बुधवार, 17 अगस्त 2016

छोटी सी घटना

बाल कहानी                        छोटी सी घटना         
                                                   
                                                पवित्रा अग्रवाल
 
     शाम हो गई थी। अपना होम वर्क समाप्त करके राहुल घर से बाहर खेलने के लिए निकला ही था कि कोने के घर वाले अंकल उसे मिल गए। उन्होंने पूछा बेटे आपके पापा घर पर हैं ?'
 "हाँ अंकल, आइए पापा घर पर ही हैं' कहकर राहुल ने उन्हें ड्राइंग रूम में बिठाया और पापा को उनके आने की सूचना दी।
  पापा के आते ही नमस्ते-नमस्ते के आदान-प्रदान के बाद अंकल ने पापा से पूछा "पूजा आपकी बेटी है क्या ?'
 "हाँ पूजा मेरी ही बेटी है। क्या किया उसने ? कोई शरारत की है क्या ?' पापा ने पूछा।
 "अजी साहब क्या संस्कार दिए हैं आपने अपनी बेटी को..
 .पापा ने बीच में ही बात काट कर कहा-- "मगर किया क्या उसने ? उससे कोई गलती हो गई ?'
 अंकल बोले-" नहीं साहब गलती कैसी ? बहुत ही अच्छी बेटी है आपकी.... अभी तीन-चार दिन पहले की बात है वह मेरे घर आई और आते ही मुझ से सीधा सवाल किया, "अंकल आप सिगरेट पीते हैं ?'
       मैं तो सकपका गया कि छोटी सी बच्ची मुझसे यह प्रश्न क्यों पूछ रही है। मैंने हाँ में सिर हिलाया। तो उसने दस रुपये का एक नोट मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा "आपके घर के सामने पड़ी यह सिगरेट की खाली डिब्बी मैंने खेलने के लिए उठाई थी। इस डिब्बी के अंदर दस रुपये का यह नोट निकला है, आपका ही होगा।' कहकर उसने वह नोट मेज पर रख दिया। मैंने उसे वह रुपये देने की बहुत कोशिश की और कहा - "इन रुपयों से तुम टॉफ़ी खरीद कर खा लेना...लेकिन उसने नहीं लिए। तब मैंने उससे उसका व पिता का नाम पूछा तो ज्ञात हुआ वह आपकी बेटी है। सात-आठ वर्ष की छोटी सी बच्ची इतने अच्छे संस्कार, सच मैं उससे बहुत प्रभावित हुआ हूँ। उसे मैं अपने क्लब की तरफ से पुरस्कार दिलवाना चाहता हूँ।'
         पापा को यह बात पता नहीं थी, शायद मम्मी को भी नहीं मालूम थी। यहाँ तक कि मुझे भी उस ने नहीं बताया था। पूजा को बुलाकर पूछा तो उसने स्वीकृति में गर्दन हिला दी।
 वो अंकल यह जानकर और भी प्रभावित हुए कि पूजा के लिए ये घटना इतनी साधारण थी कि इसका जिक्र उसने घर में भी नहीं किया। पापा को बहुत बधाई देकर पूजा के सिर पर स्नेह से हाथ फेरते अंकल चले गए।
    राहुल भी अपनी छोटी बहन से बहुत प्रभावित हुआ क्यों कि मम्मी से तो अक्सर वह जिद्द करके कुछ न कुछ खरीदने के लिए पैसे माँगती रहती है। लेकिन जो रुपये उसे सड़क पर पड़े मिले उनको अंदाजा लगा कर उसके मालिक तक पहुँचा आई। उसे जरा भी लालच नहीं आया। वह रख भी लेती तो कोई उसे चोर नहीं कहता । साथ ही राहुल को अपने ऊपर ग्लानि भी हुई कि बाहर की छोड़ो, घर में भी इधर-उधर रखे पैसे उसे मिलते हैं तो वह माँ को बिना बताए उठा लेता है और उन पैसों से टॉफ़ी, बिस्कुट आदि खरीद कर खा लेता है।
 वह सोच रहा था मैं तो पूजा से दो वर्ष बड़ा हूँ और जब-तब अपने बड़े होने का रौब उस पर जमाता रहता हूँ। हम दोनों के माता-पिता एक हैं लेकिन हम दोनों की नीयत में कितना अंतर है ?
 पूजा के साथ घटी इस छोटी सी घटना से राहुल को बहुत प्रेरणा मिली। उसने निश्चय किया कि भविष्य में वह भी इतना ही ईमानदार बनने की कोशिश करेगा। उसे पूजा पर बहुत प्यार आ रहा था। उसने अपनी बहन की बड़े प्यार से पीठ थपथपाई।

        
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शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

धन्यवाद मित्र

बाल कहानी  
                     
                                   धन्यवाद मित्र
                                                                
                                                                   पवित्रा अग्रवाल

      राकेश ने कालेज से लौट कर कपड़े बदले और बैट उठा कर क्रिकेट खेलने के लिए समीर के घर की तरफ चल दिया ,समीर दरवाजे पर ही मिल गया...
 "समीर  कुछ परेशान से दिख रहे हो ,कहीं जा रहे हो क्या ?'
 "हाँ राकेश  अभी अभी खबर मिली है कि ताऊ जी की मौत हो गई है,मम्मी पापा तो उनके पास ही थे।'
 "बीमार थे क्या ?'
 "हाँ कुछ दिन से बीमार चल रहे थे पर ऐसी उम्मीद नहीं थी कि ठीक नहीं होंगे ।'
 "चलो मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ ,मेरा यह बैट अपने घर में रख दो।'
           मौत की खबर सुन कर राकेश के मन मैं कुछ चल रहा था। उसका मन हुआ कि अपने मन की बात समीर को बता दे पर कुछ संकोच भी हो रहा था। कुछ सोचते हुए उसने समीर से पूछा ."तुम्हारे ताऊ जी ने कभी मरने के बाद अपनी आँखें दान करने की बात कही  थी ?'
 "नहीं राकेश मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं है यदि ऐसा कुछ होगा तो ताई जी को पता होगा ।...पर  आजकल पढ़ने में आ रहा है कि बहुत से लोग मरने से पहले अपनी आँखें दान करने की बात घर वालों से कह कर जाते हैं।आज सुबह के अखबार में पढ़ा था कि क्रिकेट खिलाड़ी नवाब पटौदी भी अपनी आखें दान कर गए थे .
 " और तुम्हें मालुम है समीर उनके तो एक ही आँख थी... एक  किसी दुर्घटना में खराब हो गई थी वह एक आँख से भी काफी क्रिकेट खेले और उसे भी दान कर गए।'
    'हाँ यह तो मैं ने भी पढ़ा था राकेश। जागरूक लोग फार्म भरके अपने जीवन काल मे ही नेत्रदान करने की इच्छा सब को बता देते हैं।...पर जो ऐसा नहीं कर पाए हैं क्या उनके घर वाले भी मृत व्यक्ति की आँखे दान कर सकते हैं ?'
   "हाँ इस पुण्य के काम में कोई बाधा नहीं है। मेरी मौसी की कुछ दिन पहले ही मौत हुई थी , उनकी  आँखें भी दान कर दी गई थीं ...जब कि उन्होंने ऐसी कोई इच्छा मरने से पहले व्यक्त नहीं की थी।'
   " राकेश मैं तुम्हारी बात समझ रहा हूँ क्यों न अपने घरवालों को समझा कर मैं ताऊ जी की आँखे भी दान  करने बात करूँ ।...किसी नेत्रहीन  की  जिन्दगी बदल जाएगी। वह इस दुनिया को अपनी आँखों से देख पाएगा।'
 "समीर उन आँखों से एक नहीं दो व्यक्ति देख सकेंगे।'
 - "अच्छा ! दोनो आँखें एक को नहीं बल्कि दो लोगों को एक एक लगाई जाती हैं ?'
 "हाँ।.. यदि नेत्र दान करने हैं तो समीर इसके लिए सब से बढ़िया जगह  अस्पताल ही रहेगी ।डाक्टर्स को अपनी इच्छा बताने पर वह लोग सब प्रबन्ध कर देंगे...पर हमें जल्दी से अस्पताल पहुँचना चाहिए।'
समीर ने पूछा -"क्या नेत्र दान के लिए शव को अस्पताल ले जाना पड़ता है ?'
  "नहीं समीर मौत यदि घर में हुई है तो शव को अस्पताल ले जाने की जरूरत नहीं होती । नेत्र बैंक वालों या इस से संबधित संस्था को समय से सूचित करना पड़ता है आगे फिर वह  सब कर लेते हैं।'
 "क्या इसके लिए डाक्टर्स को कुछ फीस देनी पड़ती है ?'
 "नहीं समीर कुछ नहीं देना पड़ता'
 'आँखे मरने के कितनी देर बाद तक उपयोगी रहती हैं,तुम्हें कुछ पता है ?'
 'हाँ  समीर, मैं ने कहीं पढ़ा था कि 4-5 घन्टे के अन्दर उनको निकाल लेना चाहिए ।'
 "राकेश क्या आँख पूरी निकाल लेते हैं ?'
 'अरे नहीं, आँख नही खाली कोर्नियां ( आँख का काला भाग ) लिया जाता है।'
 " राकेश ,तुम्हें इस विषय में इतनी जानकारी कैसे है ?'
        "मुझे मैगजीन्स और न्यूज पेपर पढ़ने का बहुत शौक है...उस से बहुत ज्ञान बढ़ता है।'
 अस्पताल के बाहर ही समीर के पिता मिल गए थे।
    राकेश व समीर ने उन से नेत्र दान कराने की बात की । उन्होंने ताई जी, उनके बच्चों व कुछ डाक्टर्स से सलाह मशवरा किया ।
     डाक्टर साहब ने कहा --"देखिए आपके पति या बच्चों के  पिता तो जा चुके हैं। अब आप इस शरीर का  क्या करेंगे ?...यहाँ से ले जा कर अग्नि के सुपुर्द कर देंगे । उनके नेत्र भी जल कर खाक हो जाएंगे।पर  आपके नेत्र दान करने से इनकी आँखें किन्हीं दो लोगो के शरीर में जीवित रहेंगी।..दो नेत्र हीन व्यक्ति  जिन्हें रोशनी मिलेगी  वे और उनका परिवार आपको जीवन भर दुआएं देंगे।...निर्णय अब आपको करना है।'
 आखिर सब की सहमति से नेत्र दान कर दिए गए।
    राकेश ने समीर के पापा से कहा-- "अंकल क्या आप ताऊ जी का शोक संदेश, फोटो के साथ समाचार पत्र में छपवाएंगे ?'
 "हाँ बेटा छपवाना है।'
 "तो उसके नीचे यह जरूर लिख दीजिएगा कि नेत्र दान कराया गया ।'
 समीर ने कहा - "इस से क्या होगा राकेश ?'
 "समीर, इस से समाज में जागृति आती है,  कुछ अन्य लोगों को प्रेरणा मिलती है कि वह भी नेत्र दान  कराने के विषय में सोचें ।'
   "तू बहुत दूर की सोचता है...इस नेत्र दान की प्रेरणा भी तू ही है,धन्यवाद दोस्त ।'


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-पवित्रा अग्रवाल
 

शुक्रवार, 3 जून 2016

बाल कहानी   

                      कपड़े की थैली क्यों
                                                      
                                                           पवित्रा अग्रवाल

 रतन थैला ले कर घर से बाहर निकला ही था कि उसका दोस्त हर्ष मिल गया ।
 "अरे रतन इस समय यह थैला ले कर कहाँ जा रहे हो ?'
 "माँ ने सब्जी लाने को कहा है। पास में जो सब्जी की दुकान है न,वहीं जा रहा हूँ ।'
 "तुझे सब्जी लेनी आती है ?'
 "सब्जी लेने में क्या है ?'
 "अरे उन से मोल भाव करना पड़ता है,जरा सी नजर बचे तो वह खराब सब्जी तोल देते हैं ।'
 "क्या तू घर के लिए कभी सब्जी नहीं लाता ?'
 "कभी कभी लाता हूँ।अधिकतर मम्मी पापा स्कूटर पर जा कर ले आते हैं।  मम्मी ने एक बार धनिया, पोधीना और मेथी लाने को कहा था।मुझे पहचान नहीं थी..कुछ का कुछ ले आया ।'
 रतन ने शरारत से कहा--" आज मेरे साथ चल,तुझे सब्जी लेना सिखा दूंगा ।'
 हर्ष ने हँसते हुए कहा --"ठीक है गुरू जी'
 सब्जी खरीदते समय हर्ष ने देखा कि रतन थैले में से छोटी छोटी प्लास्टिक की थैलियाँ निकाल कर सब्जी उसमें डलवाता जा रहा था और दुकान वाले से आग्रह कर रहा था कि वह अपनी थैलियों मे न डाले ।
 हर्ष ने कहा -"रतन सब्जी वाले थैलियाँ देते तो हैं तू घर से यह सब क्यों ले कर आया है ?'
 "यह आदत मैं ने अपने पापा से सीखी है।वह हमेशा घर से थैला ले कर जाते हैं।पहले तो वह एक थैले में ही सब सब्जियां रखवा लेते थे पर सब्जी खाली करने में  मम्मी परेशान हो जाती थीं।भिंडी ,सैम ,बीन्स,हरी मिर्च सब सब्जी आपस में मिल जाती थीं फिर उन्हें अलग करने में समय लगता था।तब से घर में पड़ी यह छोटी प्लास्टिक की थैलियां साथ ले कर आने लगे ।थैलियां नहीं होती हैं तो कपड़े की छोटी थैलियां मम्मी ने बहुत सी बना रखी हैं उन्हें ले आते हैं।'
 "कुछ राज्यों ने तो प्लास्टिक की थैलियों पर बैन लगा रखा है।अपने राज्य में तो अभी इसे लागू नहीं किया है।'
 "प्लास्टिक की थैलियां जानवरों के लिए तो कई बार जान लेवा साबित होती हैं।जैसे लोग बासी खाना,सब्जी और फलों के छिलके इन थैलियों में डाल कर बाहर कचरे में फैंक देते हैं ।गायें, भैंसें खाने के चक्कर में कई बार इसे भी निगल जाती हैं। कई बार तो उनकी जान पर बन आती है...इन से नालियाँ चोक हो जाती हैं...और भी बहुत से नुकसान हैं।'
 "हाँ यह सब पढ़ता तो मैं भी रहता हूँ पर इन पर कभी गहराई से सोचा नहीं।अब मैं भी मम्मी से कहूँगा कि कुछ कपड़े की थैलियां बना कर घर में रखलें व एक दो स्कूटर की डिक्की में पड़ी रहने दें।'
 "हाँ हमारे स्कूटर में भी एक दो थैली अलग से रखी रहती हैं। '
 "यार रमन आज तेरे साथ आ कर बड़ा अच्छा लगा ।एक तो मुझ में आत्म विश्वास पैदा हुआ कि मैं भी तेरी तरह सब्जी लाकर माँ की मदद कर सकता हूँ। तूने कितनी अच्छी तरह चुन चुन कर सब्जी ली हैं...मैं तो सब्जी वाले से कहता था यह दे दो, वह दे दो ।घर जा कर पता लगता था कि उसने कुछ खराब सब्जियाँ  भी तोल दीं हैं। दूसरी बात प्लास्टिक की थैलियों का उपयोग भी कम से कम  करना चाहिए ।'
 ' हर्ष तेरा साथ पाकर मुझे भी अच्छा लगा . अब चलें ?'


शुक्रवार, 20 मई 2016

समाधान

बाल कहानी
                                       समाधान

                                                                       पवित्रा अग्रवाल
 

        रत्ना और प्रीति दोनों सहेलियाँ हैं। दोनों एक ही स्कूल में व एक ही कक्षा में पढ़ती हैं। उनके घर भी बहुत दूर नहीं हैं। इन दोनों की मम्मी भी आपस में अच्छी दोस्त बन गई हैं। शाम को रत्ना की मम्मी भी रत्ना के साथ प्रीति के घर चली गई थीं। रत्ना की मम्मी को देखकर प्रीति की मम्मी बहुत खुश हुई।
    चाय पीते हुए दोनों की मम्मी आपस में बातें कर रही थीं । रत्ना की मम्मी ने कहा, "गर्मी की छुट्टियों में तो बच्चे परेशान हो जाते हैं। उनके लिए समय बिताना एक समस्या बन जाती है। घर में दो-तीन भाई-बहन हों तो वे आपस में मन बहला लेते हैं लेकिन रत्ना तो मेरी अकेली संतान है। केबिल कनेक्शन भी मैंने नहीं ले रखा है। इतनी महँगाई में गुजारा मुश्किल होता है। सौ रुपये महीने केबिल वाले को देने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। डिपोजिट अलग से देना होता है। वैसे भी केबिल कनेक्शन हो तो बच्चे टी.वी. के सामने से उठना नहीं चाहते।'
     प्रीति की मम्मी बोली, "हमने केबिल कनेक्शन तो ले रखा था। स्कूल खुलते ही बच्चों को समझा-बुझा कर निकलवा दिया। उन्होंने खुद भी महसूस किया कि केबिल के रहते वह पढ़ाई ठीक से नहीं कर पा रहे और क्लास में पिछड़ रहे हैं। अब गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हुई हैं। दो महीने के लिए कनेक्शन फिर ले लूंगी।'
    "मुझे भी कुछ करना होगा। वर्ना इन छुट्टियों में रत्ना "मैं बोर हो रही हूँ, मन नहीं लग रहा' की रट लगा कर मुझे परेशान कर देगी। कहती हूँ नानी या दादी के पास चली जा तो वह अकेली वहाँ जाने को तैयार नहीं है। मैं छह-सात दिन से ज्यादा नही रुक  सकती वर्ना इसके पापा परेशान हो जाते हैं।'
 प्रीति की मम्मी ने पूछा, "रत्ना को पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ने का शौक नहीं है ?'
 "मैं कोई पत्रिका नहीं लेती, उसे भी पढ़ने का शौक नहीं है।'
 "देखिए बहन शौक तो पैदा करना पड़ता है। शुरू में मेरे बच्चों को भी शौक नहीं था फिर भी मैं उनके लिए पत्रिकाएँ मँगाती थी। वह पन्ने पलटते, तस्वीरें देखते, चुटकुले पढ़ते और रख देते। फिर जब मुझ से कहते मम्मी हम बोर हो रहे हैं तो मैं उन्हें पत्रिका थमा कर कहती, "मैं भी बोर हो रही हूँ  किंतु पढ़ने का मेरे पास समय नहीं है। तुम ये कहानी पढ़ो तो मैं भी सुन लूंगी।' धीरे-धीरे उन्हें पत्रिकाएँ अच्छी लगने लगी। कई बार रात को कहते, "हमें नींद नहीं आ रही है' तब मैं पत्रिका उनके हाथ में दे देती कि इसे पढ़ो, पढ़ते-पढ़ते नींद आ जाएगी। आज हालत ये है कि बिना पढ़े उन्हें नींद नहीं आती। बच्चे पढ़ें या न पढ़ें उनकी उम्र व रुचि के हिसाब से पत्रिकाएँ अवश्य मँगानी चाहिए।'
 "तुम ठीक कह रही हो मैं अब नियमित रूप से उसके लिए बाल पत्रिका मँगाया करूँगी।'
     तभी पास बैठी प्रीति ने कहा, "आंटी दो बाल पत्रिकाएँ तो हमारे यहाँ कई वर्ष से आती हैं। मैंने सभी अंक बहुत सँभाल कर रखे हुए हैं क्योंकि रत्ना ने उन्हें नहीं पढ़ा है तो उसके लिए तो वह नई के समान ही हैं वह मुझ से लेकर पढ़ सकती है।.... आप भी पत्रिका मँगाने को कह रही हैं तो आप वह पत्रिका मँगाना जो मैं नहीं मँगाती, इस तरह हम आपस में बदल कर पढ़ लेंगे।'
 "हाँ प्रीति तुम्हारा सुझाव बहुत अच्छा है। हम ऐसा ही करेंगे।'
 प्रीति ने दो पत्रिकाएँ रत्ना को देते हुए कहा, "इन्हें पढ़ने के बाद मुझे वापस कर देना और फिर दूसरी दो ले जाना।'
 पत्रिका लेकर रत्ना घर चली गई। दूसरे दिन शाम को प्रीति रत्ना का इंतजार करती रही क्योंकि वह रोज खेलने आती थी। रत्ना को न आते देख प्रीति उसके घर चली गई।
"आंटी रत्ना कहाँ है ? आज तो वह खेलने भी नहीं आयी।'
 "अरे बेटा वह तो तुम्हारी दी पत्रिकाओं को पढ़ने में इतनी मस्त है कि उसके पास बोर होने को समय ही नहीं है। बैठी होगी अपने कमरे में...सच बेटा तुमने तो हम दोनों की परेशानी का समाधान कर दिया।'
 रत्ना से पत्रिका छीनते हुए प्रीति बोली -- "अरे मैंने पत्रिका इसलिए तो नहीं दी थी कि तुम मुझे ही भूल जाओ। चलो खेलेंगे, बाद में पढ़ना।'
 पत्रिका वहीं रख कर दोनों खेलने चल दी थीं।
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गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

पानी क्या ड्रम पी गया

बाल कहानी                              
             पानी क्या ड्रम पी गया ?
 
                                           पवित्रा अग्रवाल

                                                                                                                                                                                                                                      ट्यूशन   सुबह सुबह ट्यूशन पढ़ कर अनूप घर आया तो मम्मी बहुत गुस्से में थीं .बैग रखते हुए उसने पूछा “मम्मी आज सुबह सुबह इतने गुस्से में क्यों हो ?.पापा तो बाहर गए हुए हैं ,तो क्या  दादी से झगडा हुआ है ?” 
‘नहीं .’
‘तब तो फिर जरुर ऊपर वाली आंटी से हुआ होगा पर क्यों मम्मी ?
“क्यों कि तेरी मम्मी को झगडा करने की आदत है ‘
‘मैं ने ऐसा तो नहीं कहा ,...बताओ न मम्मी आप इतने गुस्से में क्यों हैं ?’
    “गुस्सा नहीं आएगा तो और क्या होगा ? किराये का मकान है, इस में बोरवैल भी नहीं है . अपना मकान होता तो कब का बोरिंग करा लेती .शहर में पानी की कितनी किल्लत है सब जानते हैं ...एक दिन छोड़ कर पानी आता है,जब मैं उठी तो ड्रम खाली पड़ा था .मैंने सोचा आज पानी नहीं आया होगा पर मंदिर से आकर दादी ने बताया कि उनके मंदिर जाते समय  ड्रम भरने वाला था पर इस समय वह एकदम खाली है. आखिर पानी कहाँ गया ? ऊपर वालों के सिवाय और कौन ले सकता है ?”
‘मम्मी वह लोग तो मोटर लगा कर पानी चढाते हैं ,क्या आपने मोटर की आवाज सुनी थी ?”
‘नहीं मोटर की आवाज तो मैं ने नहीं सुनी ’
‘तो आप क्या समझती हैं... आंटी आपके ड्रम में से बाल्टी भर भर कर ऊपर पानी ले गई होंगी ?’
‘यह सब मैं  नहीं जानती पर कोई तो पानी लेकर गया है ?’
       तभी ऊपर वाली आंटी आगई – ‘अनूप आप की मम्मी तो लड़ने के बहाने ढूँढती रहती हैं ,ड्रम खाली देख कर इन्होंने नीचे से चिल्ला चिल्ला कर लड़ना शुरू कर दिया ...हमने तो आज एक बाल्टी पानी भी नहीं भरा है .सुबह सुबह इतना अच्छा प्रेशर होता है कि बिना मोटर चलाये ही  हमारा ड्रम भर सकता है पर पानी आते ही आप की दादी नल खोल लेती हैं तो पानी ऊपर नहीं चढ़ पाता और बाद में हमें मोटर से पानी चढ़ाना पड़ता है और कभी करेंट चला जाये तो बहुत मुश्किल होती है .लेकिन रोज रोज की किटकिट से बचने के लिए हमने कुछ भी कहना छोड़ दिया है .अब भी इनको चैन नहीं है ,अब तो हम पर पानी की चोरी का इल्जाम भी लगा रही हैं . कुछ दिन चैन से रह लेने दो , हम जल्दी ही दूसरे मकान में चले जायेंगे .’
   “मैं इल्जाम नहीं लगा रही .अनूप अब तू ही बता या तो दादी झूठ बोल रही हैं या फिर पानी को ड्रम पी गया ”
“एक मिनट मम्मी ,जब आप कमरे से बाहर आई  तो पाइप ड्रम के अन्दर था या बाहर पड़ा था ?”
“पाइप तो ड्रम के अन्दर ही था ”
“नल खुला था या बंद था ?”
'खुला था '.
'नल में पानी आरहा था या जा चुका था ?'
'पानी तो जा चुका था .'
तब तो बात साफ है कि ड्रम का पानी किसी ने नहीं लिया है .
तब पानी गया कहाँ ,क्या ड्रम पी गया ?
पानी ड्रम ने नहीं नल ने पिया है
अनूप यह मजाक का समय नहीं है
मै मजाक नहीं कर रहा ,सच बोल रहा हूँ मम्मी .
'मैंने भी यही कहा था कि पानी नल में वापस चला गया है पर आपकी मम्मी तो कुछ सुनने को तैयार ही नहीं थीं”
मम्मी अभी ड्रम में कितना पानी बचा है ?
चौथाई ड्रम पानी है, दो दिन कैसे काम चलेगा ?
“मम्मी ड्रम में पाइप जहाँ तक डूबा था उतना पानी वापस नल में चला गया .और जो पानी पाइप से नीचे था वह बच गया ...और दादी मंदिर जाने से पहले आप नल बंद कर देतीं तो हमारा ड्रम खाली नहीं होता और ऊपर वाली आंटी को भी कुछ पानी मिल जाता . ‘सॉरी आंटी .मम्मी की तरफ से मैं आप से माफ़ी मांगता हूँ’ ....मम्मी आप भी थोडा सब्र से काम लिया करो .आगे से ध्यान रखो ड्रम में पाइप थोडा ही डूबने दो ताकि नल जाने पर पानी वापस न लौटे . दूसरी बात ड्रम भरते ही पाइप हटा कर नल बंद कर देना चाहिए  वरना आप के उठने तक पानी नाली में व्यर्थ ही बहता रहेगा और यह पानी की भयंकर बर्बादी है.जो किसी हालत में नहीं होनी चाहिए  और आंटी भी तो हमारी तरह किरायेदार हैं , पानी उन्हें भी तो मिलना  चाहिए .”
                                                
( यह कहानी नवम्बर 15 की  नंदन पत्रिका में छपी थी )
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