रविवार, 10 जून 2018

सोनम की समझदारी

बाल कहानी               
                   सोनम की समझदारी
                                      
                                                           पवित्रा अग्रवाल 

  गर्मी की छुट्टियों में सोनम दिल्ली से अपने मामा के पास हैदराबाद गई हुई थी। उसके मामा ने वहाँ नई कोठी बनवाई थी। परीक्षाओं की वजह से वह गृहप्रवेश के समय नहीं जा पाई थी। कोठी तो बहुत सुंदर थी लेकिन वहाँ थोड़ा सन्नाटा था। आस पास कोई घर इतनी दूरी पर न था कि पुकारने से आवाज वहां पहुँच जाए।
मामा जी को ऑफिस के काम से एक सप्ताह के लिए दिल्ली जाना पड़ा। सोनम उसकी मामी व उनके दो छोटे बच्चे घर में रह गए थे। मामी वैसे तो घर में कई बार अकेली रही हैं किंतु तब वह फ्लैट में रहती थीं। वहाँ कोई डर नहीं था। इस नए मकान में आने के बाद यह पहला अवसर था जब मामा जी को कहीं बाहर जाना पड़ रहा था। जाते समय वह भी कुछ परेशान थे। वह हम सब को खूब समझा-बुझा कर गए थे। पुलिस व परिचितों के नंबर भी दे गए थे।
चार दिन आसानी से कट गए। रोज रात को मामा जी दिल्ली से फोन पर बात कर लेते थे। एक दिन आधी रात को दरवाजे के बाहर कुछ आहट सुन कर मामी की नींद खुल गई। उन्होंने सोनम को भी जगा लिया।
मामी ने दरवाजे पर लगी मैजिक आइ ' में से बाहर देखा तो पाया कि एक आदमी रसोई में लगे एग्जौस्ट फैन को हटाने की कोशिश कर रहा है और दो आदमी उसके पास में खड़े हैं। यदि वह पंखा हट गया तो वह दुबला-पतला आदमी उस रास्ते से रसोई में आराम से प्रवेश पा सकता है बस यही सोच कर मामी ने सबसे पहले रसोई का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया ताकि चोर रसोई से घर के अन्य भाग में न आ पाए।
मामी ने पुलिस को फोन करना चाहा पर फोन उठाते ही वह घबरा कर बोलीं - "अरे सोनम, फोन तो खराब है। अब क्या होगा ? शोर मचाने से भी कोई फायदा नहीं,सब घर दूर-दूर हैं यहाँ कोई हमारी मदद को नहीं आ पाएगा।'
सोनम ने इशारे से मामी को चुप रहने को कहा फिर जोर से बोली - "मामी, दूसरा फोन ठीक है। मैं अभी पुलिस को फोन करती हूँ।'
     वह दरवाजे के पास जाकर जोर से ऐसे बोलने लगी जैसे फोन पर बात कर रही हो, "हैलो, पुलिस स्टेशन...हैलो इंस्पेक्टर साहब, मैं जुबली हिल्स रोड, कोठी नंबर 36 से बोल रही हूँ। हमारे घर में चोर घुस आए हैं...आप जल्दी आइए...क्या कहा...आप का पुलिस दस्ता इस क्षेत्र में गश्त लगा रहा है...अच्छा, आप वायरलेस पर सूचना देकर हमारे पास भेज रहे हैं...क्या, पाँच मिनट में पुलिस यहाँ पहुँच  जाएगी ...धन्यवाद अंकल, हमें बहुत डर लग रहा है...मामी, पुलिस पाँच मिनट में यहाँ पहुँच जाएगी।'
सोनम इतनी जोर से बोल रही थी ताकि बाहर चोरों तक भी उसकी आवाज पहुँच सके।
तभी बाहर भगदड़ की आवाज सुनाई दी, फिर एक कार स्टार्ट करने की आवाज आई।
"मामी, लगता है चोर पूरी तैयारी के साथ कार लेकर आए थे...लेकिन पुलिस के डर से भाग गए।'
"अरे सोनम, तू तो बहुत समझदार निकली। फोन कर ने की एÏक्टग कर के ही चोरों को भगा दिया...यह विचार तेरे दिमाग में आया कहाँ से ?... डर के मारे मेरे तो हाथ-पाँव फूल गए थे।'
"अरे मामी, मैं दिल्ली की लड़की हूँ। इतनी आसानी से हिम्मत नहीं हारती।'
मामी ने स्नेह से उसे अपने सीने से लगा लिया।
    दूसरे दिन पड़ौसियो ने पुलिस में रिपोर्ट कराई।पुलिस को जब सोनम की समझदारी का पता चला तो वह भी दंग रह गई।
जब सोनम के माता-पिता को उसकी सूझबूझ का पता चला तो वे बेहद प्रसन्न हुए। दिल्ली से लौट कर मामा ने उसे शाबाशी देते हुए एक डिजिटल डायरी इनाम में दी।

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गुरुवार, 10 मई 2018

बरफ का गोला

बाल कहानी
            बरफ का गोला                         
                     
                         पवित्रा अग्रवाल 
                          
         स्कूल के गेट से बाहर निकलते ही रंजीता की नजर ठेले पर बिक रहे बर्फ के रंग बिरंगे गोलों पर पड़ी ।गर्मी से बेहाल रंजीता का दिल भी उसे खाने को मचल उठा। उसने अपनी सहेली विपमा से कहा देख लड़कियाँ कैसे चुसकी ले ले कर बर्फ के गोले खा रही हैं ,चल आज अपन भी खाते हैं।'
                "ना बाबा मैं इनको नहीं खाने वाली ।मम्मी ने मुझे कभी नहीं खाने दिया पर एक बार ऐसे ही स्कूल से निकलते हुए मैं ने भी खूब चुस्की ले ले कर इसे खाया था और बीमार पड़ गई थी। कई दिन मुँह से आवाज नहीं निकली थी तब से मैं ने तोबा करली कि इसे कभी नहीं खाना है।'
                "तुम देखो रोज कितने बच्चें इसे खाते हैं और वास्तव में सबसे ज्यादा भीड़ भी इसी के ठेले पर रहती है,वह तो बीमार नहीं पड़ते । तू किसी और वजह से बीमार पड़ी होगी ।'
                "रंजीता सोचने की कई बातें हैं, इसमें से कितने बीमार पड़ते हैं हमें कैसे पता लगेगा ? गला खराब होना, खाँसी जुकाम होना तो अब आम बीमारी बन गई है। तकलीफ हुई और दवा खाली लेकिन हम में से बहुत से यह जानने की कोशिश नहीं करते कि इस के पीछे कहीं हमारे खान पान की आदतें तो नहीं हैं। जब मैं बीमार हुई तो मम्मी डाक्टर के ले गई थीं। डाक्टर ने सब से पहले यही पूछा कि तुमने आइसक्रीम, बाहर का जूस आदि पिया था क्या ?'
                "मुझसे पहले मम्मी ने कहा "हमारे बच्चे बाहर इस तरह की चीजें नहीं खाते पीते हैं' तब मुझे ध्यान आया कि मैं ने कल बर्फ का गोला खाया था।
                "फिर तूने मम्मी को बताया ?'
                "हाँ मैं ने डाक्टर साहब के सामने ही यह बात स्वीकार करली ।मम्मी को बुरा तो लगा पर वह मेरे सच बोलने पर खुश भी हुई ।'
                "बस आपकी इस तकलीफ का कारण यही बर्फ का गोला है' डाक्टर अंकल ने कहा था
                "पर वहाँ तो बहुत बच्चे इसे खाते हैं ।'
                "उनको भी कुछ हुआ या नहीं आपको कैसे पता चलेगा ।.. जो भी माता पिता अपने बच्चों को जुकाम, खॉसी, गले में दर्द  की तकलीफ ले कर यहाँ आते हैं मैं सब से पहले यही प्रश्न पूछता हूँ और अधिकतर मामलों में रोड साइड स्टालों से इस तरह की चीज खाना उनके इंफैक्शन का कारण होता है।'
                "वह लोग सफाई से नहीं बनाते इस लिए ?'
                "हाँ वह भी एक कारण हो सकता है पर तुम लोगों को इस सब से बचना चाहिए खास कर ठण्डी चीजों से जैसे बरफ के गोले, आइसक्रीम आदि में यह खतरा ज्यादा होता है ?
                मैं ने पूछा था -"ऐसा क्यों डाक्टर अंकल ?'
                 "बेटा आपके घर में पानी साफ करने के लिए कोई प्यूरीफायर  है ?'
                "हाँ है और हम तो स्कूल भी अपना पानी ले कर जाते हैं।'
                " ये बर्फ का गोला बेचने वालों की बर्फ साघारण पानी की होती है ,उसमें भी वह रंग बिरंगे सिरप डाल कर उसे और हानिकारक बना देते हैं। ये सिरप अपने रंगों के कारण सब को अपनी तरफ आकर्षित तो करते हैं पर यही बीमारी की जड़ हैं। ये सब से सस्ते वाले रंगों का यह प्रयोग करते हैं । किसी पर यह जल्दी ही असर दिखाते हैं किसी पर धीरे धीरे केंन्सर आदि बीमारी के रूप में गम्भीर असर दिखाते हैं ।'
                "बस रंजीता उस दिन के बाद से मैं इन ठेलों आदि से कुछ नहीं खाती ।'
                "धन्यवाद विपमा आगे से मैं भी इन बातों का घ्यान रखूँगी ।'
 
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सोमवार, 9 अप्रैल 2018

बुरके वाला लड़का

 बाल कहानी                 
                बुरके वाला लड़का                  
                                      पवित्रा अगवाल

     सिनेमा हाल के मैनेजेर ने पुलिस जीप रुकते ही उनकी अगवानी की और कहा-- "सर मैं यहाँ का मैनेजर हूं, मैं ने ही आपको फोन किया था।'
      "ओ के, कहाँ है वह लड़का जिसे आपने में बुरके में पकड़ा है... किस उम्र का होगा ?"
      "सर जो बुरके में था वह तेरह चौदह वर्ष से ज्यादा का नहीं लगता ...साथ में उसका एक साथी भी था,वह सतरह अठारह वर्ष का होगा।हमने दोनो को पकड़ लिया है'
  "  ओ के , वैल डन ...कहाँ हैं  वे दोनो ?"
       "हमारे आफिस में हैं सर ।'
 पुलिस को आता देख कर दोनों लड़के भय से काँपने लगे थे - "हमने कुछ नहीं किया सर ।'
 "वह सब तो बाद में पता चलेगा।पहले अपने अपने नाम बताओ ।'
       छोटा लड़का बोला - सर मेरा नाम यूनुस है और इसका नाम कमाल है।यही पिक्चर का लालच देकर  मुझे  यहाँ लाया था ।'
 "सच सच बताओ तुम इस बच्चें को बुरका पहना कर क्यो लाए थे ,तुम्हें किस ने भेजा था और तुम क्या करना चाहते थे ?'
 "सच मानिए सर यह सिर्फ एक मजाक था ,हम यहाँ कुछ भी गलत नहीं करना चाहते थे ।'
    दोनो लड़कों को दो दो थप्पड़ मारते हुए इंसपैक्टर ने दोनो सिपाहियों से कहा ये यों आसानी से कुबूल करने वाले नहीं हैं । इन सालों को जीप में डाल कर थाने ले चलो, वहीं सच उगलवायेंगे ।'
       दोनो लड़के पैर छू छू कर माफी माँग रहे थे और  छोड़ देने की विनती कर रहे थे।उन्हें पुलिस स्टेशन ले जाया गया।
 तलाशी में उनके पास से कुछ आपत्तिजनक सामान नहीं मिला था, उनसे पूछताछ जारी थी   नाम, पता, पिता का नाम, पिता का व्यवसाय, स्कूल -कालेज की जानकारी इकट्ठी की गई। तुम्हे यहाँ किसने भेजा ....किस उद्देश्य से आए थे बहुत सारे सवाल थे । अनुमान था कि यह जरूर किसी गलत इरादे से सिनेमा हाल गए थे.. हो सकता हैं  कोई आतंकी साजिश रची जा रही हो जिसमें इन लड़कों  को मोहरा बनाया जा रहा हो ।
     बच्चों से नंबर लेकर उनके घर वालों को पुलिस स्टेशन आने को कहा गया।  लडको की पिटाई भी हुई पर वह कुछ बता नहीं पाए।कमाल जो दूसरे लड़के को बुरके  में लाया था  वह बस एक ही बात कहे जा रहा था कि मैं ने अपने दोस्तों को बेवकूफ बनाने के लिए यह नाटक किया था ,यह सब मजाक था और मजाक के सिवाय कुछ नहीं था ।'
      "तुम्हारे साथ तो कोई दोस्त नहीं पकड़ा गया तुम किन्हें बेवकूफ बनाना चाहते थे ?'
     "सर हमें पकड़े जाते देख वह भाग गए ,शायद वे डर गए होंगे ।'
    "तुम्हारे साथ कितने दोस्त थे ?
     "सर हमे छोड़ कर तीन और थे ।'
     "उनके नाम और मोबाइल नंबर दो ।'
 यूनुस और कमाल के पिता और भाई आदि थाने आ गए थे । सब परेशान थे कि यह क्या किया इन लड़कों ने ।आजकल आतंकवाद के चलते वैसे ही शहर में बहुत सख्ती बरती जा रही है और यह लड़के ऐसा कारनामा कर बैठे।खुदा जाने अब क्या होगा। इनकी तो जिन्दगी बरबाद हो जाएगी ।
    पुलिस उनके तीनों दोस्तों को फोन कर रही थी पर सबके स्विच आफ आ रहे थे ।
   पुलिस ने यूनुस और कमाल को जीप में बैठाया और उन लड़को के घर की तरफ चल दिए । एक लड़का तो घर पर मिल गया ,पुलिस उसे उठा लाई ।दो लड़के तलाशी लेने पर भी घर में नहीं मिले तो घरवालों से कहा उन को लेकर तुरन्त थाने पहुँचो वरना  तुम्हें पकड़ लिया जाएगा ।'
      लड़कों के स्कूल जाकर भी जानकारी इकट्ठी की गई ।थोड़ी ही देर में घर वाले उन दोनो लड़को को ले कर थाने पहुँच गए ...पुलिस ने अपनी तरह से उन लड़को से भी अलग अलग पूछताछ की । सब ने करीब करीब एक ही बात कही तो पुलिस को विश्वास हो गया कि लड़के बहुत शरारती हैं पर कोई अपराधी वृत्ति के नहीं हैं पर इस पूरी छानबीन के चलते सबको एक रात जेल में बितानी पड़ी । सब के घर वाले परेशान थे कि केस बन गया तो जाने क्या होगा ,बच्चें निर्दोष भी साबित हुए तो भी पुलिस न जाने कितना धन ऐंठ  लेगी।
    पर पुलिस इंसपैक्टर बहुत समझदार था ,इमानदार भी। पुलिस ने बच्चों को उनकी गल्ती बता कर, धमका कर और उनके माता पिता को चेतावनी देकर उन्हें बिना किसी कानूनी पचड़े में फँसाए छोड़ दिया।
     कमाल से सबने पूछा - "तू इस लड़के को बुरका  पहना कर क्यों ले गया था ?'
 कमाल ने बताया कि उसके कुछ दोस्तों की गर्ल फ्रेण्ड थीं। वह सब मिल कर मुझे  छेड़ते थे कि तेरी कोई गर्ल फ्रेण्ड क्यों नही है । उस मजाक से बचने के लिए मैंने झूठ कहना शुरू कर दिया कि मेरी भी एक गर्ल फ्रेण्ड है पर उसको अपने साथ लेकर यों घूम नहीं सकता ।
 एक दिन दोस्तों ने कहा तू झूठ बोलता है तेरी कोई गर्ल फ्रेण्ड है ही नहीं या फिर तू जरूरत से ज्यादा डरपोक है।..मुझे भी जोश आगया और मैं इस परिचित बच्चे को सिनेमा दिखाने का लालच देकर बुरका पहना कर यहाँ ले आया और दोस्तो से कह दिया था कि मेरी दोस्त मुँह नहीं खोलेगी... किसी परिचित ने उसे  देख लिया तो हम दोनो मुसीबत में पड़ जाएंगे ।.... पर इस बड़ी मुसीबत में फँसने का तो अंदाजा भी नहीं था ।'
      "हाँ बरखुरदार जोश में तुम होश खो बैठे थे, खुदा के फजल से बस बच ही गए वरना...
      "हाँ अब्बा इंसपैक्टर अंकल बहुत नेक थे , अब हम कभी ऐसी शरारतें नहीं करेंगे।''
   
  
ईमेल --   agarwalpavitra78@gmail.com
 


मंगलवार, 6 मार्च 2018

एक मोहल्ला,एक ही होली

बाल कहानी
         एक मोहल्ला,एक ही होली

                                            पवित्रा अग्रवाल 

     एम. रमेश राव के पिता आठ महीने पहले ही हैदराबाद से ट्रांसफर होकर उत्तर प्रदेश के इस शहर में आए थे। होली का त्यौहार आने वाला था। रमेश राव कुछ ज्यादा ही उत्साहित था। हैदराबाद में होली इतने धूमधाम से नहीं मनाई जाती, जितने उत्साह से उत्तर प्रदेश में मनाई जाती है। वहाँ तो रमेश ने कभी होली जलते हुए भी नहीं देखी थी।
            उसके मोहल्ले के सभी मित्रों ने पंद्रह दिन पहले से होली की तैयारियां  शुरू कर दीं। सबने नए कपड़े खरीदे थे। होली के तीन-चार दिन पहले से सबके घरों में तरह-तरह की मिठाइयाँ और पकवान बनने प्रारंभ हो गए थे। मोहल्ले के सभी बच्चे घर-घर जाकर होली के लिए चंदा इकट्ठा करने में लगे थे। कभी-कभी रमेश भी उनके साथ चला जाता था। कम चंदा दिए जाने पर सब अधिक देने के लिए आग्रह करते थे, "अरे अंकल इतने कम से काम नहीं चलेगा। लकड़ी के भाव तो देखिए। कितनी महँगी हो गई है।'
     फिर सभी मिल कर रमेश राव के घर भी गए। रमेश के माता-पिता ने बच्चों को बहुत प्यार से नाश्ता करवाया लेकिन चंदा माँगने पर रमेश के पापा ने साफ मना कर दिया।
उन्होंने पूछा- "बच्चों यह तो बताओ इस मोहल्ले में कितनी जगह होली जलाई जाती है ? सुबह से पाँच-छह ग्रुप  चंदा माँगने आ चुके हैं।'
    "अंकल एक तो मोहल्ले की बड़ी होली जलती है, जो बहुत वर्षों से जलती आ रही है। अब लोग अपनी-अपनी गली और फ्लैट्स के अपार्टमेंट में अलग-अलग भी जलाने लगे हैं।'
    "यह तो गलत है न। होली में लकड़ी जलाई जाती है और लकड़ी के लिए जंगल काटने पड़ते हैं। जितनी ज्यादा संख्या में होली जलाई जाएगी। उतनी ही ज्यादा लकड़ी भी जलेगी।....एक मोहल्ले में एक से ज्यादा होली नहीं जलाई जानी चाहिए। गरीबों को खाना बनाने के लिए लकड़ी नहीं मिल पाती क्योंकि बहुत महँगी है और यहाँ होली जलाने के नाम पर देश में लाखों टन लकड़ी मिनटों में जला कर राख कर दी जाती है।...इस लकड़ी के जलाए जाने से हमारा-तुम्हारा, समाज का, देश का कोई लाभ नहीं होता बल्कि नुकसान ही होता है।...देश की हालत देखते हुए मैं इस तरह लकड़ी जलाए जाने के सख्त खिलाफ हूँ। हमें तो पेड़ों की, जंगलों की रक्षा करनी चाहिए।...बोलो बच्चों क्या मैं गलत कह रहा हूँ ?'
  'आप ठीक कह रहे है अंकल ।'
   "बच्चों होली का मुख्य उद्देश्य आपसी बैर भाव भूल कर दोस्ती, सद्भाव बढ़ाना होना चाहिए। हाँ यदि तुम लोग यह चंदा किसी जरूरतमंद की मदद करने या किसी अच्छे काम के लिए माँगते तो मैं सबसे पहले देता।'
      रमेश राव के दोस्त बिना चंदा पाए लौट गए। रमेश राव बहुत उदास था। उसके दोस्त पापा के विषय में क्या सोचेंगे। पापा को ऐसा नहीं करना चाहिए था।
 दूसरे दिन रमेश अपनी पाकेट मनी के बचाए गए रुपयों में से पचास रुपये अपने दोस्तों को देने गया और अपने पापा के चंदा न दिए जाने की बात पर उनसे क्षमा माँगी।
    उसके दोस्तों में से मयंक बोला, "रमेश तुम्हारे घर से लौटते समय हम सचमुच दुखी और अपमानित महसूस कर रहे थे किंतु जब हमने शांत मन से तुम्हारे पापा की कही गई बातों पर विचार किया तो हमें लगा कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं कहा। हमने उस दृष्टि से कभी सोचा ही नहीं था। एक तरफ तो हम जंगल बचाओ, पेड़ लगाओ की बात करते हैं, दूसरी तरफ इस तरह सैकड़ों टन लकड़ी व्यर्थ जला डालते हैं...'
      'हाँ रमेश,मयंक की तरह हम सब मित्रों को तुम्हारे पापा की बात बहुत अच्छी लगी।   इस वर्ष हम एक शुरुआत तो कर ही सकते हैं कि अपनी गली में अलग-अलग होली नहीं जलाएँगे।  जो रुपये हमने जमा किए हैं उनसे गरीब बस्ती के उन नंग-धड़ंग बच्चों को वस्त्र देकर आएँगे, जिन्हें पुराने वस्त्र भी नसीब नहीं हैं। क्या आप सबको मेरा सुझाव मंजूर है ?'
        सबने स्वीकृति में गर्दन हिला दी। रमेश भी अब अपने पिता से नाराज नहीं था।

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शनिवार, 3 फ़रवरी 2018

दंड या पुरस्कार

बाल कहानी 
 
               दंड या पुरस्कार

                                 -पवित्रा अग्रवाल

           क्लास से बाहर आते ही दीपक ने पूछा-"अतुल, चोर-सिपाही खेलेगा ?'
 "नहीं यार, अभी मन नहीं है।'
 "अच्छा मत खेल, हम तो दिनेश के साथ खेलेंगे।...अरे यार...जरा मुड़ कर हमारी तरफ भी देख लो, इतने बुरे तो हम नहीं हैं। खेलने को ही कह रहे हैं, तुमसे कुछ माँग तो नहीं रहे हैं ? लेकिन एक बात साफ है, चोर तुम्हें ही बनना पड़ेगा, हम तो सिपाही बनेंगे।'
      दिनेश बिना किसी तरफ देखे चुपचाप क्लास में चला गया। अतुल ने दीपक को जा घेरा, "क्यों यार, कल कोई खास बात हो गई क्या ? दिनेश को ऐसे क्यों चिढ़ा रहे हो ?'
     "तुझे नहीं मालूम ? अच्छा, कल तू टिफिन के बाद ही चला गया था, यह उसके बाद की बात है। मेरी हिंदी की किताब चोरी हो गई थी। सबसे पूछा, किसी ने नहीं बताया। सर ने क्लास के सभी लड़कों को कमरे से बाहर खड़ा कर दिया और हरेक के बस्ते की तलाशी ली गई। किताब दिनेश के बस्ते से निकली। तभी सर ने उसको तीन-चार छड़ी मारी और चोर की टोपी पहना कर स्कूल में घुमाया।'
 अतुल के चेहरे पर मुस्कान खेल गई, "बहुत अच्छा हुआ, बनता भी बहुत होशियार था।'
  "दिनेश, जरा बस्ता दिखाना, मेरी एक कॉपी नहीं मिल रही।' एक लड़के के यह पूछते ही क्लास के सब लड़के उसके चारों तरफ घिर आए। एक-एक चीज बस्ते से अलग निकाल कर देखी गई किंतु कॉपी नहीं मिली।
   तभी दूसरा लड़का बोला- "ली भी होगी तो पिटने के लिए बस्ते में थोड़े ही रखेगा...छिपा दी होगी कहीं।'

   क्लास में कोई सर नहीं थे। मेज पर डस्टर की चोट करते हुए एक लड़का बोला - "भाइयों, काले-पीले रंग की धारियों वाला मेरा पेन खो गया है। चोरी करना बहुत बुरी बात है.. जिसने भी लिया हो, वह अपने आप बता दे।'
        सबकी निगाहें दिनेश की तरफ हो गई। वह अपना बस्ता क्लास में छोड़कर बाहर निकल गया।

एक दिन मास्टर जी ने पूंछा --
  "क्या बात है दिनेश, तुमने पढ़ाई में ढ़ील डाल दी है। इस महीने तुम्हारे नंबर हर विषय में कम आए हैं। कोई दिक्कत हो तो बताओ हमें लेकिन पढ़ाई में मत पिछड़ो।' सर ने कहा।
 पीछे से कोई फुसफुसाया- "अब पढ़ाई से हट कर ध्यान चोरी में लग गया है। पढ़ने को समय ही कहाँ मिलता है ?'
 दिनेश की आँखें भर आर्इं और टप टप आँसू टपकने लगे। तभी टन-टन-टन स्कूल की घंटी बजी। सर क्लास से बाहर चले गए।
 अतुल को दिनेश पर बहुत दया आई- "दिनेश रोते क्यों हो ? सर की बात का बुरा मत मानना, तुम्हारी तो हमेशा तारीफ करते थे। इस परीक्षा में तुम्हारे कम नंबर देख कर उन्हें दुख हुआ है।'
    फिर अतुल टिफिन खोल कर उसके सामने बैठ गया- "आओ दिनेश, खाना खाएँगे।'
 "नहीं अतुल, मुझे भूख नहीं है। मैं घर से खाकर आता हूँ।'
 "तुम्हें खाना होगा, जितनी भूख हो उतना ही खा लो।'

 "यार, "चोरी मेरा काम' फिल्म लगी है, देखने जाएँगे।'
 "नहीं यार, चोरी मेरा काम नहीं है, मैं तो नहीं जाऊँगा। जिसका काम हो वह जाए।'
 "फिर तो दिनेश को जाना चाहए।'
 "वो देखकर क्या करेगा..यह काम तो उसे आता है।' सब बच्चे हँसने लगे।
        इस तरह बच्चे रोज क्लास में दिनेश को जलील करते थे। अतुल यह सब सहन नहीं कर पाया- "यह तुम लोगों की क्या तमीज है ? शर्म नहीं आती किसी का मजाक उड़ाते ?'
   "अतुल, तू दिनेश की तरफदारी क्यों कर रहा है ? क्या उसने कुछ खिला दिया है ?'
 "खिलाने को रखा क्या है, उसके पास ? अपने खाने को तो है नहीं- ' दीपक ने अपना वाक्य जोड़ा।
 "दीपक, बस बहुत हो चुका.. अब चुप हो जाओ वर्ना अच्छा नहीं होगा। किसी गरीब का मजाक उड़ाना अच्छी बात नहीं।'
 तभी प्रार्थना की घंटी बजी और सब लाइन में लगने लगे।

  फिर एक दिन    "मैं कल ही नया कलर बॉक्स लाया था। उसमें से चार-पाँच रंग की ट्यूब  गायब हैं, दिनेश अपना बस्ता दिखाओ' मोहन ने अकड़ कर कहा।
 "बस्ते में न मिलें, तो इसके कपड़े झाड़ना'-दूसरे ने सुझाव दिया।
 रोज रोज के इस तमाशे दिनेश तंग हो गया था..उसे भी गुस्सा आ गया --"मेरे पास नहीं हैं। न मैं बस्ता दिखाऊँगा और न कपड़े झाड़ने दूँगा।'
     "दिखाओगे कैसे नहीं ? तुम्हें दिखाना पड़ेगा।' बस्ता छीनते हुए मोहन ने कहा।
 दिनेश ने ज़बरदस्ती करते मोहन को पीछे धकेल दिया।
 "चोर, पहले चोरी करता है, फिर अकड़ता भी है।' मोहन अपनी नेकर की धूल झाड़ता दिनेश पर पुनः: झपटा... उसे जमीन पर पटक कर उस पर चढ़ बैठा और उस पर तड़ातड़ चाँटे व मुक्के भी बरसाने लगा। दिनेश के होंठ से खून बहने लगा।
    अतुल से यह सब देखा नहीं गया। अब उसका धैर्य समाप्त हो चुका था। उसका मन उसे बार-बार कचोटता था। दिनेश की इस दशा के लिए कई दिन से वह स्वयं को दोषी मान रहा था। उसने कई बार सोचा दिनेश को सब कुछ बता दे और उससे माफी माँग ले लेकिन इससे क्या फर्क पड़ेगा ? लड़के तो उसे चोर मानते ही रहेंगे। उसने यह बात कई बार अपने सर को भी बताने की सोची किंतु बदले में मिलने वाली सजा की याद आते ही उसका साहस जवाब दे जाता।
      लेकिन आज वह हर सजा भोगने को तैयार था। वह अपनी क्लास के शिक्षक के पास पहुँच गया। उस समय वह कमरे में अकेले ही थे।
 "सर, कुछ दिनों पहले मुझसे एक गलती हो गई थी, जो किसी को भी नहीं पता है किंतु अब मैं स्वयं ही बता रहा हूँ। मैं यह भी जानता हूँ कि उसके लिए मुझे कड़ी सजा मिलेगी।'
 "क्या गलती हो गई थी, यह तो बताओ ?'
 "सर डेढ़-दो महीने पहले एक किताब चुराने की वजह से दिनेश को शर्मा सर ने मारा था और चोर की टोपी पहनाई  थी ...लेकिन सर दिनेश गरीब जरूर है पर चोर नहीं है। उसने चोरी नहीं की थी, वह सब मेरी शरारत थी। ....
    मैं ने दीपक की किताब निकाल कर दिनेश के बस्ते में रखी थी लेकिन अब सब लड़के चोर-चोर कह कर  रोज उसका अपमान करते हैं। इसी झगड़े में आज दिनेश को खून भी निकल आया है।' कहते-कहते अतुल रोने लगा।
 जोशी जी अचंभे में पड़े उसे देख रहे थे -- "अतुल यह तो बहुत बुरा हुआ। एक बार दोषी भले ही सजा से बच जाए किंतु निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए। तभी दिनेश इतना चुप चुप और उदास रहता है। इसी वजह से शायद वह ढंग से पढ़ भी नहीं पाता होगा। इस बार उसके नंबर भी कम आए हैं लेकिन तुमने ऐसा क्यों किया ? इससे तुम्हें क्या मिला ?'
     "सर, मुझे उससे बहुत चिढ़ हो गई थी। लगभग सब मेरी उससे तुलना करते हुए कहा करते थे कि मैं बारहों महीने घर पर भी मास्टर से पढ़ता हूँ, पढ़ने की हर सुविधा मुझे प्राप्त है फिर भी हर परीक्षा में कम अंक लाता हूँ। एक दिनेश है जिसके पास पढ़ने को पूरी पुस्तकें भी नहीं हैं फिर भी वह कितने अच्छे नंबर लाता है.. मेरे लिए शर्म की बात है।'
     अत: उसे अपमानित करने के लिए ही मैंने ये शरारत की थी जो आज तक किसी दूसरे को नहीं पता। दिनेश को सजा मिलने की बात सुन कर भी मैं बहुत खुश हुआ था किंतु अब मेरा मन मुझे रोज धिक्कारता है।'
       "तुमने यह बात मुझे बता कर बहुत अच्छा किया। प्रिंसीपल साहब तथा शर्मा जी को इसका पता चला तो तुम्हें सख्त सजा दिये बिना वे नहीं मानेंगे। पर दिनेश को निर्दोष साबित करने के लिए मुझे यह सब बातें उन्हें बतानी होंगी। बिना बताए काम नहीं चलेगा। अच्छा, अब तुम क्लास में जाओ।'
      अतुल अब यह सोच कर दुखी था कि उसे सब लड़कों के सामने मार पड़ेगी फिर सब लड़के रोज चिढ़ाया करेंगे। उसका मन किसी काम में नहीं लग रहा था। सारे समय उसे यही लगता रहा कि प्रिन्सीपल साहब का बुलावा अब आया, बस अब आया। छुट्टी की घंटी बजते ही बस्ता उठाकर वह सबसे पहले स्कूल से बाहर निकल गया कि कहीं कोई रोक न ले।
    दूसरे दिन प्रार्थना सभा में प्रार्थना के बाद जोशी जी आगे आए और बोले- "दिनेश यहाँ आओ। बच्चों, तुम्हें याद होगा कि कुछ दिन पूर्व कक्षा आठ के दिनेश को चोरी करने के अपराध में सजा दी गई थी लेकिन अब हमें ज्ञात हुआ है कि दिनेश ने चोरी नहीं की थी। उसे व्यर्थ की सजा मिली। इसका हमें बहुत ही दुख है। दिनेश ने किताब नहीं चुराई थी बल्कि शरारत वश एक लड़के ने किसी की किताब निकाल कर उसके बस्ते में रख दी थी। वह लड़का बहुत शर्मिंदा है और उसने स्वयं ही हमें यह बात बताई है।'
    "सर उसका नाम बताइए। उसे कड़ी से कड़ी सजा दीजिए।' लड़कों के समूह में से आवाजें उभरीं।
 डर से अतुल के पैर काँपने लगे।
    "हाँ, यदि तुम लोगों की इच्छा होगी तो उसे सजा अवश्य दी जाएगी। सजा पाने के लिए वह तैयार है। दिनेश, उसका नाम तो तुम भी जानना चाहोगे ?'
      दिनेश भौंचक्का-सा आँखें फाड़ कर यह सब देख-सुन रहा था, कुछ सोचकर बोला- "नहीं सर, मैं नाम जान कर क्या करूँगा ? कुछ देर से ही सही किंतु उस लड़के ने निश्चय ही मन से अपनी गलती महसूस की है तभी सजा की चिंता किए बिना उसने स्वयं ही यह सब बता दिया वर्ना आप सबको कैसे पता चलता कि मैं निर्दोष हूँ। वह जो भी है, मैं उसके प्रति आभारी हूँ कि उसने सच बोलने का साहस किया वर्ना मैं इस झूठे आरोप से इतना दुखी हो चुका था कि किसी दिन स्कूल आना बंद करके हमेशा के लिए पढ़ाई छोड़ देता। इस समय उसे दंड नहीं बल्कि सच बोलने का पुरस्कार मिलना चाहिए। मेरी प्रार्थना है कि उसे
आप कोई दंड न दें और उसका नाम भी न बतायें ।'
    शर्माजी ने आगे बढ़ कर स्नेह से दिनेश की पीठ थपथपाई - "बहुत प्रतिभाशाली लड़का है। मैंने उस दिन इसकी बातों पर विश्वास नहीं किया, व्यर्थ ही सजा दी। बेटे, तुम्हें मेरे विषय में कभी कोई दिक्कत महसूस हो तो नि:संकोच स्कूल में या घर पर मेरे पास आ सकते हो।'
      स्कूल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। आठवें क्लास के छात्र समस्त अनुशासन भूल कर हर्ष मिश्रित ध्वनियाँ करते दिनेश की तरफ दौड़े। उससे पूर्व ही आगे बढ़ कर अतुल ने दिनेश को गले से लगा लिया था।
 
         -पवित्रा अग्रवाल

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