शनिवार, 6 अक्तूबर 2018

जी का जंजाल


बाल कहानी 
                         
  जी का जंजाल
         
                                                         पवित्रा अग्रवाल

            स्कूल साथ साथ जाते हुए पाही ने नयना से पूंछा --"नयना तुम्हारा नया मकान बने हुए तो बहुत दिन हो गए ,उसमें रहने कब जा रही हो ?''      
     "अरे जाना तो दो महीने पहले ही था लेकिन पापा मम्मी के कुछ मित्रों ने कहा कि इस में तो वास्तु के बहुत दोष हैं ।प्रवेश से पहले किसी वास्तु विशेषज्ञ की सलाह ले लो।हमारे मम्मी पापा को इस में विश्वास तो नहीं है पर शुभ चिन्तकों के लगातार आग्रह पर मम्मी को भी बहम हो गया और यह बहम जी का जंजाल बन गया।''
 "वास्तु का नाम तो इधर मैं नें भी सुना है बल्कि हमारे पड़ौस में भी एक वास्तु शास्त्री रहते हैं पर यह क्या है मुझे इस विषय में ज्यादा  कुछ नहीं पता।''
 "अच्छा है जो तुम्हें इसका ज्ञान नहीं है,जो इसके जाल में फंस जाता है वह चकर घिन्नी बन जाता है।''
 "मतलब ? ''
 "मतलब यही है कि इनके चक्कर में फंस कर फायदा हो न हो पर रुपयों को पंख जरूर लग जाते हैं और सब से बड़ी बात यह है कि एक  वास्तु विशेषज्ञ के  हिसाब से बने मकान को दूसरा विशेषज्ञ कभी सही नहीं बताता । वह पहले विशेषज्ञ को अज्ञानी बता कर दोषों की लिस्ट थमा देता है।''
  "तुम्हारे साथ क्या हुआ ?''
 "वही जिसका अनुमान था।जब से विशेषज्ञ जी घर देख कर गए हैं,मम्मी पापा बहुत तनाव में हैं।एक एक पैसा जोड़ कर व आफिस से लोन ले कर पापा ने यह फ्लैट खरीदा था और जब उसमें रहने जाने का समय आया तो वास्तु के चक्कर में फँस गए।लोन लेते समय पापा ने सोचा था कि किराए के मकान का जो आठ हजार रुपए महिने  किराया जाता हैं वह अपने फ्लैट में जाने के बाद लोन की किश्त जमा कराने के काम आ जाएगा ।वह भी नहीं हो पाया।'
 "तो क्या वास्तु के हिसाब से मकान ठीक करवा रहे हो ?'
 "फ्लैट में वह सब सुधार संभव नहीं हैं,प्रवेश द्वार जिस दिशा में है वहीं रहेगा ।रसोई ,बाथरूम,किचन किसी का भी स्थान कैसे बदल सकता है ।पापा ने कई लोगों से सलाह ली है ,छोटे मोटे बदलाव भी जो संभव थे कराए हैं।...विशेषज्ञ जी ने तो यहाँ तक कहा है कि इसे बेच कर दूसरा ले लो ।लेने से पूर्व विशेषज्ञ की सलाह जरूर ले लेना ।''
  "पर नयना यह सलाह खरीद ने से पहले ले ली होती तो इन मुश्किलों से तो  बच जाते ।''
 "असल में पापा ने यह मकान रिसेल में लिया था,पापा के परिचित का ही मकान था।वह इस मकान में करीब सात साल रहे।''
 "यदि वास्तु दोष हैं तो जिन से तुमने खरीदा उनको भी इस में परेशानियां उठानी पड़ी होंगी ?''
 "पापा बताते हैं कि खरीदने से पूर्व मकान मालिक से वास्तु आदि के विषय में पूछा था तो उन्हों ने कहा था कि "मैं ने भी बना बनाया लिया था , किसी से सलाह नहीं ली थी ।घर में हवा, पानी, धूप का अभाव नहीं था बस यही बात मुझे भा गई थी ।मेरे बच्चे इसी मकान में रहते हुए पले - बढ़े हैं...आज  दोनो बेटे मल्टी नेशनल कंपनी में काम कर रहे हैं।घर में सुख शान्ति है।'..यह सब बात पापा भी जानते थे।बस ले लिया ।'' 
 "तो अब तुम्हारे पापा ने क्या सोचा है ....क्या बेचने की सोच रहे हैं ?''
 "पाही  मकान बेचना या खरीदना क्या इतना आसान होता है ?''
 "फिर...?''
 "अभी एक सप्ताह पहले पापा के एक मित्र की पत्नी का कैंसर से स्वर्ग वास हो गया था ।पापा बताते हैं वह बहुत संपन्न हैं। उन्होंने जमीन खरीदने से ले कर कोठी बनवाने तक पूरा काम एक वास्तु-विशेषज्ञ की देख रेख में कराया था पर उस में जाने के एक साल के अंदर ही यह सब हो गया । मंदी के चलते उनको व्यापार में भी बहुत घाटा हुआ है।तब से पापा के दिमाग ने पल्टी खाई है और वह भ्रम की स्थिति से बाहर आगए हैं।उनका कहना है कि सुख- दुख सब के जीवन में आते हैं। उन्हें यह तथा कथित विशेषज्ञ नहीं रोक सकते और यदि रोक सकते तो उन के जीवन में सुख ही सुख होते ।'...
 "हाँ नयना तुम्हारे पापा का सोचना ठीक ही है। हमारे पड़ौस में जो वास्तु शास्त्री रहते हैं वह तो समाचार पत्र में इस विषय में कालम भी लिखते हैं। उनके घर से तो रोज झगड़े की आवाजें आती रहती हैं,उनका बेटा भी बहुत बिगड़ा हुआ है... एक बार पुलिस केस में भी फंस गया था।'
 "अच्छा ! वैसे पापा ने भी तय कर लिया है...अब हम इस महिने के अंत में अपने फ्लैट में चले जाएंगे ।''


    
       
        मोबाईल _     agarwalpavitra78@gmail.com
     
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बुधवार, 26 सितंबर 2018

फौजी का बेटा


बाल कहानी
  फौजी का बेटा

पवित्रा अग्रवाल

आजाद अपने कुछ साथियों के साथ स्कूल से लौट रहा था ।उसे घर जाने की जल्दी थी क्यों कि उसकी माँ बीमार थी। वह सुबह स्कूल नहीं आना चाहता था पर मम्मी ने उसे जबरन भेज दिया -- "बेटा अपनी पढ़ाई में ढ़ील मत दो।मैं ठीक हूँ फिर भी तू मोबाइल ले जा,कोई परेशानी हुई तो तुझे फोन कर दूँगी ।''
"पर... मम्मी स्कूल में मोबाइल ले जाने की इजाजत नहीं है।...यदि किसी ने देख लिया तो ड़ांट तो पड़ेगी ही ,जुर्माना भी देना पड़ेगा ।... फिर भी मैं ले जाता हूँ  ,साइलेंट मोड में वाइब्रेशन  के साथ रख लेता हूँ।जरूरी हो तो आप कर लेना वरना मैं खाने की छुट्टी में आप से बात कर लूँगा ।''
"हाँ बेटा ,यह ठीक रहेगा।''
आजाद ने दोपहर में मम्मी से बात कर ली थी। शाम को स्कूल से लौटते समय उसे मम्मी के लिए कुछ फल ले जाने थे ।वह फलों की तलाश में इधर उधर नजर घुमा रहा था तभी उसकी नजर भीड़ भरे इलाके में स्थित एक कचरा कुंडी पर पड़ी।एक आदमी उस में कुछ डाल कर गया था पर उसके हाव भाव देख कर आजाद को लगा कि कुछ दाल में काला है। उसने अपने आसपास चलते हुए कुछ बच्चों का ध्यान उधर खींचना चाहा पर वह कान में ईयरफोन लगाए गाने सुनने में व्यस्त थे ।
उसे लगा कि समय अच्छा नहीं है।लोगों को आँख कान खुले रख कर चौकन्ना रहने की जरूरत है।...एक लड़के के कान से ईयरफोन निकाल कर उसने कहा --"अभी मैं ने एक आदमी को उस कचरा कुंडी में कुछ डाल कर जाते देखा है...मुझे शक है कि वह बम भी हो सकता है ।''
बच्चे ने बड़ी लापरवाही और बेरुखी से उसे घूर कर देखा और कहा -- "कचरे के डिब्बे में कोई कचरा ही डालेगा न '' और अपने कान पर दुबारा ईयरफोन लगाते हुए उस से आगे निकल गया ।
तभी आजाद को वह आदमी अपनी तरफ आते हुए दिखा।एक पेड़ की आड़ में खड़े हो कर आजाद ने मोबाइल से उसका फोटो भी लेने का प्रयास किया । अब आजाद दुविधा में था कि क्या करूँ ? पुलिस को बताया जाए या नहीं।  यदि वहाँ कुछ नहीं मिला तो वे समझेंगे कि मैं ने उन्हें बिना बात गुमराह कर के उनका समय बर्बाद किया है ।कुछ पुलिस वाले तो इतने बद्दिमाग होते हैं कि गलत सूचना पर उसे चोट भी पंहुचा सकते हैं ।
आखिर उसने अपनी दुविधा पर विजय पाली ,100 नं.पर फोन मिला कर उसने अपना नाम ,अपने स्कूल का नाम व जगह बता कर अपना शक जाहिर करते हुए कहा कि मैं नहीं जानता कि मेरा शक सही है या गलत ।हो सकता है वहाँ कुछ भी न मिले ।...आप चाहें तो जगह की जाँच कर सकते हैं ?''   
"ठीक है बेटा,जब तुमने अपनी पूरी पहचान बता कर फोन किया है तो हम तुम्हें झूठी अफवाह फैलाने वाला तो नहीं मान सकते।...हम वहाँ जा कर देखेंगे।''
"सर अब मै अपने घर जा रहा हूँ ...मेरी माँ बीमार है।मेरा मोबाइल नंबर आपके पास रिकार्ड हो गया होगा।मेरी किसी मदद की जरूरत हो तो आप मुझे फोन कर सकते हैं।''
"ओ के बेटा।''
एक घन्टे बाद पुलिस का फोन आया ---"आजाद तुम्हारा शक सही निकला ।वहाँ एक जीवित बम पाया गया है।वह यदि फट जाता तो बहुत सी जाने जा सकती थीं ।हम तुम से मिलना चाहते हैं ...तुम से उसका हुलिया जान कर हमारे एक्सपर्ट गुनहगार का चित्र बनाएँगे ताकि उसे पकड़ा जा सके ।''
"सर मैं ने मोबाइल से उसका फोटो लिया  था  ,हो सकता है आप को उस से कुछ मदद मिल सके।''
"ओ वेरी गुड ,यह तुमने बहुत अच्छा किया,तुम मोबाइल के साथ आ जाओ। "
आजाद ने अपनी मम्मी को विस्तार से पूरी घटना बताई।सुन कर मम्मी बहुत खुश हुई और बोलीं--
"शाबाश बेटा,मुझे तुम पर नाज है।फौजी पापा के बहादुर बेटे हो तुम।...सुन कर पापा बहुत खुश होंगे ।''
थोड़ी देर बाद मम्मी ने टी. वी. चालू किया तो समाचार आ रहा था --- "एक बच्चे की मदद से एक बहुत बड़ा हादसा होते होते बचा।उसने पुलिस को बम रखे होने का शक जाहिर किया था जो सही निकला। उस साहसी बच्चे से अभी मीडिया का संपर्क नहीं हो पाया है।....अभी अभी खबर आई है कि दो जगह और भी बम विस्फोट हुए हैं।ताजा जानकारी के साथ हम फिर हाजिर होंगे ।''

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मेरे  ब्लॉग्स -----

बुधवार, 15 अगस्त 2018

यह भी चोरी है

बाल कहानी
                                यह भी चोरी है
                                                          पवित्रा अग्रवाल
 
             सोमेश को एक पुस्तक के पन्ने फाड़ते देख कर मम्मी ने टोका --" बेटा यह किस की किताब है और तुम इस किताब में से पन्ने क्यों फाड़ रहे हो ?'
 "मम्मी यह स्कूल के पुस्तकालय की किताब है, कल इसे पुस्तकालय को लौटाना है और मुझे इस में से डिवेट के लिए कुछ सामग्री चाहिए पर अब पढ़ने का समय नहीं है ।'
 "सामग्री चाहिए तो ये इतनी सारी जीरोक्स की दुकाने हैं , किताब ले जा कर उन पन्नों की जीरोक्स करा लाओ । '
 "अरे मम्मी देखो न बाहर पानी बरसने को है और मेरा मन अभी बाहर जाने को नहीं है।'
     'देखों बेटा यह बहुत गलत बात है ।पुस्तकालय का मतलब है पुस्तकों का घर।स्कूल - कालेज में,गाँव ,शहर में पुस्तकालय इसी लिए होते हैं कि वहाँ पर विभिन्न विषयों की पुस्तकें एक जगह मिल जाती हैं  ।हमें किसी खास विषय पर कुछ जानकारी चाहिए तो उसके लिए हमें पुस्तकालय से बहुत मदद मिलती है क्यों कि एक एक  जानकारी  प्राप्त करने के लिए पुस्तक खरीदना हरेक के बस की बात नहीं है। जिस विषय पर  किसी  को जानकारी चाहिए ,वह लाइब्रेरी का सहारा लेता है। लाइब्रेरी की पुस्तको की रक्षा करना हर पाठक का फर्ज है।... पन्ने फाड़ने की गल्ती नहीं करनी चाहिए ।'
     "अरे मम्मी एक मेरे न फाड़ने से क्या होगा... बहुत से बच्चे फाड़ते हैं ।कई बार ऐसा हुआ है कि मुझे भी मन चाही सामग्री नहीं मिली ...पन्ने फटे हुए थे ।'
    " और वहीं गलती तुम भी करने जा रहे हो । बेटा यह भी एक तरह की चोरी ही है ।'
  "इसे भी चोरी कहेंगे ?'
 'बिल्कुल यह भी चोरी है ।अब तुम बता रहे थे कि तुम्हारे यहाँ एक बच्चे ने किसी की किताब चुरा ली थी, पकड़े जाने पर उसे सबके सामने सजा दी गई थी न ,इसी तरह यह किताब तुम्हारी नहीं,स्कूल की  है ,चुपके से या चोरी से उसके पन्ने फाड़ना भी ,चोरी ही है ? "
     "हाँ ,आप ठीक कह रही हैं ...थैंक यू मम्मी आपने मुझे एक गलत काम करने से बचा लिया।मैं अभी जाकर इनकी जीरोक्स करा के लाता हूँ।'
 दूसरे दिन सोमेश जब पुस्तकालय में किताब लौटाने गया तो लाइब्रेरी वाले सर दो बच्चों को डाँट रहे थे। उन्होने बच्चो को चुपके से कुछ पन्ने फाड़ते देख लिया था ...उन बच्चों का नाम लिख कर उन पर फाइन  लगा दिया गया था ।...सोमेश की किताब भी खोल कर सर ने चैक की थी ।
      सोमेश मन ही मन मम्मी को थैंक्स कह रहा था


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मंगलवार, 17 जुलाई 2018

फूलों की चाहत


बाल कहानी                                    
                   फूलों की चाहत   


                                                                        पवित्रा अग्रवाल
 
"दीदी मैं अभी आयी।गुप्ता आन्टी से कुछ फूल माँग कर लाती हूँ।'
 "दिव्या, फूलों का इतनी सुबह क्या करेगी ?'
  "आज मेरी प्रिय टीचर मिस लिली का बर्थ-डे है।उन्हें मैं फूलों का गुलदस्ता भेंट करना चाहती  हूँ। गुप्ता आन्टी का बगीचा बहुत सुन्दर है।उनके यहाँ तरह तरह के फूल हैं।'
 "मैं ने भी देखा है, उनका बगीचा सचमुच बहुत सुन्दर है।जरूर उनके पास माली होगा।'
 "नही दीदी उनके यहाँ कोइ माली नही है,अंकल ,आन्टी बगीचे की देख भाल खुद करते हैं।'
 "जो अपने बगीचे की देख भाल खुद करते हैं,मुझे नही लगता कि उनसे तुम्हे फूल माँगने चाहिये। ऐसे लोगो को अपने पौधों से बच्चों की तरह प्यार होता है।...जब तुमने पहले से सोच रखा था कि मिस को गुलदस्ता भेंट करना है तो उसका इंतजाम करके रखना चाहिये था..बाजार में क्या नही मिलता ?'
 "बाजार मे तो बुके बहुत मंहगा मिलता है दीदी।मैं कोइ रोज तो माँगती नही हूँ,आज पहली बार लेने जा रही हूँ। आन्टी बहुत अच्छी हैं...आप देखना वह मना नही करेगी,मुझे बहुत प्यार करती हैं।'
 "हो सकता है वह दे दें । उनकी जगह मै होती तो एक दो फूल शायद दे भी देती पर गुलदस्ते के लिये तो मना कर देती।'
 "दीदी एक बात बताइये हम फूल नही तोड़ेगे तब भी वह पेड़ पर रहने वाले तो हैं नही, एक दो दिन मे मुर्झा कर खुद गिर जायेंगे।...यदि किसी के काम आजाये तो अच्छा है न। बाजार मे इतने फूल बिकते है वह भी तो किसी के बगीचों से ही आते होंगे ?'
 "बाजार मे बिकने वाले फूल शौकिया बगीचा रखने वालों के बगीचे से नही आते।..बाजार में बिकने के लिये फूल उगाना अपने आप मे एक अलग व्यवसाय है,उनकी बाकायदा खेती की जाती है लेकिन जो अपने घर के बगीचे की देखभाल के लिये अपना पसीना बहाते हैं वह बड़ी बेसब्री से पौधों पर कलियाँ आने का इंतजार करते हैं फिर उनको खिलते हुये देखने का भी।...इतनी मेहनत वह इसलिये तो नहीं करते कि फूल तोड़-तोड़ कर बाट दें।'
 "शायद आप ठीक कह रहीं हैं दीदी,मैं ने इतनी गहरायी से सोचा ही नही था लेकिन अब इतना समय नही है कि बाजार से फूल ला सकूँ यदि आन्टी ने दे दिया तो बस एक गुलाब का फूल लाऊँगी।'
       दिव्या गुप्ता आन्टी के घर पहुँची तो उसने आन्टी को बगीचे के गेट पर दो बच्चों से बात करते हुये खड़ा पाया।उन के चेहरे पर कुछ उदासी छायी थी।तभी आन्टी  का स्वर उसके कान मे पड़ा-"सॉरी बच्चों मैं फूल नही दे सकती ।पूजा के लिये चाहिये तो भी आपको बाजार जाना चाहिये था।'
 "आन्टी प्लीज बस दो-तीन दे दीजिये न।' 
     उन के चेहरे पर तनिक गुस्सा छा गया था - "इतनी देर से समझा रही हूँ फिर भी नही समझ रहे,अब जाओ यहाँ से।'
     तभी आन्टी की नजर दिव्या पर पड़ी । वह बोली - "देखों दिव्या इन फूल माँगने वालो से मैं परेशान हो गई हूँ, रोज कोइ न कोइ फूल माँगने चला आता है । सबको एक-एक, दो-दो भी देने लगूँ तो मेरे बगीचे में एक भी फूल नही बचेगा।किसी को घर में पूजा के लिये फूल चाहिये तो किसी को मंदिर मे चढ़ाने के लिये,किसी को जन्म दिन के लिये चाहिये तो किसी को अपने लाड़लों की माँग पूरी करने के लिये।...तंग हो गइ हूँ मैं।पहले तो मुझे पता ही नही चलता था और फूल गायब हो जाते थे।अब मै ने  सरकाने वाला गेट लगवाया है जिसे बच्चे आसानी से नही खोल पाते तो बैल बजा-बजा के मुसीबत किये रहते हैं,समझ मे नही आता क्या करूँ ?'
    आन्टी की परेशानी दिव्या समझ रही थी।उसने कहा-"आन्टी एक काम और कर के देखिये।आप गेट पर एक बोर्ड यह लिख कर लगवा दीजिये कि यहाँ फूल तोडना और माँगना दोनो सख्त मना है।...मैं समझती हूँ माँगने वालो की संख्या मे कमी जरूर आयेगी।'
 "ठीक है बेटा यह उपाय भी करके देखती हूँ।'
 लौटते समय दिव्या इस बात से बहुत खुश थी कि वह फूल माँगने की गलती करने से बच गयी थी। उसे अहसास हो गया था कि फूलों की चाहत को माँग कर नही खरीद कर पूरा करना चाहिये .    

 


-पवित्रा अग्रवाल

मेरे ब्लोग्स  


रविवार, 10 जून 2018

सोनम की समझदारी

बाल कहानी               
                   सोनम की समझदारी
                                      
                                                           पवित्रा अग्रवाल 

  गर्मी की छुट्टियों में सोनम दिल्ली से अपने मामा के पास हैदराबाद गई हुई थी। उसके मामा ने वहाँ नई कोठी बनवाई थी। परीक्षाओं की वजह से वह गृहप्रवेश के समय नहीं जा पाई थी। कोठी तो बहुत सुंदर थी लेकिन वहाँ थोड़ा सन्नाटा था। आस पास कोई घर इतनी दूरी पर न था कि पुकारने से आवाज वहां पहुँच जाए।
मामा जी को ऑफिस के काम से एक सप्ताह के लिए दिल्ली जाना पड़ा। सोनम उसकी मामी व उनके दो छोटे बच्चे घर में रह गए थे। मामी वैसे तो घर में कई बार अकेली रही हैं किंतु तब वह फ्लैट में रहती थीं। वहाँ कोई डर नहीं था। इस नए मकान में आने के बाद यह पहला अवसर था जब मामा जी को कहीं बाहर जाना पड़ रहा था। जाते समय वह भी कुछ परेशान थे। वह हम सब को खूब समझा-बुझा कर गए थे। पुलिस व परिचितों के नंबर भी दे गए थे।
चार दिन आसानी से कट गए। रोज रात को मामा जी दिल्ली से फोन पर बात कर लेते थे। एक दिन आधी रात को दरवाजे के बाहर कुछ आहट सुन कर मामी की नींद खुल गई। उन्होंने सोनम को भी जगा लिया।
मामी ने दरवाजे पर लगी मैजिक आइ ' में से बाहर देखा तो पाया कि एक आदमी रसोई में लगे एग्जौस्ट फैन को हटाने की कोशिश कर रहा है और दो आदमी उसके पास में खड़े हैं। यदि वह पंखा हट गया तो वह दुबला-पतला आदमी उस रास्ते से रसोई में आराम से प्रवेश पा सकता है बस यही सोच कर मामी ने सबसे पहले रसोई का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया ताकि चोर रसोई से घर के अन्य भाग में न आ पाए।
मामी ने पुलिस को फोन करना चाहा पर फोन उठाते ही वह घबरा कर बोलीं - "अरे सोनम, फोन तो खराब है। अब क्या होगा ? शोर मचाने से भी कोई फायदा नहीं,सब घर दूर-दूर हैं यहाँ कोई हमारी मदद को नहीं आ पाएगा।'
सोनम ने इशारे से मामी को चुप रहने को कहा फिर जोर से बोली - "मामी, दूसरा फोन ठीक है। मैं अभी पुलिस को फोन करती हूँ।'
     वह दरवाजे के पास जाकर जोर से ऐसे बोलने लगी जैसे फोन पर बात कर रही हो, "हैलो, पुलिस स्टेशन...हैलो इंस्पेक्टर साहब, मैं जुबली हिल्स रोड, कोठी नंबर 36 से बोल रही हूँ। हमारे घर में चोर घुस आए हैं...आप जल्दी आइए...क्या कहा...आप का पुलिस दस्ता इस क्षेत्र में गश्त लगा रहा है...अच्छा, आप वायरलेस पर सूचना देकर हमारे पास भेज रहे हैं...क्या, पाँच मिनट में पुलिस यहाँ पहुँच  जाएगी ...धन्यवाद अंकल, हमें बहुत डर लग रहा है...मामी, पुलिस पाँच मिनट में यहाँ पहुँच जाएगी।'
सोनम इतनी जोर से बोल रही थी ताकि बाहर चोरों तक भी उसकी आवाज पहुँच सके।
तभी बाहर भगदड़ की आवाज सुनाई दी, फिर एक कार स्टार्ट करने की आवाज आई।
"मामी, लगता है चोर पूरी तैयारी के साथ कार लेकर आए थे...लेकिन पुलिस के डर से भाग गए।'
"अरे सोनम, तू तो बहुत समझदार निकली। फोन कर ने की एÏक्टग कर के ही चोरों को भगा दिया...यह विचार तेरे दिमाग में आया कहाँ से ?... डर के मारे मेरे तो हाथ-पाँव फूल गए थे।'
"अरे मामी, मैं दिल्ली की लड़की हूँ। इतनी आसानी से हिम्मत नहीं हारती।'
मामी ने स्नेह से उसे अपने सीने से लगा लिया।
    दूसरे दिन पड़ौसियो ने पुलिस में रिपोर्ट कराई।पुलिस को जब सोनम की समझदारी का पता चला तो वह भी दंग रह गई।
जब सोनम के माता-पिता को उसकी सूझबूझ का पता चला तो वे बेहद प्रसन्न हुए। दिल्ली से लौट कर मामा ने उसे शाबाशी देते हुए एक डिजिटल डायरी इनाम में दी।

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