गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

प्यारा सा घर

 बाल कहानी                                     
                                       प्यारा सा घर    


                                                         पवित्रा अग्रवाल 


 निधि ने स्कूल से आकर बैग सोफे पर फैंका और बिना किसी से बोले अपने कमरे में चली गई।न रोज की तरह घर आते ही कुछ खाने को माँगा, न स्कूल की बात की , न सहेलियों की बातों को चटपटे ढ़ंग से मम्मी को बताया।
 मम्मी ने सोचा शायद उसकी तबियत ठीक नहीं है वरना वह कहाँ चुप बैठने वाली है अत:उन्होंने उसके कमरे में जाकर पूछा --"निधि क्या बात है बेटे , आज तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है क्या ?'
   उसने बड़े  रूखेपन से कहा --"क्या हुआ है मुझे , भली चंगी तो हूँ।'            

    "तो चल कुछ खा ले ,आज मैं ने तेरे लिए फ्रूट कस्टर्ड बना कर रखा है।'
       " नहीं खाना ..खालो आप ही।'
        "मम्मी से ऐसे बात करते हैं ?'
      " आप मेरी मम्मी नहीं है..बताइये मेरे मम्मी-पापा कौन हैं..मैं किसकी बेटी हूँ...आप को मैं कहाँ मिली ?
 "किसने कहा कि तू हमारी बेटी नहीं है ?'
 "किसी ने भी कहा हो पर है तो यह सही न..लेकिन आपने यह बात मुझे क्यों  नहीं बताई ?'
 " अभी तुम हो ही कितनी बड़ी,अभी आठवीं कक्षा में ही तो हो सोचा था जब कुछ मैच्योर हो जाओगी तब धीरे धीरे बता देंगे किन्तु उसका नंबर ही नहीं आया और किसी ने तुम्हे बता कर हमारी मुश्किल आसान कर दी है।..यह ठीक है कि हमने तुम्हें जन्म नहीं दिया किन्तु तुम्हें पालने में कोई कमी नही रखी है। हमारा अपना बच्चा होता तो उसे भी हम इस से ज्यादा प्यार नहीं कर सकते थे।...क्या तुम्हें मेरे या पापा के प्यार में कभी कोई कमी नजर आई है ?'
 "हाँ आई है ,पापा तो चाहे जब डाँटते रहते हैं और आप भी पापा की तरफ लेती हैं।'
      " क्या तुम्हारी सहेलियों को उनके मम्मी पापा नहीं डाँटते ?गल्ती करने पर हर माता पिता अपने बच्चो को डाँटते हैं और डाँटना भी चाहिए।गलत बात पर उन्हें नही रोका टोका जाएगा तो बच्चों को कैसे पता चलेगा कि क्या सही है और क्या गलत है।'
       फिर मम्मी ने उसके पास बैठ कर उसके सर पर हाथ फेरते हुये कहा -"बेटा तुम्हें तो याद नही होगी जब तुम पहली या दूसरी कक्षा में पढ़ती थीं तब अक्सर तुम्हारे बैग में से मुझे तरह - तरह के रबड़ व पेंसिल- शार्पनर मिलते थे जो तुम्हारे नही होते थे।उनके रंग बिरंगे रूप  कभी कार शेप में ,कभी तितली के शेप में देख कर हर बच्चे का दिल पाने को मचलता है, तुम्हारा भी करता होगा,तुम उन्हे उठा लाती थीं । ...  शुरू  में तुम्हें प्यार से कई बार समझाया पर तुमने वह आदत नहीं छोड़ी, फिर तुम्हारे साथ सख्ती करनी पड़ी फिर तुम समझ गई कि बिना पूछे किसी की चीज उठाना चोरी कहलाता है । उसके बाद तुमने वह गल्ती कभी नहीं की।...हम तभी तुम्हे नहीं रोकते तो तुम फिर बड़ी बड़ी चीजें उठा कर लातीं और चोरी की आदत पड़ जाती ।'
 वह हिचकियाँ ले ले कर रो रही थी --"मेरे माँ बाप कौन हैं,आप मुझे कहाँ से ले कर आई ?'
      "देखो बेटा मैं ने अपने सब परिचितों में तो यही कह रखा है कि तुम हमारी एक मित्र की बेटी हो।..किन्तु आज मैं तुम से झूठ नहीं बोलूँगी हम तुम्हें अनाथालय  से लाए थे।..तुम्हें कोई अनाथालय के दरवाजे पर छोड़ गया था इसलिए तुम्हारे माँ बाप के बारे में कोई नहीं जानता।'
        "आप मुझे क्यों लाई ?'
  "हमारे बच्चे नही थे । हम दोनो एक बच्चे के लिए तरस रहे थे ।  हम एक ऐसे बच्चे को अपने घर लाना चाहते थे जिस के माता पिता नहीं हों, अब एसे बच्चे तो अनाथालय मे ही मिल सकते हैं। सब ने सलाह दी थी कि लड़का ही लाना।हम अनाथालय गये बहुत से बच्चों को हमने देखा पर बार बार नजर एक डौल सी प्यारी लड़की पर रूक जाती थी जो हमें देख कर मुस्करा रही थी,बस हमने तभी निर्णय कर लिया कि हम उसे ही गोद लेंगे और वह प्यारी सी बच्ची तुम थीं।तुम्हें घर लाने के बाद हमने एक बहुत बड़ी पार्टी दी थी।..तुमने तो वह फोटो देखे हैं न ? निधि एक बात बाद में आराम से सोच कर बताना कि तुम्हें बेटी बना कर क्या हमने कुछ गलत किया ?..पर अभी तो किचन में चल ,बहुत जोर से भूख लगी है कुछ खायेंगे ।'
 निधि ने अपने आँसू पौछते हुए कहा-- "आप चलिए मैं अभी आती हूँ।'
     मम्मी के जाने के बाद निधि को ध्यान आया कि उसकी हर बर्थ डे पर मम्मी उसे लेकर अनाथालय में बच्चो को खाना खिलाने जाती थीं और वह हर बार कहती थी आप अकेली चली जाओ मुझे वहाँ अच्छा नहीं लगता।एक कमरे मे बहुत सारे  छोटे छोटे बिना माँ बाप के बच्चो को देख कर उसे  दुख होता था ।उसे क्या पता था कि कभी वह भी ऐसे ही किसी अनाथालय मे रहती थी। मम्मी ने ऐसी जगह से निकाल कर उसे एक घर दिया ,इतना प्यार दिया और वह इतने अच्छे मम्मी पापा से इसलिए नाराज है कि उन्होंने उसे यह क्यों नहीं बताया कि वह उनकी बेटी नहीं है।
    उसने उठ कर हाथ मुँह धोये, कपड़े बदले और बाहर जा कर मम्मी के गले में बाहे डाल कर बोली
    --" थैंक यू मम्मी।'    
        "किस लिये ?'
       "एक घर और इतना प्यार देने के लिये ।'
 मम्मी की भी आँखें भर आई -- "बेटे तेरे आने से ही तो यह मकान एक घर बन पाया है ।हमारे जीवन में जो खालीपन था वह तुझ से ही भरा है।जा टेबिल पर खाना रखा है खा ले और आज के बाद यह कभी नहीं कहना कि आप  मेरी मम्मी नहीं हैं।'
 

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सोमवार, 14 नवंबर 2011

खाने में रंग

  बाल कहानी                                                       

                          खाने में रंग

                                                                                               पवित्रा अग्रवाल


 सुयश स्कूल से घर आया तो देखा माँ रसोइ में कुछ काम का रही थीं। सुयश ने रसोई में जा कर पूछा "माँ आप इस समय रसोई में क्या कर रही हैं ?'
 "बहुत दिन से ऊपर वाली आन्टी से कह रखा था कि आप जब भी अपने लिए अचार डालने को टेंटी लाएं तो एक किलो मेरे लिए भी ले आना ।कल आन्टी ने टेंटी ला कर दी हैं ।'
 "अरे वाह माँ, टेंटी का अचार तो मुझे बहुत पसंद है।खूब सारा डालना ।'
 "मुझे मालुम है कि तुझे यह अचार बहुत पसंद है, तेरे लिए ही तो डाल रही हूँ।...तेरे पापा को तो अचार का शौक है नहीं ।'
 "थैंक यू माँ,मैं कुछ मदद करूँ ?'
 माँ ने मुस्कुरा कर कहा-- "अचार डालना सीखेगा इतने दिन से कह रही हूँ उपमा ,पोहा तुझे बहुत पसंद हैं, इन्हें  बनाना सीख ले। कभी मुझे बाहर जाना पड़े तो इन्हें बना कर पेट तो भर सकता है। "
 "उपमा ,पोहा ही क्यों माँ मुझे तो आप से पूरा खाना बनाना ही सीखना है।स्कूल बन्द हो जाने दीजिए इस बार कुछ चीजें बनाना जरूर सीखूँगा ।...आप अचार में यह क्या डाल रही हैं माँ ?'
 "बेटा यह लाल रंग है ।'
 "इस से क्या होता है माँ ?'
 "कुछ नहीं बस अचार अच्छा दिखने लगता है । '
 " इस से स्वाद में तो कोई फर्क नहीं पड़ता न ?'
 "न,इस से स्वाद में कोई फर्क नहीं पड़ता ।'
 "तो प्लीज माँ आप रंग ना डालें ।...इस तरह की चीजों से बचना चाहिए।रंग स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होते हैं।बल्कि इन्हें तो धीमा जहर कहना चाहिए ।बहुत सी बीमारियों की जड़ हैं ये ।'
 "अच्छा ..ऊपर वाली आन्टी तो हर अचार में डालती हैं ।'
 "उन्हें पता नहीं होगा, इस लिए डालती हैं ।अब आप उन्हें भी बता दीजिएगा ।'
 "पर बेटा तुझे यह किसने बताया ?'
 माँ एक बार मैं अपने एक दोस्त के घर गया था ,उसके डाक्टर भाई ने यह सब बताया था । '
 "पर बेटा आज कल तो खाने पीने की चीजों  में खूब रंग डाला जा रहा है।यदि वह हानिकारक है तो सरकार को उस पर रोक लगानी चाहिए ।'
 "आप बिल्कुल ठीक कह रही  हैं माँ  पर इसके लिए लोगों को भी जागरूक होना पड़ेगा ।हम सारी जिम्मेंदारी सरकार पर नहीं डाल सकते ।होटल में खाना खाने जाएं तो उनसे कहें कि सब्जियों में रंग न डालें, ..हलवाई के यहाँ मिठाई लें तो देख कर वही मिठाई लें जिनमें रंग न डला हो और उसे भी कहें कि रंग का प्रयोग न करे ।'
 "लेकिन बेटा वह यह बात क्यों मानेगा ?उनकी मिठाई व सब्जियाँ तो खूब बिकती ही हैं न ।'
 "हाँ माँ ,एक दो के कहने से नहीं पर जब लोगों में जागरूकता आजाएगी और वह उन्हें रंग न डालने की हिदायत देंगे ,साथ ही रंग वाली मिठाई ,सब्जियां आदि नहीं लेंगे तो वह इस बात पर सोचने को मजबूर हो जाएगे।इस लिए पहले हम को जागरूक होना पड़ेगा ।'
 "हाँ बेटा कहता तो तू बिल्कुल ठीक है।आगे से मैं इसका घ्यान रखूंगी और अपने मिलने वालों को भी बताऊंगी।ले इस रंग को कचरे के डिब्बे में फेंक दे।'
 "थैंक यू मम्मी ।'
                                       

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बुधवार, 19 अक्तूबर 2011

सच्चा दोस्त

बाल कहानी                                  

                                सच्चा दोस्त    
                                                             पवित्रा अग्रवाल



   स्कूल से लौटते समय अशोक ने अपने मित्र रमन से कहा -- "यार मैंने ताश का एक नया खेल सीखा है.. उसे तीन पत्ती कहते हैं, तुम्हें आता है ?'
 "नहीं।'
 "अरे यार बहुत आसान है। मैं तुम्हें सिखा दूँगा। इस बार दीपावली के दिन हम लोग यह गेम पैसों से खेलेंगे, बहुत मजा आएगा।'
 "अशोक मैंने कभी ताश नहीं खेले इसीलिए मुझे ताश का कोई खेल नहीं आता और ना ही मैं सीखना चाहता हूँ। वैसे भी जो खेल पैसों से खेला जाए उसे जुआ कहते हैं और मैं जुआ नहीं खेलता।'
 "रमन तू मेरा कैसा दोस्त है ?...तुझ से रोज खेलने को नहीं कह रहा, हम तो बस दीपावली के दिन खेलेंगे। अरे यार इस एक दिन जुआ खेलने की छूट तो हमारे परिवार में मिलती है।'
 इस एक दिन की छूट ने ही बहुत लोगों को जुआरी बना दिया है। हरेक का स्वयं पर इतना नियंत्रण नहीं होता। एक बार ये चस्का लग
जाए तो जिंदगी भर नहीं छूटता। बाबाजी के जमाने में हमारे परिवार में सभी को दीपावली के दिन जुआ खेलने की छूट मिली हुई थी। मेरे एक चाचा को तो ताश में रुचि नहीं थी। एक दीपावली पर परिवार में सदस्यों की संख्या कम होने की वजह से ताश खेलने में मजा नहीं आ रहा था तो बाबा जी ने चाचा को भी खेलने के लिए जबरन बैठा लिया। चाचा उस दिन खूब जीते और तब से उन्हें इस खेल का ऐसा चस्का लगा, जो अब तक नहीं छूटा है। पहले वह दोस्तों में टाइम पास करने के लिए खेलते थे फिर पैसों से खेलना शुरू किया। अब तो वे पक्के जुआरी बन चुके हैं। अपनी कमाई का अधिकांश पैसा जुए में उड़ा देते हैं। चाची बहुत दुखी रहती हैं। चाचा तो स्पष्ट कहते हैं कि मुझे ये चस्का घर वालों ने ही लगाया है। तब से हमारे परिवार में दीपावली के दिन कोई ताश भी नहीं खेलता।'
 "लेकिन रमन, मैं इतना नादान नहीं हूँ। मेरा स्वयं पर बहुत नियंत्रण है। हम बस एक दिन खेलेंगे।'
 "नहीं अशोक, न मैं खेलूँगा न तुम्हें खेलने दूँगा।'
 "देखो दोस्त तुम खेलो या मत खेलो, तुम्हारी मर्जी पर मैं तो खेलूँगा।'
 "अपने यार की एक छोटी सी बात नहीं मानेगा अशोक ? '
 "तुम भी तो मेरी बात नहीं मान रहे।'
 "मेरी बात समझने की कोशिश करो अशोक। जुआ खेलना गलत है, अपराध भी है। ये हमें गलत राह पर ले जा सकता है। सच्ची दोस्ती का मतलब यह नहीं है कि अपने दोस्त की गलत बात में भी साथ दिया जाए। सच्चा दोस्त वह है, जो अपने दोस्त के गलत राह पर बढ़ते कदमों को रोकने की कोशिश करे।'
 "तुम तो मुझे उपदेश देने लगे। मैं अपना अच्छा-बुरा समझता हूँ। यह खेल मैंने अपने मोहल्ले के लड़कों से ही सीखा है। दीपावली के दिन मैं तुमको वहाँ ले जाना चाहता था। तुम नहीं जाना चाहते तो तुम्हारी इच्छा, मैं तो जाऊँगा। तुम से उम्मीद रखता हूँ कि मेरे मम्मी-पापा को इस विषय में कुछ नहीं बताओगे।'
 "दीपावली के दिन अशोक की मम्मी रमन के घर आर्इं और पूछा, "अशोक तुम्हारे साथ है क्या ?'
 "नहीं आंटी मुझे आज सुबह से अशोक नहीं मिला है।'
 "बता सकते हो कि कहाँ होगा ? घर पर दिवाली का इतना काम पड़ा है.. बाजार से सामान मँगाना
है लेकिन उसका पता ही नहीं है कि कहाँ है ?'
 रमन ने अंदाजा लगाया कि जरूर वह लड़कों के साथ जुआ खेल रहा होगा। उसने अशोक की मम्मी को कुछ भी नहीं बताया और कहा- "आंटी आप घर जाएँ। मैं उसे ढूँढ़ कर अभी लाता हूँ।'
    दो-तीन जगह पूछने पर अशोक के ठिकाने का पता लग गया। रमन को आया देख कर अशोक चहक कर बोला --"यह हुई न दोस्तों वाली बात। तुम हमें एक-दो बाजी खेलते हुए देखो तो तुम्हें भी गेम समझ में आ जाएगा।'
 "मैं यहाँ गेम समझने नहीं आया हूँ। तुम्हारी मम्मी तुम्हें ढूँढ़ रही है।'
  "तुमने मम्मी को मेरे बारे में कुछ बताया तो नहीं ?'
 "अभी तो नहीं बताया है... फौरन चलो वर्ना उन्हें सब बता दूँगा।'
 "नहीं ऐसा मत करना, मैं अभी चल रहा हूँ।'
       दोनों उस ठिकाने से निकल कर थोड़ी दूर ही गए थे कि तभी उन्होंने कुछ पुलिस वालों को उधर जाते देखा। थोड़ी देर बाद उन्होंने देखा कि अशोक के साथ जुआ खेलने वालों को पुलिस पकड़ कर ले जा रही थी।
 अपने साथियों को पुलिस की गिरफ्त में देखकर अशोक भय से थरथराने लगा और बोला- "रमन, तुमने मुझे बचा लिया दोस्त, आज तो गजब हो जाता। मैं मम्मी-पापा को मुँह दिखाने लायक नहीं रहता। तुमने ठीक कहा था कि सच्चा दोस्त वही है, जो सही राह दिखाए। अब मैं यह खेल कभी नहीं खेलूँगा।'
 


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शनिवार, 24 सितंबर 2011

फूलों से प्यार

बाल कहानी


                                                          फूलों से प्यार

                                                                                                  पवित्रा अग्रवाल


 मम्मी ने गुस्से में दो थप्पड़ मारते हुए ऋतु से कहा --"तू क्यों नहीं मानती,तेरी वजह से रोज मुझे पड़ौसियों की बातें सुननी पड़ती हैं ।तू उनके गमलों से फूल क्यों तोड़ती है ? रोज कोई न कोई तेरी शिकायत करता रहता है।'
  रोते हुये ऋतु ने कहा "पर आज तो मैं ने किसी के फूल नही तोड़े, आप मुझे बिना बात मार रहीं हैं।'
 "आज नही तो कल तोड़े होंगे,नेहा की मम्मी आज मुझे लिफ्ट में मिली थीं तो शिकायत कर रही थीं।'
 " मैं ने कल सीमा के पौधे से दो फूल जरूर तोड़े थे पर नेहा के गमले से कोई फूल नहीं तोड़ा था'
 "सीमा के फूल भी क्यो तोड़े ?'
 "मम्मी मैं क्या करूँ, मुझे फूल बहुत अच्छे लगते हैं,न चाहते हुये भी मैं फूल तोड़ लेती हूँ।'
 माँ ने उसे समझाते हुए कहा --"अच्छे लगते हैं तो उन्हे तोड़ती क्यों है,तोड़ने के बाद तो वह और जल्दी सूख जाते हैं।पौधो पर लगे हुए फूल ज्यादा समय तक खिले रहते हैं और उनसे सब को खुशी मिलती है।उन्हे खिला देख कर सब के साथ तू भी खुश हो लिया कर।'
 ऋतु तुरन्त बोली--"मम्मी मैं नहीं तोड़ूँगी तो भी फूलों को तो सूख कर गिरना ही है।'
 ऋतु के इस प्रश्न से माँ नाराज हो गई --"बात समझती नहीं बस बहस करती है।सौ बात की एक बात समझले जो चीज तुम्हारी नही है उस को छूने का तुम्हे कोई हक नहीं है।आज के बाद तूने किसी का एक भी फूल तोड़ा तो मैं तुझे न कहीं घुमाने ले जाऊँगी,न एक भी ड्रेस दिलाऊँगी और सब से कह दूँगी कि मुझ से शिकायत मत करो उसे सजा दो।'
  ऋतु क्षमा मांगते हुए बोली--"अच्छा मम्मी मैं वादा करती हूँ आगे से नहीं तोड़ूगी पर फिर भी किसी ने मेरा झूठा नाम लगाया तो ? जैसे नेहा की मम्मी ने आप से झूठ कहा।' 
 ऋतु के वादे के बाद भी माँ की नाराजगी कम नहीं हुई थी --"उन्हों ने सामान्य बात कही थीं कि ऋतु पौधों पर एक फूल नहीं छोड़ती है वैसे भी तू तोड़े या न तोड़े पर फूल तोड़ने के लिए इस बिÏल्डग में तू इतनी बदनाम हो चुकी है कि फूल कोई और भी तोड़े तेरा ही नाम लिया जाएगा।'
 "मैं नही तोड़ू तब भी मेरा नाम लिया जाये यह तो गलत बात है मम्मी।'
 "अब गलत हो या सही पर सच्चाई यही है।'
  ऋतु स्कूल से लौटी तो अपने दरवाजे पर चार पाँच तरह के रंग बिरंगे फूलों के गमले देख कर चहकते हुए मम्मी से पूछा--"यह सब आप मेरे लिए लाई हैं ?'
 "हाँ '
 "थैंक यू मम्मी आप बहुत अच्छी हैं। ' थोड़ी ही देर मे उसके फूलों से लदे गमले देखने बहुत से बच्चे आ गए।
 आश्चर्य से एक बच्चा बोला - "अरे ऋतु अभी तक तू ने एक भी फूल नहीं तोड़ा ?तोड़ न..तू कहे तो हम तोड़ कर दे दें ?'
 "दूर हटो कोई मेरे फूलों को हाथ नहीं लगाएगा।'
 "कल तक तुम हमारे फूल तोड़ती थीं, अब हम भी तुम्हारे फूल नहीं छोड़ेगे।' कह कर सब बच्चे चले गये।

 अब ऋतु डर गई थी।न उसका खाने मे मन लग रहा था न पढ़ने में।वह बार बार खिड़की से झांक
कर देख लेती थी कि फूल अभी हैं या किसी ने तोड़ लिये।रात को उसने मम्मी से पूछा--"क्या हम इन गमलो को घर में नही रख सकते ?'
 माँ ने उसे दुलारते हुये कहा - "बेटा इन को हवा और धूप की आवश्यकता पड़ती है तभी तो यह जीवित रह पायेंगे ।'
 डरते हुए ऋतु बोली --"मम्मी बाहर किसी ने फूल तोड़ लिये तो ?'
 "तोड़ लेने पर भी तू किसी से शिकायत नहीं कर सकेगी..पर अभी तक तूने अपने गमले का एक भी फूल नहीं तोड़ा। जा तोड़ ले.. ये तेरे अपने हैं, तुझे कोई नहीं डाँटेगा... वैसे भी कल तक गिर कर मुरझा जाएगे।'
 "नहीं मम्मी ये गैंदे के फूल तो दस-पंद्रह दिन तक खिले रहते है और ये दूसरे वाले फूल भी कई दिन नहीं मुरझाते। दूसरों की तकलीफ का अहसास मुझे आज तब हुआ है जब मेरे पास अपने फूल हैं।..मैं सब बच्चो से क्षमा माँग लूँगी और कभी किसी के फूल नहीं तोड़ूँगी। उनसे कहूँगी कि वह भी मेरे फूल न तोड़े।'  

         
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शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

जन्म दिन का उपहार

बाल कहानी                                  
                                            जन्म दिन का उपहार

                                                                                                             पवित्रा अग्रवाल
             
      फिस से आते ही पापा ने कहा "टीना तुम्हारा जन्म दिन आ रहा है ..जन्म दिन के लिए क्या क्या तैयारी करनी है ?..तुम्हारी कितनी सहेलियाँ आएंगी ?..बाजार से मुझे क्या क्या लाना है...मम्मी से सलाह कर के लिस्ट तैयार कर लो,जन्म दिन से दो दिन पहले मुझे दे देना ।''
  "पापा मैं इस बार अपना जन्म दिन नहीं मनाऊँगी।''
 "जन्म दिन नहीं मनाओगी , क्यों ?...हर वर्ष तो बीस दिन पहले से शोर मचाना शुरू कर देती थी,इस बार क्या हो गया ?''
 "उन दिनो मेरी परीक्षाएं हैं, कोई भी सहेली नहीं आ पाएगी।''
 "अरे यह तो बड़ी गड़बड़ हो गई,चलो परीक्षा के बाद एक दिन अपनी दोस्तों को बुला कर वैसे ही पार्टी दे देना।...अब यह तो बता कि इस बार मेरी बिटिया अपने पापा से क्या उपहार लेगी ?''
 " पापा इस बार मुझे कोई उपहार नहीं चाहिए ।''
 " क्या तुम को इस बार जन्म दिन का उपहार भी नहीं चाहिए,आश्चर्य है ।...क्या हमारी बेटी अपने पापा से नाराज है ?''
 " नहीं पापा नाराज नहीं हूँ ,सब कुछ तो है मेरे पास ।''
 " फिर भी कुछ तो ले ले।''
 " मैं जो माँगूगी मुझे मिलेगा पापा ?''
 " माँग कर तो देख क्यों नहीं मिलेगा ।''
 " मै जानती हूँ जो मैं माँगूगी वह आप मुझे नहीं दे पाएंगे ।''
 " ऐसा क्या है जो मैं नहीं दे पाऊँगा , जो उपहार तुम चाहती हो क्या वह बहुत मंहगा है ?''
 " मंहगा तो नहीं है बल्कि उस उपहार को देने में रुपए भी खर्च नहीं करने पड़ेगे फिर भी आपके लिए देना मुश्किल है।''
 " ऐसा कौन सा उपहार है जो बिना पैसों के मिलता है ,पहेलियाँ मत बुझा,जल्दी से बता दे ।''
 " तो फिर सुनिए पापा, आपको मुझ से एक वादा करना होगा ।''
 " कैसा वादा ?''
 " पापा मैं आपको बहुत प्यार करती हूँ और चाहती हूँ आप हमेशा स्वस्थ रहें...जब पिछले दिनों आप की तबियत खराब हुई थी तब डाक्टर ने आप से साफ कहा था कि "मुझ से इलाज कराना है तो आपको तम्बाकू वाला पान और गुटखा छोड़ना होगा ' लेकिन आपने डाक्टर की बात नहीं मानी पर मेरे लिए आपको तम्बाकू और गुटका खाना छोड़ना होगा..और यही मेरे लिए जन्म दिन का उपहार होगा ।''
 "  अरे बेटा तू ने भी यह क्या माँग लिया।..मैं कई बार यह सब छोड़ने की कोशिश कर चुका हूँ किन्तु नहीं छोड़ पाया..कुछ और माँग ले टीना।...आज तुझे अचानक मेरा तम्बाकू और गुटखा कैसे याद आगया ?''
 ""पापा पिछले सप्ताह मेरे स्कूल की एक लड़की के पापा की मौत मुँह के कैंसर से हो गई थी, वह बहुत गुटखा खाते थे और सिगरेट भी खूब पीते थे।उनका आप्रेशन हुआ था। ...आपको पता है पापा इलाज में उनका मकान भी बिक गया फिर भी उनको बचाया नहीं जा सका...अब उस लड़की ने स्कूल छोड़ दिया है क्यों कि उसकी मम्मी उसे इतने मंहगे स्कूल में नहीं पढ़ा सकती।क्या आप चाहते हैं हमारे साथ भी ऐसा ही हो ? ''
 कह कर टीना सुबक - सुबक कर रोने लगी थी
 "पापा ने उसे सीने से चिपका लिया था --" रो मत टीना,तुम्हारे पापा के साथ ऐसा कुछ नहीं होगा। मैं तम्बाकू छोड़ने की पूरी कोशिश करूँगा ।''
 ""पापा कोशिश तो आप पहले भी कई बार कर चुके हैं पर इस बार आपको छोड़ना होगा।आप पान खाएं लेकिन बिना तंबाकू का और गुटखा तो बिलकुल नहीं।...मेरे जन्म दिन में अभी कुछ दिन बाकी है,तब तक आप छोड़ दें और यही मेरा उपहार है। उपहार देना न देना आपकी इच्छा पर है।''
 कुछ सोचते हुए पापा ने जेब में हाथ डाल कर गुटखे के कुछ पैकेट निकाल कर टीना को देते हुए कहा इन्हें डस्ट-बिन में फेंक दे...और फ्रिज में भी कुछ तंबाकू के पान रखे हैं उन्हें भी फेंक दे,जब छोड़ना ही है तो अभी से क्यों नही।''
 " थैंक यू पापा..पर अपना वादा याद तो रहेगा न ?''
 " तुम्हें अपने पापा पर विश्वास  नहीं..उपहार दे के कोई वापस लेता है क्या ?''
  टीना पापा से लिपट गई थी ।
                                                          
                                                                        

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शनिवार, 30 जुलाई 2011

बहादुर बालक



       बाल कहानी 
                                                         बहादुर बालक                                                                                                                       पवित्रा अग्रवाल


                सोहन को गाड़ी का इंतजार करते रात के दस बज गए थे पर गाड़ी नहीं आई थी। जनवरी के दिन थे पिछले चार पाँच दिनों से सर्दी काफी पड़ रही थी।हवा भी तेज थी ।ठंड से उसका शरीर काँप रहा था ।
               आज उसने आठ किलो मूँगफली खरीदी थीं जो करीब करीब पूरी बिक गई थीं। इस जगह उसका मन नहीं लग रहा था।उसने सुन रखा था कि दिल्ली बहुत बड़ी जगह है,वहाँ बच्चों को नौकरी आसानी से मिल जाती है।अत:आज उसने दिल्ली जाने का फैसला कर लिया था और सोचा था जब तक काम नहीं मिलेगा वहाँ भी मूँगफली बेच कर काम चलाएगा ।
               लगभग ग्यारह बजे गाड़ी धड़धड़ाती हुई स्टेशन पर आकर खड़ी हो गई।वह भी जल्दी से एक डिब्बे में चढ़ गया। वह बहुत थक गया था उसे बहुत जोर से नींद आ रही थी । डिब्बे में ज्यादा लोग नहीं थे। सब खिड़कियाँ बन्द होने की वजह से सर्दी भी कुछ कम थी। वह ऊपर की एक खाली सीट पर सिकुड़ कर लेट गया और जल्दी ही उसे नींद आगई।
               अचानक किसी स्त्री के चिल्लाने की आवाज सुन कर वह हड़बड़ा कर जग गया ।उसने नीचे झांक कर देखा कि कोट पेंट पहने एक काले कलूटे से अधेड़ आदमी ने एक लड़की का मुँह दबा रखा था।वह लड़की का पर्स छीन चुका था उसके कुंडल छीनना चाह रहा था । उसकी लम्बी लम्बी मूछें व लाल लाल डरावनी आँखें थीं। उसके एक हाथ में पिस्तौल भी थी जिसे देख कर सोहन बहुत डर गया।वहाँ कुछ यात्री थे जो कंबल में दुबके सोने का बहाना कर थे ।
                सोहन पर उस बदमाश की नजर नहीं पड़ी थी पर सोहन बहुत भयभीत था। उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अकेला क्या करूँ ।तभी उसे अपने थैले में रखे मूंगफली के लिए बनाए गए नमक मिर्च के मसाले की याद आ गई। धीरे से मुट्ठी में मसाला भर कर जैसे ही वह उठने को हुआ, आदमी ने ऊपर देखा। तभी सोहन ने झट से मसाला उसकी आँखों पर फेंक दिया।आदमी ने घबड़ा कर लड़की को छोड़ दिया और अपनी आँखें मलता हुआ दर्द से चिल्लाने  लगा  फिर सोहन ने उसे तराजू की डंडी से मारना शुरू किया और पर्स छीन कर उस लड़की को दे दिया। तभी बदमाश भाग कर दरवाजे से बाहर कूद गया पर उसका कोट सोहन के हाथ में आगया था। तब तक  एक दो लोग और आ गए ।सोहन को उन लोगो पर बहुत गुस्सा आ रहा था - "आप लोग अब आए हैं पहले आ गए होते तो हम उसको पकड़ तो सकते थे।'
               "अरे हमें तो पता ही नहीं चला,शोरगुल सुन कर अभी आँख खुली है''
          तब तक कोई स्टेशन आगया था।उन लोगों ने नीचे उतर कर गार्ड को सूचना दी फिर पुलिस आई।उन लोगों ने बताया कि  गाड़ी से कूदने पर हो सकता है बदमाश को चोट लगी हो, वैसे भी वह अभी बहुत दूर तक नहीं जा पाया होगा ।
          गाड़ी स्टेशन पर रुकी रही। थोड़ी ही देर में पुलिस के सिपाही एक आदमी को पकड़ कर लाए।वह लंगड़ा कर चल रहा था उसके सिर से खून बह रहा था।उसे देख कर सोहन चिल्लाया--"साब यह वही आदमी है।यह कोट भी इसी का है।''
          दरोगा जी ने सोहन की पीठ थपथपाई और कहा-"इस आदमी की हमें बहुत दिन से तलाश थी।एक महीने के अंदर इस लाइन पर ऐसी कई वारदात हो चुकी हैं पर यह हमारे चंगुल में नही आ पा रहा था। वहाँ खड़े सब आदमी उस बारह तेरह वर्षीय बालक की बहादुरी की तारीफ कर रहे थे।दरोगा जी ने कुछ अन्य यात्रियों को भी उस डिब्बे में बैठा दिया था।
           लड़की बता रही थी कि जब वह इस डिब्बे में चढ़ी तब इसमें काफी लोग थे जो बीच में उतर गए होंगे।  वह डाक्टरी की परीक्षा पास करके अपने घर दिल्ली लौट रही है,अकेली होने की वजह से वह  फर्स्ट  क्लास के डिब्बे में नहीं बैठी ।
         फिर उस लड़की ने जिस का नाम कविता था,सोहन से पूछा--"तुम्हारा नाम क्या है ?.. पढ़ते भी हो ?''
        "मेरा नाम सोहन है,मुझे पढ़ने का मौका कभी नहीं मिला ।''
        "अकेले कहाँ जा रहे हो ?''
         उसने कहा - ""दिल्ली नौकरी की तलाश में जा रहा हूँ ।''
        "तुम्हारे माता पिता कहाँ रहते हैं ?''
        यह सुन कर सोहन की आँखें भर आई ।आँसू पोंछते हुए वह बोला --"मेरे माता पिता नहीं हैं।अनाथालय में रहता था।वह लोग बहुत परेशान करते थे,भीख मँगवाते थे फिर भी पेट भर कर खाना नहीं देते थे और जिस दिन भीख कम मिलती थी उस दिन खाने को मार मिलती थी।एक दिन मौका देख कर मैं भाग कर दूसरी जगह चला गया।कुछ दिन भीख माँगी फिर पैसे इकट्ठे कर के मूंगफली बेचने लगा।अब दिल्ली जा रहा हूँ वैसे वहाँ भी मेरा कोई नहीं है।''
            उस लड़की कविता ने उसके आँसू पोंछ कर उस की पीठ थपथपाई और कहा -"अच्छे बच्चे रोते नहीं हैं..  तुम तो बहुत बहादुर हो।तुम मेरे साथ चलो...वहाँ हमारा बहुत बड़ा कारखाना हैं,काफी लोग वहाँ काम करते हैं... किन्तु तुम्हारी उम्र तो अभी पढ़ने की है।''
           "हाँ जीजी मुझे पढ़ना बहुत अच्छा लगता है।..आप लोग जो काम कहेंगे मैं करूँगा ,साथ में पढ़ाई भी करने को मिल जाए तो आपका एहसान जिन्दगी भर नहीं भूलूँगा ।''
           "हाँ ,मैं अपने पिता जी से बात करूँगी।..तुम्हारा कुछ न कुछ इंतजाम जरूर हो जाएगा।''
             दिल्ली स्टेशन आ गया था ।सामान उठा कर दोनो नीचे प्लेटफार्म पर उतर आए थे । बाहर बहुत सर्दी थी।तभी कविता का ध्यान सोहन की तरफ गया जो ठंड से काँप रहा था ।कविता ने अपनी शाल सोहन को देते हुए कहा ""सोहन इसे ओढ़ लो ,बहुत सर्दी है।''
          "नहीं जीजी मुझे तो इस की आदत है पर आपको सर्दी लग जाएगी ।''
           "देखो मैंने दो दो स्वेटर पहने हुए हैं फिर भी सर्दी लगी तो बैग में से दूसरी शाल निकाल लूँगी,तुम इसे ओढ़ लो।''
             फिर कविता की नजरें अपने पिता को तलाशने लगी थीं ।

        

मंगलवार, 28 जून 2011

कपड़े की थैली क्यों

बाल कहानी
                                             कपड़े की थैली क्यों                                                                                                                           
                                                                                           पवित्रा अग्रवाल
  रतन थैली  ले कर घर से बाहर निकला ही था कि उसका दोस्त हर्ष मिल गया ।
 "अरे रतन इस समय यह थैला ले कर कहाँ जा रहे हो ?'
 "माँ ने सब्जी लाने को कहा है। पास में जो सब्जी की दुकान है न,वहीं जा रहा हूँ ।'
 "तुझे सब्जी लेनी आती है ?'
 "सब्जी लेने में क्या है ?'
 "अरे उन से मोल भाव करना पड़ता है,जरा सी नजर बचे तो वह खराब सब्जी तोल देते हैं ।'
 "क्या तू घर के लिए कभी सब्जी नहीं लाता ?'
 "कभी कभी लाता हूँ।अधिकतर मम्मी पापा स्कूटर पर जा कर ले आते हैं।  मम्मी ने एक बार धनिया, पोधीना और मेथी लाने को कहा था।मुझे पहचान नहीं थी..कुछ का कुछ ले आया ।'
 रतन ने शरारत से कहा--" आज मेरे साथ चल,तुझे सब्जी लेना सिखा दूंगा ।'
 हर्ष ने हँसते हुए कहा --"ठीक है गुरू जी'
 सब्जी खरीदते समय हर्ष ने देखा कि रतन थैले में से छोटी छोटी प्लास्टिक की थैलियाँ निकाल कर सब्जी उसमें डलवाता जा रहा था और दुकान वाले से आग्रह कर रहा था कि वह अपनी थैलियों मे न डाले ।
 हर्ष ने कहा -"रतन सब्जी वाले थैलियाँ देते तो हैं तू घर से यह सब क्यों ले कर आया है ?'
 "यह आदत मैं ने अपने पापा से सीखी है।वह हमेशा घर से थैला ले कर जाते हैं।पहले तो वह एक थैले में ही सब सब्जियां रखवा लेते थे पर सब्जी खाली करने में  मम्मी परेशान हो जाती थीं।भिंडी ,सैम ,बीन्स,हरी मिर्च सब सब्जी आपस में मिल जाती थीं फिर उन्हें अलग करने में समय लगता था।तब से घर में पड़ी यह छोटी प्लास्टिक की थैलियां साथ ले कर आने लगे ।थैलियां नहीं होती हैं तो कपड़े की छोटी थैलियां मम्मी ने बहुत सी बना रखी हैं उन्हें ले आते हैं।'
 "कुछ राज्यों ने तो प्लास्टिक की थैलियों पर बैन लगा रखा है।अपने राज्य में तो अभी इसे लागू नहीं किया है।'
 "प्लास्टिक की थैलियां जानवरों के लिए तो कई बार जान लेवा साबित होती हैं।जैसे लोग बासी खाना,सब्जी और फलों के छिलके इन थैलियों में डाल कर बाहर कचरे में फैंक देते हैं ।गायें, भैंसें खाने के चक्कर में कई बार इसे भी निगल जाती हैं। कई बार तो उनकी जान पर बन आती है...इन से नालियाँ चोक हो जाती हैं...और भी बहुत से नुकसान हैं।'
 "हाँ यह सब पढ़ता तो मैं भी रहता हूँ पर इन पर कभी गहराई से सोचा नहीं।अब मैं भी मम्मी से कहूँगा कि कुछ कपड़े की थैलियां बना कर घर में रखलें व एक दो स्कूटर की डिक्की में पड़ी रहने दें।'
 "हाँ हमारे स्कूटर में भी एक दो थैली अलग से रखी रहती हैं। '
 "यार रमन आज तेरे साथ आ कर बड़ा अच्छा लगा ।एक तो मुझ में आत्मविश्वास   पैदा हुआ कि मैं भी तेरी तरह सब्जी लाकर माँ की मदद कर सकता हूँ। तूने कितनी अच्छी तरह चुन चुन कर सब्जी ली हैं...मैं तो सब्जी वाले से कहता था यह दे दो, वह दे दो ।घर जा कर पता लगता था कि उसने कुछ खराब सब्जियाँ  भी तोल दीं हैं। दूसरी बात प्लास्टिक की थैलियों का उपयोग भी कम से कम  करना चाहिए ।' 
 

मंगलवार, 24 मई 2011

समाधान

                                                                         समाधान
                                                                                                                 
                                                                                                                 पवित्रा अग्रवाल

              रत्ना और प्रीति दोनों सहेलियाँ हैं। दोनों एक ही स्कूल में व एक ही कक्षा में पढ़ती हैं। उनके घर भी बहुत दूर नहीं हैं। इन दोनों की मम्मी भी आपस में अच्छी दोस्त बन गई हैं। शाम को रत्ना की मम्मी भी रत्ना के साथ प्रीति के घर चली गई थीं। रत्ना की मम्मी को देखकर प्रीति की मम्मी बहुत खुश हुई।
            चाय पीते हुए दोनों की मम्मी आपस में बातें कर रही थीं । रत्ना की मम्मी ने कहा, "गर्मी की छुट्टियों में तो बच्चे परेशान हो जाते हैं। उनके लिए समय बिताना एक समस्या बन जाती है। घर में दो-तीन भाई-बहन हों तो वे आपस में मन बहला लेते हैं लेकिन रत्ना तो मेरी अकेली संतान है। केबिल कनेक्शन भी मैंने नहीं ले रखा है। इतनी महँगाई में गुजारा मुश्किल होता है। सौ रुपये महीने केबिल वाले को देने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। डिपोजिट अलग से देना होता है। वैसे भी केबिल कनेक्शन हो तो बच्चे टी.वी. के सामने से उठना नहीं चाहते।'
          प्रीति की मम्मी बोली, "हमने केबिल कनेक्शन तो ले रखा था। स्कूल खुलते ही बच्चों को समझा-बुझा कर निकलवा दिया। उन्होंने खुद भी महसूस किया कि केबिल के रहते वह पढ़ाई ठीक से नहीं कर पा रहे और क्लास में पिछड़ रहे हैं। अब गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हुई हैं। दो महीने के लिए कनेक्शन फिर ले लूंगी।'
       "मुझे भी कुछ करना होगा। वर्ना इन छुट्टियों में रत्ना "मैं बोर हो रही हूँ, मन नहीं लग रहा' की रट लगा कर मुझे परेशान कर देगी। कहती हूँ नानी या दादी के पास चली जा तो वह अकेली वहाँ जाने को तैयार नहीं है। मैं छह-सात दिन से ज्यादा नही रुक  सकती वर्ना इसके पापा परेशान हो जाते हैं।'
                प्रीति की मम्मी ने पूछा, "रत्ना को पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ने का शौक नहीं है ?'
 "मैं कोई पत्रिका नहीं लेती, उसे भी पढ़ने का शौक नहीं है।'
             "देखिए बहन शौक तो पैदा करना पड़ता है। शुरू में मेरे बच्चों को भी शौक नहीं था फिर भी मैं उनके लिए पत्रिकाएँ मँगाती थी। वह पन्ने पलटते, तस्वीरें देखते, चुटकुले पढ़ते और रख देते। फिर जब मुझ से कहते मम्मी हम बोर हो रहे हैं तो मैं उन्हें पत्रिका थमा कर कहती, "मैं भी बोर हो रही हूँ  किंतु पढ़ने का मेरे पास समय नहीं है। तुम ये कहानी पढ़ो तो मैं भी सुन लूंगी।' धीरे-धीरे उन्हें पत्रिकाएँ अच्छी लगने लगी। कई बार रात को कहते, "हमें नींद नहीं आ रही है' तब मैं पत्रिका उनके हाथ में दे देती कि इसे पढ़ो, पढ़ते-पढ़ते नींद आ जाएगी। आज हालत ये है कि बिना पढ़े उन्हें नींद नहीं आती। बच्चे पढ़ें या न पढ़ें उनकी उम्र व रुचि के हिसाब से पत्रिकाएँ अवश्य मँगानी चाहिए।'
           "तुम ठीक कह रही हो मैं अब नियमित रूप से उसके लिए बाल पत्रिका मँगाया करूँगी।'
 तभी पास बैठी प्रीति ने कहा, "आंटी दो बाल पत्रिकाएँ तो हमारे यहाँ कई वर्ष से आती हैं। मैंने सभी अंक बहुत सँभाल कर रखे हुए हैं क्योंकि रत्ना ने उन्हें नहीं पढ़ा है तो उसके लिए तो वह नई के समान ही हैं वह मुझ से लेकर पढ़ सकती है।.... आप भी पत्रिका मँगाने को कह रही हैं तो आप वह पत्रिका मँगाना जो मैं नहीं मँगाती, इस तरह हम आपस में बदल कर पढ़ लेंगे।'
       "हाँ प्रीति तुम्हारा सुझाव बहुत अच्छा है। हम ऐसा ही करेंगे।'
           प्रीति ने दो पत्रिकाएँ रत्ना को देते हुए कहा, "इन्हें पढ़ने के बाद मुझे वापस कर देना और फिर दूसरी दो ले जाना।'
         पत्रिका लेकर रत्ना घर चली गई। दूसरे दिन शाम को प्रीति रत्ना का इंतजार करती रही क्योंकि वह रोज खेलने आती थी। रत्ना को न आते देख प्रीति उसके घर चली गई।
         "आंटी रत्ना कहाँ है ? आज तो वह खेलने भी नहीं आयी।'
         "अरे बेटा वह तो तुम्हारी दी पत्रिकाओं को पढ़ने में इतनी मस्त है कि उसके पास बोर होने को समय ही नहीं है। बैठी होगी अपने कमरे में...सच बेटा तुमने तो हम दोनों की परेशानी का समाधान कर दिया।'
           रत्ना से पत्रिका छीनते हुए प्रीति बोली -- "अरे मैंने पत्रिका इसलिए तो नहीं दी थी कि तुम मुझे ही भूल जाओ। चलो खेलेंगे, बाद में पढ़ना।'
           पत्रिका वहीं रख कर दोनों खेलने चल दी थीं।
                                                                             ----

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

प्रेस ने चोर पकड़ा

                  
                                                  प्रेस ने चोर पकड़ा
 
                                                                                                     पवित्रा अग्रवाल  
        अभय और नीरा जुड़वाँ भाई-बहन थे।दोनों ही पढ़ने में बहुत तेज थे।कुछ दिन पूर्व उन के पिता की मृत्यु हो गई थी।वह अपने पीछे कोई जमा पूँजी नहीं छोड़ गए थे।पिता के जाने के बाद बच्चों के परवरिश की जिम्मेदारी माँ को ही निभानी थी किन्तु वह अधिक पढ़ी-लिखी नहीं थी।बहुत सोच विचार के बाद वह दो घरों में सुबह शाम खाना बनाने का काम करने लगी थीं।
        अपनी कम आय के बावजूद माँ चाहती थीं कि अभय और नीरा की पढ़ाई चलती रहे।दोनों ही कक्षा सात में पढ़ते थे।पढ़ने के अतिरिक्त नीरा को गाने का बहुत शौक था।पास पड़ोस के रेडियो से आते गाने  उसे न जाने कब याद हो जाया करते थे।स्कूल के हर उत्सव में वह कोई न कोई गाना अवश्य गाती थी और हर बार पुरस्कार पाती थी।
       एक बार उसके स्कूल में एक सांस्कृतिक प्रोग्राम का आयोजन किया गया। नीरा ने उस में - "ए मेरे वतन के लोगों,जरा आँख में भर लो पानी' देश भक्ति का गीत गाया।श्रोताओं ने मंत्रमुग्ध हो कर वह गाना सुना।गाने की समाप्ति पर हॉल ताली की गड़गड़ाहटों से गूँज उठा।
        उन्हीं श्रोताओं में शहर के मशहूर डॉक्टर देवेन भी थे।कार्यक्रम समाप्त होने के बाद उन्होंने नीरा को अपने पास बुलाया और उस से बहुत सारी बातें कीं।साथ ही उसे कक्षा सात की किताबों का पूरा सैट पुरस्कार में दिया। 
       नीरा और अभय दोनों के पास पूरी किताबें नहीं थीं।उन्होने कुछ पुरानी किताबें आधे दामों पर खरीदी थीं किन्तु किसी किताब के आगे के पन्ने गायब थे, किसी किताब के पीछे के।मजबूरी में दोनों भाई-बहन उन्हीं से काम चला रहे थे।किताबों का नया सैट देख कर दोनों चहक उठे।
       माँ जिन घरों में काम करती थी वहाँ से पुराने अखबार खरीद लाती थी । खाली समय में वे दोनो  लिफाफे बना कर दुकानों पर बेच देते थे।उन मे से सुन्दर चित्र छाँट कर उन्हों ने किताबों पर कवर चढ़ा लिए थे।
        अभय का स्कूल घर के पास में ही था।दोनों आपस में अदल-बदल कर किताबें स्कूल ले जाते थे।एक दिन अभय का एक घंटा खाली था।वह कुछ अन्य साथियों के साथ मैदान में खेलने चला गया। अगला घंटा गणित का था,उस ने गणित की किताब निकालने के लिए बस्ता खोला तो उसकी नई किताब गायब थी। उसकी आँखों से झर झर आँसू बहने लगे।मास्टर साहब के कहने पर उसने सब के बस्तों की तलाशी  ली। कई बच्चों के पास नई किताबें थीं पर सब पर उन बच्चों के नाम लिखे थे। 
        मास्टर साहब के पूछने पर अभय ने बताया " किताब पर मेरा नाम नहीं लिखा था पर उस पर मेरी बहन का नाम लिखा होना चाहिए' लेकिन किसी भी पुस्तक पर उसकी बहन का नाम नहीं लिखा था।वह बहुत परेशान था।सोच रहा था अब दूसरी किताब कहाँ से आएगी ..नीरा को क्या जवाब दूँगा ? पढ़ाई में उसका मन नहीं लग रहा था।
       आधी छुट्टी की घंटी बजने पर वह मास्टर साहब से इजाजत ले कर घर चला गया।उस दिन नीरा के स्कूल की छुट्टी थी।अभय को उदास देख कर वह बोली -"अभय क्या हुआ...मुँह क्यों लटका रखा है ? लगता है बच्चू को गृहकार्य पूरा न करने पर सजा मिली है...कान खिचायी हुई या मुर्गा भी बनाया गया ?'
       कोई और दिन होता तो अभय उसकी चोटी पकड़ कर घुमा देता या हँसी में ही सही दो मुक्के उसकी पीठ पर जमा देता किन्तु आज एक गंभीर मामला था ।अपराधी की तरह नजरें झुका कर बोला -" मुझ  से तेरी गणित की किताब खो गई है...पता नहीं किसने चुरा ली।...उस पर तेरा नाम लिखा था या नहीं ?'

      "क्या कहा किसी ने किताब चुरा ली ?...उस पर तो मैं ने नाम तक नहीं लिखा था।'
     "नाम भी नहीं लिखा था फिर कैसे मिल सकती है ? चुरा कर किसी ने अपना नाम लिख लिया होगा और अब किताब जिसने चुराई है सौ प्रतिशत उसकी हो गई..चोर तो पकड़ा ही नहीं जा सकता।'
      कुछ क्षण बाद ही नीरा की आँखों में एक चमक सी आ गई,वह बोली-"अभय मेरी किताब पहचान ने का एक तरीका है', कह कर उसने अभय के कान में कुछ कहा।
      अभय को एक आशा की किरण दिखाई दी।वह तभी स्कूल की तरफ चल दिया।स्कूल के बाहर एक धोबी का घर था जहाँ वह प्रेस करता रहता था।अभय कुछ देर के लिए उससे प्रेस माँग कर अपनी कक्षा में ले गया।
         अँग्रेज़ी के शिक्षक क्लास में आ चुके थे।उनसे अनुमति ले कर उसने कक्षा में प्रवेश किया और प्रेस ले जाकर मेज पर रख दी।मास्टर साहब कुछ कहते उस से पहले ही वह बोला-"मास्साब आज मेरी गणित की किताब चोरी हो गई है...मैं तो चोर नहीं पकड़ सका किन्तु मुझे उम्मीद है कि यह प्रेस चोर का पता अवश्य लगा लेगी।'
       उसे देख कर क्लास के सब बच्चे हँसने लगे। मास्टर साहब ने उसे क्रोध से घूर कर कहा -"यह क्या मजाक है,पागल तो नहीं हो गए हो ?'
     "साब मुझे एक मौका दीजिये,भगवान ने चाहा तो चोर अभी पकड़ में आ जाएगा।'
      उस ने पुन:सब की किताबें देखीं और जिन की किताबें नई थीं उन्हें ला कर मेज पर रख दिया।उसने एक एक कर के हर किताब को खोला फिर उस के पहले पन्ने पर जल्दी से प्रेस घुमा दी। सात-आठ किताबों पर प्रेस कर ने के बाद भी जब कोई परिणाम नहीं निकला तो मास्टर साहब ने झुंझला कर कहा
      -"क्यों सब का समय बरबाद कर रहे हो ?'
        तभी एकाएक अभय चिल्ला उठा -"मास्साब चोर पकड़ा गया....यह रही मेरी किताब ...मुकेश चोर है।'
       मुकेश दौड़ कर लड़ने के लिए आया--"बड़ा आया मुझे चोर बताने वाला...किताब पर लिखा मेरा नाम नहीं दिख रहा ?'
 मास्टर साहब ने किताब हाथ में लेकर देखी तो वहाँ किसी रंगहीन चिकने पदार्थ से"नीरा रानी नाम चमक रहा था।
     मास्टर साहब ने आश्चर्य में पड़ कर उस से पूछा कि अभी तक तो यहाँ कुछ नहीं था अब यह नाम कहा से आगया ?
        उस ने बताया कि --" मेरी बहन ने मोमबत्ती की पतली नोक से हर किताब पर अपना नाम लिख रखा है जो दिखाई नहीं देता यदि उस पर कोई गर्म वस्तु रखी ज़ाए तो अक्षर चमकने लगते हैं।'
        मास्टर साहब ने चोर पता लगाने के लिए अभय की पीठ थपथपाई फिर मुकेश को अपने पास आने को कहा किन्तु अभय का ध्यान अब वहाँ नहीं था वह किताब को कस कर सीने से चिपकाए था जैसे बहुत दिनों बाद कोई बिछुड़ा दोस्त मिला हो।उसकी आँखों में प्रसन्नता के आँसू थे।
                                                                

पवित्रा अग्रवाल
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रविवार, 6 मार्च 2011

दो चोटी वाली


                                                                  दो चोटी वाली

                                                                                                                              पवित्रा अग्रवाल

 श्रुति ने रोते हुए घर में प्रवेश किया और सुबक कर बोली- "माँ मैं रुचि की गलती की सजा आखिर कब तक पाती रहूँगी ? '
 "क्यों आज क्या हुआ ? ...क्या किया है रुचि ने ?'
 "स्कूल की एक लड़की को ये मोटी कह कर चिढ़ाती है। मैंने इसको कई बार टोका कि ये अच्छी बात नहीं है। किसी दिन वो मारेगी।' ...आज उसकी दीदी उसे लेने आई थी। उसने मुझे दो थप्पड़ मार कर कहा-"अब मेरी बहन को मोटी कहा, तो देखना..।'
 "कितनी ही बार घर व बाहर दोनों जगह उसकी गलती की सजा मैंने पाई है, आखिर क्यों ? मेरी गलती क्या है ? यही न कि वह मेरी जुड़वाँ बहन है और हम दोनों देखने में बिल्कुल एक सी हैं। मैं अब उसके साथ नहीं पढ़ूँगी..मेरा दाखिला दूसरे स्कूल में करा दो माँ। दूसरी कक्षा में तो उसकी वजह से मेरी रेंक भी बिगड़ गई थी।'
 "रुचि की वजह से तुम्हारी रेंक कैसे चली गई थी श्रुति ?' पड़ोस में आई नई आंटी ने आँगन में प्रवेश करते हुए पूछा।
 श्रुति की मम्मी ने आंटी को बताया- "जब ये दोनों सैकंड क्लास में थीं तब इनकी मौखिक परीक्षा थी। घर आकर रुचि ने बताया कि उसकी परीक्षा दो बार हुई। श्रुति ने बताया कि उसकी तो एक बार भी नहीं हुई। असल में रुचि को ही श्रुति समझ कर टीचर ने उसकी दो बार परीक्षा ले ली थी। इन लोगों को तब इतनी समझ नहीं थी कि टीचर से जाकर कहतीं। रुचि पढ़ने में श्रुति जितनी अच्छी नहीं है अतः श्रुति के नंबर कुछ कम आए और क्लास में सैकंड आने के बदले उसकी रेंक थर्ड आई।'
 "अरे यह तो बड़ा मजेदार किस्सा है...आपने टीचर से जाकर कहा नहीं ?'
 "मैं तो कहना चाहती थी किंतु सब लोगों ने कहा कि दुविधा से बचने के लिए टीचर दोनों को अलग-अलग सेक्शन में कर देंगी। इस तरह तो दोनों बहनें अलग-अलग हो जाएँगी। दोनों का एक ही सेक्शन में रहना ठीक है।'
 "आपकी रुचि लगता है श्रुति से ज्यादा शरारती  है ?'
 "हाँ रुचि बहुत शैतान है। श्रुति शांत है। रुचि का मन पढ़ने में भी अधिक नहीं लगता लेकिन श्रुति पढ़ने में तेज है।
  "इन दोनों को पहचानने में आप से कभी गलती नहीं होती थी ?'
 "शुरू में पहचान ने में मुझसे भी कभी-कभी गलती हो जाती थी पर अब नहीं होती।'
 "पर इसका तो आपको कोई हल ढूँढ़ना होगा क्योंकि स्वास्थ्य, ऊँचाई, रंग, नैन - नक्श सभी में दोनों एक सी हैं। मुझे यहाँ आए तीन महीने हो गए, मैं अब भी यह नहीं बता सकती कि कौन सी रुचि है, कौन सी श्रुति है।'
 "इसीलिए अब श्रुति जिद्द कर रही है कि रुचि वाले स्कूल में नहीं पढ़ेगी लेकिन स्कूल तो मैं नहीं बदलवा सकती। अभी तो इसके पापा दोनों को एक साथ स्कूल छोड़ आते हैं, एक साथ ले आते हैं। कभी एक स्कूल न जा पाए तब भी कोई परेशानी नहीं है। क्या पढ़ाया, सब पता चल जाता है। छुट्टी भी एक दिन होती है। शिक्षक- अभिभावक संगोष्ठी भी एक ही दिन होती हैं। अलग-अलग स्कूल होने से परेशानियाँ बढ़ जाएँगी।'
 "ठीक है मम्मी स्कूल मत बदलवाइए.. सेक्शन भी वही रहने दीजिए। मुझे एक उपाय सूझा है। हम

दोनों के ही छोटे-छोटे बाल कटे हैं। मैं अपने बाल बढ़ा कर दो चोटियाँ किया करूँगी। जब तक मेरे बाल छोटे हैं, आप रबर बैंड लगाकर मेरी दो चोटी कर दिया करिए। बालों से हमारी पहचान बन जाएगी फिर मैं दो चोटी वाली कहलाऊँगी..बोलिए मंजूर है ?'
 "हाँ श्रुति तुम्हारा ये सुझाव बहुत अच्छा है, मुझे मंजूर है।'
 श्रुति ने चहकते हुए रुचि से कहा-" अब अपनी शरारतों की सजा स्वयं ही भुगतना...मेरा पीछा छूटा।'  फिर मम्मी के हाथ में कंघा देते हुए श्रुति ने कहा, "मम्मी मुझे आज से ही दो चोटी वाली बना दो न...।'

-पवित्रा अग्रवाल
 

 

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

छाले अब नहीं

                                                              छाले अब नहीं
                                                                                         
                                                                                                           पवित्रा अग्रवाल

 दीपू के मुँह में फिर छाले निकल आए थे। तीन दिन से वह ढंग से खाना भी नहीं खा पा रहा। डॉक्टर के पास जाने से अब उसे डर लगता है।
 पहले जब छाले होते थे तो डॉक्टर खाने की गोलियाँ लिख देते थे। बी-कॉम्पलैक्स की उन गोलियों से उसके छाले ठीक भी हो जाते थे। गोलियों से जब कोई फायदा नहीं हुआ तो डॉक्टर ने हर बार यही कहा कि "बेटा, आपको साग-सब्जी खूब खानी चाहिए। तुम्हारी मम्मी कह रही थीं कि तुम कोई सब्जी नहीं खाते हो। यही आपके छालों का कारण है... छाले बार-बार होते रहेंगे। सुई कब तक लगवाते रहोगे ? जल्दी-जल्दी छाले होना अच्छी बात नहीं है। इससे मुँह में कैंसर भी हो सकता है।'
 जब डॉक्टर समझाते तो सात-आठ दिन वह खूब सब्ज़ियाँ खाता था। छाले ठीक होते ही फिर वह डॉक्टर की हिदायत भूल जाता था।
 माँ रोज गुस्सा होती हैं -" दोनों टाइम दाल-चावल खाना चाहता है। सब्जी तो खाना ही नहीं चाहता। रोटी-पराठे खाता है तो वह भी अचार के साथ। इस बार मैं तेरे साथ डॉक्टर के पास नहीं जाऊँगी। अकेला जा और सुई लगवा कर आ।'
 डॉक्टर के पास जाने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी। पहले तो वह डाँटेंगे कि सब्ज़ियाँ खानी क्यों छोड़ दीं ? दूसरी बात फिर इंजेक्शन लगाने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। जिससे उसे बहुत डर लगता है। तीन दिन और इसी तरह निकल गए। छाले बढ़ते ही जा रहे थे। मम्मी उसके आग्रह पर हरी सब्जी भी बना रही थीं किंतु छालों की वजह से वह कुछ नहीं खा पा रहा था। मम्मी इस बार बहुत सख्त हो गई थीं। डॉक्टर के पास उसके साथ जाने को तैयार नहीं थीं। उसका मन रोने को करता  किंतु रो भी नहीं पाता था, क्योंकि छोटी बहन उसे चिढ़ाती थी कि "भैया लड़का होकर रोता है।"
   आखिर उसने माँ से प्रार्थना की - "मम्मी, इस बार आप मेरे साथ डॉक्टर के पास चलो। मैं वायदा करता हूँ आप जो भी सब्जी बनाएँगी रोज दोनों टाइम खाया करूँगा। बस आप एक काम करना जब मैं सब्जी नहीं खा रहा होऊँ तो आप मुझे छालों की याद दिला देना।'
 फिर माँ उसे डॉक्टर के पास ले गई। उसने डॉक्टर से भी पक्का वायदा किया कि "अब मैं रोज सब्जी खाया करूंगा ।' डॉक्टर के इलाज से छाले ठीक हो गए।
 अब कई महीनों से उसे छाले नहीं हुए हैं। वह रोज सब्जी खाता है। वह समझ गया है कि दवाएँ खाने व इंजेक्शन लगवाने से अच्छा सब्ज़ियाँ खाना है। कभी वह सब्जी खाने में आनाकानी करता है तो मम्मी याद दिला देती है। मम्मी से पहले नटखट नन्हीं बहन जूही याद दिला देती है, "भैया, सब्जी नहीं खाओगे तो छाले हो जाएँगे। फिर आप सुई लगवाने में रोएँगे।'
 अब सब्जी खाने की उसकी आदत पड़ गई है। बहुत दिनों से वह डॉक्टर के पास  नहीं गया है।
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