गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

चिड़िया मैं बन जाऊँ

सपना अभी स्कूल से लौटी थी। रोज की तरह उसे बहुत भूख लगी थी। आते ही बोली- "मम्मी बहुत जोर से भूख लग रही है, जल्दी से कुछ खाने को दो न ! '
 मम्मी ने कहा, "तुम हाथ मुँह धोकर कपड़े बदलो। इतनी देर में मैं खाना परोस देती हूँ।'   झटपट सपना ने कपड़े बदले और ड्राइंगरूम में टीवी खोल कर सोफे पर बैठ कर खाना खाने लगी।
 तभी मम्मी आ गई, "सपना यह क्या तरीका है। आते ही जूते कहीं डाले। स्कूल बैग ड्राइंग रूम में पटक रखा है। स्कूल ड्रेस बाथरूम के बाहर पड़ी है। रोज समझाती हूँ कि आते ही अपनी चीजें जगह पर रखो। बेटा मैं भी थक जाती हूँ। तुम मेरी मदद नहीं कर पातीं कोई बात नहीं कम-से-कम मेरे लिए काम तो मत बढ़ाओ। सुबह स्कूल जाते समय फिर शोर मचाती हो कि मोजा नहीं मिल रहा, टाई नहीं मिल रही, कभी जूते नहीं मिल रहे।.... सुबह मैं तुम्हारा टिफिन तैयार करूँ या तुम्हारा सामान ढूँढ़ूँ ?...'
 सपना का लटका मुँह देख कर मम्मी ने पुन: कहा -- "मुझे मालूम है तुम्हें मेरा बोलना अच्छा नहीं लग रहा। आखिर कब तक न बोलूँ ? इतनी बार कहा है खाना ड्राइंग रूम में नहीं, डाइनिंग टेबल पर बैठ कर खाओ। तुम्हें देखकर दूसरे बच्चे भी फिर यहीं खाना चाहते हैं।'
 'मम्मी अभी तो आई हूँ। अभी सब सामान जगह पर रख दूँगी। मेरी पसंद का टीवी प्रोग्राम आ रहा था, इसीलिए खाना यहाँ ले आई।'
 "बेटा ये तो रोज की बात है...।'
 खाना खाते हुए सपना की नजर एक चिड़िया पर पड़ी। वह बरांडे में रखे हुए गेहूँ के दाने चुग रही थी। उसे देखकर सपना सोचने लगी- हमारा भी क्या जीवन है। घड़ी की सुई की तरह बस चलते ही रहो। कितने बंधन हैं... ये करो.. वो मत करो। यहाँ जाओ, वहाँ मत जाओ। खेलने का कितना मन करता है, किंतु होम वर्क पूरा न होने पर स्कूल में सजा मिलती है। स्कूल में टीचर्स के हिसाब से चलना पड़ता है और घर में ये मम्मी-पापा टोका-टाकी करते रहते हैं। हम से अच्छा जीवन तो इन चिड़ियों का है। न माता-पिता की डाँट, न स्कूल, न होम वर्क। अपनी मर्जी की मालिक हैं। इस पेड़ से उस पेड़ पर फुदकती-फिरती हैं। जहाँ दाना देखा उतर कर खा लिया। जहाँ पानी मिला पी लिया। जब मन हुआ तो ऊँचे आकाश में उड़ान भर ली। काश मैं भी चिड़िया होती, कितना मजा आता।
 यही सब सोचते हुए उसने होम वर्क किया। अपना सामान जगह पर रखा। अपना कमरा ठीक किया। रात का खाना खाया और जल्दी ही सोने के लिए बिस्तर पर चली गई। सोते समय भी वह गुनगुना रही थी-  चिड़िया मुझे बना दे राम, सुंदर पंख लगा दे राम। नील गगन में उड़ जाऊँ, हाथ किसी के न आऊँ।
 उसने देखा वह सचमुच चिड़िया बन गई है। सुंदर-सुंदर दो छोटे से पंख भी निकल आए हैं। पंख देखते ही उसने सोचा क्या वह उड़ पाएगी ? और वह सचमुच उड़ने लगी। ठंडी मंद पवन चल रही थी। नीले आकाश में दूर-दूर तक उड़ान भरते हुए वह बहुत खुश थी। उसे सब कुछ बहुत नया-नया और अच्छा लग रहा था। थोड़ी देर में वह थकान अनुभव करने लगी। भूख भी लग आई थी।
 वह दाने की तलाश में घरों के ऊपर उड़ने लगी। एक छत पर उसने देखा कि दाल सूख रही है। वह दाना चुगने के लिए छत पर उतरने ही वाली थी कि एक महिला दाल उठा कर घर में ले गई। उसने फिर

उड़ान भरी उसे कहीं कुछ नहीं मिल रहा था। तभी एक छत पर उसे चावल रखे हुए दिखाई दिए। छत पर उतर कर उसने तीन-चार दाने ही खाए थे कि वहाँ एक बिल्ली आ गई। बिल्ली ने उस पर झपट्टा मारा किंतु किसी तरह वह जान बचा कर उड़ गई।
 अब वह बहुत डर गई थी । उसने सोचा पक्षियों का जीवन भी इतना आसान तो नहीं है, जितना दूर से देखने पर लगता है। उन्हें भी पेट भरने के लिए बड़े खतरे उठाने पड़ते हैं। कभी भूखा प्यासा भी रह जाना पड़ता है। वह थक कर एक पेड़ पर बैठ गई। वहाँ भी उसे एक बिल्ली दिखाई दी। अरे पक्षियों का जीवन तो बहुत असुरक्षित है। ये बिल्ली तो हर जगह पहुँच सकती है।
  तभी उसे ध्यान आया कि उसने कई बार अपने बगीचे में चिड़िया व कबूतर के पंख पड़े देखे हैं। घायल चिड़िया भी देखी है। ये जरूर बिल्ली के शिकार हुए होंगे। यहाँ से भी उड़ना पड़ेगा वर्ना बिल्ली दबोच लेगी। अब कहाँ जाऊँ ? भूख भी लगी है। उसे पछतावा हो रहा था कि वह तो अच्छी भली लड़की के रूप में मम्मी-पापा के साथ  रह रही थी। बेकार में ही चिड़िया बन गई। जब वह बहुत परेशान हो गई तो मम्मी-पापा की याद आई। अरे उसकी सब परेशानियाँ तो मम्मी-पापा चुटकी बजाते ही हल कर देते हैं। उन्हीं के पास जाती हूँ वहीं  खाना खिलाएँगे और बिल्ली से भी बचाएँगे।
 वह उड़कर अपने घर के आँगन में जा बैठी तभी उसका प्यारा टोमी उस की तरफ लपका। वह डर कर किवाड़ पर बैठ गई। उसने देखा मम्मी रो रही थीं। पापा परेशान थे। छोटा भाई उसे सहेलियों के घर ढूँढ़ कर लौटा था। उसने कहना चाहा मम्मी मैं आपकी बेटी सपना हूँ किंतु ये क्या,वह तो चीं चीं करके चिड़िया वाली बोली बोल रही है। मम्मी उसकी बात कैसे समझ सकती हैं। उसने मम्मी के कंधे पर बैठ कर खाना माँगना चाहा किंतु मम्मी ने उसे हाथ से उड़ा दिया।
 अब तो उसे रोना आने लगा था। वह अपनी गलत सोच पर पछता रही थी। मानव जीवन तो सब से श्रेष्ठ है। हे भगवान मुझे फिर से सपना बना दें। मैं चिड़िया बने रहना नहीं चाहती। मेरे मम्मी-पापा बहुत अच्छे हैं। मैं फिर से लड़की बनना चाहती हूँ। उसके रोने की आवाज सुनकर मम्मी दौड़ी-दौड़ी आई- "सपना, तू क्यों रो रही है...? कोई बुरा सपना देखा क्या ?'
 मम्मी की आवाज सुनकर उसने आँखें खोल दीं। अरे वह तो अपने घर में अपने बिस्तर पर सो रही थी। वह सपने में चिड़िया बनी थी ,सचमुच मैं नहीं।
 वह खुश होकर मम्मी से लिपट गई।    

 -पवित्रा अग्रवाल
  

3 टिप्‍पणियां:

  1. Dear Bhabhiji;
    Very nice story.This happens in childhood.I am very well aware of your writing talent as once at a time I also contributed a small note to you along with manoj.
    Regards
    Dr.Brijeshwar Shukla

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  2. पवित्रा जी, आपने बच्चों के लिए ब्लॉग शुरु कर एक शुभ कार्य किया है, बधाई स्वीकार करें।
    आपकी यह रचना मनोवैज्ञानिक रूप से ठीक न होते हुए भी प्यारी लगी।
    आपकी रचनाएँ निरंतर पढ़ने को मिलती रहें, यही कामना है।
    -श्याम सुन्दर अग्रवाल

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  3. रचना नहीं पढ़ रहा हूं अभी, ब्‍लॉग देखकर ही मन हर्षित है। बधाईयां वर्ष 2011 में आपने एक एक ग्‍यारह नहीं, सतरह कर दिया। मानवसेवा की रूखी-सूखी मेवा सबको पसंद है

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