शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

पिंकी के नखरे

बाल कहानी 
                 पिंकी के नखरे                                                     पवित्रा अग्रवाल

            एक लड़की थी । उसका नाम पिंकी था । वह बहुत जिद्दी हो गई थी । मम्मी जब भी कहीं बाहर जातीं तो वह कपड़े पहनने में बहुत रोती थी ।मम्मी पहनने को जो भी कपड़े निकालतीं वह उन्हें उठा कर दूर फेंक देती थी। यह ड्रेस नहीं पहननी, इसमें बटन हैं मुझे बटन वाले कपड़े अच्छे नहीं लगते ।....मुझे यह कलर पसन्द नहीं है, यह भी अच्छी नहीं है ,वह भी अच्छी नहीं है।
 अब पिंकी की  मम्मी ने नए नए कपड़े लाने बन्द कर दिए क्यों कि पिंकी को कोई भी पसन्द नहीं आते थे । एक दिन पिंकी ने कहा -" मम्मी आज मेरी  फ्रेण्ड नीलू की बर्थ डे हैं ,शाम को वहाँ जाना है।'
 शाम को मम्मी ने बहुत सुन्दर फ्राक निकाल कर पहनने को दी पर फ्राक देख कर पिंकी ने उसे हटा दिया। मुझे यह नहीं पहननी। मम्मी ने तीन ड्रेस और निकाल कर दी और कहा इनमें से जो पसन्द है वह पहन लो पर पिंकी को कोई भी अच्छी नहीं लगी ,वह रोने लगी मुझे यह नहीं पहनना ।वह रोज जो कपड़े पहनती थी उनमें से एक ड्रेस लाकर बोली "यह पहननी है '
 "मम्मी ने कहा बेटा यह पार्टी में पहनने की नहीं हैं ...बहुत खराब लग रही है ।'
पर पिंकी ने रोना बन्द नहीं किया ।मम्मी ने वही ड्रेस पहना दी फिर वह जूते पहन ने में रोने लगी ये जूते अच्छे नहीं है, वह जूते अच्छे नहीं हैं । मम्मी ने उसकी पसन्द के पुराने जूते ही पहना दिए। फिर वह मम्मी के साथ नीचे पार्टी में चली गई।नीलू ने बहुत सुन्दर नीले रंग की फ्राक पहन रखी थी, नए जूते पहने थे उसका घर फूलों से और बैलून से बहुत सुन्दर सजाया गया था। पिंकी के बहुत सारे दोस्त रिषभ ,सोनम, मीता,आकाश वहाँ आ गए थे । सब ने पिंकी को देखा तो कहा अरे पिंकी तू इतनी खराब ड्रेस पहन कर क्यों आई है ?आन्टी इसके पास अच्छे वाले कपड़े नहीं हैं क्या ?'
 "बेटा इस पर बहुत सारे नए और अच्छे अच्छे कपड़े हैं पर उसने कोई भी नहीं पहने। अपनी पसन्द से यह कपड़े पहन कर आई है।'
 "पिंकी तू तो सबसे गंदी लग रही है।जा, जाकर अच्छे वाले कपड़े पहन कर आ तो तू भी हम सब की तरह सुन्दर लगेगी । पिंकी ने एक बार सब के कपड़े देखे फिर उसने अपने कपड़े देखे । पिंकी मम्मी के पास जाकर बोली "मम्मी घर चलो '
  "नहीं बेटा अभी तो नीलू केक काटेगी फिर सब  हैप्पी बर्थ वाला गाना गाएंगे फिर बच्चे नए नए गेम खेलेंगे उसके बाद पार्टी होगी ,तब सब घर जाएगे।'
 "मम्मी मुझे अच्छे वाले कपड़े पहनने हैं, जूते भी दूसरे पहन ने हैं ,जल्दी घर चलो ।'
 "तेरे पास तो अच्छे कपड़े हैं नहीं, तू क्या पहनेगी ?'
 "मेरे पास भी अच्छे अच्छे कपड़े हैं,मुझे भी इन जैसे अच्छे कपड़े पहना दो ।'
 "ऊपर जा कर तू फिर रोएगी ?'
 "नहीं रोऊँगी, मम्मी आप अच्छी वाली पहना देना ।'
 "पिंकी जब दूसरी ड्रेस पहन कर आई तो सभी बच्चों ने कहा वाह पिंकी के कपडे तो बहुत अच्छे हैं...इन्हें  कौन लाया ? '
 "मेरी मम्मी ।'
  नीलू की मम्मी ने कहा - " पिंकी तुम्हारी मम्मी तो बहुत अच्छी ड्रेस लाती है । तुम गुड गर्ल हो न...अब मम्मी की लाई सब ड्रेस पहनना, उन्हें गन्दा तो नहीं कहोगी ?
 " नहीं कहूँगी, आन्टी अब रोऊँगी भी नहीं।सब कपड़े पहनूँगी ।'
         "गुड गर्ल,...चलो बच्चों नीलू को बुलाओ अब केक काटते हैं ।'
केक काटने की बात सुनते ही चहकते हुए सब बच्चे केक के पास इकट्ठे हो गए थे .
-- 
-पवित्रा अग्रवाल
 मेरे ब्लोग्स ---

शनिवार, 9 मार्च 2019

रंग भरा गुब्बारा

बाल कहानी  
                          रंग भरा गुब्बारा 
                                                - पवित्रा अग्रवाल

होली के दूसरे दिन सुबह यश जल्दी उठ गया। उसे अखबार का इंतजार था। रोज अखबार सुबह छह बजे तक आ जाता था। सात बजे तक नहीं आया तो उसे ध्यान आया कि आज तो समाचार पत्र नहीं आते।...वह बेचैन हो उठा।...पता नहीं कल जो आदमी स्कूटर से गिरा था, उसका क्या हाल है। यदि मामूली चोट लगी होगी तो अखबार में उसका जिक्र नहीं होगा। यदि हालत गंभीर होगी या मौत हो चुकी होगी तो समाचार पत्र में न्यूज अवश्य आएगी।
यश पूरे दिन परेशान रहा। दूसरे दिन उठते ही सबसे पहले उसने समाचार पत्र लेकर वह पृष्ठ खोला, जिसमें दुर्घटना आदि के समाचार छपते हैं। तभी उसकी नजर एक समाचार पर रुक गई। उसमें लिखा था "एक शरारती बच्चे द्वारा रंग भरा गुब्बारा फेंकने से चालीस वर्षीय सुमेर स्कूटर पर संतुलन खो बैठने से गिर पड़े। उनके सिर में गंभीर चोट आई है। हालत नाजुक है।'
समाचार पढ़ कर यश रो पड़ा। यद्यपि वह घायल आदमी न उसका रिश्तेदार था और न कोई परिचित। उसने अंदाजा लगाया कि वह पापा की उम्र का ही होगा। मेरी उम्र के उसके भी बेटे-बेटी होंगे, पत्नी होगी। हो सकता है बूढ़े माँ-बाप भी हों। हो सकता है वह घर में कमाने वाला अकेला  व्यक्ति     हो....यदि उसे कुछ हो गया तो उसके परिवार का क्या होगा।...होली पर की गई मेरी ये छोटी सी शरारत किसी के लिए जान लेवा साबित हो सकती है ऐसा तो मैंने सोचा भी नहीं था।
परसों होली वाले दिन छोटे गुब्बारों में रंगीन पानी भरते देख कर मम्मी ने टोका था,  -"यश, सीधे-साधे रंगों से होली खेलना। राह चलते लोगों पर ये गुब्बारे मत फेंकना। इससे किसी को चोट लग सकती है, कोई दुर्घटना भी हो सकती है।'
"कुछ नहीं होता मम्मी आप तो वैसे ही डरती हैं।'
     उसकी बात सुने बिना ही मम्मी दूसरे कमरे में चली गई थीं। यश रंगों की पुड़िया, पिचकारी व गुब्बारे लेकर अपने दोस्तों के घर की तरफ चल दिया था। बहुत जल्दी उसके रंग समाप्त हो गए थे और रंग लेने के लिए वह अपने घर की तरफ लौट रहा था। उसके हाथ में एक गुब्बारा बचा था। स्कूटर पर जाते हुए एक आदमी पर उसकी नजर पड़ी। उसे ताज्जुब हुआ कि उसके ऊपर किसी ने भी रंग क्यों नहीं डाला। बस हाथ का गुब्बारा उसने स्कूटर वाले पर उछाल दिया था।...उस आदमी को स्कूटर के साथ गिरते देख कर वह डर गया और भाग कर अपने घर आ गया। उसे किसी ने शायद गुब्बारा फेंकते नहीं देखा था।
मम्मी ने उसे टोका भी था कि 'अरे आज तो तू बड़ी जल्दी होली खेल कर घर आ गया।'
"हाँ मम्मी सिर में थोड़ा दर्द है।'
मम्मी ने माथे पर हाथ लगा कर देखा फिर कहा, "बुखार तो नहीं है।...पानी गर्म कर देती हूँ, जल्दी से नहा-धो ले। अभी तो रंग छुड़ाने में ही आधा घंटा लगेगा...फिर खाना खाकर थोड़ी देर सो जाना।'
उसे कई दोस्त बुलाने आए। "उसके सिर में दर्द है' कह कर मम्मी ने उन्हें बाहर से ही लौटा दिया।
कल भी पूरे दिन वह परेशान रहा। मम्मी ने कारण पूछा तो वह बोला "कुछ नहीं मम्मी, परीक्षा आ रही हैं न उसी की वजह से थोड़ा तनाव हो रहा है।'
आज अखबार में स्कूटर वाले की गंभीर हालत का समाचार पढ़ कर तो वह बहुत दुखी हो गया। जल्दी से तैयार हुआ। टिफिन बॉक्स बैग में रखा। मम्मी आवाज ही देती रह गई। वह बिना नाश्ता किए घर के बाहर बने मंदिर में गया। भगवान से स्कूटर वाले का जीवन बचाने की प्रार्थना की और स्कूल चला गया।
क्लास में लेट आने पर टीचर ने राहुल को बाहर खड़े रहने को कहा तो वह बोला,
      -" मैडम मेरे लेट होने की वजह सुन लें। फिर भी आप सजा देंगी तो मुझे मंजूर होगी।...मेरे ताऊ जी का होली वाले दिन एक एक्सीडेंट हो गया था। दो दिन से वह बेहोश थे।मैं पापा और ताई जी को हास्पिटल में चाय-नाश्ता दे कर आ रहा हूँ इसीलिए कुछ लेट हो गया।'
   "ठीक है अंदर आओ।...कैसे हो गया था एक्सीडेंट ? अब वे कैसे हैं ?'--टीचर ने पूछा
"होली वाले दिन स्कूटर चलाते हुए एक रंग भरा गुब्बारा उनके मुँह पर आकर लगा। संतुलन बिगड़ जाने से वह गिर पड़े थे।...आज वे होश में आए हैं।...अब खतरे से बाहर हैं ।' 
अनायास ही यश के हाथ जुड़ गए और उसके मुँह से निकला "थैंक गॉड।'
बराबर में बैठे छात्र ने चौंक कर पूछा "तुझे क्या हुआ ?'
   "कुछ नहीं उसके ताऊजी खतरे से बाहर हैं यह जान कर अच्छा लगा।' 
टीचर ने पढ़ाना शुरू कर दिया था किंतु यश का ध्यान पढ़ने में नहीं था।...वह बहुत खुश था उसकी वजह से जो व्यक्ति दुर्घटना का शिकार हो गया था, उस व्यक्ति का जीवन अब बच गया है वर्ना वह कभी अपने को माफ नहीं कर पाता। उसने मन ही मन कसम खाई कि इस तरह की होली अब वह कभी नहीं खेलेगा और दोस्तों को भी नहीं खेलने देगा।


                                -- 
-पवित्रा अग्रवाल
 

रविवार, 24 फ़रवरी 2019

खाली कागज का कमाल

बाल कहानी                
                      खाली कागज का कमाल      

                                                     पवित्रा अग्रवाल
 
 
                तुषार भूख से व्याकुल था। सुबह से चाय तक पीने को नहीं मिली थी। इस अनजान जगह में अपहरण करके लाए हुए चार दिन हो चुके थे किंतु वह अभी तक अपने उस अपहरणकर्ता को ढंग से पहचान भी नहीं पाया है। पहचाने भी कैसे, उसका लगभग आधा चेहरा तो बड़े फ्रेम के काले चश्मे में छिपा रहता है।
 मम्मी-पापा, पप्पू-सोनू, दादी माँ चार दिन से कितने परेशान होंगे। किसी से खाना भी नहीं खाया गया होगा। पापा ने शायद अखबार में फोटो निकलवाया होगा। थाने में भी रिपोर्ट लिखाई होगी। सोचते-सोचते वह फिर रोने लगा। वह भी कितना पागल था, जो बातों में आ गया। इस तरह अपहरण करके ले जाने के कितने क़िस्से-कहानियाँ वह पढ़ता-सुनता रहा है फिर भी अपना अपहरण करा बैठा।
 हैड मास्टर साहब ने बुलाकर कहा था, "तुषार तुम्हारे घर से किसी का फोन आया है कि आज Aड्राइवर कार लेकर तुम्हें लिवाने नहीं आ सकेगा वे फैक्ट्री के रमेश नाम के नौकर को भेज रहे हैं, वह काला चश्मा लगाता है , तुमको पहचानता भी है, उसके साथ टैक्सी करके आ जाना।'
 छुट्टी के समय स्कूल के गेट पर पहुँचते ही काला चश्मा लगाए हुए एक आदमी आगे आया "चलिए छोटे साहब।'
 "तुमने मुझे कैसे पहचान लिया,...मैंने तो तुम्हें पहले कभी नहीं देखा।'
 "पहले मैं चश्मा नहीं लगाता था। कुछ दिन पहले आँख का ऑपरेशन करवाया है, तभी से लगाने लगा हूँ. इसीलिए आप नहीं पहचान पा रहे हैं।'
 "चलो जल्दी से टैक्सी पकड़ो। बहुत ठंडी हवा है, सर्दी लग रही है।'
 पास में खड़ी एक टैक्सी में वे बैठ गए थे जिसे एक सरदार जी चला रहे थे। तभी उसने चौंक कर कहा - "रमेश टैक्सी गलत रास्ते पर जा रही है।'
 "खैर चाहते हो तो चुपचाप बैठो, खबरदार जो शोर मचाया।'
 टैक्सी के चारों तरफ के शीशे बंद थे। चिल्लाने पर भी आवाज बाहर नहीं जा सकती थी। इसीलिए वह सहम कर चुप हो गया। न जाने कितनी सड़कें, चौराहे, गलियाँ, मोड़ पार करने के बाद एक सुनसान जगह कुछ खँडहरों के बीच टैक्सी उन्हें उतार कर चली गई। एक-दो घंटे बाद रात घिर आई थी। चारों तरफ गहरा अंधेरा था। एक-दूसरे को ठीक से देख पाना भी मुश्किल था। तब उसे बहुत पैदल चलना पड़ा, उसके बाद एक कोठरी में बंद कर दिया गया था।
 दरवाजे पर ताला खुलने की आवाज से उसका ध्यान भंग हुआ। उसने अंदाजा लगाया कि चश्मे वाला आदमी खाना लेकर आया होगा, दरवाजा खुलने के साथ ही हल्का सा प्रकाश भी कमरे में घुस आया।  उसकी नजर चश्मे वाले के पैरों पर पड़ी। उसके दोनों पैरों में छह-छह उँगली थीं।
 तभी उसे अपने घर में काम कर चुके एक नौकर रमुआ का ख्याल आया। उसने अपने मम्मी-पापा से सुना था कि उसके हाथ-पैरों में छह-छह उँगलियाँ थीं... रंग गोरा था, एक आँख की पुतली पर सफेदी फैली थी। जब वह स्वयं चार-पाँच वर्ष का था तभी अलमारी में से गहने निकालते हुए मम्मी ने रमुआ को पकड़ा था...पापा के आने तक वह भाग चुका था। रमुआ की उसे याद नहीं है पर अब वह चश्मे में छिपी उसकी आँखें देखना चाहता था।
 वह कागज में रोटी- सब्जी रख कर उसे खाने को दे गया था। दरवाजे में कई सुराख थे जिसमें से काफी रोशनी अंदर आ सकती थी किंतु उस पर बाहर से किसी कपड़े का पर्दा डाल दिया गया था जिससे  कमरे में अंधेरा रहता और वह बाहर भी नहीं देख सकता था।
 भूख उसे तेजी से लगी थी। मोटी-मोटी रोटियों को छूते ही उसे फिर माँ याद आ गई। माँ के हाथ के
बने करारे परांठे याद आ गए। मन न होते हुए भी उसने रोटी खाई व लोटे से पानी पी गया।
 अभी वह गिलास में चाय देकर बाहर निकला ही था कि कमरे में रोशनी की एक रेखा देखकर उसने किवाड़ की दरार से बाहर झाँका। वह आदमी चश्मा हाथ में लिए सरदार से बातें कर रहा था। यह देखकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा कि उसकी एक आँख खराब थी उसमें सफेदी फैली थी। उसने प्रसन्नता से अपनी पीठ स्वयं थपथपाई कि वह भी कहानी के पात्रों जैसा नन्हा जासूस हो गया है। तभी उसकी आशा पुन: निराशा में बदल गई। ठीक है उसने जासूसी करके अपहरणकर्ता का पता लगा लिया है, उसे पहचान लिया है लेकिन क्या फायदा.. यह जानकारी वह घर या पुलिसवालों तक कैसे पहुँचाए , पाँच दिन हो चुके हैं। किसी भी दिन यह मुझे मार डालेंगे। वह फिर सुबकने लगा।
 किवाड़ों पर हुई खटपट की आवाज सुनकर उसने सोचा, अभी तो वह चाय देकर गया था पुन: क्यों आ रहा है.. क्या पता कहीं दूसरी जगह ले जाए या हो सकता है मार ही दे।
 चश्मे वाले ने उसके हाथ में एक लिफाफा थमाया और कहा, "पेन तुम्हारे बस्ते में होगा, कागज भी होगा। अपने पापा को पत्र लिखो कि जिंदा देखना चाहते हैं तो माँगी हुई रकम बताई हुई जगह पर पहुँचा दें। पुलिस को बताने की कोशिश हर्गिज़ न करें वर्ना बेटे को हमेशा के लिए खो देंगे।'
    किसी के खाँसने की आवाज सुन कर वह बाहर जाते हुए बोला, "दरवाजे का पर्दा हटा देता हूँ, कमरे में रोशनी हो जाएगी। जल्दी से पत्र लिख दो, लिफाफे पर पता भी लिख दो..... मैं अभी आकर ले जाऊँगा।'
 "वाह बेटे, तुम तो बहुत तेज हो। जैसा मैंने कहा था वैसा ही लिख दिया। पत्र को खाली कागज में क्यों लपेट दिया है ?' उसने कागज को उलट-पलट कर देखते हुए कहा।
 "थोड़ी देर पहले आप कह रहे थे बादल हो रहे हैं, पानी बरस सकता है। इसीलिए पत्र को खाली कागज में लपेट दिया है। लिफाफा भीग भी जाए तो पत्र न भीगे। अक्षर मिट गए तो पापा पढ़ेंगे कैसे। फिर मुझे कैसे ले जाएँगे।'
 "शाबाश ठीक किया तुमने।'
 पत्र गए तीन दिन हो चुके थे। इस बीच वह सोते-जागते तरह-तरह की कल्पनाएँ करता रहा था। सपने में कभी उसे चश्मे वाला छुरा लिए अपनी तरफ आता हुआ दिखता। कभी सब बीमार माँ के पास बैठे हुए दिखाई देते। कभी उदास खड़े पापा दिखते, कभी रोती हुई बहन दिखती।
 तभी उसे एक तेज आवाज सुनाई दी- "तुषार... तुषार, तुम कहाँ हो'
     अरे यह तो पापा की आवाज है। वह चौंक कर उठा और दरवाजा पीटने लगा -" पापा मैं यहाँ हूँ, इस कोठरी में।'
 तभी ताला तोड़ने की आवाज आई। दरवाजा खुलते ही पहले दरोगा जी अंदर आए फिर पापा आए। वह पापा से लिपट कर जोर-जोर से रोने लगा।...पापा भी उसे सीने से लगाए रो रहे थे - "मेरे बेटे मैं आ गया, तू ठीक तो है न ?'
 घर जाते हुए उसने रास्ते में पूछा - "पापा उस दिन कार मुझे लेने क्यों नहीं आई थी।'
 "बेटे फोन पर किसी ने कहा था कि आज स्कूल में फंक्शन है। तुषार को लेने के लिए कार दो घंटे लेट भेजना, ऐसा कई बार हो चुका है... हमें क्या पता था कि धोखा हो सकता है।'
 घर पर उसे देखने वालों की भीड़ इकट्ठी थी। सब इतने खुश थे, जैसे कोई उत्सव हो। सबको मिठाई बाँटी जा रही थी।
 तभी उसने पूछा- "मम्मी उस घर का पता कैसे लगा ?'
 "जब अपहरणकर्ता का ही पता लग गया फिर उसके घर का पता लगाना कौन सा मुश्किल था।...सब तेरे उस पत्र के साथ आए खाली कागज का कमाल है।'
 "माँ, उस कागज को पढ़ा किसने ? मैंने तो अंधेरे में तीर मारा था। मुझे उम्मीद नहीं थी कि कोई उसे पढ़ पाएगा।'
 पप्पू ने गर्व से सीना फुलाकर कहा - "भैया मैंने पढ़ा था।'
 "तूने,...तूने कैसे पढ़ा ?'
 "चार-पाँच दिन पहले तुम्हारे दोस्त संदीप भैया आए थे। उदास थे, बहुत देर बैठे रहे। वही बता रहे थे कि अपहरण वाले दिन उन्होंने तुम को एक पेन्सिल दी थी जिसका लिखा कागज पर दिखाई नहीं देता। उन्होंने पढ़ने की तरकीब भी बताई थी। तुम्हारे पत्र के साथ आए खाली कागज को पापा ने उलट-पलट कर बेकार समझ कर फेंक दिया था। मैं तब खाना खा रहा था। मुझे संदीप भैया की बात याद आ गई। मैंने कागज उठा लिया और उस पर दाल की गर्म कटोरी रख कर घुमादी।....देखते ही देखते कागज पर लिखे तुम्हारे अक्षर चमकने लगे। बिना पढ़े ही मैं उसे लेकर पापा के पास गया। पत्र से पता लग गया कि अपहरण रमुआ ने किया है फिर क्या था, घर में हलचल मच गई। पापा तभी पुलिस स्टेशन गए और उनकी सहायता से तुम्हें ढूँढ़ लाए।'
 तभी पापा खुशी से चहकते हुए घर में घुसे और कुर्सी पर आराम से बैठते हुए बोले- "साला रमुआ भी पकड़ में आ गया है।'
       फिर कुछ ठहर कर पूछा - "तुषार बेटे उस खाली कागज का रहस्य क्या था ?'
 "भैया क्या वह जादू की पेन्सिल थी ?'
 "अरे नहीं, जादू कैसा..... असल में वह पेन्सिल मोम की थी इसीलिए उसके लिखे अक्षर कागज पर दिखाई नहीं दे रहे थे। पप्पू ने उस पर गर्म कटोरी रख दी, गर्मी पाकर मोम पिघल गया और अक्षर स्पष्ट दिखने लगे, यही उसका रहस्य था।'
 "भाई कुछ भी हो खाली कागज ने कमाल कर दिखाया। वर्ना पता नहीं तुझे फिर से देख भी पाते या नहीं।' माँ की आँखों में हर्ष के आँसू थे .

email -  agarwalpavitra78@gmail.com

-पवित्रा अग्रवाल
 

शुक्रवार, 4 जनवरी 2019

थोड़ी सी नासमझी

बाल कहानी 

                  थोड़ी सी नासमझी 

                                                           पवित्रा अग्रवाल 

           फोन की घन्टी सुन कर माँ ने अमृता को पुकार कर बताया कि तेरी दोस्त का फोन आया है।
     'अच्छा माँ  अभी आई '
       "हैलो कौन सारा ?....क्या ...कल शाम रोश्नी छत से गिर गई थी ? ...पर वह उस समय छत पर क्या कर रही थी ?'
''पतंग उड़ा रही थी '
"उसे पतंग उड़ाना भी आता है ?'
"हाँ, पतंग के दिनो में अपने भाई का चरक पकड़ते , पकड़ते उसने भी पतंग उड़ाना सीख लिया था।'
"अरे पहले यह तो बता वह कैसी है ... बहुत चोट तो नहीं लगी ?'
   "बहुत अच्छी किस्मत थी ,छोटी मोटी चोट आई है... हॉ पैर की हड्डी भी टूटी है।'
    "थेंक गॉड , वरना छत से गिर कर तो जान भी जा सकती थी और गम्भीर चोट भी लग सकती थी।  पिछले वर्ष मेरा कजिन भी पतंग उड़ाते समय छत से गिर गया था ,उसका तो सिर फट गया था, कुछ घन्टों में ही उसकी मौत हो गई थी,मालुम है माँ- बाप का वह अकेला बेटा था।'
    " अच्छा ! आज कल तो ज्यादातर परिवारों में एक दो बच्चे ही होते हैं। रोशनी भी तो अकेली बेटी ही है,एक भाई भी है।'
"पर वह गिर कैसे गई ?'
  "अपने भाई के साथ छत पर पतंग उड़ाने गई  थी । भाई पानी पीने नीचे गया था .पीछे से  एक पतंग लूटने चक्कर में नीचे गिर गई।'
'अरे बड़ी बेवकूफी की उसने... कटी पतंग लूटने की क्या जरूरत थी, क्या उसके पास पतंगे नहीं थीं ?'
"अरे उनके पास बहुत सारी नई - नई पतंगे हैं पर पतंग उड़ाने से  ज्यादा बच्चों को पतंग लूटने में मजा आता है ।'
"क्या उसकी छत पर रेलिंग नहीं थी ?'
"उसकी छत पर तो रेलिंग है पर पतंग लूटने के लिए वह अपनी छत से जुड़े व नए बन रहे मकान की छत पर चली गई थी,उस छत की रेलिंग अभी बनी नहीं थी ... मैं भी उसके साथ ही थी पर माँ के डर से जल्दी लौट गई थी ।'
"बड़ी नासमझी की उसने ... पतंग के दिनों में इस तरह की बहुत सी घटनाए होती रहती हैं। इस विषय में अखबारों में भी खबरे छपती रहती हैं।मेरी मम्मी ने तो छत पर ताला लगा रखा है ,बस एक दिन ही पतंग उड़ाने की छूट मिलती है वह भी किसी बड़े के साथ होने पर ।'
"ताला तो उनकी छत पर भी लगा रहता है पर आज उसके मम्मी पापा किसी काम से बाहर गए थे ...और इन्हें मौका मिल गया ।'
"जब रोशनी छत से गिरी तो उसके घर में कोई नहीं था ? '
  "गिरने के पाँच मिनट के अंदर ही उसके मम्मी - पापा आ गए थे ,वे ही उसे लेकर अस्पताल भागे।'
"कोई खतरे की बात तो नहीं है ?'
' नहीं खतरा तो कोई नहीं है , बस डेढ़ - दो महीने के लिए पैर पर प्लास्टर चढ़ गया है। स्कूल नहीं जा पाएगी ... वह तो अच्छा हुआ हाथ सलामत हैं वरना परीक्षा कैसे लिखती ?'
"सच में सारा थोड़ी सी नासमझी कितनी खरतनाक हो सकती है पर हम समझते ही नहीं ।माँ बाप जब हमें समझाने की कोशिश करते हैं तो हमें वह दुश्मन नजर आते हैं।...स्कूल से लौटते समय उससे मिलने चलेंगे। '
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-पवित्रा अग्रवाल
 ईमेल - agarwalpavitra78@gmail.com

मेरे ब्लॉग्स ---

शनिवार, 8 दिसंबर 2018

  बाल कहानी 

                             अवैतनिक सचिव
                                                             पवित्रा अग्रवाल 

सुबह स्कूल जाने के लिए तैयार होकर रमेश जब सुरेश के घर पहुँचा तो
 वहाँ सबको कुछ परेशान पाया। पूछने पर उसने बताया - "हम लोग पीने के
 लिए उबला पानी इस्तेमाल करते हैं। मम्मी रोज रात को एक स्टील के घड़े
 में पानी भर कर उसमें पानी गर्म करने की रौड लगा देती है करीब पचास 
मिनट में पानी उबल जाता है। दूसरे दिन ठंडा होने पर वही पानी मम्मी घड़े 
में पलट कर रख लेती हैं और वही पानी सब पीते हैं।' 
"यह तो अच्छी बात है'
"बात तो अच्छी है...पर रात को मम्मी स्विच बंद करना भूल 
गई...पानी रात भर उबलता रहा, सुबह जब रसोई का दरवाजा खोला तो पूरी
 रसोई गीली थी। रात को भाप बनकर उड़ा पानी छत व दीवारों से टपक रहा
 था। पानी गर्म करने की रौड लाल होकर घड़े में लटकी हुई थी। घड़े में बस 
उतना ही पानी बचा था जो रौड से नीचे था।'
सुरेश ने बताया कि इस लापरवाही के लिए पापा,मम्मी पर नाराज 
हुए।...मम्मी कुछ भुलक्कड़ भी हैं। इससे कोई दुर्घटना भी हो सकती थी।
"लेकिन सुरेश इस तरह की भूल तो कभी, किसी से भी हो सकती 
है।...हमारे यहाँ बोरवेल है। रोज मोटर चला कर छत की टंकी में पानी भरना
 पड़ता है।...एक दिन मम्मी मोटर चला कर भूल गई। टी.वी. और कूलर की
 आवाज में बोरिंग की आवाज सुनाई नहीं दी। दो-तीन घंटे बाद जब उन्होंने
 टी.वी. बंद किया तो ज्ञात हुआ कि पानी ओवर फ्लो होकर न जाने कितनी 
देर से बह रहा था। मोटर भी बहुत गर्म हो गई थी.....
उस दिन से मम्मी ने एक तरकीब निकाली। उन्हें जितनी देर के लिए 
मोटर चलानी होती है या जितने बजे मोटर बंद करनी होती है उतने बजे का
 घड़ी में अलार्म लगा देती है।...भूल भी जाए तो अलार्म याद दिला देता है।
 तुम्हारी मम्मी भी बंद करने के समय का अलार्म लगालें तो ऐसी भूल पुनः 
नहीं होगी।'
"अरे वाह रमेश यह तो तुमने घड़ी का बड़ा अच्छा उपयोग बताया।...'
"यही नहीं मेरी मम्मी तो अलार्म का दैनिक जीवन में बहुत उपयोग 
करती हैं। उन्हें कोई टी.वी. सीरियल देखना हो तो उस टाइम का अलार्म 
लगा देती हैं। कभी निश्चित समय कहीं जाना हो,कोई जरूरी दवा खानी हो..
 छोटी बहन को स्कूल से लाना हो...तो बस अलार्म लगा कर निÏश्चत हो 
जाती हैं।... उनकी ये ट्रिक हम लोग भी जरूरत पर इस्तेमाल कर लेते हैं।
 हम लोगों ने तो अलार्म पीस का नाम मम्मी की सचिव रख दिया है।'
 "सचिव, वह भी बिना वेतन वाली यानी कि अवैतनिक सचिव। 
       
             ( मेरे  बाल कहानी संग्रह  'चिड़िया मैं बनजाऊँ ' से )

email- agarwalpavitra78@gmail.com
                                                       
   -पवित्रा अग्रवाल