शुक्रवार, 4 जनवरी 2019

थोड़ी सी नासमझी

बाल कहानी 

                  थोड़ी सी नासमझी 

                                                           पवित्रा अग्रवाल 

           फोन की घन्टी सुन कर माँ ने अमृता को पुकार कर बताया कि तेरी दोस्त का फोन आया है।
     'अच्छा माँ  अभी आई '
       "हैलो कौन सारा ?....क्या ...कल शाम रोश्नी छत से गिर गई थी ? ...पर वह उस समय छत पर क्या कर रही थी ?'
''पतंग उड़ा रही थी '
"उसे पतंग उड़ाना भी आता है ?'
"हाँ, पतंग के दिनो में अपने भाई का चरक पकड़ते , पकड़ते उसने भी पतंग उड़ाना सीख लिया था।'
"अरे पहले यह तो बता वह कैसी है ... बहुत चोट तो नहीं लगी ?'
   "बहुत अच्छी किस्मत थी ,छोटी मोटी चोट आई है... हॉ पैर की हड्डी भी टूटी है।'
    "थेंक गॉड , वरना छत से गिर कर तो जान भी जा सकती थी और गम्भीर चोट भी लग सकती थी।  पिछले वर्ष मेरा कजिन भी पतंग उड़ाते समय छत से गिर गया था ,उसका तो सिर फट गया था, कुछ घन्टों में ही उसकी मौत हो गई थी,मालुम है माँ- बाप का वह अकेला बेटा था।'
    " अच्छा ! आज कल तो ज्यादातर परिवारों में एक दो बच्चे ही होते हैं। रोशनी भी तो अकेली बेटी ही है,एक भाई भी है।'
"पर वह गिर कैसे गई ?'
  "अपने भाई के साथ छत पर पतंग उड़ाने गई  थी । भाई पानी पीने नीचे गया था .पीछे से  एक पतंग लूटने चक्कर में नीचे गिर गई।'
'अरे बड़ी बेवकूफी की उसने... कटी पतंग लूटने की क्या जरूरत थी, क्या उसके पास पतंगे नहीं थीं ?'
"अरे उनके पास बहुत सारी नई - नई पतंगे हैं पर पतंग उड़ाने से  ज्यादा बच्चों को पतंग लूटने में मजा आता है ।'
"क्या उसकी छत पर रेलिंग नहीं थी ?'
"उसकी छत पर तो रेलिंग है पर पतंग लूटने के लिए वह अपनी छत से जुड़े व नए बन रहे मकान की छत पर चली गई थी,उस छत की रेलिंग अभी बनी नहीं थी ... मैं भी उसके साथ ही थी पर माँ के डर से जल्दी लौट गई थी ।'
"बड़ी नासमझी की उसने ... पतंग के दिनों में इस तरह की बहुत सी घटनाए होती रहती हैं। इस विषय में अखबारों में भी खबरे छपती रहती हैं।मेरी मम्मी ने तो छत पर ताला लगा रखा है ,बस एक दिन ही पतंग उड़ाने की छूट मिलती है वह भी किसी बड़े के साथ होने पर ।'
"ताला तो उनकी छत पर भी लगा रहता है पर आज उसके मम्मी पापा किसी काम से बाहर गए थे ...और इन्हें मौका मिल गया ।'
"जब रोशनी छत से गिरी तो उसके घर में कोई नहीं था ? '
  "गिरने के पाँच मिनट के अंदर ही उसके मम्मी - पापा आ गए थे ,वे ही उसे लेकर अस्पताल भागे।'
"कोई खतरे की बात तो नहीं है ?'
' नहीं खतरा तो कोई नहीं है , बस डेढ़ - दो महीने के लिए पैर पर प्लास्टर चढ़ गया है। स्कूल नहीं जा पाएगी ... वह तो अच्छा हुआ हाथ सलामत हैं वरना परीक्षा कैसे लिखती ?'
"सच में सारा थोड़ी सी नासमझी कितनी खरतनाक हो सकती है पर हम समझते ही नहीं ।माँ बाप जब हमें समझाने की कोशिश करते हैं तो हमें वह दुश्मन नजर आते हैं।...स्कूल से लौटते समय उससे मिलने चलेंगे। '
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-पवित्रा अग्रवाल
 ईमेल - agarwalpavitra78@gmail.com

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शनिवार, 8 दिसंबर 2018

  बाल कहानी 

                             अवैतनिक सचिव
                                                             पवित्रा अग्रवाल 

सुबह स्कूल जाने के लिए तैयार होकर रमेश जब सुरेश के घर पहुँचा तो
 वहाँ सबको कुछ परेशान पाया। पूछने पर उसने बताया - "हम लोग पीने के
 लिए उबला पानी इस्तेमाल करते हैं। मम्मी रोज रात को एक स्टील के घड़े
 में पानी भर कर उसमें पानी गर्म करने की रौड लगा देती है करीब पचास 
मिनट में पानी उबल जाता है। दूसरे दिन ठंडा होने पर वही पानी मम्मी घड़े 
में पलट कर रख लेती हैं और वही पानी सब पीते हैं।' 
"यह तो अच्छी बात है'
"बात तो अच्छी है...पर रात को मम्मी स्विच बंद करना भूल 
गई...पानी रात भर उबलता रहा, सुबह जब रसोई का दरवाजा खोला तो पूरी
 रसोई गीली थी। रात को भाप बनकर उड़ा पानी छत व दीवारों से टपक रहा
 था। पानी गर्म करने की रौड लाल होकर घड़े में लटकी हुई थी। घड़े में बस 
उतना ही पानी बचा था जो रौड से नीचे था।'
सुरेश ने बताया कि इस लापरवाही के लिए पापा,मम्मी पर नाराज 
हुए।...मम्मी कुछ भुलक्कड़ भी हैं। इससे कोई दुर्घटना भी हो सकती थी।
"लेकिन सुरेश इस तरह की भूल तो कभी, किसी से भी हो सकती 
है।...हमारे यहाँ बोरवेल है। रोज मोटर चला कर छत की टंकी में पानी भरना
 पड़ता है।...एक दिन मम्मी मोटर चला कर भूल गई। टी.वी. और कूलर की
 आवाज में बोरिंग की आवाज सुनाई नहीं दी। दो-तीन घंटे बाद जब उन्होंने
 टी.वी. बंद किया तो ज्ञात हुआ कि पानी ओवर फ्लो होकर न जाने कितनी 
देर से बह रहा था। मोटर भी बहुत गर्म हो गई थी.....
उस दिन से मम्मी ने एक तरकीब निकाली। उन्हें जितनी देर के लिए 
मोटर चलानी होती है या जितने बजे मोटर बंद करनी होती है उतने बजे का
 घड़ी में अलार्म लगा देती है।...भूल भी जाए तो अलार्म याद दिला देता है।
 तुम्हारी मम्मी भी बंद करने के समय का अलार्म लगालें तो ऐसी भूल पुनः 
नहीं होगी।'
"अरे वाह रमेश यह तो तुमने घड़ी का बड़ा अच्छा उपयोग बताया।...'
"यही नहीं मेरी मम्मी तो अलार्म का दैनिक जीवन में बहुत उपयोग 
करती हैं। उन्हें कोई टी.वी. सीरियल देखना हो तो उस टाइम का अलार्म 
लगा देती हैं। कभी निश्चित समय कहीं जाना हो,कोई जरूरी दवा खानी हो..
 छोटी बहन को स्कूल से लाना हो...तो बस अलार्म लगा कर निÏश्चत हो 
जाती हैं।... उनकी ये ट्रिक हम लोग भी जरूरत पर इस्तेमाल कर लेते हैं।
 हम लोगों ने तो अलार्म पीस का नाम मम्मी की सचिव रख दिया है।'
 "सचिव, वह भी बिना वेतन वाली यानी कि अवैतनिक सचिव। 
       
             ( मेरे  बाल कहानी संग्रह  'चिड़िया मैं बनजाऊँ ' से )

email- agarwalpavitra78@gmail.com
                                                       
   -पवित्रा अग्रवाल

बुधवार, 21 नवंबर 2018

खिड़की खुली न रखना


बाल कहानी
खिड़की खुली न रखना
पवित्रा अग्रवाल

दीपावली की रात को पूजा हो चुकी थी। मम्मी ने कहा --"चलो जल्दी से घर बंद करो, बुआ के घर दीपावली की शुभ कामनाएं व मिठाई दे आते हैं ।' 
  सौम्या ने मम्मी से पूछा -- "मम्मी सब खिड़कियां भी बंद कर दूँ ?'
"नहीं बेटा खिड़कियां बंद नही करना ।'
"क्यों मम्मी ?'
"तुम्हारी दादी ने दीपावली के दिन कभी मुझे खिड़कियाँ बंद नहीं करने दीं।कहती थीं खिड़की दरवाजे बंद देख कर लक्ष्मी जी बाहर से ही लौट जाएगी ।शुरू में मुझे भी यह आदेश अच्छा नहीं लगता था फिर आदत पड़ गई है ।'
"पर मम्मी अब तो आदेश देने या गुस्सा करने को दादी नहीं हैं, आप फिर भी वही सब कर रही हैं जो दादी के सामने करती थीं ।'
"हाँ बेटा इतनी जल्दी उनकी बातें भूलने को मन नहीं कर रहा ।...वैसे भी अपने फ्लैट्स बहुत सुरक्षित हैं यहाँ चोरी चकोरी का बिलकुल डर नहीं है।'
"मम्मी आप ठीक कह रही हैं यहाँ चोरी का डर तो बिलकुल नहीं है पर खिड़की खुली रखने से आग का खतरा बढ़ जाता है ।'
"दीदी खिड़की से आग का क्या संबंध है ?'
"तुम्हारे जैसे शरारती बच्चे जब मन में आया कहीं भी पटाखे जलाना शुरू कर देते हैं।पिछले वर्ष मेरी सहेली के घर में इसी तरह आग लग गई थी।बाहर से जलता हुआ राकेट खिड़की से उनके बैडरूम में आ कर बिस्तर पर गिर गया.था.....पर उस समय वह सब लोग घर में ही थे,अत:एक बड़ी दुर्घटना टल गई वरना सभी फ्लैट्स आग की चपेट में आ जाते ।'
"हाँ दीदी आप ठीक कह रही हैं , मम्मी दीदी से खिड़की के दरवाजे भी बन्द करने को कह दीजिए न ।'
"सौम्या तुम ठीक ही कह रही हो,इस तरह की सावधानी बरतने में कोई नुकसान नहीं है।घर की सभी खिड़कियां बंद कर दो ।'
"वैसे दीदी खिड़की दरवाजे बंद करने से एक फायदा और भी है।'
"क्या ?'
"दरवाजे बंद होने से बाहर की लक्ष्मी अंदर नहीं आ सकेंगी तो क्या ,जो लक्ष्मी अंदर हैं वह भी तो बाहर नहीं जा सकेंगी ।इस तरह घर की लक्ष्मी तो घर में ही रहेंगी ।'
सौम्या ने प्यार से छोटी बहन को चपत लगाते हुये कहा -"बात में दम है दादी माँ,अब चलें ?'
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शनिवार, 6 अक्तूबर 2018

जी का जंजाल


बाल कहानी 
                         
  जी का जंजाल
         
                                                         पवित्रा अग्रवाल

            स्कूल साथ साथ जाते हुए पाही ने नयना से पूंछा --"नयना तुम्हारा नया मकान बने हुए तो बहुत दिन हो गए ,उसमें रहने कब जा रही हो ?''      
     "अरे जाना तो दो महीने पहले ही था लेकिन पापा मम्मी के कुछ मित्रों ने कहा कि इस में तो वास्तु के बहुत दोष हैं ।प्रवेश से पहले किसी वास्तु विशेषज्ञ की सलाह ले लो।हमारे मम्मी पापा को इस में विश्वास तो नहीं है पर शुभ चिन्तकों के लगातार आग्रह पर मम्मी को भी बहम हो गया और यह बहम जी का जंजाल बन गया।''
 "वास्तु का नाम तो इधर मैं नें भी सुना है बल्कि हमारे पड़ौस में भी एक वास्तु शास्त्री रहते हैं पर यह क्या है मुझे इस विषय में ज्यादा  कुछ नहीं पता।''
 "अच्छा है जो तुम्हें इसका ज्ञान नहीं है,जो इसके जाल में फंस जाता है वह चकर घिन्नी बन जाता है।''
 "मतलब ? ''
 "मतलब यही है कि इनके चक्कर में फंस कर फायदा हो न हो पर रुपयों को पंख जरूर लग जाते हैं और सब से बड़ी बात यह है कि एक  वास्तु विशेषज्ञ के  हिसाब से बने मकान को दूसरा विशेषज्ञ कभी सही नहीं बताता । वह पहले विशेषज्ञ को अज्ञानी बता कर दोषों की लिस्ट थमा देता है।''
  "तुम्हारे साथ क्या हुआ ?''
 "वही जिसका अनुमान था।जब से विशेषज्ञ जी घर देख कर गए हैं,मम्मी पापा बहुत तनाव में हैं।एक एक पैसा जोड़ कर व आफिस से लोन ले कर पापा ने यह फ्लैट खरीदा था और जब उसमें रहने जाने का समय आया तो वास्तु के चक्कर में फँस गए।लोन लेते समय पापा ने सोचा था कि किराए के मकान का जो आठ हजार रुपए महिने  किराया जाता हैं वह अपने फ्लैट में जाने के बाद लोन की किश्त जमा कराने के काम आ जाएगा ।वह भी नहीं हो पाया।'
 "तो क्या वास्तु के हिसाब से मकान ठीक करवा रहे हो ?'
 "फ्लैट में वह सब सुधार संभव नहीं हैं,प्रवेश द्वार जिस दिशा में है वहीं रहेगा ।रसोई ,बाथरूम,किचन किसी का भी स्थान कैसे बदल सकता है ।पापा ने कई लोगों से सलाह ली है ,छोटे मोटे बदलाव भी जो संभव थे कराए हैं।...विशेषज्ञ जी ने तो यहाँ तक कहा है कि इसे बेच कर दूसरा ले लो ।लेने से पूर्व विशेषज्ञ की सलाह जरूर ले लेना ।''
  "पर नयना यह सलाह खरीद ने से पहले ले ली होती तो इन मुश्किलों से तो  बच जाते ।''
 "असल में पापा ने यह मकान रिसेल में लिया था,पापा के परिचित का ही मकान था।वह इस मकान में करीब सात साल रहे।''
 "यदि वास्तु दोष हैं तो जिन से तुमने खरीदा उनको भी इस में परेशानियां उठानी पड़ी होंगी ?''
 "पापा बताते हैं कि खरीदने से पूर्व मकान मालिक से वास्तु आदि के विषय में पूछा था तो उन्हों ने कहा था कि "मैं ने भी बना बनाया लिया था , किसी से सलाह नहीं ली थी ।घर में हवा, पानी, धूप का अभाव नहीं था बस यही बात मुझे भा गई थी ।मेरे बच्चे इसी मकान में रहते हुए पले - बढ़े हैं...आज  दोनो बेटे मल्टी नेशनल कंपनी में काम कर रहे हैं।घर में सुख शान्ति है।'..यह सब बात पापा भी जानते थे।बस ले लिया ।'' 
 "तो अब तुम्हारे पापा ने क्या सोचा है ....क्या बेचने की सोच रहे हैं ?''
 "पाही  मकान बेचना या खरीदना क्या इतना आसान होता है ?''
 "फिर...?''
 "अभी एक सप्ताह पहले पापा के एक मित्र की पत्नी का कैंसर से स्वर्ग वास हो गया था ।पापा बताते हैं वह बहुत संपन्न हैं। उन्होंने जमीन खरीदने से ले कर कोठी बनवाने तक पूरा काम एक वास्तु-विशेषज्ञ की देख रेख में कराया था पर उस में जाने के एक साल के अंदर ही यह सब हो गया । मंदी के चलते उनको व्यापार में भी बहुत घाटा हुआ है।तब से पापा के दिमाग ने पल्टी खाई है और वह भ्रम की स्थिति से बाहर आगए हैं।उनका कहना है कि सुख- दुख सब के जीवन में आते हैं। उन्हें यह तथा कथित विशेषज्ञ नहीं रोक सकते और यदि रोक सकते तो उन के जीवन में सुख ही सुख होते ।'...
 "हाँ नयना तुम्हारे पापा का सोचना ठीक ही है। हमारे पड़ौस में जो वास्तु शास्त्री रहते हैं वह तो समाचार पत्र में इस विषय में कालम भी लिखते हैं। उनके घर से तो रोज झगड़े की आवाजें आती रहती हैं,उनका बेटा भी बहुत बिगड़ा हुआ है... एक बार पुलिस केस में भी फंस गया था।'
 "अच्छा ! वैसे पापा ने भी तय कर लिया है...अब हम इस महिने के अंत में अपने फ्लैट में चले जाएंगे ।''


    
       
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बुधवार, 26 सितंबर 2018

फौजी का बेटा


बाल कहानी
  फौजी का बेटा

पवित्रा अग्रवाल

आजाद अपने कुछ साथियों के साथ स्कूल से लौट रहा था ।उसे घर जाने की जल्दी थी क्यों कि उसकी माँ बीमार थी। वह सुबह स्कूल नहीं आना चाहता था पर मम्मी ने उसे जबरन भेज दिया -- "बेटा अपनी पढ़ाई में ढ़ील मत दो।मैं ठीक हूँ फिर भी तू मोबाइल ले जा,कोई परेशानी हुई तो तुझे फोन कर दूँगी ।''
"पर... मम्मी स्कूल में मोबाइल ले जाने की इजाजत नहीं है।...यदि किसी ने देख लिया तो ड़ांट तो पड़ेगी ही ,जुर्माना भी देना पड़ेगा ।... फिर भी मैं ले जाता हूँ  ,साइलेंट मोड में वाइब्रेशन  के साथ रख लेता हूँ।जरूरी हो तो आप कर लेना वरना मैं खाने की छुट्टी में आप से बात कर लूँगा ।''
"हाँ बेटा ,यह ठीक रहेगा।''
आजाद ने दोपहर में मम्मी से बात कर ली थी। शाम को स्कूल से लौटते समय उसे मम्मी के लिए कुछ फल ले जाने थे ।वह फलों की तलाश में इधर उधर नजर घुमा रहा था तभी उसकी नजर भीड़ भरे इलाके में स्थित एक कचरा कुंडी पर पड़ी।एक आदमी उस में कुछ डाल कर गया था पर उसके हाव भाव देख कर आजाद को लगा कि कुछ दाल में काला है। उसने अपने आसपास चलते हुए कुछ बच्चों का ध्यान उधर खींचना चाहा पर वह कान में ईयरफोन लगाए गाने सुनने में व्यस्त थे ।
उसे लगा कि समय अच्छा नहीं है।लोगों को आँख कान खुले रख कर चौकन्ना रहने की जरूरत है।...एक लड़के के कान से ईयरफोन निकाल कर उसने कहा --"अभी मैं ने एक आदमी को उस कचरा कुंडी में कुछ डाल कर जाते देखा है...मुझे शक है कि वह बम भी हो सकता है ।''
बच्चे ने बड़ी लापरवाही और बेरुखी से उसे घूर कर देखा और कहा -- "कचरे के डिब्बे में कोई कचरा ही डालेगा न '' और अपने कान पर दुबारा ईयरफोन लगाते हुए उस से आगे निकल गया ।
तभी आजाद को वह आदमी अपनी तरफ आते हुए दिखा।एक पेड़ की आड़ में खड़े हो कर आजाद ने मोबाइल से उसका फोटो भी लेने का प्रयास किया । अब आजाद दुविधा में था कि क्या करूँ ? पुलिस को बताया जाए या नहीं।  यदि वहाँ कुछ नहीं मिला तो वे समझेंगे कि मैं ने उन्हें बिना बात गुमराह कर के उनका समय बर्बाद किया है ।कुछ पुलिस वाले तो इतने बद्दिमाग होते हैं कि गलत सूचना पर उसे चोट भी पंहुचा सकते हैं ।
आखिर उसने अपनी दुविधा पर विजय पाली ,100 नं.पर फोन मिला कर उसने अपना नाम ,अपने स्कूल का नाम व जगह बता कर अपना शक जाहिर करते हुए कहा कि मैं नहीं जानता कि मेरा शक सही है या गलत ।हो सकता है वहाँ कुछ भी न मिले ।...आप चाहें तो जगह की जाँच कर सकते हैं ?''   
"ठीक है बेटा,जब तुमने अपनी पूरी पहचान बता कर फोन किया है तो हम तुम्हें झूठी अफवाह फैलाने वाला तो नहीं मान सकते।...हम वहाँ जा कर देखेंगे।''
"सर अब मै अपने घर जा रहा हूँ ...मेरी माँ बीमार है।मेरा मोबाइल नंबर आपके पास रिकार्ड हो गया होगा।मेरी किसी मदद की जरूरत हो तो आप मुझे फोन कर सकते हैं।''
"ओ के बेटा।''
एक घन्टे बाद पुलिस का फोन आया ---"आजाद तुम्हारा शक सही निकला ।वहाँ एक जीवित बम पाया गया है।वह यदि फट जाता तो बहुत सी जाने जा सकती थीं ।हम तुम से मिलना चाहते हैं ...तुम से उसका हुलिया जान कर हमारे एक्सपर्ट गुनहगार का चित्र बनाएँगे ताकि उसे पकड़ा जा सके ।''
"सर मैं ने मोबाइल से उसका फोटो लिया  था  ,हो सकता है आप को उस से कुछ मदद मिल सके।''
"ओ वेरी गुड ,यह तुमने बहुत अच्छा किया,तुम मोबाइल के साथ आ जाओ। "
आजाद ने अपनी मम्मी को विस्तार से पूरी घटना बताई।सुन कर मम्मी बहुत खुश हुई और बोलीं--
"शाबाश बेटा,मुझे तुम पर नाज है।फौजी पापा के बहादुर बेटे हो तुम।...सुन कर पापा बहुत खुश होंगे ।''
थोड़ी देर बाद मम्मी ने टी. वी. चालू किया तो समाचार आ रहा था --- "एक बच्चे की मदद से एक बहुत बड़ा हादसा होते होते बचा।उसने पुलिस को बम रखे होने का शक जाहिर किया था जो सही निकला। उस साहसी बच्चे से अभी मीडिया का संपर्क नहीं हो पाया है।....अभी अभी खबर आई है कि दो जगह और भी बम विस्फोट हुए हैं।ताजा जानकारी के साथ हम फिर हाजिर होंगे ।''

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