बुधवार, 15 अगस्त 2018

यह भी चोरी है

बाल कहानी
                                यह भी चोरी है
                                                          पवित्रा अग्रवाल
 
             सोमेश को एक पुस्तक के पन्ने फाड़ते देख कर मम्मी ने टोका --" बेटा यह किस की किताब है और तुम इस किताब में से पन्ने क्यों फाड़ रहे हो ?'
 "मम्मी यह स्कूल के पुस्तकालय की किताब है, कल इसे पुस्तकालय को लौटाना है और मुझे इस में से डिवेट के लिए कुछ सामग्री चाहिए पर अब पढ़ने का समय नहीं है ।'
 "सामग्री चाहिए तो ये इतनी सारी जीरोक्स की दुकाने हैं , किताब ले जा कर उन पन्नों की जीरोक्स करा लाओ । '
 "अरे मम्मी देखो न बाहर पानी बरसने को है और मेरा मन अभी बाहर जाने को नहीं है।'
     'देखों बेटा यह बहुत गलत बात है ।पुस्तकालय का मतलब है पुस्तकों का घर।स्कूल - कालेज में,गाँव ,शहर में पुस्तकालय इसी लिए होते हैं कि वहाँ पर विभिन्न विषयों की पुस्तकें एक जगह मिल जाती हैं  ।हमें किसी खास विषय पर कुछ जानकारी चाहिए तो उसके लिए हमें पुस्तकालय से बहुत मदद मिलती है क्यों कि एक एक  जानकारी  प्राप्त करने के लिए पुस्तक खरीदना हरेक के बस की बात नहीं है। जिस विषय पर  किसी  को जानकारी चाहिए ,वह लाइब्रेरी का सहारा लेता है। लाइब्रेरी की पुस्तको की रक्षा करना हर पाठक का फर्ज है।... पन्ने फाड़ने की गल्ती नहीं करनी चाहिए ।'
     "अरे मम्मी एक मेरे न फाड़ने से क्या होगा... बहुत से बच्चे फाड़ते हैं ।कई बार ऐसा हुआ है कि मुझे भी मन चाही सामग्री नहीं मिली ...पन्ने फटे हुए थे ।'
    " और वहीं गलती तुम भी करने जा रहे हो । बेटा यह भी एक तरह की चोरी ही है ।'
  "इसे भी चोरी कहेंगे ?'
 'बिल्कुल यह भी चोरी है ।अब तुम बता रहे थे कि तुम्हारे यहाँ एक बच्चे ने किसी की किताब चुरा ली थी, पकड़े जाने पर उसे सबके सामने सजा दी गई थी न ,इसी तरह यह किताब तुम्हारी नहीं,स्कूल की  है ,चुपके से या चोरी से उसके पन्ने फाड़ना भी ,चोरी ही है ? "
     "हाँ ,आप ठीक कह रही हैं ...थैंक यू मम्मी आपने मुझे एक गलत काम करने से बचा लिया।मैं अभी जाकर इनकी जीरोक्स करा के लाता हूँ।'
 दूसरे दिन सोमेश जब पुस्तकालय में किताब लौटाने गया तो लाइब्रेरी वाले सर दो बच्चों को डाँट रहे थे। उन्होने बच्चो को चुपके से कुछ पन्ने फाड़ते देख लिया था ...उन बच्चों का नाम लिख कर उन पर फाइन  लगा दिया गया था ।...सोमेश की किताब भी खोल कर सर ने चैक की थी ।
      सोमेश मन ही मन मम्मी को थैंक्स कह रहा था


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मंगलवार, 17 जुलाई 2018

फूलों की चाहत


बाल कहानी                                    
                   फूलों की चाहत   


                                                                        पवित्रा अग्रवाल
 
"दीदी मैं अभी आयी।गुप्ता आन्टी से कुछ फूल माँग कर लाती हूँ।'
 "दिव्या, फूलों का इतनी सुबह क्या करेगी ?'
  "आज मेरी प्रिय टीचर मिस लिली का बर्थ-डे है।उन्हें मैं फूलों का गुलदस्ता भेंट करना चाहती  हूँ। गुप्ता आन्टी का बगीचा बहुत सुन्दर है।उनके यहाँ तरह तरह के फूल हैं।'
 "मैं ने भी देखा है, उनका बगीचा सचमुच बहुत सुन्दर है।जरूर उनके पास माली होगा।'
 "नही दीदी उनके यहाँ कोइ माली नही है,अंकल ,आन्टी बगीचे की देख भाल खुद करते हैं।'
 "जो अपने बगीचे की देख भाल खुद करते हैं,मुझे नही लगता कि उनसे तुम्हे फूल माँगने चाहिये। ऐसे लोगो को अपने पौधों से बच्चों की तरह प्यार होता है।...जब तुमने पहले से सोच रखा था कि मिस को गुलदस्ता भेंट करना है तो उसका इंतजाम करके रखना चाहिये था..बाजार में क्या नही मिलता ?'
 "बाजार मे तो बुके बहुत मंहगा मिलता है दीदी।मैं कोइ रोज तो माँगती नही हूँ,आज पहली बार लेने जा रही हूँ। आन्टी बहुत अच्छी हैं...आप देखना वह मना नही करेगी,मुझे बहुत प्यार करती हैं।'
 "हो सकता है वह दे दें । उनकी जगह मै होती तो एक दो फूल शायद दे भी देती पर गुलदस्ते के लिये तो मना कर देती।'
 "दीदी एक बात बताइये हम फूल नही तोड़ेगे तब भी वह पेड़ पर रहने वाले तो हैं नही, एक दो दिन मे मुर्झा कर खुद गिर जायेंगे।...यदि किसी के काम आजाये तो अच्छा है न। बाजार मे इतने फूल बिकते है वह भी तो किसी के बगीचों से ही आते होंगे ?'
 "बाजार मे बिकने वाले फूल शौकिया बगीचा रखने वालों के बगीचे से नही आते।..बाजार में बिकने के लिये फूल उगाना अपने आप मे एक अलग व्यवसाय है,उनकी बाकायदा खेती की जाती है लेकिन जो अपने घर के बगीचे की देखभाल के लिये अपना पसीना बहाते हैं वह बड़ी बेसब्री से पौधों पर कलियाँ आने का इंतजार करते हैं फिर उनको खिलते हुये देखने का भी।...इतनी मेहनत वह इसलिये तो नहीं करते कि फूल तोड़-तोड़ कर बाट दें।'
 "शायद आप ठीक कह रहीं हैं दीदी,मैं ने इतनी गहरायी से सोचा ही नही था लेकिन अब इतना समय नही है कि बाजार से फूल ला सकूँ यदि आन्टी ने दे दिया तो बस एक गुलाब का फूल लाऊँगी।'
       दिव्या गुप्ता आन्टी के घर पहुँची तो उसने आन्टी को बगीचे के गेट पर दो बच्चों से बात करते हुये खड़ा पाया।उन के चेहरे पर कुछ उदासी छायी थी।तभी आन्टी  का स्वर उसके कान मे पड़ा-"सॉरी बच्चों मैं फूल नही दे सकती ।पूजा के लिये चाहिये तो भी आपको बाजार जाना चाहिये था।'
 "आन्टी प्लीज बस दो-तीन दे दीजिये न।' 
     उन के चेहरे पर तनिक गुस्सा छा गया था - "इतनी देर से समझा रही हूँ फिर भी नही समझ रहे,अब जाओ यहाँ से।'
     तभी आन्टी की नजर दिव्या पर पड़ी । वह बोली - "देखों दिव्या इन फूल माँगने वालो से मैं परेशान हो गई हूँ, रोज कोइ न कोइ फूल माँगने चला आता है । सबको एक-एक, दो-दो भी देने लगूँ तो मेरे बगीचे में एक भी फूल नही बचेगा।किसी को घर में पूजा के लिये फूल चाहिये तो किसी को मंदिर मे चढ़ाने के लिये,किसी को जन्म दिन के लिये चाहिये तो किसी को अपने लाड़लों की माँग पूरी करने के लिये।...तंग हो गइ हूँ मैं।पहले तो मुझे पता ही नही चलता था और फूल गायब हो जाते थे।अब मै ने  सरकाने वाला गेट लगवाया है जिसे बच्चे आसानी से नही खोल पाते तो बैल बजा-बजा के मुसीबत किये रहते हैं,समझ मे नही आता क्या करूँ ?'
    आन्टी की परेशानी दिव्या समझ रही थी।उसने कहा-"आन्टी एक काम और कर के देखिये।आप गेट पर एक बोर्ड यह लिख कर लगवा दीजिये कि यहाँ फूल तोडना और माँगना दोनो सख्त मना है।...मैं समझती हूँ माँगने वालो की संख्या मे कमी जरूर आयेगी।'
 "ठीक है बेटा यह उपाय भी करके देखती हूँ।'
 लौटते समय दिव्या इस बात से बहुत खुश थी कि वह फूल माँगने की गलती करने से बच गयी थी। उसे अहसास हो गया था कि फूलों की चाहत को माँग कर नही खरीद कर पूरा करना चाहिये .    

 


-पवित्रा अग्रवाल

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रविवार, 10 जून 2018

सोनम की समझदारी

बाल कहानी               
                   सोनम की समझदारी
                                      
                                                           पवित्रा अग्रवाल 

  गर्मी की छुट्टियों में सोनम दिल्ली से अपने मामा के पास हैदराबाद गई हुई थी। उसके मामा ने वहाँ नई कोठी बनवाई थी। परीक्षाओं की वजह से वह गृहप्रवेश के समय नहीं जा पाई थी। कोठी तो बहुत सुंदर थी लेकिन वहाँ थोड़ा सन्नाटा था। आस पास कोई घर इतनी दूरी पर न था कि पुकारने से आवाज वहां पहुँच जाए।
मामा जी को ऑफिस के काम से एक सप्ताह के लिए दिल्ली जाना पड़ा। सोनम उसकी मामी व उनके दो छोटे बच्चे घर में रह गए थे। मामी वैसे तो घर में कई बार अकेली रही हैं किंतु तब वह फ्लैट में रहती थीं। वहाँ कोई डर नहीं था। इस नए मकान में आने के बाद यह पहला अवसर था जब मामा जी को कहीं बाहर जाना पड़ रहा था। जाते समय वह भी कुछ परेशान थे। वह हम सब को खूब समझा-बुझा कर गए थे। पुलिस व परिचितों के नंबर भी दे गए थे।
चार दिन आसानी से कट गए। रोज रात को मामा जी दिल्ली से फोन पर बात कर लेते थे। एक दिन आधी रात को दरवाजे के बाहर कुछ आहट सुन कर मामी की नींद खुल गई। उन्होंने सोनम को भी जगा लिया।
मामी ने दरवाजे पर लगी मैजिक आइ ' में से बाहर देखा तो पाया कि एक आदमी रसोई में लगे एग्जौस्ट फैन को हटाने की कोशिश कर रहा है और दो आदमी उसके पास में खड़े हैं। यदि वह पंखा हट गया तो वह दुबला-पतला आदमी उस रास्ते से रसोई में आराम से प्रवेश पा सकता है बस यही सोच कर मामी ने सबसे पहले रसोई का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया ताकि चोर रसोई से घर के अन्य भाग में न आ पाए।
मामी ने पुलिस को फोन करना चाहा पर फोन उठाते ही वह घबरा कर बोलीं - "अरे सोनम, फोन तो खराब है। अब क्या होगा ? शोर मचाने से भी कोई फायदा नहीं,सब घर दूर-दूर हैं यहाँ कोई हमारी मदद को नहीं आ पाएगा।'
सोनम ने इशारे से मामी को चुप रहने को कहा फिर जोर से बोली - "मामी, दूसरा फोन ठीक है। मैं अभी पुलिस को फोन करती हूँ।'
     वह दरवाजे के पास जाकर जोर से ऐसे बोलने लगी जैसे फोन पर बात कर रही हो, "हैलो, पुलिस स्टेशन...हैलो इंस्पेक्टर साहब, मैं जुबली हिल्स रोड, कोठी नंबर 36 से बोल रही हूँ। हमारे घर में चोर घुस आए हैं...आप जल्दी आइए...क्या कहा...आप का पुलिस दस्ता इस क्षेत्र में गश्त लगा रहा है...अच्छा, आप वायरलेस पर सूचना देकर हमारे पास भेज रहे हैं...क्या, पाँच मिनट में पुलिस यहाँ पहुँच  जाएगी ...धन्यवाद अंकल, हमें बहुत डर लग रहा है...मामी, पुलिस पाँच मिनट में यहाँ पहुँच जाएगी।'
सोनम इतनी जोर से बोल रही थी ताकि बाहर चोरों तक भी उसकी आवाज पहुँच सके।
तभी बाहर भगदड़ की आवाज सुनाई दी, फिर एक कार स्टार्ट करने की आवाज आई।
"मामी, लगता है चोर पूरी तैयारी के साथ कार लेकर आए थे...लेकिन पुलिस के डर से भाग गए।'
"अरे सोनम, तू तो बहुत समझदार निकली। फोन कर ने की एÏक्टग कर के ही चोरों को भगा दिया...यह विचार तेरे दिमाग में आया कहाँ से ?... डर के मारे मेरे तो हाथ-पाँव फूल गए थे।'
"अरे मामी, मैं दिल्ली की लड़की हूँ। इतनी आसानी से हिम्मत नहीं हारती।'
मामी ने स्नेह से उसे अपने सीने से लगा लिया।
    दूसरे दिन पड़ौसियो ने पुलिस में रिपोर्ट कराई।पुलिस को जब सोनम की समझदारी का पता चला तो वह भी दंग रह गई।
जब सोनम के माता-पिता को उसकी सूझबूझ का पता चला तो वे बेहद प्रसन्न हुए। दिल्ली से लौट कर मामा ने उसे शाबाशी देते हुए एक डिजिटल डायरी इनाम में दी।

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गुरुवार, 10 मई 2018

बरफ का गोला

बाल कहानी
            बरफ का गोला                         
                     
                         पवित्रा अग्रवाल 
                          
         स्कूल के गेट से बाहर निकलते ही रंजीता की नजर ठेले पर बिक रहे बर्फ के रंग बिरंगे गोलों पर पड़ी ।गर्मी से बेहाल रंजीता का दिल भी उसे खाने को मचल उठा। उसने अपनी सहेली विपमा से कहा देख लड़कियाँ कैसे चुसकी ले ले कर बर्फ के गोले खा रही हैं ,चल आज अपन भी खाते हैं।'
                "ना बाबा मैं इनको नहीं खाने वाली ।मम्मी ने मुझे कभी नहीं खाने दिया पर एक बार ऐसे ही स्कूल से निकलते हुए मैं ने भी खूब चुस्की ले ले कर इसे खाया था और बीमार पड़ गई थी। कई दिन मुँह से आवाज नहीं निकली थी तब से मैं ने तोबा करली कि इसे कभी नहीं खाना है।'
                "तुम देखो रोज कितने बच्चें इसे खाते हैं और वास्तव में सबसे ज्यादा भीड़ भी इसी के ठेले पर रहती है,वह तो बीमार नहीं पड़ते । तू किसी और वजह से बीमार पड़ी होगी ।'
                "रंजीता सोचने की कई बातें हैं, इसमें से कितने बीमार पड़ते हैं हमें कैसे पता लगेगा ? गला खराब होना, खाँसी जुकाम होना तो अब आम बीमारी बन गई है। तकलीफ हुई और दवा खाली लेकिन हम में से बहुत से यह जानने की कोशिश नहीं करते कि इस के पीछे कहीं हमारे खान पान की आदतें तो नहीं हैं। जब मैं बीमार हुई तो मम्मी डाक्टर के ले गई थीं। डाक्टर ने सब से पहले यही पूछा कि तुमने आइसक्रीम, बाहर का जूस आदि पिया था क्या ?'
                "मुझसे पहले मम्मी ने कहा "हमारे बच्चे बाहर इस तरह की चीजें नहीं खाते पीते हैं' तब मुझे ध्यान आया कि मैं ने कल बर्फ का गोला खाया था।
                "फिर तूने मम्मी को बताया ?'
                "हाँ मैं ने डाक्टर साहब के सामने ही यह बात स्वीकार करली ।मम्मी को बुरा तो लगा पर वह मेरे सच बोलने पर खुश भी हुई ।'
                "बस आपकी इस तकलीफ का कारण यही बर्फ का गोला है' डाक्टर अंकल ने कहा था
                "पर वहाँ तो बहुत बच्चे इसे खाते हैं ।'
                "उनको भी कुछ हुआ या नहीं आपको कैसे पता चलेगा ।.. जो भी माता पिता अपने बच्चों को जुकाम, खॉसी, गले में दर्द  की तकलीफ ले कर यहाँ आते हैं मैं सब से पहले यही प्रश्न पूछता हूँ और अधिकतर मामलों में रोड साइड स्टालों से इस तरह की चीज खाना उनके इंफैक्शन का कारण होता है।'
                "वह लोग सफाई से नहीं बनाते इस लिए ?'
                "हाँ वह भी एक कारण हो सकता है पर तुम लोगों को इस सब से बचना चाहिए खास कर ठण्डी चीजों से जैसे बरफ के गोले, आइसक्रीम आदि में यह खतरा ज्यादा होता है ?
                मैं ने पूछा था -"ऐसा क्यों डाक्टर अंकल ?'
                 "बेटा आपके घर में पानी साफ करने के लिए कोई प्यूरीफायर  है ?'
                "हाँ है और हम तो स्कूल भी अपना पानी ले कर जाते हैं।'
                " ये बर्फ का गोला बेचने वालों की बर्फ साघारण पानी की होती है ,उसमें भी वह रंग बिरंगे सिरप डाल कर उसे और हानिकारक बना देते हैं। ये सिरप अपने रंगों के कारण सब को अपनी तरफ आकर्षित तो करते हैं पर यही बीमारी की जड़ हैं। ये सब से सस्ते वाले रंगों का यह प्रयोग करते हैं । किसी पर यह जल्दी ही असर दिखाते हैं किसी पर धीरे धीरे केंन्सर आदि बीमारी के रूप में गम्भीर असर दिखाते हैं ।'
                "बस रंजीता उस दिन के बाद से मैं इन ठेलों आदि से कुछ नहीं खाती ।'
                "धन्यवाद विपमा आगे से मैं भी इन बातों का घ्यान रखूँगी ।'
 
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सोमवार, 9 अप्रैल 2018

बुरके वाला लड़का

 बाल कहानी                 
                बुरके वाला लड़का                  
                                      पवित्रा अगवाल

     सिनेमा हाल के मैनेजेर ने पुलिस जीप रुकते ही उनकी अगवानी की और कहा-- "सर मैं यहाँ का मैनेजर हूं, मैं ने ही आपको फोन किया था।'
      "ओ के, कहाँ है वह लड़का जिसे आपने में बुरके में पकड़ा है... किस उम्र का होगा ?"
      "सर जो बुरके में था वह तेरह चौदह वर्ष से ज्यादा का नहीं लगता ...साथ में उसका एक साथी भी था,वह सतरह अठारह वर्ष का होगा।हमने दोनो को पकड़ लिया है'
  "  ओ के , वैल डन ...कहाँ हैं  वे दोनो ?"
       "हमारे आफिस में हैं सर ।'
 पुलिस को आता देख कर दोनों लड़के भय से काँपने लगे थे - "हमने कुछ नहीं किया सर ।'
 "वह सब तो बाद में पता चलेगा।पहले अपने अपने नाम बताओ ।'
       छोटा लड़का बोला - सर मेरा नाम यूनुस है और इसका नाम कमाल है।यही पिक्चर का लालच देकर  मुझे  यहाँ लाया था ।'
 "सच सच बताओ तुम इस बच्चें को बुरका पहना कर क्यो लाए थे ,तुम्हें किस ने भेजा था और तुम क्या करना चाहते थे ?'
 "सच मानिए सर यह सिर्फ एक मजाक था ,हम यहाँ कुछ भी गलत नहीं करना चाहते थे ।'
    दोनो लड़कों को दो दो थप्पड़ मारते हुए इंसपैक्टर ने दोनो सिपाहियों से कहा ये यों आसानी से कुबूल करने वाले नहीं हैं । इन सालों को जीप में डाल कर थाने ले चलो, वहीं सच उगलवायेंगे ।'
       दोनो लड़के पैर छू छू कर माफी माँग रहे थे और  छोड़ देने की विनती कर रहे थे।उन्हें पुलिस स्टेशन ले जाया गया।
 तलाशी में उनके पास से कुछ आपत्तिजनक सामान नहीं मिला था, उनसे पूछताछ जारी थी   नाम, पता, पिता का नाम, पिता का व्यवसाय, स्कूल -कालेज की जानकारी इकट्ठी की गई। तुम्हे यहाँ किसने भेजा ....किस उद्देश्य से आए थे बहुत सारे सवाल थे । अनुमान था कि यह जरूर किसी गलत इरादे से सिनेमा हाल गए थे.. हो सकता हैं  कोई आतंकी साजिश रची जा रही हो जिसमें इन लड़कों  को मोहरा बनाया जा रहा हो ।
     बच्चों से नंबर लेकर उनके घर वालों को पुलिस स्टेशन आने को कहा गया।  लडको की पिटाई भी हुई पर वह कुछ बता नहीं पाए।कमाल जो दूसरे लड़के को बुरके  में लाया था  वह बस एक ही बात कहे जा रहा था कि मैं ने अपने दोस्तों को बेवकूफ बनाने के लिए यह नाटक किया था ,यह सब मजाक था और मजाक के सिवाय कुछ नहीं था ।'
      "तुम्हारे साथ तो कोई दोस्त नहीं पकड़ा गया तुम किन्हें बेवकूफ बनाना चाहते थे ?'
     "सर हमें पकड़े जाते देख वह भाग गए ,शायद वे डर गए होंगे ।'
    "तुम्हारे साथ कितने दोस्त थे ?
     "सर हमे छोड़ कर तीन और थे ।'
     "उनके नाम और मोबाइल नंबर दो ।'
 यूनुस और कमाल के पिता और भाई आदि थाने आ गए थे । सब परेशान थे कि यह क्या किया इन लड़कों ने ।आजकल आतंकवाद के चलते वैसे ही शहर में बहुत सख्ती बरती जा रही है और यह लड़के ऐसा कारनामा कर बैठे।खुदा जाने अब क्या होगा। इनकी तो जिन्दगी बरबाद हो जाएगी ।
    पुलिस उनके तीनों दोस्तों को फोन कर रही थी पर सबके स्विच आफ आ रहे थे ।
   पुलिस ने यूनुस और कमाल को जीप में बैठाया और उन लड़को के घर की तरफ चल दिए । एक लड़का तो घर पर मिल गया ,पुलिस उसे उठा लाई ।दो लड़के तलाशी लेने पर भी घर में नहीं मिले तो घरवालों से कहा उन को लेकर तुरन्त थाने पहुँचो वरना  तुम्हें पकड़ लिया जाएगा ।'
      लड़कों के स्कूल जाकर भी जानकारी इकट्ठी की गई ।थोड़ी ही देर में घर वाले उन दोनो लड़को को ले कर थाने पहुँच गए ...पुलिस ने अपनी तरह से उन लड़को से भी अलग अलग पूछताछ की । सब ने करीब करीब एक ही बात कही तो पुलिस को विश्वास हो गया कि लड़के बहुत शरारती हैं पर कोई अपराधी वृत्ति के नहीं हैं पर इस पूरी छानबीन के चलते सबको एक रात जेल में बितानी पड़ी । सब के घर वाले परेशान थे कि केस बन गया तो जाने क्या होगा ,बच्चें निर्दोष भी साबित हुए तो भी पुलिस न जाने कितना धन ऐंठ  लेगी।
    पर पुलिस इंसपैक्टर बहुत समझदार था ,इमानदार भी। पुलिस ने बच्चों को उनकी गल्ती बता कर, धमका कर और उनके माता पिता को चेतावनी देकर उन्हें बिना किसी कानूनी पचड़े में फँसाए छोड़ दिया।
     कमाल से सबने पूछा - "तू इस लड़के को बुरका  पहना कर क्यों ले गया था ?'
 कमाल ने बताया कि उसके कुछ दोस्तों की गर्ल फ्रेण्ड थीं। वह सब मिल कर मुझे  छेड़ते थे कि तेरी कोई गर्ल फ्रेण्ड क्यों नही है । उस मजाक से बचने के लिए मैंने झूठ कहना शुरू कर दिया कि मेरी भी एक गर्ल फ्रेण्ड है पर उसको अपने साथ लेकर यों घूम नहीं सकता ।
 एक दिन दोस्तों ने कहा तू झूठ बोलता है तेरी कोई गर्ल फ्रेण्ड है ही नहीं या फिर तू जरूरत से ज्यादा डरपोक है।..मुझे भी जोश आगया और मैं इस परिचित बच्चे को सिनेमा दिखाने का लालच देकर बुरका पहना कर यहाँ ले आया और दोस्तो से कह दिया था कि मेरी दोस्त मुँह नहीं खोलेगी... किसी परिचित ने उसे  देख लिया तो हम दोनो मुसीबत में पड़ जाएंगे ।.... पर इस बड़ी मुसीबत में फँसने का तो अंदाजा भी नहीं था ।'
      "हाँ बरखुरदार जोश में तुम होश खो बैठे थे, खुदा के फजल से बस बच ही गए वरना...
      "हाँ अब्बा इंसपैक्टर अंकल बहुत नेक थे , अब हम कभी ऐसी शरारतें नहीं करेंगे।''
   
  
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