शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

चिड़िया मैं बन जऊँ

बाल कहानी
                            चिड़िया मैं बन जाऊँ


                                                          -पवित्रा अग्रवाल

              सपना अभी स्कूल से लौटी थी। रोज की तरह उसे बहुत भूख लगी थी। आते ही बोली- "मम्मी बहुत जोर से भूख लग रही है, जल्दी से कुछ खाने को दो न ! '
           मम्मी ने कहा, "तुम हाथ मुँह धोकर कपड़े बदलो। इतनी देर में मैं खाना परोस देती हूँ।'   झटपट सपना ने कपड़े बदले और ड्राइंगरूम में टीवी खोल कर सोफे पर बैठ कर खाना खाने लगी।
     तभी मम्मी आ गई, "सपना यह क्या तरीका है। आते ही जूते कहीं डाले। स्कूल बैग ड्राइंग रूम में पटक रखा है। स्कूल ड्रेस बाथरूम के बाहर पड़ी है। रोज समझाती हूँ कि आते ही अपनी चीजें जगह पर रखो। बेटा मैं भी थक जाती हूँ। तुम मेरी मदद नहीं कर पातीं कोई बात नहीं कम-से-कम मेरे लिए काम तो मत बढ़ाओ। सुबह स्कूल जाते समय फिर शोर मचाती हो कि मोजा नहीं मिल रहा, टाई नहीं मिल रही, कभी जूते नहीं मिल रहे।.... सुबह मैं तुम्हारा टिफिन तैयार करूँ या तुम्हारा सामान ढूँढ़ूँ ?...'
      सपना का लटका मुँह देख कर मम्मी ने पुन: कहा -- "मुझे मालूम है तुम्हें मेरा बोलना अच्छा नहीं लग रहा। आखिर कब तक न बोलूँ ? इतनी बार कहा है खाना ड्राइंग रूम में नहीं, डाइनिंग टेबल पर बैठ कर खाओ। तुम्हें देखकर दूसरे बच्चे भी फिर यहीं खाना चाहते हैं।'
    'मम्मी अभी तो आई हूँ। अभी सब सामान जगह पर रख दूँगी। मेरी पसंद का टीवी प्रोग्राम आ रहा था, इसीलिए खाना यहाँ ले आई।'
 "बेटा ये तो रोज की बात है...।'
    खाना खाते हुए सपना की नजर एक चिड़िया पर पड़ी। वह बरांडे में रखे हुए गेहूँ के दाने चुग रही थी। उसे देखकर सपना सोचने लगी- हमारा भी क्या जीवन है। घड़ी की सुई की तरह बस चलते ही रहो। कितने बंधन हैं... ये करो.. वो मत करो। यहाँ जाओ, वहाँ मत जाओ। खेलने का कितना मन करता है, किंतु होम वर्क पूरा न होने पर स्कूल में सजा मिलती है। स्कूल में टीचर्स के हिसाब से चलना पड़ता है और घर में ये मम्मी-पापा टोका-टाकी करते रहते हैं। हम से अच्छा जीवन तो इन चिड़ियों का है। न माता-पिता की डाँट, न स्कूल, न होम वर्क। अपनी मर्जी की मालिक हैं। इस पेड़ से उस पेड़ पर फुदकती-फिरती हैं। जहाँ दाना देखा उतर कर खा लिया। जहाँ पानी मिला पी लिया। जब मन हुआ तो ऊँचे आकाश में उड़ान भर ली। काश मैं भी चिड़िया होती, कितना मजा आता।
     यही सब सोचते हुए उसने होम वर्क किया। अपना सामान जगह पर रखा। अपना कमरा ठीक किया। रात का खाना खाया और जल्दी ही सोने के लिए बिस्तर पर चली गई। सोते समय भी वह गुनगुना रही थी- 

 चिड़िया मुझे बना दे राम, सुंदर पंख लगा दे राम।                     नील गगन में उड़ जाऊँ, हाथ किसी के न आऊँ।
        उसने देखा वह सचमुच चिड़िया बन गई है। सुंदर-सुंदर दो छोटे से पंख भी निकल आए हैं। पंख देखते ही उसने सोचा क्या वह उड़ पाएगी ? और वह सचमुच उड़ने लगी। ठंडी मंद पवन चल रही थी। नीले आकाश में दूर-दूर तक उड़ान भरते हुए वह बहुत खुश थी। उसे सब कुछ बहुत नया-नया और अच्छा लग रहा था। थोड़ी देर में वह थकान अनुभव करने लगी। भूख भी लग आई थी।
      वह दाने की तलाश में घरों के ऊपर उड़ने लगी। एक छत पर उसने देखा कि दाल सूख रही है। वह दाना चुगने के लिए छत पर उतरने ही वाली थी कि एक महिला दाल उठा कर घर में ले गई .        

     उसने फिर उड़ान भरी उसे कहीं कुछ नहीं मिल रहा था। तभी एक छत पर उसे चावल रखे हुए दिखाई दिए। छत पर उतर कर उसने तीन-चार दाने ही खाए थे कि वहाँ एक बिल्ली आ गई। बिल्ली ने उस पर झपट्टा मारा किंतु किसी तरह वह जान बचा कर उड़ गई।
    अब वह बहुत डर गई थी । उसने सोचा पक्षियों का जीवन भी इतना आसान तो नहीं है, जितना दूर से देखने पर लगता है। उन्हें भी पेट भरने के लिए बड़े खतरे उठाने पड़ते हैं। कभी भूखा प्यासा भी रह जाना पड़ता है। वह थक कर एक पेड़ पर बैठ गई। वहाँ भी उसे एक बिल्ली दिखाई दी। अरे पक्षियों का जीवन तो बहुत असुरक्षित है। ये बिल्ली तो हर जगह पहुँच सकती है।
      तभी उसे ध्यान आया कि उसने कई बार अपने बगीचे में चिड़िया व कबूतर के पंख पड़े देखे हैं। घायल चिड़िया भी देखी है। ये जरूर बिल्ली के शिकार हुए होंगे। यहाँ से भी उड़ना पड़ेगा वर्ना बिल्ली दबोच लेगी। अब कहाँ जाऊँ ? भूख भी लगी है।                    उसे पछतावा हो रहा था कि वह तो अच्छी भली लड़की के रूप में मम्मी-पापा के साथ  रह रही थी। बेकार में ही चिड़िया बन गई।       जब वह बहुत परेशान हो गई तो मम्मी-पापा की याद आई। अरे उसकी सब परेशानियाँ तो मम्मी-पापा चुटकी बजाते ही हल कर देते हैं। उन्हीं के पास जाती हूँ वहीं  खाना खिलाएँगे और बिल्ली से भी बचाएँगे।
      वह उड़कर अपने घर के आँगन में जा बैठी तभी उसका प्यारा टोमी उस की तरफ लपका। वह डर कर किवाड़ पर बैठ गई। उसने देखा मम्मी रो रही थीं। पापा परेशान थे। छोटा भाई उसे सहेलियों के घर ढूँढ़ कर लौटा था। उसने कहना चाहा मम्मी मैं आपकी बेटी सपना हूँ किंतु ये क्या,वह तो चीं चीं करके चिड़िया वाली बोली बोल रही है। मम्मी उसकी बात कैसे समझ सकती हैं। उसने मम्मी के कंधे पर बैठ कर खाना माँगना चाहा किंतु मम्मी ने उसे हाथ से उड़ा दिया।
   अब तो उसे रोना आने लगा था। वह अपनी गलत सोच पर पछता रही थी। मानव जीवन तो सब से श्रेष्ठ है। हे भगवान मुझे फिर से सपना बना दें। मैं चिड़िया बने रहना नहीं चाहती। मेरे मम्मी-पापा बहुत अच्छे हैं। मैं फिर से लड़की बनना चाहती हूँ। उसके रोने की आवाज सुनकर मम्मी दौड़ी-दौड़ी आई- "सपना, तू क्यों रो रही है...? कोई बुरा सपना देखा क्या ?'
 मम्मी की आवाज सुनकर उसने आँखें खोल दीं। अरे वह तो अपने घर में अपने बिस्तर पर सो रही थी। वह सपने में चिड़िया बनी थी ,सचमुच मैं नहीं।
 वह खुश होकर मम्मी से लिपट गई।    


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रविवार, 16 अक्तूबर 2016

यादगार दीपावली

 बाल कहानी
                                 यादगार दीपावली
     
                                                             पवित्रा अग्रवाल


        मेरे दोस्त नन्दू के पिता पटाखों का व्यापार करते हैं। उनका थोक का काम है। एक बार मुझ से नन्दू ने कहा था -"जब पटाखे लेने हों तो मेरे साथ चलना, मैं पापा से कह कर सस्ते दिलवा दूँगा।बाजार में यही पटाखे दुगनी कीमत पर मिलेंगे।'
     मैं ने पटाखों के लिए दो सौ रुपये मम्मी से लिए और दो सौ रुपये मैं ने अपने जेब खर्च में से बचाए थे।वह भी जेब में रख कर नन्दू के घर की तरफ चल दिया।
     नन्दू के घर एक औरत ( जो मुझे उनकी काम वाली लग रही थी ) बैठ कर रो रही थी और नन्दू की बहन से तीन सौ रुपये उधार मॉग रही थी। नन्दू की बहन ने कहा--"बाई बच्चे को सरकारी दवाखाने में ले जाना चाहिए था।वहाँ डॉक्टर की फीस भी नहीं देनी पड़ती और इलाज भी मुफ़्त में हो जाता।जब इलाज के लिए रुपये नहीं थे तो प्राइवेट अस्पताल में बच्चे को क्यों भरती करवा दिया ?'
          "बिटिया ,पहले मैं सरकारी अस्पताल में ही गई थी। वहाँ डॉक्टर साहब नहीं थे, उनका इंतजार करती तो मेरा बेटा मर जाता....उसकी हालत बहुत खराब है। उसे सुबह से उल्टी और दस्त हो रहे हैं। मैं काम पर गई हुई थी। घर जा कर जब उसकी हालत देखी तो घबरा गई और जल्दी से अस्पताल ले कर भागी...मजबूरी में मुझे प्राइवेट अस्पताल ले जाना पड़ा।डॉक्टर साहब ने पर्चा लिख कर दवाएँ जल्दी लाने को कहा है ,उसे ग्लूकोस चढ़ाना है..बिटिया मुझे जल्दी से तीन सौ रुपये दे दो,बहुत मेहरबानी होगी ।'
     "देखो बाई मैं तुम से पहले भी कह चुकी हूँ कि इस समय मम्मी घर पर नहीं हैं।हमारे यहाँ काम करते अभी तुम्हें दस दिन हुए हैं।उन से बिना पूछे तुम्हें तीन सौ रुपये कैसे दे दूँ ? तुम इंतजार कर लो,मम्मी थोड़ी देर में आती होंगी।'
    "पर मैं इंतजार नहीं कर सकती।तब तक तो मेरा बेटा मर जाएगा..मैं जाती हूँ,कही दूसरी जगह कोशिश कर के देखूँगी।' वह आँसू पोंछती हुई घर से बाहर चली गई।
      मैं ने उसे रोक कर डॉक्टर का पर्चा दिखाने को कहा।उस ने मुझे वह पर्चा दिखाया ।पर्चा देख कर मुझे विश्वास हो गया कि वह झूठ नहीं बोल रही है, मैं ने कहा--"तुम मेरे साथ चलो,मैं दवाए अभी दिलवा देता हूँ फिर तुम्हारे साथ डॉक्टर साहब के पास भी चलूँगा।...तुम्हारे पति कहाँ हैं ?'
      वह लंबी आह भर कर बोली--"वह मज़दूरी करता है पर रोज काम नहीं मिलता।कभी मिलता भी है तो उसे शराब पीने में उड़ा देता है।सुबह का गया रात को नशे में धुत्त हो कर लौटता है...नाम का पति है।उस की रोटी का जुगाड़ भी मुझे ही करना पड़ता है।'
     दवाएँ ले कर हम अस्पताल पहुँचे तो कम्पाउडर बोला --"तुमने बहुत देर कर दी..'
     "तो क्या मेरा बेटा....'
  "परेशान मत हो,तुम्हारा बेटा ठीक है।डॉक्टर साहब ने अपने पास से इंजक्शन लगा दिया है और ग्लूकोस भी चढाया जा रहा है।'
     "क्या करती साहब ,घर में एक पैसा नहीं था। कहीं से इंतजाम भी नहीं कर पाई।देवदूत की तरह यह बच्चा मुझे मिल गया।मेरा दुखड़ा सुन कर इसी ने मुझे सब दवाएँ खरीद कर दी हैं।मैं तो इसे जानती भी नहीं हूँ और न ये मुझे जानता है। ये दीपावली के लिए पटाखे खरीदने बाजार जा रहा था ,उन रुपयो से इस बच्चे ने मुझे दवाएँ दिलवा दीं।...देखो न मैं भी कितनी स्वार्थी हूँ... अभी तक इस बच्चे का नाम भी नहीं पूँछा -- "बेटा तुम्हारा नाम क्या है ?'
    "मेरा नाम अभिषेक है, प्यार से सब मुझे अभि कह कर पुकारते हैं।'
  कम्पाउडर ने कहा -- "शाबाश अभिषेक, तुम बहुत अच्छे हो।....क्या तुम्हारे घर में अब डाँट नहीं पड़ेगी ?'
      "कम्पाउडर साहब,ये रुपये तो कल तक पटाखे - बम के रूप में जल कर धुआँ बन जाते। मम्मी कहती हैं कि आतिशबाजी धन की बरबादी तो है ही ,इस से प्रदूषण भी फैलता है।जलने व आग लगने का खतरा भी बना रहता है। उनसे नुकसान ही नुकसान है,फायदा एक भी नहीं।मेरे इन रूपयो का उपयोग देख कर मम्मी बहुत खुश होंगी।'
    बचे हुए रुपये मैं ने बाई को देते हुए कहा-"ये रुपये तुम रख लो,अभी तुम्हें इन की जरूरत पड़ सकती है।तुम्हारा बेटा अब ठीक है,मैं जा रहा हूँ।'
      "बेटा तुम्हारे ये रुपये मुझ पर उधार हैं।मैं थोड़े-थोड़े कर के तुम्हें लौटा दूँगी । तुम नन्दू के दोस्त हो न ? मैं उन के घर काम करती हूँ।'
  "ठीक है।'
   घर में प्रवेश करते ही माँ ने पूँछा--"तू तो पटाखे लेने गया था,खाली हाथ क्यों लौट आया ?'
  "माँ आप कहती हैं न कि पटाखे छुड़ाना रुपयों का धुआँ उड़ाने के समान है। मैं ने आज उन रुपयों से एक गरीब बीमार बच्चे को दवा दिला दी है।सच माँ वह रुपये एक गरीब माँ के आँसू पोंछने के काम आए हैं। यह दीपावली बिना पटाखों के मनाने का मुझे जरा भी मलाल नहीं होगा बल्कि यह दीपावली मुझे हमेशा याद रहेगी।'
  पूरी बात सुन कर मेरी माँ की ऑखों में भी स्नेह के दीप जल उठे।


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गुरुवार, 29 सितंबर 2016

बाल कहानी                    
 

                    जिद्दी टिन्नी

 
                                              पवित्रा अग्रवाल
                                 
                                                                                   
       जब से दादी आई है मानसी के मजे आगये हैं.हर समय   एक ही फरमाइश–‘दादी एक कहानी सुनाओ न .’
‘ ठीक है मानसी पर यह अंतिम कहानी सुना रही हूँ.'

    'ठीक है दादी
'तो सुनो–  एक लड़की थी .उसका नाम टिन्नी था .’
‘दादी टिन्नी उसके घर का नाम था या स्कूल का ?’
‘घर का, घर में सब उसे टिन्नी कह कर बुलाते थे .’
‘और स्कूल में उसका क्या नाम था ?’
‘स्कूल में उसका नाम टीना था . वह मम्मी पापा की अकेली बेटी थी .’
‘मेरी तरह वह भी अकेली थी ?...उसके कोई भाई बहन नहीं था ?’
   ‘हाँ वह अकेली थी .मम्मी पापा उसको बहुत प्यार करते थे इसलिए वह बहुत जिद्दी हो गई थी .वह जो मांगती थी उसे सब एक बार में मिल जाता था .कभी उसका कहा पूरा नहीं होता था तो वह जोर जोर से रोती  थी और कहती थी आप लोग बहुत गंदे हो ,मुझे प्यार नहीं करते .’
   ‘अच्छा टिन्नी ऐसा कहती थी ,मै तो मम्मी पापा से ऐसा कभी नहीं कहती .फिर क्या हुआ दादी ?’
   ‘एक दिन टिन्नी स्कूल से बहुत खुश खुश आई और मम्मी को बताया ‘आज मेरी सहेली तारा का बर्थ डे है .शाम को हमें उनके घर जाना है.’
मम्मी ने कहा -‘टिन्नी आज मेरी तबियत बहुत ख़राब है आज मै नहीं जा पाऊँगी ’
‘आप नहीं जाओगी तो मै कैसे जाउंगी?कुछ भी हो मुझे तो जरुर जाना है कह कर वह जोर जोर से रोने लगी...आप कोई भी मुझे प्यार नहीं करते ...मै जरुर जाउंगी '.
‘फिर वो गई दादी ?’
   ‘हाँ उसकी मम्मी की तबियत बहुत ख़राब थी पर उसे  रोता देख कर उन्हें जाना पड़ा.वहां जाकर मम्मी को  बुखार और तेज हो गया, उनको वोमिटिंग भी होने लगी .मम्मी ने पापा को फोन करके बुलाया .पहले तो पापा गुस्सा हुए की तबियत ख़राब थी तो बर्थ डे में नहीं आना चाहिए था .फिर पापा मम्मी को लेकर हॉस्पिटल गए .वहां डॉक्टर ने मम्मी को भर्ती कर लिया ’                            
'भर्ती  करना क्या होता है दादी ?’
    ‘भर्ती  करना यानि एडमिट कर लिया और कहा दो – तीन दिन उनको हॉस्पिटल में ही रहना पड़ेगा पर बच्चों को हम अन्दर नहीं आने देते .इस लिए आप की बेटी यहाँ नहीं रह सकती .’
    ‘बच्चों को वहां क्यों नहीं रहने देते दादी ?’
‘अस्पताल में बहुत तरह के बीमार रहते हैं.बच्चों को इन्फेक्शन न हो जाये, इसी लिए बच्चों को नहीं आने देते .’
‘उसके पापा को भी तो इन्फेक्शन हो सकता है, उनको क्यों आने दिया ?’
‘मानसी , बच्चों को इन्फेक्शन जल्दी होता है इस लिए नहीं आने देते .’
‘दादी फिर टिन्नी कहाँ रही ?’
‘टिन्नी को उसके पापा उसके चाचा चाची के घर छोड़ आये.’
‘चाचा-चाची किस को कहते हैं दादी ?’
‘पापा के छोटे भाई को चाचा कहते हैं’
‘दादी मेरे चाचा नहीं हैं ?’
‘तुम्हारे पापा के कोई भाई नहीं है, इसलिए तुम्हारे कोई  चाचा नहीं है’
‘मेरी मम्मी बीमार हो गई तो दादी मै कहाँ रहूंगी ?’
‘मानसी मुझे बहुत जोर से निन्नी आ रही है,बीच बीच में तुम इसी तरह सवाल पूछती रही तो कहानी पूरी कैसे होगी ?’
‘ठीक है दादी अब नहीं बोलूंगी ,आप पूरी कहानी सुना दो.’
 ‘मै तो यह भी भूल गई कि मै ने कहानी कहाँ तक सुनाइ थी?’
‘टिन्नी को उसके पापा चाचा-चाची के पास छोड़ कर चले गए .दादी वो साथ जाने को रोई नहीं ?’
‘टिन्नी खूब रोई पर पापा को गुस्सा आगया बोले चलो अपने घर, रात को वहां अकेली रहना,मै सुबह आ जाऊंगा.’ 
‘फिर क्या हुआ दादी ?                                                                                                                                       ‘टिन्नी  ने रोना बंद कर दिया और कहा ठीक है पापा आप जाओ ,सुबह जल्दी आजाना .फिर टिन्नी की  चाची ने उसे खाना खिलाया और प्यार से समझाया की अच्छे बच्चे जिद्द नहीं करते हैं .बताओ जब तुम्हारी मम्मी की तबियत ख़राब थी तो तुमने उन्हें घर में आराम क्यों नहीं करने दिया ?’
  टिन्नी ने कहा --‘मम्मी नहीं जातीं तो मैं भी बर्थ डे में  नहीं जा पाती.’
 चाची ने समझाया - ‘टिन्नी  जब तुम्हें बुखार आता है तो मम्मी तुम्हें स्कूल भेजती हैं ?...नहीं भेजती न ? ...इसी तरह जब मम्मी बीमार थीं तो तुमको कहना चाहिए था कि मम्मी आप आराम करिए, बर्थ डे में नहीं जाऊंगी.कहना चाहिए था न?’
‘हाँ चाची मुझसे गलती हो गई .आगे से जिद्द नहीं करूंगी .’
चाची ने कहा –‘ गुड गर्ल , चलो अब जल्दी से सो जाओ .हो सकता है मम्मी कल सुबह ही आजायें . ‘
‘दादी फिर टिन्नी की मम्मी सुबह आगई थीं ?’
‘हाँ आगई थीं , अब तुम भी जल्दी से सो जाओ मानसी, दादी को भी बहुत जोर से नींद आरही है .’
‘गुड नाइट दादी ,अब आप वापस मत जाना दादी .मम्मी बीमार हुई तो मैं किस के पास रहूंगी ,मेरे तो चाचा –चाची यहाँ कोई भी नहीं रहते हैं.’
‘ ठीक है , अब तुम सो जाओ और दादी को भी सोने दो .बाकी  बात कल  करेंगे ,गुड नाईट मानसी ‘
‘गुड नाईट दादी .’     
                                                                                          

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बुधवार, 17 अगस्त 2016

छोटी सी घटना

बाल कहानी                        छोटी सी घटना         
                                                   
                                                पवित्रा अग्रवाल
 
     शाम हो गई थी। अपना होम वर्क समाप्त करके राहुल घर से बाहर खेलने के लिए निकला ही था कि कोने के घर वाले अंकल उसे मिल गए। उन्होंने पूछा बेटे आपके पापा घर पर हैं ?'
 "हाँ अंकल, आइए पापा घर पर ही हैं' कहकर राहुल ने उन्हें ड्राइंग रूम में बिठाया और पापा को उनके आने की सूचना दी।
  पापा के आते ही नमस्ते-नमस्ते के आदान-प्रदान के बाद अंकल ने पापा से पूछा "पूजा आपकी बेटी है क्या ?'
 "हाँ पूजा मेरी ही बेटी है। क्या किया उसने ? कोई शरारत की है क्या ?' पापा ने पूछा।
 "अजी साहब क्या संस्कार दिए हैं आपने अपनी बेटी को..
 .पापा ने बीच में ही बात काट कर कहा-- "मगर किया क्या उसने ? उससे कोई गलती हो गई ?'
 अंकल बोले-" नहीं साहब गलती कैसी ? बहुत ही अच्छी बेटी है आपकी.... अभी तीन-चार दिन पहले की बात है वह मेरे घर आई और आते ही मुझ से सीधा सवाल किया, "अंकल आप सिगरेट पीते हैं ?'
       मैं तो सकपका गया कि छोटी सी बच्ची मुझसे यह प्रश्न क्यों पूछ रही है। मैंने हाँ में सिर हिलाया। तो उसने दस रुपये का एक नोट मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा "आपके घर के सामने पड़ी यह सिगरेट की खाली डिब्बी मैंने खेलने के लिए उठाई थी। इस डिब्बी के अंदर दस रुपये का यह नोट निकला है, आपका ही होगा।' कहकर उसने वह नोट मेज पर रख दिया। मैंने उसे वह रुपये देने की बहुत कोशिश की और कहा - "इन रुपयों से तुम टॉफ़ी खरीद कर खा लेना...लेकिन उसने नहीं लिए। तब मैंने उससे उसका व पिता का नाम पूछा तो ज्ञात हुआ वह आपकी बेटी है। सात-आठ वर्ष की छोटी सी बच्ची इतने अच्छे संस्कार, सच मैं उससे बहुत प्रभावित हुआ हूँ। उसे मैं अपने क्लब की तरफ से पुरस्कार दिलवाना चाहता हूँ।'
         पापा को यह बात पता नहीं थी, शायद मम्मी को भी नहीं मालूम थी। यहाँ तक कि मुझे भी उस ने नहीं बताया था। पूजा को बुलाकर पूछा तो उसने स्वीकृति में गर्दन हिला दी।
 वो अंकल यह जानकर और भी प्रभावित हुए कि पूजा के लिए ये घटना इतनी साधारण थी कि इसका जिक्र उसने घर में भी नहीं किया। पापा को बहुत बधाई देकर पूजा के सिर पर स्नेह से हाथ फेरते अंकल चले गए।
    राहुल भी अपनी छोटी बहन से बहुत प्रभावित हुआ क्यों कि मम्मी से तो अक्सर वह जिद्द करके कुछ न कुछ खरीदने के लिए पैसे माँगती रहती है। लेकिन जो रुपये उसे सड़क पर पड़े मिले उनको अंदाजा लगा कर उसके मालिक तक पहुँचा आई। उसे जरा भी लालच नहीं आया। वह रख भी लेती तो कोई उसे चोर नहीं कहता । साथ ही राहुल को अपने ऊपर ग्लानि भी हुई कि बाहर की छोड़ो, घर में भी इधर-उधर रखे पैसे उसे मिलते हैं तो वह माँ को बिना बताए उठा लेता है और उन पैसों से टॉफ़ी, बिस्कुट आदि खरीद कर खा लेता है।
 वह सोच रहा था मैं तो पूजा से दो वर्ष बड़ा हूँ और जब-तब अपने बड़े होने का रौब उस पर जमाता रहता हूँ। हम दोनों के माता-पिता एक हैं लेकिन हम दोनों की नीयत में कितना अंतर है ?
 पूजा के साथ घटी इस छोटी सी घटना से राहुल को बहुत प्रेरणा मिली। उसने निश्चय किया कि भविष्य में वह भी इतना ही ईमानदार बनने की कोशिश करेगा। उसे पूजा पर बहुत प्यार आ रहा था। उसने अपनी बहन की बड़े प्यार से पीठ थपथपाई।

        
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शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

धन्यवाद मित्र

बाल कहानी  
                     
                                   धन्यवाद मित्र
                                                                
                                                                   पवित्रा अग्रवाल

      राकेश ने कालेज से लौट कर कपड़े बदले और बैट उठा कर क्रिकेट खेलने के लिए समीर के घर की तरफ चल दिया ,समीर दरवाजे पर ही मिल गया...
 "समीर  कुछ परेशान से दिख रहे हो ,कहीं जा रहे हो क्या ?'
 "हाँ राकेश  अभी अभी खबर मिली है कि ताऊ जी की मौत हो गई है,मम्मी पापा तो उनके पास ही थे।'
 "बीमार थे क्या ?'
 "हाँ कुछ दिन से बीमार चल रहे थे पर ऐसी उम्मीद नहीं थी कि ठीक नहीं होंगे ।'
 "चलो मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ ,मेरा यह बैट अपने घर में रख दो।'
           मौत की खबर सुन कर राकेश के मन मैं कुछ चल रहा था। उसका मन हुआ कि अपने मन की बात समीर को बता दे पर कुछ संकोच भी हो रहा था। कुछ सोचते हुए उसने समीर से पूछा ."तुम्हारे ताऊ जी ने कभी मरने के बाद अपनी आँखें दान करने की बात कही  थी ?'
 "नहीं राकेश मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं है यदि ऐसा कुछ होगा तो ताई जी को पता होगा ।...पर  आजकल पढ़ने में आ रहा है कि बहुत से लोग मरने से पहले अपनी आँखें दान करने की बात घर वालों से कह कर जाते हैं।आज सुबह के अखबार में पढ़ा था कि क्रिकेट खिलाड़ी नवाब पटौदी भी अपनी आखें दान कर गए थे .
 " और तुम्हें मालुम है समीर उनके तो एक ही आँख थी... एक  किसी दुर्घटना में खराब हो गई थी वह एक आँख से भी काफी क्रिकेट खेले और उसे भी दान कर गए।'
    'हाँ यह तो मैं ने भी पढ़ा था राकेश। जागरूक लोग फार्म भरके अपने जीवन काल मे ही नेत्रदान करने की इच्छा सब को बता देते हैं।...पर जो ऐसा नहीं कर पाए हैं क्या उनके घर वाले भी मृत व्यक्ति की आँखे दान कर सकते हैं ?'
   "हाँ इस पुण्य के काम में कोई बाधा नहीं है। मेरी मौसी की कुछ दिन पहले ही मौत हुई थी , उनकी  आँखें भी दान कर दी गई थीं ...जब कि उन्होंने ऐसी कोई इच्छा मरने से पहले व्यक्त नहीं की थी।'
   " राकेश मैं तुम्हारी बात समझ रहा हूँ क्यों न अपने घरवालों को समझा कर मैं ताऊ जी की आँखे भी दान  करने बात करूँ ।...किसी नेत्रहीन  की  जिन्दगी बदल जाएगी। वह इस दुनिया को अपनी आँखों से देख पाएगा।'
 "समीर उन आँखों से एक नहीं दो व्यक्ति देख सकेंगे।'
 - "अच्छा ! दोनो आँखें एक को नहीं बल्कि दो लोगों को एक एक लगाई जाती हैं ?'
 "हाँ।.. यदि नेत्र दान करने हैं तो समीर इसके लिए सब से बढ़िया जगह  अस्पताल ही रहेगी ।डाक्टर्स को अपनी इच्छा बताने पर वह लोग सब प्रबन्ध कर देंगे...पर हमें जल्दी से अस्पताल पहुँचना चाहिए।'
समीर ने पूछा -"क्या नेत्र दान के लिए शव को अस्पताल ले जाना पड़ता है ?'
  "नहीं समीर मौत यदि घर में हुई है तो शव को अस्पताल ले जाने की जरूरत नहीं होती । नेत्र बैंक वालों या इस से संबधित संस्था को समय से सूचित करना पड़ता है आगे फिर वह  सब कर लेते हैं।'
 "क्या इसके लिए डाक्टर्स को कुछ फीस देनी पड़ती है ?'
 "नहीं समीर कुछ नहीं देना पड़ता'
 'आँखे मरने के कितनी देर बाद तक उपयोगी रहती हैं,तुम्हें कुछ पता है ?'
 'हाँ  समीर, मैं ने कहीं पढ़ा था कि 4-5 घन्टे के अन्दर उनको निकाल लेना चाहिए ।'
 "राकेश क्या आँख पूरी निकाल लेते हैं ?'
 'अरे नहीं, आँख नही खाली कोर्नियां ( आँख का काला भाग ) लिया जाता है।'
 " राकेश ,तुम्हें इस विषय में इतनी जानकारी कैसे है ?'
        "मुझे मैगजीन्स और न्यूज पेपर पढ़ने का बहुत शौक है...उस से बहुत ज्ञान बढ़ता है।'
 अस्पताल के बाहर ही समीर के पिता मिल गए थे।
    राकेश व समीर ने उन से नेत्र दान कराने की बात की । उन्होंने ताई जी, उनके बच्चों व कुछ डाक्टर्स से सलाह मशवरा किया ।
     डाक्टर साहब ने कहा --"देखिए आपके पति या बच्चों के  पिता तो जा चुके हैं। अब आप इस शरीर का  क्या करेंगे ?...यहाँ से ले जा कर अग्नि के सुपुर्द कर देंगे । उनके नेत्र भी जल कर खाक हो जाएंगे।पर  आपके नेत्र दान करने से इनकी आँखें किन्हीं दो लोगो के शरीर में जीवित रहेंगी।..दो नेत्र हीन व्यक्ति  जिन्हें रोशनी मिलेगी  वे और उनका परिवार आपको जीवन भर दुआएं देंगे।...निर्णय अब आपको करना है।'
 आखिर सब की सहमति से नेत्र दान कर दिए गए।
    राकेश ने समीर के पापा से कहा-- "अंकल क्या आप ताऊ जी का शोक संदेश, फोटो के साथ समाचार पत्र में छपवाएंगे ?'
 "हाँ बेटा छपवाना है।'
 "तो उसके नीचे यह जरूर लिख दीजिएगा कि नेत्र दान कराया गया ।'
 समीर ने कहा - "इस से क्या होगा राकेश ?'
 "समीर, इस से समाज में जागृति आती है,  कुछ अन्य लोगों को प्रेरणा मिलती है कि वह भी नेत्र दान  कराने के विषय में सोचें ।'
   "तू बहुत दूर की सोचता है...इस नेत्र दान की प्रेरणा भी तू ही है,धन्यवाद दोस्त ।'


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-पवित्रा अग्रवाल