और अब किताब जिसने चुराई है सौ प्रतिशत उसकी हो गई..चोर तो पकड़ा ही नहीं जा सकता।'
      कुछ क्षण बाद ही नीरा की आँखों में एक चमक सी आ गई,वह बोली-"अभय मेरी किताब पहचान ने का एक तरीका है', कह कर उसने अभय के कान में कुछ कहा।
      अभय को एक आशा की किरण दिखाई दी।वह तभी स्कूल की तरफ चल दिया।स्कूल के बाहर एक धोबी का घर था जहाँ वह प्रेस करता रहता था।अभय कुछ देर के लिए उससे प्रेस माँग कर अपनी कक्षा में ले गया।
         अँग्रेज़ी के शिक्षक क्लास में आ चुके थे।उनसे अनुमति ले कर उसने कक्षा में प्रवेश किया और प्रेस ले जाकर मेज पर रख दी।मास्टर साहब कुछ कहते उस से पहले ही वह बोला-"मास्साब आज मेरी गणित की किताब चोरी हो गई है...मैं तो चोर नहीं पकड़ सका किन्तु मुझे उम्मीद है कि यह प्रेस चोर का पता अवश्य लगा लेगी।'
       उसे देख कर क्लास के सब बच्चे हँसने लगे। मास्टर साहब ने उसे क्रोध से घूर कर कहा -"यह क्या मजाक है,पागल तो नहीं हो गए हो ?'
     "साब मुझे एक मौका दीजिये,भगवान ने चाहा तो चोर अभी पकड़ में आ जाएगा।'
      उस ने पुन:सब की किताबें देखीं और जिन की किताबें नई थीं उन्हें ला कर मेज पर रख दिया।उसने एक एक कर के हर किताब को खोला फिर उस के पहले पन्ने पर जल्दी से प्रेस घुमा दी। सात-आठ किताबों पर प्रेस कर ने के बाद भी जब कोई परिणाम नहीं निकला तो मास्टर साहब ने झुंझला कर कहा
      -"क्यों सब का समय बरबाद कर रहे हो ?'
        तभी एकाएक अभय चिल्ला उठा -"मास्साब चोर पकड़ा गया....यह रही मेरी किताब ...मुकेश चोर है।'
       मुकेश दौड़ कर लड़ने के लिए आया--"बड़ा आया मुझे चोर बताने वाला...किताब पर लिखा मेरा नाम नहीं दिख रहा ?'
 मास्टर साहब ने किताब हाथ में लेकर देखी तो वहाँ किसी रंगहीन चिकने पदार्थ से"नीरा रानी नाम चमक रहा था।
     मास्टर साहब ने आश्चर्य में पड़ कर उस से पूछा कि अभी तक तो यहाँ कुछ नहीं था अब यह नाम कहा से आगया ?
        उस ने बताया कि --" मेरी बहन ने मोमबत्ती की पतली नोक से हर किताब पर अपना नाम लिख रखा है जो दिखाई नहीं देता यदि उस पर कोई गर्म वस्तु रखी ज़ाए तो अक्षर चमकने लगते हैं।'
        मास्टर साहब ने चोर पता लगाने के लिए अभय की पीठ थपथपाई फिर मुकेश को अपने पास आने को कहा किन्तु अभय का ध्यान अब वहाँ नहीं था वह किताब को कस कर सीने से चिपकाए था जैसे बहुत दिनों बाद कोई बिछुड़ा दोस्त मिला हो।उसकी आँखों में प्रसन्नता के आँसू थे।
                                                                

पवित्रा अग्रवाल
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