शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

मम्मी ने कहा था

बाल कहानी
                   
मम्मी ने कहा था    
                                                          पवित्रा अग्रवाल


     दिसंबर की छुट्टियां   शुरू होते ही वरुण ने  ऊँचा स्टूल लगा कर अलमारी पर से कुछ पतंगें और चरक,  माँजा  नीचे उतार लिया ।
    माँ ने कहा "बेटा वरुण तुमने इतनी सारी पंतगें क्यों जमा की हुई हैं... जितनी जरूरत हो उतनी ही लाया  करो।...पड़े पड़े खराब भी होती हैं।'
 वरुण खुश हो कर बोला -- "अरे मम्मी इनमें से एक भी मेरी खरीदी हुई नहीं हैं, सब कट कर आई हुई  पतंगें हैं। '
 "तुम से मना किया था  न, फिर भी तुम पतंगें लूटते हो ? '
 "अरे माँ अपनी छत इतनी बड़ी है कि पतंगें अपने आप आ कर गिर जाती हैं।...वही पतंगें मैं जमा कर  लेता हूँ'
 " इनमें से कुछ पतंगें तो  बहुत खराब हो रही हैं पर तूने उनको भी संभाल कर क्यों रखा हुआ है ?'
 'फिर इनका क्या करूँ माँ ?'
 "पतंग के दिनों में बहुत से गरीब बच्चे अपनी जान की परवाह न करते हुए पतंग लूटने के लिए सड़कों पर भागते फिरते हैं,यह पतंगें उन को दी जा सकती थीं  ।'
 "हाँ माँ आपकी सलाह तो अच्छी है पर पतंगें देख कर उन्हें सहेज कर रखने या खुद ही उड़ाने का  लालच  आ जाता है।'

     एक दिन वरूण दोस्तों के साथ क्रिकेट खेल कर लौटा था ,उसकी नजर अपने बगीचे में गई। उसने  देखा कि  बगीचे में एक लड़का घुसा हुआ था और  उसने हाथ में एक लोहे की छड़ उठा रखी थी ,उस  से पतंग निकालने की वह कोशिश कर रहा था।
   वरूण एक दम से चिल्लाया -- "अरे यह क्या कर रहे हो ?'
 लड़के ने डर के मारे लोहे की छड़ वहीं फेंक दी और रोने लगा - ' भैया मैं चोर नहीं हूँ ।अभी एक पतंग कट कर यहाँ लटक गई थी, उसको निकालने की कोशिश कर रहा था।'
     "तुम डरो नहीं, मैं तुम्हें चोर नहीं समझ रहा पर क्या तुम्हें मालुम है कि पेड़ के पास से करेंट के तार जा रहे हैं... पतंग निकालने के चक्कर में यदि यह छड़ तारों से छू गई तो तुम अभी यहीं करेंट लगने से मर  जाओगे।दो चार रुपए की पतंग के लिए तुम अपनी जान खतरे में क्यों डाल रहे हो ? '
    'हाँ भैया गलती हो गई ...मैं ने यह तो सोचा ही नहीं था पर मैं अभी मरना नहीं चाहता। मेरे छोटे भाई को पोलियो है, आज वह पतंग के लिए जिद्द कर रहा था ...मैं ने सोचा उसके लिए पतंग ले जाऊँगा तो  वह खुश हो जाएगा ।'
 "तुम्हारे घर में कौन कौन है ?'
 "माँ है ,बापू हैं,एक छोटा भाई है । माँ दो घरों का खाना बनाती है...बापू केले की बंडी लगाते हैं।पर  उनको  शराब पीने की लत है ,वह घर में खर्च को कुछ नहीं देते और हम लोगों को बहुत मारते पीटते  हैं।'
 "तुम स्कूल जाते हो ? '
 "हाँ ,पास के सरकारी स्कूल में चौथी कक्षा में पढ़ता हूँ।पहले मैं खाली समय में एक दुकान में काम भी करता था पर जब से सरकार ने बच्चों से काम कराने पर रोक लगाई है  तब से मेरी नौकरी चली  गई है।.. फिर भी चुपके से दो घरों में कार साफ करने का काम अभी भी कर रहा हूँ।'


 "ठीक है मैं पापा से बात करता हूँ, हमारी कार गैराज में रहती हैं किसी को पता भी नहीं चलेगा कि   उसकी सफाई कौन करता है। तुम एक दो दिन बाद आना ।'
 "भैया आप तो बहुत अच्छे हो, अब मैं चलूँ.... दो दिन बाद आऊँगा ।'
  तुम्हारा नाम क्या है ?'
 "शंकर '
 वरुण को अचानक मम्मी की एक बात याद आ गई। उसने कहा"--" शंकर तुम दो मिनट यहीं रूको ,मैं अभी आता हूँ।'
वरूण ने अन्दर से पाँच छह पतंगे और डोर लाकर उसे देते हुए कहा --" लो यह अपने भाई को दे  देना  पर उस से कहना वह इन्हें सड़क पर नहीं, किसी सुरक्षित जगह से उड़ाए ।'
 पतंगें पाकर शंकर के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई।
 खिड़की में से मम्मी यह सब देख कर बहुत खुश हो रही थीं।

 
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शनिवार, 24 दिसंबर 2016

छाले अब नहीं

बाल कहानी                
                        
छाले अब नहीं

                                                
                                                             पवित्रा अग्रवाल

              दीपू के मुँह में फिर छाले निकल आए थे। तीन दिन से वह ढंग से खाना भी नहीं खा पा रहा। डॉक्टर के पास जाने से अब उसे डर लगता है।
 पहले जब छाले होते थे तो डॉक्टर खाने की गोलियाँ लिख देते थे। बी-कॉम्पलैक्स     की उन गोलियों से उसके छाले ठीक भी हो जाते थे। गोलियों से जब कोई फायदा नहीं हुआ तो डॉक्टर ने हर बार यही कहा कि "बेटा, आपको साग-सब्जी खूब खानी चाहिए। तुम्हारी मम्मी कह रही थीं कि तुम कोई सब्जी नहीं खाते हो। यही आपके छालों का कारण है... छाले बार-बार होते रहेंगे। सुई कब तक लगवाते रहोगे ? जल्दी-जल्दी छाले होना अच्छी बात नहीं है। इससे मुँह में कैंसर भी हो सकता है।'
    जब डॉक्टर समझाते तो सात-आठ दिन वह खूब सब्ज़ियाँ खाता था। छाले ठीक होते ही फिर वह डॉक्टर की हिदायत भूल जाता था।
      माँ रोज गुस्सा होती हैं -" दोनों टाइम दाल-चावल खाना चाहता है। सब्जी तो खाना ही नहीं चाहता। रोटी-पराठे खाता है तो वह भी अचार के साथ। इस बार मैं तेरे साथ डॉक्टर के पास नहीं जाऊँगी। अकेला जा और सुई लगवा कर आ।'
 डॉक्टर के पास जाने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी। पहले तो वह डाँटेंगे कि सब्ज़ियाँ खानी क्यों छोड़ दीं ? दूसरी बात फिर इंजेक्शन लगाने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। जिससे उसे बहुत डर लगता है। तीन दिन और इसी तरह निकल गए। छाले बढ़ते ही जा रहे थे। मम्मी उसके आग्रह पर हरी सब्जी भी बना रही थीं किंतु छालों की वजह से वह कुछ नहीं खा पा रहा था। मम्मी इस बार बहुत सख्त हो गई थीं। डॉक्टर के पास उसके साथ जाने को तैयार नहीं थीं। उसका मन रोने को करता  किंतु रो भी नहीं पाता था, क्योंकि छोटी बहन उसे चिढ़ाती थी कि "भैया लड़का होकर रोता है।"
   आखिर उसने माँ से प्रार्थना की - "मम्मी, इस बार आप मेरे साथ डॉक्टर के पास चलो। मैं वायदा करता हूँ आप जो भी सब्जी बनाएँगी रोज दोनों टाइम खाया करूँगा। बस आप एक काम करना जब मैं सब्जी नहीं खा रहा होऊँ तो आप मुझे छालों की याद दिला देना।'
      फिर माँ उसे डॉक्टर के पास ले गई। उसने डॉक्टर से भी पक्का वायदा किया कि "अब मैं रोज सब्जी खाया करूंगा ।' डॉक्टर के इलाज से छाले ठीक हो गए।
    अब कई महीनों से उसे छाले नहीं हुए हैं। वह रोज सब्जी खाता है। वह समझ गया है कि दवाएँ खाने व इंजेक्शन लगवाने से अच्छा सब्ज़ियाँ खाना है। कभी वह सब्जी खाने में आनाकानी करता है तो मम्मी याद दिला देती है। मम्मी से पहले नटखट नन्हीं बहन जूही याद दिला देती है, "भैया, सब्जी नहीं खाओगे तो छाले हो जाएँगे। फिर आप सुई लगवाने में रोएँगे।'
     अब सब्जी खाने की उसकी आदत पड़ गई है। बहुत दिनों से वह डॉक्टर के पास  नहीं गया है।

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शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

चिड़िया मैं बन जऊँ

बाल कहानी
                            चिड़िया मैं बन जाऊँ


                                                          -पवित्रा अग्रवाल

              सपना अभी स्कूल से लौटी थी। रोज की तरह उसे बहुत भूख लगी थी। आते ही बोली- "मम्मी बहुत जोर से भूख लग रही है, जल्दी से कुछ खाने को दो न ! '
           मम्मी ने कहा, "तुम हाथ मुँह धोकर कपड़े बदलो। इतनी देर में मैं खाना परोस देती हूँ।'   झटपट सपना ने कपड़े बदले और ड्राइंगरूम में टीवी खोल कर सोफे पर बैठ कर खाना खाने लगी।
     तभी मम्मी आ गई, "सपना यह क्या तरीका है। आते ही जूते कहीं डाले। स्कूल बैग ड्राइंग रूम में पटक रखा है। स्कूल ड्रेस बाथरूम के बाहर पड़ी है। रोज समझाती हूँ कि आते ही अपनी चीजें जगह पर रखो। बेटा मैं भी थक जाती हूँ। तुम मेरी मदद नहीं कर पातीं कोई बात नहीं कम-से-कम मेरे लिए काम तो मत बढ़ाओ। सुबह स्कूल जाते समय फिर शोर मचाती हो कि मोजा नहीं मिल रहा, टाई नहीं मिल रही, कभी जूते नहीं मिल रहे।.... सुबह मैं तुम्हारा टिफिन तैयार करूँ या तुम्हारा सामान ढूँढ़ूँ ?...'
      सपना का लटका मुँह देख कर मम्मी ने पुन: कहा -- "मुझे मालूम है तुम्हें मेरा बोलना अच्छा नहीं लग रहा। आखिर कब तक न बोलूँ ? इतनी बार कहा है खाना ड्राइंग रूम में नहीं, डाइनिंग टेबल पर बैठ कर खाओ। तुम्हें देखकर दूसरे बच्चे भी फिर यहीं खाना चाहते हैं।'
    'मम्मी अभी तो आई हूँ। अभी सब सामान जगह पर रख दूँगी। मेरी पसंद का टीवी प्रोग्राम आ रहा था, इसीलिए खाना यहाँ ले आई।'
 "बेटा ये तो रोज की बात है...।'
    खाना खाते हुए सपना की नजर एक चिड़िया पर पड़ी। वह बरांडे में रखे हुए गेहूँ के दाने चुग रही थी। उसे देखकर सपना सोचने लगी- हमारा भी क्या जीवन है। घड़ी की सुई की तरह बस चलते ही रहो। कितने बंधन हैं... ये करो.. वो मत करो। यहाँ जाओ, वहाँ मत जाओ। खेलने का कितना मन करता है, किंतु होम वर्क पूरा न होने पर स्कूल में सजा मिलती है। स्कूल में टीचर्स के हिसाब से चलना पड़ता है और घर में ये मम्मी-पापा टोका-टाकी करते रहते हैं। हम से अच्छा जीवन तो इन चिड़ियों का है। न माता-पिता की डाँट, न स्कूल, न होम वर्क। अपनी मर्जी की मालिक हैं। इस पेड़ से उस पेड़ पर फुदकती-फिरती हैं। जहाँ दाना देखा उतर कर खा लिया। जहाँ पानी मिला पी लिया। जब मन हुआ तो ऊँचे आकाश में उड़ान भर ली। काश मैं भी चिड़िया होती, कितना मजा आता।
     यही सब सोचते हुए उसने होम वर्क किया। अपना सामान जगह पर रखा। अपना कमरा ठीक किया। रात का खाना खाया और जल्दी ही सोने के लिए बिस्तर पर चली गई। सोते समय भी वह गुनगुना रही थी- 

 चिड़िया मुझे बना दे राम, सुंदर पंख लगा दे राम।                     नील गगन में उड़ जाऊँ, हाथ किसी के न आऊँ।
        उसने देखा वह सचमुच चिड़िया बन गई है। सुंदर-सुंदर दो छोटे से पंख भी निकल आए हैं। पंख देखते ही उसने सोचा क्या वह उड़ पाएगी ? और वह सचमुच उड़ने लगी। ठंडी मंद पवन चल रही थी। नीले आकाश में दूर-दूर तक उड़ान भरते हुए वह बहुत खुश थी। उसे सब कुछ बहुत नया-नया और अच्छा लग रहा था। थोड़ी देर में वह थकान अनुभव करने लगी। भूख भी लग आई थी।
      वह दाने की तलाश में घरों के ऊपर उड़ने लगी। एक छत पर उसने देखा कि दाल सूख रही है। वह दाना चुगने के लिए छत पर उतरने ही वाली थी कि एक महिला दाल उठा कर घर में ले गई .        

     उसने फिर उड़ान भरी उसे कहीं कुछ नहीं मिल रहा था। तभी एक छत पर उसे चावल रखे हुए दिखाई दिए। छत पर उतर कर उसने तीन-चार दाने ही खाए थे कि वहाँ एक बिल्ली आ गई। बिल्ली ने उस पर झपट्टा मारा किंतु किसी तरह वह जान बचा कर उड़ गई।
    अब वह बहुत डर गई थी । उसने सोचा पक्षियों का जीवन भी इतना आसान तो नहीं है, जितना दूर से देखने पर लगता है। उन्हें भी पेट भरने के लिए बड़े खतरे उठाने पड़ते हैं। कभी भूखा प्यासा भी रह जाना पड़ता है। वह थक कर एक पेड़ पर बैठ गई। वहाँ भी उसे एक बिल्ली दिखाई दी। अरे पक्षियों का जीवन तो बहुत असुरक्षित है। ये बिल्ली तो हर जगह पहुँच सकती है।
      तभी उसे ध्यान आया कि उसने कई बार अपने बगीचे में चिड़िया व कबूतर के पंख पड़े देखे हैं। घायल चिड़िया भी देखी है। ये जरूर बिल्ली के शिकार हुए होंगे। यहाँ से भी उड़ना पड़ेगा वर्ना बिल्ली दबोच लेगी। अब कहाँ जाऊँ ? भूख भी लगी है।                    उसे पछतावा हो रहा था कि वह तो अच्छी भली लड़की के रूप में मम्मी-पापा के साथ  रह रही थी। बेकार में ही चिड़िया बन गई।       जब वह बहुत परेशान हो गई तो मम्मी-पापा की याद आई। अरे उसकी सब परेशानियाँ तो मम्मी-पापा चुटकी बजाते ही हल कर देते हैं। उन्हीं के पास जाती हूँ वहीं  खाना खिलाएँगे और बिल्ली से भी बचाएँगे।
      वह उड़कर अपने घर के आँगन में जा बैठी तभी उसका प्यारा टोमी उस की तरफ लपका। वह डर कर किवाड़ पर बैठ गई। उसने देखा मम्मी रो रही थीं। पापा परेशान थे। छोटा भाई उसे सहेलियों के घर ढूँढ़ कर लौटा था। उसने कहना चाहा मम्मी मैं आपकी बेटी सपना हूँ किंतु ये क्या,वह तो चीं चीं करके चिड़िया वाली बोली बोल रही है। मम्मी उसकी बात कैसे समझ सकती हैं। उसने मम्मी के कंधे पर बैठ कर खाना माँगना चाहा किंतु मम्मी ने उसे हाथ से उड़ा दिया।
   अब तो उसे रोना आने लगा था। वह अपनी गलत सोच पर पछता रही थी। मानव जीवन तो सब से श्रेष्ठ है। हे भगवान मुझे फिर से सपना बना दें। मैं चिड़िया बने रहना नहीं चाहती। मेरे मम्मी-पापा बहुत अच्छे हैं। मैं फिर से लड़की बनना चाहती हूँ। उसके रोने की आवाज सुनकर मम्मी दौड़ी-दौड़ी आई- "सपना, तू क्यों रो रही है...? कोई बुरा सपना देखा क्या ?'
 मम्मी की आवाज सुनकर उसने आँखें खोल दीं। अरे वह तो अपने घर में अपने बिस्तर पर सो रही थी। वह सपने में चिड़िया बनी थी ,सचमुच मैं नहीं।
 वह खुश होकर मम्मी से लिपट गई।    


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रविवार, 16 अक्तूबर 2016

यादगार दीपावली

 बाल कहानी
                                 यादगार दीपावली
     
                                                             पवित्रा अग्रवाल


        मेरे दोस्त नन्दू के पिता पटाखों का व्यापार करते हैं। उनका थोक का काम है। एक बार मुझ से नन्दू ने कहा था -"जब पटाखे लेने हों तो मेरे साथ चलना, मैं पापा से कह कर सस्ते दिलवा दूँगा।बाजार में यही पटाखे दुगनी कीमत पर मिलेंगे।'
     मैं ने पटाखों के लिए दो सौ रुपये मम्मी से लिए और दो सौ रुपये मैं ने अपने जेब खर्च में से बचाए थे।वह भी जेब में रख कर नन्दू के घर की तरफ चल दिया।
     नन्दू के घर एक औरत ( जो मुझे उनकी काम वाली लग रही थी ) बैठ कर रो रही थी और नन्दू की बहन से तीन सौ रुपये उधार मॉग रही थी। नन्दू की बहन ने कहा--"बाई बच्चे को सरकारी दवाखाने में ले जाना चाहिए था।वहाँ डॉक्टर की फीस भी नहीं देनी पड़ती और इलाज भी मुफ़्त में हो जाता।जब इलाज के लिए रुपये नहीं थे तो प्राइवेट अस्पताल में बच्चे को क्यों भरती करवा दिया ?'
          "बिटिया ,पहले मैं सरकारी अस्पताल में ही गई थी। वहाँ डॉक्टर साहब नहीं थे, उनका इंतजार करती तो मेरा बेटा मर जाता....उसकी हालत बहुत खराब है। उसे सुबह से उल्टी और दस्त हो रहे हैं। मैं काम पर गई हुई थी। घर जा कर जब उसकी हालत देखी तो घबरा गई और जल्दी से अस्पताल ले कर भागी...मजबूरी में मुझे प्राइवेट अस्पताल ले जाना पड़ा।डॉक्टर साहब ने पर्चा लिख कर दवाएँ जल्दी लाने को कहा है ,उसे ग्लूकोस चढ़ाना है..बिटिया मुझे जल्दी से तीन सौ रुपये दे दो,बहुत मेहरबानी होगी ।'
     "देखो बाई मैं तुम से पहले भी कह चुकी हूँ कि इस समय मम्मी घर पर नहीं हैं।हमारे यहाँ काम करते अभी तुम्हें दस दिन हुए हैं।उन से बिना पूछे तुम्हें तीन सौ रुपये कैसे दे दूँ ? तुम इंतजार कर लो,मम्मी थोड़ी देर में आती होंगी।'
    "पर मैं इंतजार नहीं कर सकती।तब तक तो मेरा बेटा मर जाएगा..मैं जाती हूँ,कही दूसरी जगह कोशिश कर के देखूँगी।' वह आँसू पोंछती हुई घर से बाहर चली गई।
      मैं ने उसे रोक कर डॉक्टर का पर्चा दिखाने को कहा।उस ने मुझे वह पर्चा दिखाया ।पर्चा देख कर मुझे विश्वास हो गया कि वह झूठ नहीं बोल रही है, मैं ने कहा--"तुम मेरे साथ चलो,मैं दवाए अभी दिलवा देता हूँ फिर तुम्हारे साथ डॉक्टर साहब के पास भी चलूँगा।...तुम्हारे पति कहाँ हैं ?'
      वह लंबी आह भर कर बोली--"वह मज़दूरी करता है पर रोज काम नहीं मिलता।कभी मिलता भी है तो उसे शराब पीने में उड़ा देता है।सुबह का गया रात को नशे में धुत्त हो कर लौटता है...नाम का पति है।उस की रोटी का जुगाड़ भी मुझे ही करना पड़ता है।'
     दवाएँ ले कर हम अस्पताल पहुँचे तो कम्पाउडर बोला --"तुमने बहुत देर कर दी..'
     "तो क्या मेरा बेटा....'
  "परेशान मत हो,तुम्हारा बेटा ठीक है।डॉक्टर साहब ने अपने पास से इंजक्शन लगा दिया है और ग्लूकोस भी चढाया जा रहा है।'
     "क्या करती साहब ,घर में एक पैसा नहीं था। कहीं से इंतजाम भी नहीं कर पाई।देवदूत की तरह यह बच्चा मुझे मिल गया।मेरा दुखड़ा सुन कर इसी ने मुझे सब दवाएँ खरीद कर दी हैं।मैं तो इसे जानती भी नहीं हूँ और न ये मुझे जानता है। ये दीपावली के लिए पटाखे खरीदने बाजार जा रहा था ,उन रुपयो से इस बच्चे ने मुझे दवाएँ दिलवा दीं।...देखो न मैं भी कितनी स्वार्थी हूँ... अभी तक इस बच्चे का नाम भी नहीं पूँछा -- "बेटा तुम्हारा नाम क्या है ?'
    "मेरा नाम अभिषेक है, प्यार से सब मुझे अभि कह कर पुकारते हैं।'
  कम्पाउडर ने कहा -- "शाबाश अभिषेक, तुम बहुत अच्छे हो।....क्या तुम्हारे घर में अब डाँट नहीं पड़ेगी ?'
      "कम्पाउडर साहब,ये रुपये तो कल तक पटाखे - बम के रूप में जल कर धुआँ बन जाते। मम्मी कहती हैं कि आतिशबाजी धन की बरबादी तो है ही ,इस से प्रदूषण भी फैलता है।जलने व आग लगने का खतरा भी बना रहता है। उनसे नुकसान ही नुकसान है,फायदा एक भी नहीं।मेरे इन रूपयो का उपयोग देख कर मम्मी बहुत खुश होंगी।'
    बचे हुए रुपये मैं ने बाई को देते हुए कहा-"ये रुपये तुम रख लो,अभी तुम्हें इन की जरूरत पड़ सकती है।तुम्हारा बेटा अब ठीक है,मैं जा रहा हूँ।'
      "बेटा तुम्हारे ये रुपये मुझ पर उधार हैं।मैं थोड़े-थोड़े कर के तुम्हें लौटा दूँगी । तुम नन्दू के दोस्त हो न ? मैं उन के घर काम करती हूँ।'
  "ठीक है।'
   घर में प्रवेश करते ही माँ ने पूँछा--"तू तो पटाखे लेने गया था,खाली हाथ क्यों लौट आया ?'
  "माँ आप कहती हैं न कि पटाखे छुड़ाना रुपयों का धुआँ उड़ाने के समान है। मैं ने आज उन रुपयों से एक गरीब बीमार बच्चे को दवा दिला दी है।सच माँ वह रुपये एक गरीब माँ के आँसू पोंछने के काम आए हैं। यह दीपावली बिना पटाखों के मनाने का मुझे जरा भी मलाल नहीं होगा बल्कि यह दीपावली मुझे हमेशा याद रहेगी।'
  पूरी बात सुन कर मेरी माँ की ऑखों में भी स्नेह के दीप जल उठे।


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गुरुवार, 29 सितंबर 2016

बाल कहानी                    
 

                    जिद्दी टिन्नी

 
                                              पवित्रा अग्रवाल
                                 
                                                                                   
       जब से दादी आई है मानसी के मजे आगये हैं.हर समय   एक ही फरमाइश–‘दादी एक कहानी सुनाओ न .’
‘ ठीक है मानसी पर यह अंतिम कहानी सुना रही हूँ.'

    'ठीक है दादी
'तो सुनो–  एक लड़की थी .उसका नाम टिन्नी था .’
‘दादी टिन्नी उसके घर का नाम था या स्कूल का ?’
‘घर का, घर में सब उसे टिन्नी कह कर बुलाते थे .’
‘और स्कूल में उसका क्या नाम था ?’
‘स्कूल में उसका नाम टीना था . वह मम्मी पापा की अकेली बेटी थी .’
‘मेरी तरह वह भी अकेली थी ?...उसके कोई भाई बहन नहीं था ?’
   ‘हाँ वह अकेली थी .मम्मी पापा उसको बहुत प्यार करते थे इसलिए वह बहुत जिद्दी हो गई थी .वह जो मांगती थी उसे सब एक बार में मिल जाता था .कभी उसका कहा पूरा नहीं होता था तो वह जोर जोर से रोती  थी और कहती थी आप लोग बहुत गंदे हो ,मुझे प्यार नहीं करते .’
   ‘अच्छा टिन्नी ऐसा कहती थी ,मै तो मम्मी पापा से ऐसा कभी नहीं कहती .फिर क्या हुआ दादी ?’
   ‘एक दिन टिन्नी स्कूल से बहुत खुश खुश आई और मम्मी को बताया ‘आज मेरी सहेली तारा का बर्थ डे है .शाम को हमें उनके घर जाना है.’
मम्मी ने कहा -‘टिन्नी आज मेरी तबियत बहुत ख़राब है आज मै नहीं जा पाऊँगी ’
‘आप नहीं जाओगी तो मै कैसे जाउंगी?कुछ भी हो मुझे तो जरुर जाना है कह कर वह जोर जोर से रोने लगी...आप कोई भी मुझे प्यार नहीं करते ...मै जरुर जाउंगी '.
‘फिर वो गई दादी ?’
   ‘हाँ उसकी मम्मी की तबियत बहुत ख़राब थी पर उसे  रोता देख कर उन्हें जाना पड़ा.वहां जाकर मम्मी को  बुखार और तेज हो गया, उनको वोमिटिंग भी होने लगी .मम्मी ने पापा को फोन करके बुलाया .पहले तो पापा गुस्सा हुए की तबियत ख़राब थी तो बर्थ डे में नहीं आना चाहिए था .फिर पापा मम्मी को लेकर हॉस्पिटल गए .वहां डॉक्टर ने मम्मी को भर्ती कर लिया ’                            
'भर्ती  करना क्या होता है दादी ?’
    ‘भर्ती  करना यानि एडमिट कर लिया और कहा दो – तीन दिन उनको हॉस्पिटल में ही रहना पड़ेगा पर बच्चों को हम अन्दर नहीं आने देते .इस लिए आप की बेटी यहाँ नहीं रह सकती .’
    ‘बच्चों को वहां क्यों नहीं रहने देते दादी ?’
‘अस्पताल में बहुत तरह के बीमार रहते हैं.बच्चों को इन्फेक्शन न हो जाये, इसी लिए बच्चों को नहीं आने देते .’
‘उसके पापा को भी तो इन्फेक्शन हो सकता है, उनको क्यों आने दिया ?’
‘मानसी , बच्चों को इन्फेक्शन जल्दी होता है इस लिए नहीं आने देते .’
‘दादी फिर टिन्नी कहाँ रही ?’
‘टिन्नी को उसके पापा उसके चाचा चाची के घर छोड़ आये.’
‘चाचा-चाची किस को कहते हैं दादी ?’
‘पापा के छोटे भाई को चाचा कहते हैं’
‘दादी मेरे चाचा नहीं हैं ?’
‘तुम्हारे पापा के कोई भाई नहीं है, इसलिए तुम्हारे कोई  चाचा नहीं है’
‘मेरी मम्मी बीमार हो गई तो दादी मै कहाँ रहूंगी ?’
‘मानसी मुझे बहुत जोर से निन्नी आ रही है,बीच बीच में तुम इसी तरह सवाल पूछती रही तो कहानी पूरी कैसे होगी ?’
‘ठीक है दादी अब नहीं बोलूंगी ,आप पूरी कहानी सुना दो.’
 ‘मै तो यह भी भूल गई कि मै ने कहानी कहाँ तक सुनाइ थी?’
‘टिन्नी को उसके पापा चाचा-चाची के पास छोड़ कर चले गए .दादी वो साथ जाने को रोई नहीं ?’
‘टिन्नी खूब रोई पर पापा को गुस्सा आगया बोले चलो अपने घर, रात को वहां अकेली रहना,मै सुबह आ जाऊंगा.’ 
‘फिर क्या हुआ दादी ?                                                                                                                                       ‘टिन्नी  ने रोना बंद कर दिया और कहा ठीक है पापा आप जाओ ,सुबह जल्दी आजाना .फिर टिन्नी की  चाची ने उसे खाना खिलाया और प्यार से समझाया की अच्छे बच्चे जिद्द नहीं करते हैं .बताओ जब तुम्हारी मम्मी की तबियत ख़राब थी तो तुमने उन्हें घर में आराम क्यों नहीं करने दिया ?’
  टिन्नी ने कहा --‘मम्मी नहीं जातीं तो मैं भी बर्थ डे में  नहीं जा पाती.’
 चाची ने समझाया - ‘टिन्नी  जब तुम्हें बुखार आता है तो मम्मी तुम्हें स्कूल भेजती हैं ?...नहीं भेजती न ? ...इसी तरह जब मम्मी बीमार थीं तो तुमको कहना चाहिए था कि मम्मी आप आराम करिए, बर्थ डे में नहीं जाऊंगी.कहना चाहिए था न?’
‘हाँ चाची मुझसे गलती हो गई .आगे से जिद्द नहीं करूंगी .’
चाची ने कहा –‘ गुड गर्ल , चलो अब जल्दी से सो जाओ .हो सकता है मम्मी कल सुबह ही आजायें . ‘
‘दादी फिर टिन्नी की मम्मी सुबह आगई थीं ?’
‘हाँ आगई थीं , अब तुम भी जल्दी से सो जाओ मानसी, दादी को भी बहुत जोर से नींद आरही है .’
‘गुड नाइट दादी ,अब आप वापस मत जाना दादी .मम्मी बीमार हुई तो मैं किस के पास रहूंगी ,मेरे तो चाचा –चाची यहाँ कोई भी नहीं रहते हैं.’
‘ ठीक है , अब तुम सो जाओ और दादी को भी सोने दो .बाकी  बात कल  करेंगे ,गुड नाईट मानसी ‘
‘गुड नाईट दादी .’     
                                                                                          

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