मंगलवार, 22 अक्तूबर 2019

यादगार दीपावली

बाल कहानी 

                       यादगार दीपावली
                                                        पवित्रा अग्रवाल

        मेरे दोस्त नन्दू के पिता पटाखों का व्यापार करते हैं। उनका थोक का काम है। एक बार मुझ से नन्दू ने कहा था -"जब पटाखे लेने हों तो मेरे साथ चलना, मैं पापा से कह कर सस्ते दिलवा दूँगा।बाजार में यही पटाखे दुगनी कीमत पर मिलेंगे।'
    मैं ने पटाखों के लिए दो सौ रुपये मम्मी से लिए और दो सौ रुपये मैं ने अपने जेब खर्च में से बचाए थे।वह भी जेब में रख कर नन्दू के घर की तरफ चल दिया।
  नन्दू के घर एक औरत ( जो मुझे उनकी काम वाली लग रही थी ) बैठ कर रो रही थी और नन्दू की बहन से तीन सौ रुपये उधार मॉग रही थी। नन्दू की बहन ने कहा--"बाई बच्चे को सरकारी दवाखाने में ले जाना चाहिए था।वहाँ डॉक्टर की फीस भी नहीं देनी पड़ती और इलाज भी मुफ़्त में हो जाता।जब इलाज के लिए रुपये नहीं थे तो प्राइवेट अस्पताल में बच्चे को क्यों भरती करवा दिया ?'
          "बिटिया ,पहले मैं सरकारी अस्पताल में ही गई थी। वहाँ डॉक्टर साहब नहीं थे, उनका इंतजार करती तो मेरा बेटा मर जाता....उसकी हालत बहुत खराब है। उसे सुबह से उल्टी और दस्त हो रहे हैं। मैं काम पर गई हुई थी। घर जा कर जब उसकी हालत देखी तो घबरा गई और जल्दी से अस्पताल ले कर भागी...मजबूरी में मुझे प्राइवेट अस्पताल ले जाना पड़ा।डॉक्टर साहब ने पर्चा लिख कर दवाएँ जल्दी लाने को कहा है ,उसे ग्लूकोस चढ़ाना है..बिटिया मुझे जल्दी से तीन सौ रुपये दे दो,बहुत मेहरबानी होगी ।'
          "देखो बाई मैं तुम से पहले भी कह चुकी हूँ कि इस समय मम्मी घर पर नहीं हैं।हमारे यहाँ काम करते अभी तुम्हें दस दिन हुए हैं।उन से बिना पूछे तुम्हें तीन सौ रुपये कैसे दे दूँ ? तुम इंतजार कर लो,मम्मी थोड़ी देर में आती होंगी।'
    "पर मैं इंतजार नहीं कर सकती।तब तक तो मेरा बेटा मर जाएगा..मैं जाती हूँ,कही दूसरी जगह कोशिश कर के देखूँगी।' वह आँसू पोंछती हुई घर से बाहर चली गई।
      मैं ने उसे रोक कर डॉक्टर का पर्चा दिखाने को कहा।उस ने मुझे वह पर्चा दिखाया ।पर्चा देख कर मुझे विश्वास हो गया कि वह झूठ नहीं बोल रही है, मैं ने कहा--"तुम मेरे साथ चलो,मैं दवाऐ  अभी दिलवा देता हूँ फिर तुम्हारे साथ डॉक्टर साहब के पास भी चलूँगा।...तुम्हारे पति कहाँ हैं ?'
      वह लंबी आह भर कर बोली--"वह मज़दूरी करता है पर रोज काम नहीं मिलता।कभी मिलता भी है तो उसे शराब पीने में उड़ा देता है।सुबह का गया रात को नशे में धुत्त हो कर लौटता है...नाम का पति है।उस की रोटी का जुगाड़ भी मुझे ही करना पड़ता है।'
     दवाएँ ले कर हम अस्पताल पहुँचे तो कम्पाउडर बोला --"तुमने बहुत देर कर दी..'
     "तो क्या मेरा बेटा....'
  "परेशान मत हो,तुम्हारा बेटा ठीक है।डॉक्टर साहब ने अपने पास से इंजक्शन लगा दिया है और ग्लूकोस भी चढ़या जा रहा है।'
  "क्या करती साहब ,घर में एक पैसा नहीं था। कहीं से इंतजाम भी नहीं कर पाई।देवदूत की तरह यह बच्चा मुझे मिल गया।मेरा दुखड़ा सुन कर इसी ने मुझे सब दवाएँ खरीद कर दी हैं।मैं तो इसे जानती भी नहीं हूँ और न ये मुझे जानता है। ये दीपावली के लिए पटाखे खरीदने बाजार जा रहा था ,उन रुपयो से इस बच्चे ने मुझे दवाएँ दिलवा दीं।...देखो न मैं भी कितनी स्वार्थी हूँ... अभी तक इस बच्चे का नाम भी नहीं पूँछा -- "बेटा तुम्हारा नाम क्या है ?'
      "मेरा नाम अभिषेक है, प्यार से सब मुझे अभि कह कर पुकारते हैं।'
  कम्पाउडर ने कहा -- "शाबाश अभिषेक, तुम बहुत अच्छे हो।....क्या तुम्हारे घर में अब डाँट नहीं पड़ेगी ?'
      "कम्पाउडर साहब,ये रुपये तो कल तक पटाखे - बम के रूप में जल कर धुआँ बन जाते। मम्मी कहती हैं
कि आतिशबाजी धन की बरबादी तो है ही ,इस से प्रदूषण भी फैलता है।जलने व आग लगने का खतरा भी बना रहता है। उनसे नुकसान ही नुकसान है,फायदा एक भी नहीं।मेरे इन रूपयो का उपयोग देख कर मम्मी बहुत खुश होंगी।'
  बचे हुए रुपये मैं ने बाई को देते हुए कहा-"ये रुपये तुम रख लो,अभी तुम्हें इन की जरूरत पड़ सकती है।तुम्हारा बेटा अब ठीक है,मैं जा रहा हूँ।'
      "बेटा तुम्हारे ये रुपये मुझ पर उधार हैं।मैं थोड़े-थोड़े कर के तुम्हें लौटा दूँगी । तुम नन्दू के दोस्त हो न ? मैं उन के घर काम करती हूँ।'
"ठीक है।'
घर में प्रवेश करते ही माँ ने पूँछा--"तू तो पटाखे लेने गया था,खाली हाथ क्यों लौट आया ?'
"माँ आप कहती हैं न कि पटाखे छुड़ाना रुपयों का धुआँ उड़ाने के समान है। मैं ने आज उन रुपयों से एक गरीब बीमार बच्चे को दवा दिला दी है।सच माँ वह रुपये एक गरीब माँ के आँसू पोंछने के काम आए हैं। यह दीपावली बिना पटाखों के मनाने का मुझे जरा भी मलाल नहीं होगा बल्कि यह दीपावली मुझे हमेशा याद रहेगी।'
पूरी बात सुन कर मेरी माँ की ऑखों में भी स्नेह के दीप जल उठे।

  -पवित्रा अग्रवाल
 मेरे ब्लॉग्स -----

बुधवार, 25 सितंबर 2019

गणेश चन्दा

बाल कहानी 
            गणेश चन्दा
                                                  पवित्रा अग्रवाल

 "सोनम दरवाजे पर कौन था ?'
 " माँ गणेश का चन्दा माँगने के लिए चार पाँच लड़कों का ग्रुप आया  है।'
 " अरे हाँ अब गणेश चतुर्थी आ रही है यानि गणेश बैठाने के दिन, अब बच्चें दरवाजे की घन्टी बजा बजा कर परेशान करते रहेंगे ।'
  "आप कल जब घर पर नहीं थीं तब भी,तीन चार ग्रुप चन्दा माँगने आए थे।'
 "फिर तूने उन्हें चन्दा दिया ?"
 "नहीं मम्मी आप घर पर नहीं थी ,मैं किसी को जानती नहीं  ... मैं ने तो दरवाजा भी नहीं खोला।'
 "अच्छा किया ।...हर गली,नुक्कड़ मे तीन चार गणेश बैठाते हैं। इस तरह अपने घर के आसपास कम से कम  छह- सात गणेश  लगेंगे । कुछ साल पहले एक बड़ा सा गणेश लगता था, सब वहीं पूजा कर लेते थे पर अब हर कोई अपने घर के सामने गणेश लगाने को तैयार बैठा है और हर किसी को चन्दा चाहिए। '
 "हाँ माँ अपने अपने गणेश अलग बैठाने का शौक है तो बैठाए, पर सब से चन्दा क्यों माँगते फिरते हैं ?...'
  "माँ वह लोग दरवाजे पर खड़े हैं,पहले उनसे बात करलो ।'
 "ठीक है अभी बात करती हूँ - " क्या बात है बच्चों, क्यों बैल बजा रहे हो ?'
 "आन्टी गणेश का चन्दा लेने आए हैं।'
 'अपने एरिये में बहुत वर्षो से इतना बड़ा गणेश लगता है, वह पूजा करने के लिए बस नहीं होता ?'
 "वहाँ बहुत भीड़ हो जाती है आन्टी फिर हम तो अपने घर के बाहर छोटा सा गणेश लगाते हैं,अच्छी तरह पूजा करने को भी मिल जाती है।'
 "क्या तुम लोग स्कूल नहीं जाते हो ?'
" जाते हैं न आन्टी, मैं नौ क्लास में पढ़ता हूँ, यह सब भी ऐसे ही अलग अलग कक्षाओं में पढ़ते हैं'
 "जो समय तुम इस काम में व्यर्थ  कर रहे हो वह समय तुम्हें अच्छे से पढ़ने लिखने में लगाना चाहिए।'
 "आन्टी गणेश इसी लिए तो बैठा रहे हैं ताकि अच्छे से पूजा कर सकें और वह हमें आशीर्वाद दें।'
 "यदि तुम बड़े गणेश की पूजा करोगे  या किसी दूसरे गणेश मंदिर में जा कर पूजा करोगे तो क्या भगवान तुम्हें आशीर्वाद नहीं देंगे ?'
 "देंगे पर इस से ज्यादा खुश होंगे , प्लीज आन्टी दीजिए न यह तो धर्म का काम है ।'
 "हाँ बेटा धर्म का काम है और हम हर वर्ष बड़े गणेश को बड़ा चन्दा देते हैं और पूजा करने के लिए एक   गणेश बहुत हैं, तुम लोगों को भी उन्हीं की पूजा करनी चाहिए ...हम ज्यादा गणेश बैठाने के पक्ष में नहीं हैं । '
 "पर क्यों आन्टी ?'
 "हाँ बच्चों इस विषय में तुम्हें मैं जरूर बताना चाहूँगी। गणेश प्रतिमाए क्या मुफ्त में मिलती  हैं ?।
 "आन्टी मुफ्त में मिलतीं तो हम चन्दा क्यों माँगते,बहुत मंहगी मिलती हैं और बड़े गणेश तो सुना हैं साइज के हिसाब  से पचास साठ हजार तक आते हैं ?'
 "बेटा एक बात बताओ ...अपने शहर में कितने गणेश बिठाए जाते होंगे ? '                
 "कम से कम सात हजार और हर वर्ष इनकी संख्या बढ़ती जा रही है।'
  "यानि करोड़ों रुपए के गणेश लिए जाते हैं और  कुछ दिन पूजा के बाद उनको नदी ,तालाबों में डाल कर जल को प्रदूषित किया जाता है ... और यह हिसाब तो एक शहर का है, पूरे देश में कितना धन इस पर खर्च होता होगा ? और यह तो सिर्फ प्रतिमाओं की कीमत है...बाकी सब अलग ..बेटा तुम बताओ आज कितने बच्चें धन के अभाव में स्कूल नहीं जा पाते, ऊँची पढाई नहीं कर पाते ।'
 "हाँ आन्टी बहुत से तो पढ़ाई की उम्र तक ही नहीं पहुँच पाते... उस से पहले ही भूख और बीमारी के शिकार हो कर मर जाते हैं।'
 " बेटा मैं बस तुम लोगों को यही बताना चाह रही थी ...यह पैसा सही जगह लगे तो कितनों का भला हो सकता है।'
 "पर आन्टी एक दो के न लगाने से क्या फर्क पड़ना है ?'
      "बेटा लोगों को जागरूक करना पड़ेगा।हम जैसे लोग चन्दा माँगने वालों को चन्दा न देकर उन्हें न देने की वजह बताऐ। मीडिया समाचार पत्रों व टी वी चैनलों के माघ्यम से इस तरह के संदेश  प्रसारित हों तो धीरे धीरे ही सही जरूर जागृति आएगी ।'
 "हाँ आन्टी हम ने इस तरह से कभी सोचा ही नहीं और किसी ने इस तरह से हमें समझाया भी नहीं ।'
 "हाँ आन्टी अब बात हमारी समझ में आ गई है। हम अब से बड़े गणेश की ही पूजा करेंगे और दूसरे लोगो को भी समझाने की कोशिश करेंगे ।'
 "थैंक्यू आन्टी हमारा मार्गदर्शन करने के लिए ।'             
                                      
-------                   

 मेरे ब्लॉग्स ----

सोमवार, 19 अगस्त 2019


बाल कहानी                  गंदा भैया
                                                        पवित्रा अग्रवाल

           रूपेश के पापा का तबादला  इंदौर  हो गया था।शुरू में उसे बार बार शहर बदलना अच्छा नही लगता था। नई जगह जैसे-तैसे मित्र बन पाते थे कि फिर तबादला हो जाता था किन्तु अब उसको आदत सी पड़ गई है और नई नई जगह देखने में मजा भी आने लगा है।
     इस बार उन्हें बड़ा अच्छा बंगला मिला था।घर के बाहर बाउन्ड्री से घिरा एक सुन्दर बगीचा भी था।
           पहले उन्होंने घर में प्रवेश के लिए बगीचे की तरफ का दरवाजा स्तेमाल करना शुरु किया था किन्तु जल्दी ही वह इरादा बदलना पड़ा ।बच्चों की खेलते समय गार्डन में  बॉल गिर जाती थी,कभी कोई फूल तोड़ने आ जाता था, किसी को अशोक के पेड़ के पत्ते चाहिये होते थे।वह बेरोक टोक आते थे किन्तु जाते समय गार्डन का गेट बंद करना किसी को याद नहीं रहता था।कई बार अंदर आ कर गाय, भैंस पौधों को चट्ट कर गई थीं आखिर परेशान होकर उन्हों ने घर के पीछे वाले दरवाजे का स्तेमाल शुरू किया और गार्डन के गेट में ताला डाल दिया।
       रूपेश अब नौवीं कक्षा में है,आठवीं कक्षा तक वह भी गली के बच्चों के साथ सड़क पर खूब क्रिकेट खेलता  था  किन्तु  इंदौर  आने के बाद एक तो उस पर पढ़ाई का दबाव  बढ़ा है दूसरी बात स्कूल में खेलने को मिल जाता है। इसलिए वह अपनी कोलोनी के बच्चों के साथ सड़क पर खेलने कभी नहीं गया।
स्कूल से लौट कर वह पढ़ने बैठा ही था कि दरवाजे की घन्टी की आवाज सुन कर देखा तो कुछ बच्चे हाथ में बैट ले कर खड़े थे--"भैया आपके गार्डन मे बाल गिर गई है, प्लीज ला दीजिये।'
   रूपेश थोड़ा अचकचाया फिर बोला -"ठीक है बाहर चलो अभी देता हूँ।'
"थैंक यू भैया, आप कितने अच्छे हैं,आपसे पहले जो आन्टी इस घर में रहती थीं वह बहुत गंदी थीं बाल मॉगने जाओ तो डाँट कर भगा देती थीं।' बच्चे ने यह बात कुछ इस तरह कही जैसे बता रहा हो कि आप नहीं दोगे तो आप भी गंदे भैया कहे जाओगे।
       थोड़ी देर बाद फिर घंटी बजी रूपेश ने देखा कुछ बच्चे फिर बाल माँगने आये थे।वह मन ही मन झुंझलाया कि ऐसे तो मैं बिलकुल नहीं पढ़ पाऊंगा।उसने कहा -- "देखो अभी मैं पढ़ रहा हूँ,मुझे बार बार डिस्टर्ब मत करो।सुबह सात बजे गार्डन में मम्मी-पापा सैर करते हैं तब ले जाना।'
"प्लीज भैया ला दो न,दो मिनट ही तो लगते हैं ।'
"कहा न कि कल सुबह ले जाना ।'
"प्लीज भैया बस इस बार दे दो फिर नहीं माँगेंगे।'
रूपेश को अपना समय याद आ गया पिछले वर्ष तक वह भी इसी तरह बच्चों के झुंड मे शामिल होकर अपने पड़ौस की आन्टी से बाल के लिये मिन्नतें करता था।वह बोला"--"ठीक है आज दे देता हूँ इसके बाद मुझे डिस्टर्ब नहीं करना।'
   बच्चों ने बाल ली,थैंक यू कहा और चहकते हुए चले गये ।
अब तो यह रोज का सिर दर्द हो गया था।मम्मी अलग परेशान थीं--"रूपेश क्या करूँ इन बच्चों का  दरवाजे की घन्टी बजा बजा कर परेशान किये रहते हैं।कई बार तो मैं ने घन्टी का स्विच बन्द कर दिया तो आन्टी आन्टी आवाज लगा कर परेशान कर देते हैं।'
         रूपेश को अपने पुराने शहर की याद आ गई।वहाँ उसके पड़ौस मे भी ऐसा ही गार्डन था।इन्हीं बच्चो की तरह वह भी सड़क पर क्रिकेट खेलता था और रोज उनकी बाल भी इसी तरह आन्टी के गार्डन में गिर जाती थी।बच्चों के साथ वह भी इसी तरह बार बार घन्टी बजा कर या आवाज लगा कर आन्टी को परेशान करता था। तब आन्टी भी यही कहती थीं -- "बच्चो बार बार डिस्टर्ब मत करो ,तुम्हारी बाल कही नही जाएगी सुबह आकर ले लेना।'
किन्तु वह कहाँ मानते थे,नए नए बच्चों को बाल लेने भेज देते थे।..कभी कभी डाँट के डर से नहीं भी जाते थे तो सुबह अपनी दो तीन बाल एक साथ ले आते थे किन्तु ऐसा बहुत कम होता था।एक दिन उन्होने एसे ही फिर दोपहर को दरवाजे की घन्टी बजाई थी । आन्टी ने मम्मी की तरह स्विच बन्द कर दिया था फिर उन्हों ने आन्टी प्लीज,आन्टी प्लीज की आवाज लगानी शुरू करदी।अचानक आन्टी गार्डन में आई, बाल ढ़ूँढ़ी और बच्चो को देने के बदले निकट के एक खण्डहर में फेंक दी।वह एक कालेज के पीछे का हिस्सा था,वहाँ साँप के डर से कोई जाने की हिम्मत नहीं करता था।फिर गुस्से से बोलीं "अब तो खुश हो,जाओ ले लो बाल। तुम लोगों की बाल ने जीना मुश्किल कर रखा है।तबियत खराब थी अभी दवा खा कर सोई थी किन्तु तुम्हे इस सब से क्या लेना देना हैं।...आज के बाद फिर कभी बाल के लिये मेरे घर की घन्टी बजाई तो इसी तरह खंडहर में फेंक दूँगी।..हाँ सुबह जब हम गार्डन में होते हैं तब ले सकते हो।'
     सब मुँह लटकाए लौट गए थे,बाल गार्डन मे जाने पर भी कोई उन्हे डिस्टर्ब नही करता था ,सुबह अपनी बाल ले आते थे लेकिन उनका नाम गंदी आन्टी रख दिया था।
       तब आन्टी की परेशानी कोई नही समझा था पर अब रूपेश को आन्टी की तकलीफ का अहसास हो रहा था।वह जानता है समझाने पर यह बच्चे भी उनकी परेशानी नहीं समझेंगे फिर भी वह उनको समझाने की कोशिश करेगा ,नही माने तो फिर आन्टी वाली ट्रिक ही अजमानी पड़ेगी,भले ही वे उसका नाम गन्दा भैया रख लें।
                                               ------
email -agarwalpavitra78@gmail.com
-- 
 

रविवार, 21 जुलाई 2019

पक्का वचन

बाल कहानी                            
                      पक्का वचन
                                                    पवित्रा अग्रवाल

घंटी की आवाज सुन कर सोनू ने दरवाजा खोला तो सामने मकान मालकिन आंटी खड़ी थीं
-‘बेटा आप की मम्मी घर पर हैं ?‘
‘नहीं आंटी मम्मी तो घर पर नहीं हैं पर दादा जी हैं ‘
आवाज सुन कर दादा जी भी आगये थे – हाँ कहिये बहन जी ‘
‘अब क्या कहूं मैं दूसरे किरायेदारों की शिकायत सुन सुन कर तंग आ गई हूँ कि पान की पीक से सीढियाँ बहुत गन्दी हो गई हैं .पर मैं भी क्या करूं? सब से कहती हूँ कि पान थूकने वाले का नाम बताओ तो मैं कुछ करूं भी पर हर बार आपका नाम सामने आता है ‘.
‘नहीं बहन जी मैं पान खाता हूँ इसलिए सब का शक मुझ पर जाता है ,मेरा भी तो रास्ता यही है, मैं उसे गन्दा क्यों करूंगा ...बाहर से आने वाले भी तो थूक सकते हैं’
‘हाँ भाई साब मुझे भी आप इतने असभ्य तो दिखाई नहीं देते ... पर कई लोगों ने आप को थूकते देखा है .अब इस बहस से कोई फायदा नहीं है , मैं ने पेन्टर बुलाया है, आज तो मैं सब साफ करा देती हूँ पर मन में यही डर है कि कोई बेवकूफ इसे फिर गन्दा कर देगा . अपने यहाँ आने वालों को भी चैक करिए ...’
पेन्ट कराए दस पन्द्रह दिन हो गए थे पर अभी तक सीढ़ी साफ थीं।
पर एक दिन फिर दीवारों पर पान थूका हुआ था।यह बात ऊपर वालों ने देखी पर आन्टी से शिकायत करने कोई नहीं गया। सोनू ने भी यह सब देखा पर इस बार उसे भी विश्वास नहीं था कि यह काम दादा जी का ही है।
सोनू ने चुप के से दादा जी पर नजर रखनी शुरू की और वह यह देख कर दंग थी कि दादा जी ने वहाँ फिर से पान थूकना शुरू कर दिया है।
एक दिन स्कूल से लौटते हुए सोनू को मकान मालकिन आंटी मिल गई.उन्होंने कहा-- "बेटा देखो अभी तो पेन्ट कराया था, सीढ़ी फिर गन्दी कर दी गई हैं ...क्या तुमने किसी को यहाँ पान थूकते देखा है ?'
सोनू के मुँह से एकदम से निकल गया कि हाँ मेरे दादाजी थूकते हैं ।
तभी दादा जी सीढ़ी उतर कर आते दिखे तो आन्टी ने कहा -"भाई साहब आपने फिर यहाँ थूकना शुरू कर दिया ?
"अरे आप बिना देखे मेरा नाम कैसे लगा सकती हैं ?' 
" मुझे तो पहले से पता था कि यहाँ आप ही थूकते हैं पर मैं ने नहीं देखा था ... आज तो आपकी सोनू भी यही कह रही है ,अब इस जगह को मैं नहीं आप साफ कराएगे ।'
'सोनू मैं ने यहाँ कब थूका ?'
"दादा जी मैं ने आपको बहुत बार यहाँ थूकते देखा है।'
‘हाँ यह सच है कि मैं पहले कभी कभी यहाँ थूक देता था पर जब से पेन्ट हुआ है मैं ने एक बार भी नहीं थूका है’
"अब मैं आप से क्या कहूँ दादा जी' कह कर सोनू ऊपर अपने घर चली गई।
पीछे पीछे दादा जी भी चले गए।
"सोनू तुमने आन्टी से यह क्यों कहा कि दादा जी पान थूकते हैं ।'
"मैं ने झूठ तो नहीं कहा दादा जी...आप ही तो हमें सिखाते हैं कि झूठ नहीं बोलना चाहिए पर आप खुद ही ...आप को वहाँ पान थूक कर क्या मजा आता है दादा जी।'
"क्या करूँ घर में वाश बेसन में थूकता हूँ तो तेरी माँ को अच्छा नहीं लगता ...फिर वह काम वाली भी चिल्लाती हैं कि पान थूकोगे तो मैं बेसन साफ नहीं करूँगी ... हर समय भाग कर बाहर तो नहीं जा सकता ?'
"दादा जी एक सलाह दूँ...यदि आप तंबाकू वाला पान खाते हैं तो वह खाना छोड़ दीजिए ।'
"नहीं बेटा मैं तंबाकू नहीं खाता ...फिर भी कोशिश करूँगा कि पान खाना कुछ कम करदूँ ।'
"यह तो बहुत अच्छी बात है...पर आप एक काम कर सकते हैं ...पान आप वाश बेसन में ही थूकिए पर तभी पानी डाल कर साफ कर दीजिए तो किसी को भी शिकायत नहीं रहेगी।'
"ठीक है बेटा आगे से मैं ऐसा ही करूंगा और सीढियाँ भी साफ करा दूँगा ।'
‘दादा जी, पक्का वचन देते हैं ?'
‘हाँ बेटा ,पक्का वचन देता हूँ “
"मेरे अच्छे दादा जी ,मेरे प्यारे प्यारे दादा जी ।'

मेरे ब्लॉग्स --- 

गुरुवार, 13 जून 2019

बन्दर की कहानी


बाल कहानी 
           बन्दर की कहानी

                                                पवित्रा अग्रवाल

    गार्डन में  दादी के साथ घूमते हुए मणि ने दो तीन बंदरों को वहां से जाते देखा और
 डर कर दादी का हाथ पकड़ लिया—‘दादी वहां बन्दर हैं मुझको डर लग रहा है। 
  'अरे वह तो दूर कहीं जा रहे है ,डरने की क्या बात है ?
'आपको बन्दर से डर नहीं लगता ?
  'नहीं बन्दर से मुझे बिलकुल डर नहीं लगता .बन्दर तो मेरे दोस्त हैं.   
  'तो मुझे बन्दर की कहानी सुनाओ न'
   'ठीक है मणि तो सुनो एक कहानी --  जब तुम्हारी दादी छोटी थी ...
 'कितनी छोटी थी ?...मेरे बराबर की ?'
 'हाँ तुम्हारे बराबर की .मतलब चार साल की थी तो दादी के घर में बहुत बन्दर आते थे.'
  'क्यों दादी ?'
'दादी के आँगन में एक बहुत बड़ा नीम का पेड़ था .उस पर बहुत सारे बन्दर रहते थे.'
'पेड़ पर बंदरों का घर  था ?...उनका घर कैसा होता है दादी ?'
'बन्दरों का कोई घर नहीं होता .वह तो जगह जगह घूमते रहते हैं.
'फिर वह खाना कहाँ खाते हैं दादी ?'
  'बन्दर को जब भूख लगती है तो आस पास उसे जो  भी खाने लायक चीज जैसे फल
 ,रोटी दिखती है वही उठा कर खा लेता है .जहाँ पानी मिल जाता है वहां पानी पी लेता 
है .'
'दादी बन्दर कहाँ सोता है ?'
'मणि तुम्हारी तरह बन्दर के पास बैड तो होता नहीं है...वह पेड़ पर भी सो जाता है '
 'पेड़ पर , गिरता नहीं है ?
 'नहीं, गिरता नहीं है.'
  ‘दादी आप के घर में पेड़ पर तो बहुत सारे बन्दर रहते थे,कभी वह आपकी रोटियां भी 
उठा कर ले जाते थे ?’
 ‘हाँ बहुत बार हमारी रोटियां उठा कर ले जाते थे फिर हमारी मम्मी को दोबारा रोटी 
बनानी पड़ती थीं.’
‘ कहीं से रोटी भी ना मिले तो क्या खाता है ?’
‘बन्दर एक जगह तो रहते नहीं हैं .दूर दूर तक घूमते रहते हैं .आम ,अमरूद ,केला आदि
' की पेड़ों से फल तोड़ कर खा लेते हैं .खाने के सामान की कोई बंडी मिल जाये तो उस
 पर से उठा कर भाग जाते हैं ‘.
'कभी बहुत भूखे हों और कहीं भी खाने को ना मिले तो वो क्या करते हैं ?
‘तब वह किसी के कपडे या दूसरा सामान उठा कर भाग जाते हैं ’ .
‘तो क्या बन्दर कपडे भी खा लेते हैं ?’
  ‘अरे बुद्धू कपडे भी कोई खाता है क्या ?बन्दर बड़ा चालाक होता है .कपडे लेकर वहीं 
बैठ जाता है और खों खों कर के डराता रहता  है  .जिसके कपडे उसने लिए है वह बन्दर
 से वापस लेने की कोशिश करता है पर वह आसानी से  कपडे नहीं छोड़ता  ’.
‘फिर कैसे छोड़ते हैं ?’
 ‘ एक कपडे में रोटी बांध कर बन्दर को दिखा कर दूर फेंक देते हैं.वह कपड़ा वहीँ छोड़
 कर रोटी लेने जाता है तो पीछे से कपड़ा उठा लाते हैं ‘.
  'दादी एक बात बताओ रोटी कपडे में ही बांध कर क्यो फेंकते है ,एसे भी तो फेंक 
सकते हैं ?'
    इसकी दो वजह हैं एक तो रोटी कपडे में बांध कर फेंकने से वह दूर तक फेंकी जा
 सकती है .'
 'दूर फेंकने से क्या फायदा होगा दादी ? '
  'दूर फेंकने से उसे अपनी जगह छोड़ कर दूर रोटी लेने जाना पड़ता है और कपडे में 
बंधी होने की वजह से वह उसमे से रोटी निकालने की कोशिश करता है ,इतनी देर में 
लोग अपना कपड़ा उठा लेते हैं ' 
 ‘दादी जब  बन्दर आपका सामान या कपड़े ले जाता था तो आप भी रोटी देती थीं 
?...फिर वो छोड़ देता था ?
‘हाँ ज्यादातर छोड़ देता था पर एक बार मालुम है क्या हुआ ?'
'क्या हुआ दादी ?
  ‘एक बार  जब हम छोटे थे तो गर्मी के दिनों में छत पर सो रहे थे ,सुबह जब मेरी 
नींद खुली तो  देखा कि बन्दर मेरा तकिया लेकर बैठा है .मैं ने अपनी मम्मी को बताया
 पर तब हमारे पास रोटी नहीं थी .’
‘फिर क्या हुआ दादी ?
  'मेरी मम्मी ने एक रुमाल में कागज ,पत्थर बांध कर दूर फेंक दिए थे .वह तकिया
 साथ लेकर गया और रुमाल में रोटी न मिलने पर  खों खों कर के बहुत देर तक 
डराता रहा फिर उसने दांतों से पूरा तकिया फाड़ कर फेंक दिया.’
‘अच्छा रोटी नहीं मिली तो उसको  गुस्सा आगया था ? आपको कभी काटा भी ?
‘नहीं बन्दर को बिना बात छेड़ना नहीं चाहिए ....फिर वह कुछ नहीं कहता .’
  ‘ठीक है दादी मैं भी बन्दर को कभी नहीं छेड़ूँगी  ..अब घर चलें दादी ?’
                                                 ---
 
--
-पवित्रा अग्रवाल